हर धर्म अलग-अलग रूपों में एक ही शिक्षा देता है कि प्रभु पर भरोसा रखने से जीवन यात्रा सहज रहती है। लेकिन सिर्फ़ विश्वास के सहारे जीना संभव नहीं है । उपरोक्त बातें आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन जैन संघ में प्रवचन देते हुए कही, वे आगे बोले कि मां की गोद में बैठा छोटा-सा बच्चा भी जरा सा झटका लगने पर अपने हाथ में जो कुछ आए उसे पकड़ लेता है, जैसे उसके सहारे नीचे गिरने से बच जाएगा। हम अपनी बुद्धि के कारण सोचते हैं कि परमात्मा उसी की मदद करते हैं जो अपनी मदद की खुद चेष्टा करता है।
यह एक सीमा तक सच है। पर यही वजह है कि खुद को धार्मिक मानने वाले और हमेशा परमात्मा का नाम भजने वाले भी दैनिक जीवन की चिंताओं मुक्त नहीं हो पाते। किसी तरह जोड़तोड़ कर खुद ही अपने बिगड़े काम बनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन जब कोई कठिन स्थिति आती है और लगता है कि अब चीजें हमारे काबू में नहीं हैं, तब हम पूरी तरह उसकी शरण में लौट जाते हैं। और सब कुछ उसके भरोसे छोड़ देते हैं। वह हमें कठिनाइयों से लड़ने की ही नहीं, उनके साथ जीने की ताकत भी देता है। लेकिन अनिश्चितता हमारे विश्वास को डांवाडोल कर देती है।
वह हमें लक्ष्य की ओर बढ़ने से पहले ही ठिठका देती है। हम जो कुछ करते हैं, उसका फल पहले से निश्चित कर लेना चाहते हैं, जबकि जीवन में कुछ भी निश्चित नहीं होता। थोड़ी उलझन, थोड़ी अनिश्चितता के बिना हम कुछ सीखने और आगे बढ़ने में समर्थ नहीं हो सकते। हम बदलाव से डरते हैं, पर उसे स्वीकारने में ही विकास है। आस्था हमें परिवर्तन के डर से बचा कर आगे बढ़ने में मदद करती है। भोर की रोशनी आने से पहले अंधेरे में ही गीत गाना शुरू करने वाली चिड़िया में सुबह के आने का पूर्ण विश्वास ही तो है। निरीश्वरवादी उसके अस्तित्व को नकारने पर भी उसे अपने ढंग से स्वीकार करते हैं। जब अविश्वासी भी विश्वास का महत्व मानता है तो आस्थावान के बारे में क्या कहा जाए। एक नव विवाहित जोड़ा नाव में नदी पार कर रहा था, तभी तूफान आ गया। सभी सवार घबराने लगे। लड़की ने अपने शांत पति से पूछा, क्या उसे डर नहीं लग रहा?
सैनिक पति ने अपनी तलवार पत्नी के गले पर रखकर पूछा, क्या तुम्हें डर लग रहा है? उसने कहा, नहीं, क्योंकि मैं जानती हूं कि आप मुझे नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। पति ने उत्तर दिया, यही विश्वास मुझे अपने ईश्वर पर है। यही भरोसा संघर्ष की स्थिति में हमें ताकत देता है। उसके सदा साथ होने का एहसास हमें खतरों का सामना करने की हिम्मत देता है। अंत में आचार्य श्री ने कहा, तुम्हारा जीवन इस पर निर्भर नहीं करता कि उसने तुम्हें क्या दिया है, बल्कि इस पर कि तुम्हारी जीवन के प्रति क्या प्रवृत्ति है। इस पर नहीं कि तुम पर क्या बीत रही है, बल्कि इस पर कि तुम्हारा मन उसे कैसे स्वीकार करता है। अपने लिए सिर्फ अच्छा मांगना हमारी हठधर्मी है, क्योंकि सबको अपने-अपने हिस्से का सुख- दुख लेना पड़ेगा।