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धर्म का मार्ग बताने वाली है जिनवाणी: जयतिलक मुनिजी

धर्म का मार्ग बताने वाली है जिनवाणी: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में ए यम के यम स्थानक में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में कहा कि आत्म बधुओ, जिनेशवर भगवान महावीर की वाणी धर्म को प्रस्तुत करने वाली हैl उनकी वाणी से ही जन-2 को ये ज्ञान प्राप्त होता है कि धर्म क्या है, धर्म पालन कैसे करना है। शुद्ध रूप से धर्म का मार्ग बताने वाली धर्म में आगे बढाने वाली एक मात्र वाणी जिनवाणी है। जिसने भी इस जिनवाणी को सुना और अपने साम्थर्य से अपनाया, अपनायेगें और अपनाते रहेंगे वे सभी जीव मोक्ष में जायेगे।

जिनेश्वर ने दो प्रकार धर्म के बताये श्रुत धर्म, चारित्र धर्म । भगवान कहते है कि पहले सुनो श्रद्धा करो फिर आचरण में लाओ। क्योंकि सुनने से ही ज्ञान होता है और श्रद्धा जागृत होती है। इसलिए श्रुतवाणी का भी बड़ा महत्व है। भगवान कहते है धर्म पालन में प्रमाद मत करो जितना हो सके पालन करो। संसारियों को भी भगवान ने धर्म जोड़ने के लिए आगार धर्म का निरुपण कीया है। सामायिक मे राग द्वेष आर्त ध्यान रौद्र ध्यान नही करना चाहिए। सम्पूर्ण सावध योगों का त्याग सामायिक में करना चाहिए। सामायिक मे जिनवाणी श्रवन करना, सुनना, स्वाध्याय करना चाहिए। सामायिक में रमण करना चाहिए। जिससे आत्मा में शुद्धता आती है।

पाप के त्याग की अभिलाषा होती है। जब तक जीव को सम्यग् ज्ञान प्राप्त नहीं होता तब तक जब जीव को सम्यक ज्ञान नहीं होता तब तक श्रुत सामयिक नियमित करना चाहिए। सुने हुए ज्ञान को बार-2 फेर कर स्मृति में जमा लेना चाहिए उसके बाद उस ज्ञान का चितंन मनन कर उसे आचरण में लाना चाहिए। जिससे अनेक प्रकार के सावध्य वचन बोलने की और सावध्य प्रवृति करने की क्रिया छूट जाती है। जिससे मन, वचन, काया तीनो परिष्कृत हो जाते है।‌ अन्यथा व्यक्ति ज्ञान न होने से धर्म की प्रेरणा कम करता है और सावध प्रकृति की प्रेरणा, ज्यादा देते हैं। अभ्यास करने से ही ये प्रवृति छूटती है और इसलिए सामायिक करना आवश्यक है।

भगवान ने कहा कि जिस आत्मा में सावध प्रवृत्ति के विचार नहीं आते वह आत्मा स्वयं ही सामायिक बन जाती है। ऐसे अभ्यास करके आगार धर्म से अणगार धर्म की ओर बढा जाता है फिर अणगार से सिद्ध शिला की और बढ़ा जाता है। सामायिक करते समय ऐसे कोई उपकरण नही रखने चाहिए जिससे राग द्वेष उत्पन्न हो । धर्म स्थान में सादगी पूर्ण आना चाहिए। जिससे द्रव्य शुद्धि होती है। द्रव्य शुद्धि रखने से मन शान्त रहता है। जहाँ मन स्थिर न हो वहाँ बैठ कर सामायिक नहीं करना । क्षेत्र शुद्धि का ध्यान रखना चाहिए। घर में सामायिक करने का स्थान अवश्य निर्माण करवाना चाहिए ।

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