Blog

जीवों को तारने के लिए दो धर्म: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में ए यम के यम स्थानक में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि भगवान ने भवी जीवों को तारने के लिए दो धर्म बताये है आगार धर्म और अनगार धर्म। आगार धर्म श्रावक और श्राविकाओं के लिए, अनगार धर्म साधु और साघ्वीयों का सर्वविरति धर्म‌‌। जो ममत्व के साथ रहते है कुछ छूट रखते है वो है आगार धर्म। जो बिना ममत्व के साथ रहते है वो है सर्वविरति धर्म। भगवान ने संसारी आत्मा को भटकने नहीं दिया वो कभी भी देशविरति धर्म से सर्वाविरति धर्म में आ सकता है इसलिए आगार धर्म का निरुपण किया। जिससे वो आगार धर्म को स्वीकार कर सके। आगार धर्म में भी 5 अनुव्रत तीन गुणव्रत और चार शिक्षावत का निरुपण कर दिया। अणुव्रत भी कम नहीं हैं। महाव्रत के बराबर है अणुव्रती, पाटे पर नहीं बैठता है कभी भी पाटे पर आ कर बैठ सकता है महाव्रती और अणुव्रती का मिलान रोज होता है। भगवान ने श्रावक को भी तीर्थ में लिया है तीर्थ यानि...

बड़ी मुश्किल से मिला है मनुष्य जन्म, इसे सार्थक कर लो : साध्वी वंदनाश्री जी

साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने बताया- जो जीवन को पतित करे वह पाप है Sagevaani.com @शिवपुरी। 84 लाख जीवयोनि में भटकने के बाद पुण्य के प्रभाव से आपको मनुष्य जीवन मिला है। इस मनुष्य जीवन को सद्कर्म और धर्म आराधना कर सार्थक कर लो अन्यथा पछताने के अलावा कुछ हाथ नहीं रहेगा। मानव जीवन की व्यथा में अगले भव की व्यवस्था कर लो यही जीवन की सार्थकता है। उक्त बात प्रसिद्ध जैन साध्वी वंदनाश्री जी ने कमला भवन में आयोजित विशाल धर्मसभा में कही। साध्वी नूतन प्रभाश्री जी जैन दर्शन में वर्णित नौ तत्वों की व्याख्या कर रही हैं। आज उन्होंने पाप तत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जो जीवन को पतित करे वह पाप है। इस अवसर पर साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने प्रसिद्ध जैनाचार्य विजयधर्म सूरि जी की पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हें याद किया और कहा कि उनकी स्मृति में वह आगामी दिनों में जप और तप का समाज के सहयोग से आयोजन करेंगी। धर्मसभा के...

सुख की परिभाषा है कषायों की मंदता, संक्लेश का अभाव और प्रसन्नता: आचार्य उदयप्रभ सूरी

किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने आचारांग सूत्र के अंतर्गत कहा कि कष्ट की साधना के मार्ग सुख देने वाले होते हैं। सुख के साधन का मार्ग दुख देने वाले हैं। सुख की परिभाषा है कषायों की मंदता, संक्लेश का अभाव और प्रसन्नता। ज्ञानी कहते हैं आत्मा के अंदर छोटे-मोटे संकलेश चलते ही रहते हैं, उनको अनुभव में न लें। हमें अपने मन के संक्लेश जब पता चलेंगे, तब हम शांत होंगे। जगत में तीन प्रकार के सुख होते हैं मान्यता वाला सुख, व्यवहार सुख और परमार्थ सुख। भूख, विषय की इच्छा या गर्मी, ये सब मान्यता वाले सुख हैं। आज तक जीवात्मा मान्यता वाले सुखों को लेकर भ्रमणा में बैठा है। वर्तमान में व्यवहार सुख देखकर लोग कहते हैं हम तो बहुत सुखी हैं। ज्ञानी कहते हैं जब तक पुण्य है तब तक ही यह सब चलेगा। जब पुण्य की बात करनी है तो व्यक्ति स्वयं...

