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समाज के अंदर व्यक्ति कई बंधनों से बंधा है, : देवेंद्रसागरसूरि

समाज के लिए जो उत्तरदायित्व होते हैं। उनको पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से निभाना चाहिएl आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने नोर्थटाउन के श्री सुमतिवल्लभ श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में प्रवचन देते हुए कहा कि समाज के अंदर व्यक्ति कई बंधनों से बंधा है, इसलिए उसे हमेशा गतिशील रहना चाहिए। आज का युग डिजिटल का युग है। इसके कारण व्यक्ति का व्यवहार, रहन-सहन, खानपान, विचार भी बदल गए हैं। इसके कई फायदे भी हैं और नुकसान भी। व्यक्ति को हमेशा अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर उसको प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। व्यक्ति के समाज के प्रति कुछ उत्तरदायित्व होते हैं। उनको पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से निभाना चाहिए। आज इस भागदौड़ की ज़िंदगी में व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारने वाले महत्वपूर्ण गुण संस्कार, अच्छी बातें, अच्छी आदतों की कमी लग रही है। इन अच्छी बातों व आदतों का गुण व्यक्ति को अपने जीवन में अपना...

 कर्म करोगे तो फल मिलेगा :गुरुदेव रविंद्र मुनि जी”नीरज”

कर्म का मतलब है पुरुषार्थ मेहनत क्रिया। आप कर्म करोगे तो फल मिलेगा जैसा करोगे वैसा फल मिलेगा। खिलाकर खुश रहने की भावना रखें, आपके हाथों में कर्म करने की क्षमता है तुम जैसा चाहो वैसा कर सकते हो लेकिन फल के लिए हमें पुरुषार्थ तो करना ही पड़ेगा क्योंकि बिना पुरुषार्थ के भगवान भी हमारी सहायता नहीं कर सकते हैंl यदि आप हमेशा किस्मत के भरोसे बैठे रहना पसंद करते हैं तो आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं। दिवाकर भवन पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए मेवाड़ गौरव प्रखर वक्ता पूज्य गुरुदेव रविंद्र मुनि जी”नीरज” ने फरमाया कि कर्म का मतलब है किसी क्रिया या कार्य का प्रदर्शन। यह हिंदु धर्म और दर्शन में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जिसके अनुसार व्यक्ति के कर्म उसके जीवन के भविष्य में प्रभाव डालते हैं। यह आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों के साथ जुड़ा होता है और जीवन के अनुभवों को समझाने में मदद करता है। कर्म का म...

धर्म का आयाम है, नैतिकता: साध्वी धर्मप्रभा 

Sagevaani.com @चेन्नई । धर्म का आयाम है नैतिकता । शुक्रवार को साहूकार पेठ में साध्वी धर्मप्रभा ने चातुर्मासिक धर्मसभा में श्रध्दालुओं सम्बोधित करते हुए कहा कि नैतिकता और आध्यात्मिका मनुष्य का मानवीय गुण जो उसे गुणगान औंर चारित्रवान बनाता है। बिना नैतिकता के मनुष्य मे आध्यात्मिका नहीं आ सकती है।आज हर व्यक्ति नैतिकता के उपदेश देता है और बड़ी – बड़ी बातें करता है,लेकिन स्वंय में नैतिकता का अभाव है। धर्म के तीन आयाम है, जिसमें नैतिकता एवं उपासना धर्म का सर्वोपरी आयाम बताये गये है आध्यात्मिकता प्राणी मात्र के प्रति समभाव सब में साम्य एकता का अनुभव करना आध्यात्मिकता है। इसमें संप्रदाय, रूप,वेष पंथ स्थान की मान्यता नहीं है। अर्थात बिना भेद भाव के सब के साथ आत्मवत् व्यवहार करना आध्यात्मिकता में धोखा बेईमानी ठगाई भ्रष्टाचार कहीं का नहीं है। नैतिकता का संबंध समाज से होता है नैतिकता समाज के बिना ...

आत्मा को राग द्वेष से मुक्त करना और सभी परिस्थितियों में समभाव रखना ही सर्वश्रेष्ठ आत्मरक्षा है:  डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.

🏰☔ *साक्षात्कार वर्षावास* ☔🏰           *ता :05/8/2023 शनिवार*      🛕 *स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई*  🪷 *विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, दीक्षा दाणेश्वरी प.पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.* के प्रवचन के अंश    🪔 *विषय श्री अभिधान राजेंद्र कोष भाग 7* ~ हमारी आत्मा को राग द्वेष से मुक्त करना और सभी परिस्थितियों में समभाव में रखना वह सर्वश्रेष्ठ आत्मरक्षा है। ~ जगत के सभी जीवो को पापों से रहित देखने का सामर्थ्य ही परमात्मा के मिलन का प्रथम कदम है। ~ हमारे भीतर में भी परमात्मा का अंश है ही उसकी सच्ची श्रद्धा से वह अवश्य प्रगट हो सकता है। ~ प्रभु महावीर स्वामी ने 12 1/2 साल की साधना काल में पूर्ण रूप से मौन की साधना की थी और परम मौन...

