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ज्ञान वाणी

सौभाग्य प्आत्मा का प्रकाश तेज होता है वह तीनो लोक को देख लेती है: ज्य प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनि जी

*पूज्य प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनि जी महारासा* ने फरमाया कि…

पांचो इंद्रियों में सबसे प्रधान कोन सी है ?

चक्षुइन्द्रीय प्रधान है , आंखे नही तो जीव परवश हो जाता है ।

सबसे तेज प्रकाश आंखों का है, आँख के प्रकाश के आगे सूर्य का प्रकाश निस्तेज हो जाता है ।

आत्मा है तो आंख काम कर रही है , देखने वाला आत्मा है , आत्मा का प्रकाश तेज होता है वह तीनो लोक को देख लेती है ।

कैसे देखती है ?

हस्तामलकवत : हाथ मे रखे हुए आंवले के समान देख लेती है , आंवले में रेशे होते है हर रेशा देखा जा सकता है , ब्रम्हांड में अंधकार हो तो भी प्रत्यक्ष ज्ञान देख लेती है ।

मूल स्वरूप आत्मा का *ज्ञाता ओर द्रष्टा* है संसार मे रही हुई आत्मा का स्वरूप *कर्ता ओर भोक्ता* है , आत्मा का सम्पूर्ण ज्ञान सम्यक ज्ञान के बिना नही होता है , वीतराग का ज्ञान *6 बोल* में आ गया , आत्मा परिवर्तनशील है ।

पैसा तमाशा करता है ,उन्माद करता है , पैसा पाप में ले जाता है , पैसा यहां भी घुमाता है और तिर्यंच गति में भी घुमाता है सबसे बड़ा कोटा तिर्यंच गति का है ।

इच्छाओं पर लगाम लगाओ ,इच्छाओं के अधीन जीने वाले दुःख पाते है ।

जीवन जीना है , जीते हुए विराधना से बचना है *आचारांग सूत्र* में कहाँ है कि..

1साधु जी आते है तो बताते नही ओर जाते है तो भी बताते नही (नगर प्रवेश)

2 साधु जी को चलते हुए बात करना नही कलपता है ।

3 साधु जी पलेवन करते समय बोलते नही

4 साधु जी अपनी गवेषणा खुद करते है , साधु का अपमान हो तो भिक्षाचरी तप है।

संसार मे घुमाने वाले दो है *पैसा और पाप*

पैसा तुम्हारी ईच्छा अनुसार घुमाता है और पाप अपनी इच्छा अनुसार घुमाता है इसी का नाम *मोह* है सब जानते है ।

*भाग्य और सौभाग्य में फर्क क्या ?*

*भाग्य* में पूण्य ओर पाप दोनों होते है भाग्य कमजोर हो तो पाप का उदय ओर तेज हो तो पूण्य का उदय चलता है ।

*सौभाग्य* में पूण्य होता है दुःख आता नही है आता भी है तो वह टिकता नही

महापुरषो की बुद्धि कुशाग्र होती है , सत्य कबुल करने में कोई दोष नही इससे अपनी आलोचना हो जाती है ।

विद्वद्वर्या डॉ. श्री ललित प्रभाजी म.सा. ने *पूज्य सौभाग्य मल जी महारासा* के लिए फरमाया है …

*पुण्य स्वरूप गुरुदेव ! सुज्ञान सिन्धुः ।*

 *रत्नत्रयस्य परिपालक लोक बन्धुः ।*

*ज्योतिर्मयं ललित- शान्त-सुमोद पूर्णम्।*

*सौभाग्य सद्गुरुवरं शिवदं स्मरामि ॥२॥*

पूण्य का प्रभाव था नाम सौभाग्य था , परिवार अच्छा मिला , दादा गुरु अच्छे मिले पूण्य का रूप प्रकट हुआ जिनको अक्षर का ज्ञान नही था वह आगम के ज्ञाता बने, जीव को दान देने वाले (छः काय जीव),लोक के बंधु , जीव के बंधु रक्षक बने, जिनका जीवन ज्योतिमय था वो चले गए प्रकाश छोड़े गये, सारी जिंदगी प्रकाश बाटा, सम्पूर्ण जीवन आनन्द मय रहा, ज्ञान ध्यान में मस्त रहते थे , हम भी आनंदमय जीवन जिये। 🙏

                मनोहर लाल भटेवरा

                     अध्यक्ष

  श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ खाचरौद, जिला-उज्जैन मध्य प्रदेश

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