आचार्य सम्राट पुज्य जयमल जी म सा की 316वीं जन्म जयंती नार्थ टाउन में

आचार्य सम्राट पुज्य जयमल जी म सा की 316वीं जन्म जयंती नार्थ टाउन में 30 तारीख से 8 तारीख तक नौ दिवसीय कार्यक्रम के रूप में मनाई जाएगी नार्थ टाउन के ए यम के यम स्थानक में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने फरमाया कि सम्यकत्व हर श्रावक और श्राविका को अपनाना चाहिए । सम्यकत्व से ही मुक्ति प्राप्त होती हैं सम्यक्त्व आने के बाद जा भी सकता है जब तक क्षायिक सम्यकत्व नहीं होता है तब तक शुद्ध धर्म का पालन करना पड़ता है। जैसे सम्यकत्व होता है वैसा ही धर्म होता है धर्म और मोक्ष मे ही सम्यकत्व द्वार है धर्म का मार्ग खुलने पर ही क्षायिक सम्यकत्व प्राप्त होता है सम्यकत्व के 5 दुषण बताये है। पाँचवा है पर पाखंडी की प्रशंसा। ऐसे की संगति, प्रशंसा नहीं करना जिसमे वह धर्म से भ्रष्ट हो जाये। जैसी संगति वैसा धर्म आचरण होगा। बुरी संगति से धर्म भी गया परिवार भी गया । सब कुछ नष्ट हो जायेगा। कितना बड़ा नुकसान होता है उनकी संग...

जो मन में चल रहा है उसे बोलना सीखो : प्रवीण ऋषि

नवकार कलश अनुष्ठान की तैयारियां जोरों पर… Sagevaani.com @रायपुर। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा कि कई बार मनुष्य अपने मन में क्या चल रहा है, उसे बोलने की जगह कुछ और बोल देता है। हम किसी उलझन में फंस जाते हैं तो हमारे मन में यह चलता रहता है कि कैसे हम किसी से बोलें? यह कपोत लेश्या का चरित्र है। आदमी उलझन में फंस जाता है। सीधा व्यक्ति टेढ़ा चलने लगता है। जो बात मन को, दिल को चुभती है, उसे बता नहीं सकता है। इस लेश्या से बचने के लिए जो मन में चल रहा है, उसे बोलना सीखो। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी। उपाध्याय प्रवर गुरुवार को लालगंगा पटवा भवन में धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। लेश्या की प्रवचन माला में आज उन्होंने कपोत लेश्या का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि जो हम नहीं देख सकते हैं उसे जानने के लिए हम ज्योतिष के पास जाते हैं, और जो हम देख सकते है, लेकिन हमें...

अपने कर्मो से डरे ईश्वर से नहीं,भगवान तो माफ कर देगा,पर कर्म माफ नहीं करते है: महासती धर्मप्रभा

Sagevaani.com @चैन्नई। कर्मो से डरो ईश्वर से नहीं,ईश्वर तो माफ कर देता है परन्तु कर्म माफ नहीं करतें है। गुरवार साहूकारपेट जैन भवन के मरूधर केसरी दरबार मे महासती धर्मप्रभा ने श्रावक श्राविकाओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि कर्मो के कारण ही हमारी आत्मा संसार मे अनादि काल से भटक और अटक रही है।संसार में सुख- दुःख कर्मों के फल अनुसार ही मिलते हैं। पुण्य कर्मों का फल सुख के रूप में हमें मिलता है। पाप कर्मों का फल दुःख के रूप में मिलता है। इन कर्मों के फल से आज तक कोई भी प्राणीं नहीं बच पाया है। कर्मों के फल की सजा भगवान महावीर स्वामी को भी भोगनी पड़ी थी।यदि हमारे कर्म अच्छे हैं तो यह जीवन सुधर सकता है वरना यह आत्मा संसार फिर से अटक भटक सकती है। संसार मे मानव भव ही एक ऐसा भव जिससे हम आत्मा को संसार से छुटकारा दिला सकते है। पुण्य और शुभ कर्मों के आधार पर ही हमे मानव भव मिला है और हम तुच्छ वस्तुओं को...