संसार में सबसे बड़ा भय मरण है: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए बताया कि जिनेश्वर भगवान महावीर ने जिनरुपी गंगा बहाई‌। संसार में ऐसा कोई भी जीव नहीं होगा जो मरना चाहे, मरण आये फिर भी जीने की अभिलाषा। संसार में सबसे बड़ा भय मरण का। यदि कोई दुःख से पीडित होकर भी मरने की कामना करता है बस संसार में दुःख नहीं झेल सकता है लेकिन जब मरण सामने आ जाती हैं तो थर थर कांपने लगता है मरण सामने आता है तो भयभीत होता है और जीने की अभिलाषा, प्रार्थना करने लग जाता है। ऐसा भी जीव अभिलाषा होती है मुझे जीना है जिसने जीवन के अंदर धर्म को धारण कर लिया है वह मरण से भयभीत नहीं होता वह जानता है मेरा तीन काल में भी मरण नहीं होता है क्योंकि मैंने ऐसा धर्माचरण कर लिया है उनको मरने की डर नहीं होती है जो दिन रात पाप में लगा रहता है उसे मरण का डर होता है जो धर्म की राह पर चलता है वह मरण को जीत लेता है अपने मरन से संथारा...

तृप्ति में ही है आनन्द की अनुभूति: गच्छाधिपति जिनमणिप्रभसूरिश्वरजी

  श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में धर्मपरिषद् को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने शनिवारीय प्रवचन में कहा कि समता में रहना ही आनन्द में रहना है और आनन्द में रहना ही समता में रहना है। जीवन में जो है, उसमें भी सन्तुष्टि के साथ में रहने वाला अभाव में होते हुए भी आनन्दित रह सकता है, प्रसन्नचित रह सकता है। आनन्द के लिए जीवन में प्राप्ति ही नहीं, अपितु तृप्ति चाहिए। आनन्द हमेशा तृप्ति में है। एक व्यक्ति नेगेटिव न्यूज को पढ़ कर भी मुस्कुराहट में रहता है। वह जब अखबार में कोई दुर्घटना या मृत्यु की खबर पढ़ता है, तब वह उस के प्रति मंगलकामना करता हुआ, प्रभु को धन्यवाद देता है कि- मैं तो सुखी हूँ, स्वस्थ हूँ। हृदय में आनन्दित रहे। ◆ सामुहिक बंधन से ही सामुहिक वेदना का भुगतान ...

तपस्या आत्मोत्थान का महत्वपूर्ण साधन है: साध्वी डॉ गवेषणाश्री

मासखमण तप अनुमोदनार्थ कार्यक्रम Sagevaani.com @तिरूपुर: युवामनीषी महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमणजी की सुशिष्या डॉ साध्वी गवेषणाश्री के सान्निध्य में तेरापंथ सभा भवन, तिरूपुर में श्रीमती सरिता श्यामसुखा के मासखमण तप का अभिनंदन समारोह मनाया गया। कार्यक्रम का प्रारंभ साध्वीश्रीजी द्वारा नमस्कार महामंत्र से किया गया। मंगलाचरण महिला मंडल द्वारा किया गया। तेरापंथ सभाध्यक्ष श्री अनिल आंचलिया ने स्वागत स्वर प्रस्तुत किया। साध्वी डॉ गवेषणाश्री ने फरमाया कि आटे का धोवन पीने वाला दूध को नहीं नहीं समझता, चीड का आभूषण पहनने वाला मोती का महत्व नहीं जानता, वैसे ही जो प्रतिदिन खाने वाला है वह तप का महत्व नहीं समझ सकता। इस दुर्लभ, दुष्कर तप का स्वाद वही ले सकता है, जिसने अपनी जिव्हा पर नियंत्रण किया है। इस प्रतियोगिता के युग में तपस्या का अनुसरण विरला ही कर सकता है। तपस्या आत्मोत्थान का महत्वपूर्ण साधन है।...

हमारी आत्मा को देखने का जरिया उसके अंदर रहे परमात्म स्वरूप को देखना है: आचार्य उदयप्रभ सूरी

किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरीश्वरजी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने प्रवचन में बताया कि हमारे पास आंखें हैं, इसका सबूत यह है कि हमें दिखता है। हमारे पास मन हैं, जिससे चिंतन मनन कर सकते हैं। इसी तरह कुछ लोग पूछते हैं हमारे पास आत्मा है, उसका क्या प्रमाण है? हमारे पास आत्मा को देखने का जरिया ही नहीं है। आत्मदर्शन का मार्ग है ध्यानयोग। उन्होंने कहा नमक अकेला होता है तो खारा लगता है, किसी के साथ मिल जाए तो प्यारा लगता है। वैसे ही आदमी का अकेलापन सबको खारा लगेगा। परमात्मा हमारी आत्मा में बसे हुए हैं, आत्मा को जूम करके देखो तो महसूस होगा। आचार्यश्री ने कहा निज की आत्मा में परमात्मा का दर्शन करने के लिए छ:काय के जीवों की रक्षा करो। सिद्ध भगवंतों का उपकार याद करो कि हमें अव्यवहार से व्यवहार राशि में प्रवेश का काम किया है। सिद्धों ने सर्वप्रथम सा...

