*क्रमांक — 472* . *कर्म-दर्शन* 🚥🔹🚥🔹🚥🔹🚥 🔹🚥🔹🚥🔹🚥 *🔹जीव और कर्म के बंध पश्चात् परिणमन का स्वरूप* *👉 आगम ग्रंथों एवं परवर्ती विभिन्न आचार्यों द्वारा जीव और कर्म के बंध काल में, दोनों के विशिष्ट प्रकार के परिणमन को भिन्न-भिन्न उपमाओं से उपमित किया गया है।* *1. आवेष्टन – परिवेष्टन — भगवती में भगवान् महावीर कहते हैं कि जीव के एक प्रदेश को ज्ञानावरणीय आदि कर्म समूह के अनन्त-अनन्त अविभाग-प...