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धन-दौलत,मोह-माया सुख का नहींं, हमारे दुःख का साधन है: महासती धर्मप्रभा

Sagevaani.com/चैन्नई। संसार में सांसो का कोई भरोसा नहींं दुसरी सांस आऐ भी या नहीं आऐगी कोई भी बता नहीं सकता है।मंगलवार साहुकारपेट जैन भवन में महासती धर्मप्रभा ने आयोजित धर्मसभा में श्रोताओं को धर्मसंदेश प्रदान करतें हुए कहा कि समय अमूल्य है और जीवन क्षणभंगुर है और मनुष्य शरीर की नश्वरता को जानतें हुए भी संसार के क्षण मात्र के सुख को पाने की चाह में वो परलोक के सुख को खो रहा है। जबकि संसारी सुख से आत्मा को सुख नहींं दुःख मिलता है आत्मा को तब सुख मिल सकता है जब मनुष्य अपने मोह को छोड़ेगा तभी वह परलोक के सुख को प्राप्त कर सकता है। भगवान महावीर स्वामी के प्रथम शिष्य गौतम स्वामी को मोह के कारण देर से केवलज्ञान प्राप्त हो पाया था। हमारा मोह घटेगा नहींं तब तक है हमारी आत्मा संसार से तिर नहीं सकती है और नाही आत्मा को मुक्ति मिलने वाली है। जितना हमारा मोह बढ़ेगा उतनी ही बार संसार की अलग-अलग जीवा योनि...

मोक्षगामी आत्माओं के स्रवणीय वचन को जिनवाणी कहते है: जयतिलक मुनिजी

यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि जिनेश्वर भगवान ने सकल जीवों को धर्म मार्ग का निरुपण तारने के लिए किया। श्रुत यानि सुनना, चारित्र यानी आचरण करना। कुछ विशिष्ट आत्मायें होती है जिनके पास जन्म से ही ज्ञान होता है ऐसी भवि आत्माएं ही मोक्ष गामी होती हैं। मोक्षगामी आत्माओं से जो वचन श्रवण किये जाते है वो वानी जिनवाणी कहलाती है। जीवन तभी सफल होता है जब कर्म बन्धनों को तोड़ आत्मा सिध्द बुद्ध होती है। आत्मा का संसार घटता बढ़ता रहता है जब संसार घटता है तो आत्मा उच्च गति में जाती है और संसार बढ़ता है तो नीच गति में जाती है ये उच्च नीच गति में जाना ही संसार है। संसार परिभ्रमण से बचने के लिए भगवान ने आगार व अणगार धर्म का निरुपण किया। जीव अभ्यास करने के लिए श्रावक‌ के व्रतों को अपनाता है। मूल व्रत एक ही है। जैसे वृक्ष के मूल से‌ वृक्ष के अन्य भाग पेड़, पत्ती, शाखा...

समय की सुनों, क्योंकि समय किसी की नहीं सुनता: प्रवीण ऋषि

Sagevaani.com /रायपुर। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा कि समय बड़ा मूल्यवान है। इस संसार ने उत्कृष्ठ स्थित दो जगहों की है, एक है 33 सागरोपम और दूसरी है सर्वार्थ सिद्धि विमान की। इन दो जगहों की स्थिति उत्कृष्ट है। लेकिन दोनों ही स्थितियों का बंद है। 33 सागरोपम को लवसप्तम कहा गया है। सात श्वास का एक प्राण होता है, सात प्राण का एक स्तोक होता है और सात स्तोक का एक लव होता है। आज के समय में लव सप्तम का मतलब है 7 से 8 मिनट। इस समय अंतराल में 33 सागरोपम का आयुष बनता है, शुभ और अशुभ दोनों। अगर मनुष्य लोक में इतना समय सर्वार्थ सिद्धि विमान के देवताओं के पास होता तो वे सीधे मोक्ष में जाते। कोई गलती नहीं, ज्ञान में कमी नहीं, कमी केवल इतनी कि उन्होंने साधना 7 मिनट देरी से शुरू की। अगर उनके पास 7 मिनट का और आयुष होता तो वो मोक्ष में जाते। 7 मिनट का आयुष नहीं रखने के कारण उन्हें 33 सागरोपम में रहना पड़ता...