संसार में कोई अपना नहीं है: जयतिलक मुनिजी

यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि नाता किससे है? संसारी से। स्वार्थ से हर कोई जुड़ता है। जब वक्त आयेगा तब मुहुँ दिखाने के लिए भी नहीं आयेंगे। कभी 2 माता-पिता, पत्नी पुत्र-पुत्री भी मौका मिलता है तो छोड़कर चले जाते है। पत्नी-पत्नी का साथ अंतिम तक हो। लेकिन स्वार्थ की पूर्ति न हो । व्यक्ति खारा लगने लग जाता है। ज्ञानी जन कहते है संसार में कोई अपना नहीं है, जिस दिन स्वार्थ की पूर्ति न हो तो कोई भी अच्छा नहीं लगता है। पिता के पास धन है तो पुत्री भी जाना आना लगाए रखती है। सीख देते हैं (सीख याने ज्ञान, शिक्षा) सीख देते है तो अच्छा लगता है। चार दिन पिता की सेवा करना है यह समझ रखे। बिना स्वार्थ से रखे। संकट में अपने भी पराये हो जाते है। दो बेटे है एक कमाता है एक नही कमाता है माँ किसको पूछती है धन कमाने वाले को। धर्म ध्यान करने वाले से भ...

जिसके मन में प्रभु आज्ञा का प्रेम नहीं उसके लिए कोई भी बंधन नहीं है: जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के

🏰☔ *साक्षात्कार वर्षावास* ☔🏰           *ता :04/8/2023 शुक्रवार*      🛕 *स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई*  🪷 *विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, संघ एकता शिल्पी प.पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.* के प्रवचन के अंश    🪔 *विषय श्री अभिधान राजेंद्र कोष भाग 7*🪔 ~ शासन प्रभावना और शासन रक्षा का सौभाग्य जो स्वयं कि आत्म रक्षा करता है उसके लिए ही संभव है। ~ सद्गुरु मिलना सरल है किंतु सद्गुरु के प्रति समर्पण होना और आज्ञा का पालन बहुमन भाव से होना कठिन है। ~ जो पाप करता है वह इतना पापी नहीं है जितना पापी वह है कि जिनके सिर पर गुरु तत्व नहीं है। ~ जीवन में गुण, सकारात्मकता तभी प्रकट होती है जब साधक स्वयं के स्वभाव के मूलभूत परिवर्तन के लिए पु...

त्याग का संकल्प लेने वालों को मिला तपस्वी साध्वी को पारणा कराने का लाभ

SAgevaani.com @शिवपुरी। लगभग 45 दिन से सिद्धि तप की आराधना कर रहीं प्रसिद्ध जैन साध्वी रमणीक कुंवर जी महाराज की सुशिष्या नेपाल प्रचारिका साध्वी पूनमश्री जी की तपस्या पूर्ण होने पर आज उन्हें पारणा कराने का लाभ उन श्रावक-श्राविकाओं को मिला जिन्होंने कोई ना कोई व्रत और संकल्प लिया है। इनमें ब्रह्मचर्य व्रत के पालन से लेकर 8 उपवास की तपस्या सहित अन्य धार्मिक संकल्प भी शामिल हैं। साध्वी पूनमश्री जी ने आहार श्रावक धर्मेन्द्र गूगलिया के निवास स्थान पर लिया। इस अवसर पर साध्वी रमणीक कुंवर जी ने तप और त्याग की महिमा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन में तप को अमृत द्वार की संज्ञा दी गई है। मोक्ष जाने का यह एक मार्ग है। साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने कहा कि मनुष्य को प्रतिदिन कोई ना कोई त्याग के प”ाखाण अवश्य लेना चाहिए। जिससे हम हिंसा आदि दोषों से बच सकते हैं और कर्मों की निर्जर...

पचक्खाण ऐसा होना चाहिए जिसमें आत्मा की शोभा बढ़े- आचार्यश्री उदयप्रभ सूरी

किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म.सा. ने चित्त दमन नामक अधिकार की विवेचना करते हुए कहा चित्त दमन के लिए यम और नियम का पालन करना अनिवार्य है। यम यानी पांच महाव्रत और नियम यानी पांचों महाव्रतों को साधने के लिए बनाए नियम का पालन करना। अपने अंतःकरण से इंद्रियों को वश में करना है, उसके लिए ‘आवश्यक’ क्रियाओं से जुड़ना अनिवार्य है। ज्ञानी कहते हैं बड़ा तप करना अपना- अपना विषय है, पर किसी भी तरह के पचक्खान लेना ‘आवश्यक’ है। आचार्यश्री ने कहा आत्मनियंत्रण के लिए मनोनियंत्रण और मनोनियंत्रण के लिए विषयनियंत्रण आवश्यक है। विषय का नियंत्रण पचक्खाण नामक नियम से आता है। विषय/ पाप के नियंत्रण से पाप काबू में आते हैं। ज्ञानी कहते हैं पचक्खाण ऐसा होना चाहिए जिसमें आत्मा की शोभा बढ़े। उन्होंने कहा धर्म लोक...

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