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अहंकार को जीते बिना क्रोध से मुक्ति संभव नहीं: साध्वी नूतन प्रभाश्री

साध्वी रमणीक कुंवर जी के निर्देशन में आचार्यर् विजय धर्मसूरि जी की 101 वी पुण्यतिथि पर हुई गुणानुवाद सभा Sagevaani.com @शिवपुरी ब्यूरो। जैन दर्शन में जिन 18 पापों की चर्चा की गईर् है उनमें क्रोध भी एक पाप है। क्रोध की उत्पत्ति अहंकार से होती है और अहंकार को समाप्त किए बिना क्रोध से बचाव संभव नहीं है। उक्त उदगार प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने कमला भवन में आयोजित विशाल धर्मसभा में व्यक्त किए। धर्मसभा में साध्वी वंदना श्री जी ने श्रावक के 21 गुणों में से शारीरिक स्वास्थ्य और सौम्यता पर विस्तार से प्रकाश डाला। धर्मसभा में शिवपुरी में समाधि लेने वाले प्रसिद्ध जैनाचार्य विजय धर्मसूरीजी की 101 वीं पुण्यतिथि मनाई गईर् और इस अवसर पर गुणानुवाद सभा में साध्वी रमणीक कुंवर जी और साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि गुरू के आशीर्वाद से आचार्य जी ने अपने जीवन को सफल और ...

सफ़ाई अभियान बड़े पैमाने पर चला

गांधी जयंती के अवसर पर आरंभ हुए विश्व के सबसे बड़े स्वच्छता अभियान “स्वच्छ भारत अभियान” की 9 वी वर्षगांठ के अवसर पर स्वच्छता श्रमदान कार्यक्रम मरीना बीच मे चेन्नई महानगर पालिका, राजस्थान पत्रिका, एक्ष्नोरा इंटरनेशनल एवं अनेक सामाजिक संगठनों एवं स्कूल कालेजो के विद्यार्थियो द्वारा सफ़ाई अभियान बड़े पैमाने पर चलाl इस अभियान को प्रतिज्ञा दिलाकर, हरी झंडी दिखा कर सफ़ाई करना प्रारंभ किया। इस अभियान मैं चेन्नई महानगर पालिका एवं इंडियन ओवरसीज बैंक का पूरा सहियोग रहा।

हमें अपनी संस्कृति, धर्म पर गौरान्वित महसूस करना चाहिए – गणिवर्य समर्पणप्रभ विजयजी

किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ में विराजित आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी के शिष्य गणिवर्य समर्पणप्रभ विजयजी ने प्रवचन में दशवैकालिक सूत्र की विवेचना करते हुए कहा कि दश यानी इसमें दस विभाग है और वैकालिक यानी असज्झायकाल या अकाल या जब हम स्वाध्याय नहीं कर सकते हैं, ऐसी स्थिति में इस ग्रंथ का वांचन नहीं कर सकते हैं। इसकी रचना स्वयंभव सूरीजी ने की। स्वयंभव सूरीजी ब्राह्मण कुल के थे। उन्होंने कहा साधु जीवन में कैसे मोक्षमय बने। मन, इंद्रियों के विकारों पर कैसे विजय प्राप्त करे, इसका वर्णन इस सूत्र में हुआ है। उन्होंने कहा हमें अपनी संस्कृति, धर्म पर गौरान्वित महसूस करना चाहिए। संसार में रहते हुए अल्प हिंसा वाली वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए। नियम और नियंत्रण के माध्यम से अति जीवहिंसा से बचा जा सकता है। सुपात्रदान का लाभ भी अतिसंयोग और पुण्य से प्राप्त होता है। गणिवर्य ने बताया कि दशवैकालिक ...