परमात्मा के शब्दों से पहले उनके ज्ञान का प्रकाश पहुंचता है : प्रवीण ऋषि

Sagevaani.com /रायपुर। सुधर्मा स्वामी की अनुभूति जिन शब्दों में अक्षुण्य है, उन्ही शब्दों के माध्यम से परमात्मा महावीर के उस अक्षर स्वरुप को जानने के लिए लालगंगा पटवा भवन में पुच्छिंसुणं आराधना अनवरत जारी है। जंबूस्वामी की जिज्ञासा को शांत करने के लिए सुधर्मा स्वामी ने जिस स्तोत्र की रचना की थी, उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि में मुखारविंद से श्रावक उसका रसपान कर रहे हैं। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी। धर्मसभा को संबोधित करते हुए उपाध्याय प्रवर ने कहा कि यदि आपसे पूछा जाए कि सबसे सर्वश्रेष्ठ वृक्ष कौन सा है तो आप क्या उत्तर देंगे? प्रायः लोग कहेंगे कि कल्पवृक्ष सबसे श्रेष्ठ है। ज्यादातर हम उस पेड़ को सर्वश्रेष्ठ कहते हैं जिसमे फूल-फल लगते हैं। यदि आपसे कहा कहा जाए कि ज्ञान को उपमा देनी है, तो उसके लिए हमारे पास सूर्य है, ज्योति है। लेकिन सुधर्मा स्वामी ने जब परमा...

50वी दीक्षा जयंती बड़े ही हर्ष उल्लास के साथ मनाई गईl

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैंl बंधुओं जैसे कि वर्धमान जैन स्थानक वासी भायंदर मैं कल हमारे यहां पर विराज सत्य साधना जी महाराज साहब अर्हत ज्योति जी महाराज साहब तन्मय श्री जी महाराज साहब हित साधना जी महाराज साहब हर्ष प्रज्ञा जी महाराज साहब गुरु छाया जी महाराज साहब सौम्य ज्योति जी महाराज साहब आदि 7 ठाणा के सानिध्य में उप वर्तनी संथारा प्रेरिका सत्य साधना जी महाराज साहब की 50वी दीक्षा जयंती बड़े ही हर्ष उल्लास के साथ मनाई गईl हमारे संघ के अध्यक्ष मोहनलाल जी सिसोदिया मंत्री बाबूलाल जी दूगड़ कोषाध्यक्ष श्री दिनेश जी कोठारी, हस्तीमल जी, पोखरना सुरेश जी कागरेचा, संपत जी पामेचा, कृष्ण जी तलेसरा भुरीलाल जी इटोदिया, रतन जी नागोरी, उमेश जी सिसोदिया, भगवती लाल जी...

सच्ची सफलता वही है जो हमें प्रसन्नता और शांति की तरफ लेकर जाये : देवेंद्रसागरसूरि

पूर्ण अनुशासन, समर्पण व लगन से ही जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता पाने का रास्ता खुलता है। सफलता के ये सुझाव आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने श्री सुमति वल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में प्रवचन के दौरान व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यदि जीवन में कुछ कर गुजरने का जुनून है तो कोई लक्ष्य कितना भी कठिन क्यों न हो, उसे प्राप्त कर सकते हैं। जब तक समर्पण नहीं होता, तब तक सच्चा सुख नहीं मिलता। सच्चे सुख की प्राप्ति के लिए समर्पण किया जाता है। लेकिन यहां जानने योग्य बात यह है कि समर्पण यदि कपटपूर्ण है तो सुख भी दिखावा मात्र ही होगा। समर्पण से ही परमात्मा सहाय बनते हैं। आचार्य श्री ने उदाहरण से समझाते हुए कहा कि एक बन्दर का बच्चा अपनी माँ से चिपका रहता है। वह जानता है कि माँ के साथ वो सुरक्षित रहेगा। कहाँ, क्या, कब, कैसे इन सब का निर्णय वह माँ पर छोड़ देता है। यह शरणागति का एक अच्छा...