श्रमणसंघ को उच्च शिखर तक पहुंचाया था सौभाग्य मुनि महाराज ने: महासती प्रितीसुधा

गुणगान सामायिक और जाप करके मनाया गया श्रमणसंघ के महामंत्री सौभाग्य मुनि का पुण्य स्मृति दिवस अहिंसा भवन  Sagevaani.com @भीलवाड़ा। सम्पूर्ण मेवाड़ गुरू सौभाग्य के उपकारो भूला नहीं सकता है। गुरूवार अहिंसा भवन मे श्रमणसंघ के महामंत्री सौभाग्य मुनि महाराज के पुण्य स्मृति दिवस पर महासती प्रिती सुधा ने धर्मसभा मे गुणागान करतें हुए कहा कि भौतिक रूप से सौभाग्य जी मुनि महाराज कि देह हमारे बीच नहीं है पर.श्रमणसंघ एवं सम्पूर्ण जैन समाज उनके योगदान को भूला नहीं सकता है। सौभाग्य मुनि ने श्रमणसंघ को उच्च शिखर तक पहुंचाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को निभाते हुए गुरू अम्बेश के बताये गये अहिंसा के मार्ग को अपनाकर समाज को संघठन एकता के सूत्र में जो बांधा उन उपकारों को मेवाड़ भूल नहीं सकता है। आपकी आपकी साधना और विद्वत्ता को देखकर आचार्य आनन्द ऋषिजी एवं सभी संतो ने आपको श्रमण संघ के महामंत्री पद प्रदान किया गय...

सचित्र जैन आगम विमोचन समारोह का भव्य आयोजन होगा सूल्लूरपेठ में

श्रुताचार्य साहित्य सम्राट पूज्य प्रवर्तक गुरुदेव श्री अमर मुनि जी म. सा. ने आज से लगभग 30 – 40 वर्ष पहले चिंतन किया कि आने वाली युवा पीढ़ी (न्यू जनरेशन) का रूझान आंगल भाषा (इंग्लिश) की ओर अधिक रहेगा । यह उस महान् युगपुरुष गुरुदेव की एक दूरदृष्टि थी, उनका एक विजन था और केवल विजन ही नहीं, उन्होंने अपने उस लक्षय को साकार भी किया। पूरे विश्व में प्रथम बार उत्तर भारतीय प्रवर्तक राष्ट्र संत अनंत उपकारी दादा गुरुदेव महामहिम प. पू. भण्डारी श्री पदम चन्द्र जी म. सा. के पावन नाम से पदम प्रकाशन का गठन हुआ, जिसके अंतर्गत सचित्र प्राकृत, हिंदी एवं इंग्लिश भाषा में जैन आगम साहित्य का प्रकाशन किया जा रहा है। उपरोक्त जानकारी देते हुए मधुर वक्ता श्री रूपेश मुनि जी म. सा. ने बताया कि पूज्य दादा गुरुदेव वाणी भूषण श्री अमर मुनि जी म. सा. के जीवन काल में 23 आगमों का प्रकाशन कार्य संपन्न हुआ। पूज्य दादा ...

जीवन के तारों को साधना ही साधना होती है: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैंl बंधुओं जैसे कि साधे जीवन की वीणा के तार हमारा जीवन वीणा के तारों की तरह वीणा के तारों को साध लिया जाए तो अद्भुत संगीत के जनक हो जाते हैंl अनुपम शांति और अनमोल आनंद का सृजन कर देते हैंl वीणा के तारों को साधने का बहुत अगर हमें नहीं होगा तो कभी हम तारों को ढीला छोड़ देंगे या कभी हम इतना कर देंगे की ध्वनि बिगड़ जाएगीl जीवन के तारों को साधना ही साधना होती है, जीवन की तार शरीर के तार मां के तार परिवार धर्म और समाज के दर हमसे साधने चाहिए मुझे कोई पूछे कि आप दिन भर क्या करते हो तो मैं सिर्फ यही कहूंगी कि आनंद है सांसे तो सास का आनंद हैl तन मन नहीं है तो तन मन का आनंद है समझ ही तो समाज का धर्म है तो धर्म का इं...