अपनी आराधना ऐसी होनी चाहिए कि दूसरों को प्रेरणा मिले: गणिवर्य समर्पणप्रभ विजय

किलपॉक श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में विराजित गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सुरीश्वरजी के शिष्य गणिवर्य समर्पणप्रभ विजयजी ने ‘ओघ निर्युक्ति’ ग्रंथ की विवेचना करते हुए में कहा कि इस आगम में महापुरुषों साधु- साध्वी, श्रावक, श्राविका के जीवन की आचार संहिता का वर्णन है। आगम के प्रमुख चार ग्रंथ है आवश्यक सूत्र, अनुयोग, उत्तराध्ययन सूत्र और ओघ निर्युक्ति। ओघ निर्युक्ति ग्रंथ में सात द्वार बताए गए हैं प्रतिलेखना द्वार यानी वस्तु, पात्र प्रतिलेखन, पडिलेहन विधि आदि, पिंड द्वार यानी साधु के आहार चर्या का वर्णन, उपधि द्वार यानी उपकरण आदि की जयणा का वर्णन, अनायतन द्वार यानी साधु के ठहरने की जगह और जीवों की हिंसा से बचने का लक्ष्य, प्रतिसेवन, आलोचना और आलोचना पूर्ण करना यानी आलोचना लेनी ही नहीं, पूर्ण करनी है। इससे आत्मा के मलिन संस्कार दूर होते हैं। शास्त्र विधान में बताया गया है कि साधु...

आचार्य सम्राट जयमलजी म सा के जीवन के दृष्टांत पर भाषण प्रतियोगिता

आचार्य सम्राट जयमल जी म सा की 316 वीं जयंती के उपलक्ष्य में नौ दिवसीय कार्यक्रम के अंतर्गत दिनांक 30 सितंबर, शनिवार को प्रथम दिवस में पुज्य जयमल जी म सा के जीवन के दृष्टांत पर भाषण प्रतियोगिता नार्थ टाउन में AMKM स्थानक, विला 7 में आयोजन किया गया। अनेक वक्ताओं ने जयमल जी महाराज साहब के बारे में वर्णन किया। ज्ञानचंद कोठारी ने बताया कि आचार्यश्री जयमलजी म. धर्मोद्धारक वीर पुरुष श्री धर्मदासजी म० की परम्परा के ज्योतिर्धर सन्तरत्न थे। वे माता जिनवाणी की जीवनपर्यन्त त्याग, तपस्या, वैराग्य आदि के द्वारा उपासना करते रहे। आपका जन्म मरु-प्रदेश के लांबिया ग्राम में हुआ था। माता पिता का नाम क्रमशः महिमाबाई और मोहनदासजी था। एक संभ्रांत परिवार की कन्या (श्री लक्ष्मी बाई) के साथ इनका विवाह 22 वर्ष की अवस्था में हुआ था। मेड़ता में आपको पूज्य श्रीभूधरजी म. का वैराग्यमूलक उपदेश श्रवण करने का स्वर्ण-अवसर मि...

व्यवहार कुशल होना सफल जीवन का एक सुखद मार्ग है : देवेंद्रसागरसूरि

मनुष्य की पहचान उसके आचरण से होती है। कोई अपनी अच्छाई-बुराई का प्रमाणपत्र लेकर नहीं घूमता, बल्कि उसका व्यवहार ही उसके व्यक्तित्व का प्रतिबिंब है। उपरोक्त बातें आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन जैन संघ में प्रवचन देते हुए कही, उन्होंने आगे कहा कि शैक्षणिक विश्वविद्यालयों में भले ही प्रमाणपत्रों की दरकार पड़ती हो, लेकिन जीवनरूपी विश्वविद्यालय में व्यवहार ही व्यक्तित्व की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति होती है। जो व्यवहार कुशल नहीं उसे नहीं मालूम होता कि किस से कैसे व्यवहार करना चाहिए। वह मनुष्य होने की न्यूनतम अर्हता पूरी नहीं कर पाता। लिहाजा जीवन में व्यवहार कुशलता अत्यंत आवश्यक है। व्यवहार कुशल होना असल में जीवन जीने की विधि है। उद्दंड होने में कोई मेहनत नहीं लगती, लेकिन सुशील, सज्जन एवं व्यवहार कुशल होना बेहद कठिन है। मगर ये गुण गर्भ से ही नहीं ग्रहण किए जाते। जन्म के समय स...