गुरू के समक्ष अपने पापों की आलोचना कर जीवन सरल बनायें: साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

जैन साध्वी ने बताया कि ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप है मोक्ष के मार्ग Sagevaani.com /शिवपुरी ब्यूरो। भगवान महावीर स्वामी की अंतिम वाणी उत्तराध्यन सूत्र का वाचन करते हुए साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने बताया कि अपने जीवन और आत्मा को सरल बनाने के लिए साधक को गुरू के समक्ष अपने पापों की आलोचना करना चाहिए और गुरू द्वारा बताए गए दण्ड को स्वीकार कर प्रायश्चित्त करना चाहिए। उन्होंने बताया कि ज्ञान दर्शन चारित्र और तप मोक्ष के मार्ग है। धर्मसभा को गुरूणी मैया साध्वी रमणीक कुंवर जी महाराज साहब ने भी संबोधित किया। गुरू की महिमा का बखान करते हुए साध्वी जयश्री जी और साध्वी वंदना श्री जी ने सुमधुर स्वर में भजनों का गायन किया। साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने बताया कि जो व्यक्ति अपने अपराधों और पापों की आलोचना करता है उसकी आत्मा सरल भाव में चली जाती है और उसे आने वाले भाव में स्त्री तथा नपुंसक भव नहीं मिलता है। ऐ...

धर्म का मार्ग बताने वाली है जिनवाणी: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में ए यम के यम स्थानक में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में कहा कि आत्म बधुओ, जिनेशवर भगवान महावीर की वाणी धर्म को प्रस्तुत करने वाली हैl उनकी वाणी से ही जन-2 को ये ज्ञान प्राप्त होता है कि धर्म क्या है, धर्म पालन कैसे करना है। शुद्ध रूप से धर्म का मार्ग बताने वाली धर्म में आगे बढाने वाली एक मात्र वाणी जिनवाणी है। जिसने भी इस जिनवाणी को सुना और अपने साम्थर्य से अपनाया, अपनायेगें और अपनाते रहेंगे वे सभी जीव मोक्ष में जायेगे। जिनेश्वर ने दो प्रकार धर्म के बताये श्रुत धर्म, चारित्र धर्म । भगवान कहते है कि पहले सुनो श्रद्धा करो फिर आचरण में लाओ। क्योंकि सुनने से ही ज्ञान होता है और श्रद्धा जागृत होती है। इसलिए श्रुतवाणी का भी बड़ा महत्व है। भगवान कहते है धर्म पालन में प्रमाद मत करो जितना हो सके पालन करो। संसारियों को भी भगवान ने धर्म जोड़ने के लिए आगार धर्म का निरुपण कीया है। सामाय...

साधु और साध्वियों को साधना के आठ सूत्रों में होना चाहिए पारंगत: साध्वी नूतन प्रभाश्री

साध्वी जी ने बताया भगवान महावीर ने कहा साधना के जो आठ सूत्रों को उपलब्ध है उसे ही बोलने का अधिकार है Sagevaani.com /शिवपुरी। प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी भगवान महावीर की अंतिम वाणी उत्तराध्यन सूत्र का वाचन कर रही हैं। उत्तराध्यन सूत्र के 25 वें अध्ययन में उन्होंने बताया कि भगवान महावीर ने साधू और साध्वियों के लिए साधना के आठ सूत्र बताए हैं। इन आठ सूत्रों में पारंगत होने पर ही उन्हें धर्म के संबंध में बोलने का अधिकार है। इन सूत्रों को भगवान महावीर ने प्रवचन माताऐं कहा है। साधक और संयमी के लिए आठ प्रवचन माताऐं हैं। इनमें पांच समितियां ईर्या, भाषा, ऐषणा, आदान प्रदान और उच्चार निसर्ग समिति और तीन गुप्तियां-मनो गुप्ति, वचन गुप्ति और काया गुप्ति शामिल हैं। साध्वी जयाश्री जी ने अमोलक है जीवन गवांकर न जाऐं, सांसों के यह ये मोती लुटाकर न जाऐं, भजन का गायन किया। इसके बाद साध्वी नूतन प्रभाश्...