किसी को मारकर ही नहीं, बल्कि उसे दुखी कर भी आप हिंसा कर सकते हैं : साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

साध्वी जी ने बताया कि जो सत्य बोलता है उसकी वाणी सिद्ध होती है Sagevaani.com @शिवपुरी। जैन दर्शन में जिन 18 पापों की चर्चा है उनमें सबसे पहला पाप हिंसा है। हिंसा का अर्थ किसी को मारना या किसी की जान लेना ही नहीं, बल्कि शब्दों से भी किसी को घायल और मारा जा सकता है। किसी के मन को शब्दों, अपने व्यवहार और आचरण द्वारा दुखी करना भी हिंसा है। उक्त उद्गार प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने स्थानीय कमला भवन में आयोजित एक विशाल धर्मसभा में व्यक्त किए। धर्मसभा में साध्वी वंदनाश्री जी ने जीवन की 4 गतियों में से मनुष्य गति को सर्वश्रेष्ठ बताया और कहा कि मनुष्य जन्म लेकर ही इंसान नर से नारायण बन सकता है। आत्मा परमात्मा बन सकती है। साध्वी जयश्री जी ने मौत जब तुझे आवाज देगी, घर से बाहर निकलना होगा…भजन का गायन कर माहौल को आध्यात्मिकता से परिपूर्ण कर दिया। धर्मसभा में कोटा से जैन समाज का प्रतिनि...

 जैन का विशेष निर्देश है सादा जीवन उच्च विचार: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन के ए यम के यम स्थानक में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आत्म बंधुओ, सम्यकत्व के दूषण यानि मलिनता बताये है। मलिनता यानि सम्यकत्व से मिथ्यात्व की ओर बढ़ना लेकिन जैन का विशेष निर्देश है सादा जीवन उच्च विचार । ऊच्च विचार यानि सदाकाल सही सोचना सही बात का निर्णय करना । ऊंचे विचार रहेंगे तो किसी क प्रति भी बुरी भावना नहीं आयेगी जैन कुल में जन्म लेने पर भी भौतिकता में रचा पचा रहता है । सादा जीवन अच्छा नहीं लगता है। आडम्बर युक्त जीवन जीने की अभिलाषा नहीं रखना। सादा जीवन जीने की इच्छा रखना। आडम्बर युक्त जीवन- जीने से अंहकार बढ़ता है ज्ञानी जन कहते है व्यक्ति गुणों से पूजा जाता है वस्त्रों से नहीं। जैन धर्म में गहनों और वस्त्रों को नहीं दिखाया जाता है अन्य धर्मों में आडम्बर युक्त जीवन पर जोर दिया हैं आडम्बर युक्त जीवन मिथ्यात्व की ओर ले जाता है कर्मबन्ध ह...

अच्छी सोच को सुनने वाले कम होते हैं, दिमाग में रखने वाले उससे भी कम और उसको टिकाने वाले उससे भी कम होते हैं: आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीजी

किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने आचारांग सूत्र के तहत कहा कि आत्मा आत्मा में कोई फर्क नहीं है, चाहे वह एकेंद्रिय, बेइंद्रिय या पंचेेंद्रिय की हो। चींटी को तीन इंद्रिय है। चींटी को जन्म से ही नहीं दिखता लेकिन वह आहार वासना के लिए गंध के आधार पर अपनी गति बनाती है। कुछ इंद्रियां काम नहीं करती लेकिन जीव के संस्कारों से वह महसूस करते हैं। व्यक्ति को सपने आने के समय पांचो इंद्रियां सुषुप्त अवस्था में होती है लेकिन फिर भी हम शब्द, रुप, गंध को महसूस करते हैं। चींटी देखती नहीं, फिर भी चलती- सुनती है और मक्खी सुनती नहीं, फिर भी महसूस करती है। यह आत्मा में रही हुई संज्ञा द्वारा होता है। ज्ञानी कहते हैं हर जीवात्मा के पास चार संज्ञा रही हुई है। छोटे जीवों में भी माया संज्ञा होती है, चाहे वह बेइंद्रिय हो या तेइंद्रिय। जीव...

Skip to toolbar