संकल्प मजबूत रहे तो असंभव भी संभव हो जाता है : प्रवीण ऋषि

इस बार फिर बनेगा कीर्तिमान, 1 अक्टूबर से भव्य नवकार कलश अनुष्ठान Sagevaani.com @रायपुर (वीएनएस)। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने शुक्रवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि अगर आपका संकल्प मजबूत रहेगा तो असंभव कार्य भी संभव हो जाता है। कृष्ण, नील और कपोत लेश्या वाले व्यक्ति का संकल्प कभी मजबूत नहीं होता है, वे बड़ी जल्दी भटक जाते हैं। ये नीच लेश्या का चरित्र है।उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी है। उपाध्याय प्रवर शुक्रवार को नीच लेश्या के बाद उच्चा लेश्या का वर्णन कर रहे थे। उन्होंने बताया कि जो चार कषाय को पतला करे और आत्मा का भान रखे वो तेजो लेश्या है। जो कीचड़ में भी कमल खिला दे वो पदम् लेश्या है। जो शुभ ध्यान में रमा दे, अशुभ ध्यान का त्याग करा दे, राग द्वेष से दूर रखे, वो शुक्ल लेश्या है। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि अगर आप सोचें कि जो मैं कर सकता हूं, वो कर के ...

ऐसी गलती मत करो, जिसे तुम सुधार न सको : प्रवीण ऋषि

नवकार कलश अनुष्ठान को दो दिन शेष… Sagevaani.com @रायपुर। लालगंगा पटवा भवन में चल रही प्रवचन माला में उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि लेश्या का वर्णन कर रहे हैं। शुक्रवार को प्रवचन से पहले तीर्थेश मुनि ने अपने गीतों के माध्यम से धर्मसभा को बताया कि हमारी अंतरआत्मा में जो हलचल पैदा कर दे, वो तरंगें लेश्या है। जो व्यक्ति हिंसा करने से नहीं डरता, वो कृष्ण लेश्या वाला होता है। जो व्यक्ति अपना ही सुख चाहता है, और दूसरों के सुख से जलता है, वो नील लेश्या वाला होता है। जो अपने दुर्गुणों को छुपाता है, लेकिन औरों को दुर्गुणों को प्रकट करता है, वो कपोत लेश्या वाला होता है। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी है। धर्मसभा को संबोधित करते हुए उपाध्याय प्रवर ने कहा कि कभी ऐसी गलती मत करो, जिसे तुम सुधार न सको। जैसी गलती द्रौपदी ने की थी। एक छोटा सा मजाक, एक व्यंग, कटाक्ष बन गया ...

जो विनम्र होते हैं वे हर जगह सम्मान पाते हैं: देवेंद्रसागरसूरि

श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में पूज्य आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि धर्म-ग्रंथों का एक मूल मंत्र है जो नम्र होकर झुकते हैं वही ऊपर उठते हैं। विनम्रता न केवल आपके व्यक्तित्व में निखार लाती है, बल्कि कई बार सफलता का कारण भी बनती है। विनम्रता के एवज में जो सम्मान मिलता है उसका एक अलग महत्व है। मन की कोमलता और व्यवहार में विनम्रता एक बड़ी शक्ति है। कोमलता सदा जीवित रहती है, जबकि कठोरता का जल्दी ही विनाश हो जाता है। तलवार कठोर से कठोर पदार्थ को काट देती है, लेकिन कई कठोर पदार्र्थों को काटने की ताकत उसमें नहीं होती। नदी समुद्र तक पहुंचती है तो अपने साथ पानी के अतिरिक्त बड़े-बड़े लंबे पेड़ साथ ले आती है। एक दिन समुद्र ने नदी से पूछा कि तुम पेड़ों को तो अपने प्रवाह में ले आती हो, परंतु कोमल बेलों और नाजुक पौ...