आहार संज्ञा की सभी जीवों में प्रधानता होती है: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में कहा कि 10 प्रकार की संज्ञा की परिभाषा भगवान ने किया। इन संज्ञाओ में संसार बढ़ाने का बहुत साम्थर्य है ये सभी‌ जीवों में पायी जाती है। आहार संज्ञा की सभी जीवों में प्रधानता होती है।आहार के बिना शरीर का निर्माण नहीं होता। ये आहार जन्म से मरण तक निरन्तर चलता रहता है। ये संज्ञा का कभी विराम नही होता चारों आहार का त्याग होने पर भी रोम आहार निरन्तर चालू रहता है। नारकी में खेती-बाड़ी कुछ नही होती फिर भी नारकी जीव मात्र रोम से आहार ग्रहण करते है और सागरोपम जीवित रहते ज़मीन से व्यक्ति जीवित रहते है। व्यक्ति ज्यादा भोजन ग्रहण करता है। तप में आहार त्याग करने से मृत्यु नहीं होती। बार बार भोजन ग्रहण करना गलत है क्योंकि बीमारियों की शान्ति तप से होती है न की औषधि से। यदि चारों आहार का प्याग कर धूप में बैठ जाओ तो शरीर के सभी रोग स्वतः ही शान्त हो जाते हैं। ...

उप वर्तनी संथारा प्रेरिका सत्य साधना जी महाराज साहब की 50 दीक्षा जयंती बड़े ही हर्ष उल्लास के साथ मनाई गई

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैंl बंधुओं जैसे कि वर्धमान जैन स्थानक वासी भायंदर मैं कल हमारे यहां पर विराज सत्य साधना जी महाराज साहब अर्हत ज्योति जी महाराज साहब तन्मय श्री जी महाराज साहब हित साधना जी महाराज साहब हर्ष प्रज्ञा जी महाराज साहब गुरु छाया जी महाराज साहब सौम्य ज्योति जी महाराज साहब आदि 7 ठाणा के सानिध्य में उप वर्तनी संथारा प्रेरिका सत्य साधना जी महाराज साहब की 50 दीक्षा जयंती बड़े ही हर्ष उल्लास के साथ मनाई गईl U हमारे संघ के अध्यक्ष मोहनलाल जी सिसोदिया मंत्री बाबूलाल जी दूगड़ कोषाध्यक्ष श्री दिनेश जी कोठारी, हस्तीमल जी पोखरना, सुरेश जी कागरेचा, संपत जी पामेचा कृष्ण जी तलेसरा भुरीलाल जी इटोदिया, रतन जी नागोरी, उमेश जी सिसोदिया, भगवती लाल जी ...

गूदनी मैया का 50 वन जन्म दिवस मनाया गया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं वह इस प्रकार हैंl बंधुओं जैसे कि आज हमारे गूदनी मैया का 50 वन जन्म दिवस मनाया गयाl उसमें 1500 से अधिक संख्या थी गुना बेंगलुरु हैदराबाद औरंगाबाद सभी जगह से बहुत लोग पधारे थेl सभी का सम्मान कियाl सुचारू रूप से बहुत ही अच्छा प्रोग्राम रहा हैl इसी के साथ जिसने समय की कीमत और महत्व को पहचान वही तो समय पर चल पाएगा जो समय का सही उपयोग करते हैंl मेरे कामयाबियों को उपलब्ध कराते हैंl संविधान है दुनिया का सबसे कीमती धन पर क्या हम समय का उतना सम्मान करते हैं जितना कि पैसे काl समय किन कर दिया अपने बच्चों के लिए इस समय को हम किस तरह उपयोग करते हैं जीवन में हमारे सफलता हैl इसके अनुसार अपने समय को व्यवस्थित कीजिए इसका इस तरह प्रश्न बंद...

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