विश्व शांति की स्थापना हेतू धर्म की है- परम आवश्यकता: कान्ति मुनि

विश्व शांति जप महामहोत्सव सुल्लूरपेठ में होगा भव्यता पूर्वक आयोजित आज पूरा विश्व हिंसा, आतंकवाद, उग्रवाद, संप्रदायवाद की ज्वालाओं में जल रहा है । विश्व शांति की स्थापना के लिए हमें धर्म की शरण को स्वीकार करना ही होगा। धर्म की शरण से ही विश्व शांति एवं विश्व बंधुत्व की स्थापना संभव हो सकती है । यह विचार ओजस्वी प्रवचनकार डॉ. श्री वरुण मुनि जी म. सा. ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने फरमाया- विश्व शांति के उदेश्य से गुरु गणेश मिश्री पावन स्मृति धाम, सुल्लूरपेठ के प्रांगण में सायर बाई चंपा लाल खाबिया चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधन् में, 1 अक्तूबर 2023 (रविवार) को विश्व शांति जप महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस समारोह को आगम मर्मज्ञ प. पू. श्री कांति मुनि जी म. सा., उत्तर भारत गौरव उप प्रवर्तक प. पू. श्री पंकज मुनि जी म. सा. अपना पावन सान्निध्य प्रदान करेंगे। उन्होंने बताया य...

पूजक से पूज्य बनने के लिए पूज्य का पूजन किया जाता है: आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीजी

किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने ठाणांग सूत्र की विवेचना करते हुए कहा इस सूत्र को पढ़ने का अधिकार केवल श्रमणों को दीक्षा पर्याय आठ वर्ष बाद ही दिया जाता है। इस सूत्र में बताया गया है कि आत्मा एक है। इस सूत्र में स्यादवाद को बहुत महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि यह मोक्ष मार्ग में हमारा मार्गदर्शक है। स्यादवाद यानी एक वस्तु के अनेक दृष्टिकोण। स्यादवाद जब तक नहीं समझ पाएंगे तो वस्तु को समझ ही नहीं पाएंगे। ज्ञान जितना है, उसका उतना सम्यग उपयोग करना शुरू कर दो। मात्र संग्रह वाला ज्ञान मोक्ष नहीं देता। आत्मा का लक्षण है उपयोग। सब आत्मा का लक्षण समान है, जैसे सूर्य एक ही है लेकिन वह अपना रंग और प्रभाव बदलता रहता है, वह उसके पर्याय से दिखता है। आत्मा आत्म स्वरूप से एक है लेकिन पर्याय अनेक है। आत्मा एक है इसका दूसरा कारण ...

जिसका जीवन धर्ममय होता है उस पर ग्रहों का नहीं पड़ता कोईर् दुष्प्रभाव: साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

जैन साध्वी ने बताया कि धन की पेढ़ी से पहले धर्म की पेढ़ी को दें महत्व, धर्म स्थान की बढ़ाऐं ऊर्जा Sagevaani.com @शिवपुरी ब्यूरो। जिसका जीवन धर्ममय होता है और जिसके जीवन की धूरी नैतिकता, आस्तिकता और सदाचार होती है उसे जीवन में किसी कष्ट का सामना नहीं करना पड़ता। राहू हों या केतू अथवा शनि आदि ग्रहों का दुष्प्रभाव उस पर नहीं पड़ता। उक्त उदगार प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने कमला भवन में आयोजित विशाल धर्मसभा में व्यक्त किए। धर्मसभा में उन्होंने समझाईश दी कि जिसने अपने जीवन में धर्म की पेढ़ी को महत्व दिया और अपनी आराधना तथा साधना से धर्म स्थानों को ऊर्जावान बनाया उसे कहीं भटकने की आवश्यकता नहीं है। धर्मसभा में साध्वी वंदना श्री जी ने इस बात पर दु:ख व्यक्त किया कि आज इंसान ने बाहरी दुनिया में काफी प्रगति कर ली है, लेकिन आंतरिक जगत में शुन्यता कायम है। यही कारण है कि इंसान का जीवन दु:खों की खा...

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