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त्याग का पर्याय ही साधु जीवन है : देवेन्द्रसागरसूरि

त्याग का पर्याय ही साधु जीवन है : देवेन्द्रसागरसूरि

Sagevaani.com/चेन्नई. बिन्नी नोर्थटाउन जैन संघ के संघ भवन में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने नवपद ओली की आराधना के पंचम दिन साधु पद की महिमा से अवगत कराया। उन्होंने कहा धर्मरूपी कल्पवृक्ष पंचमेष्ठि से व्याप्त आत्मा को परमात्मा बनाते हैं। अरिहंत परमात्मा जड़ है, सिद्ध भगवंत फल , आचार्य भगवंत फूल हैं और उपाध्याय पत्ते व साधु भगवंत धड़ के स्थान पर हैं। साधु भगवंत जिनका पंच परमेष्ठी में अंतिम स्थान है किंतु सभी पदों में उनकी महिमा, गरिमा महान है। अरिहंत बनने से पूर्व साधु बनना होता है। सिद्ध, आचार्य और उपाध्याय भी साधु बने बिना प्राप्त नहीं हो सकते।

कैवल्य ज्ञान सहित अन्य ज्ञान भी साधू बने बिना प्राप्त नहीं किए जा सकते, सिद्ध पद को प्राप्त नहीं किया जा सकता। मरुदेवी माता ने भी तभी सिद्ध अवस्था को प्राप्त किया जब उनके भावों में साधुता आई। पंच परमेष्ठी के चार पदों में से कोई भी पद बिना साधु बने मिल नहीं सकता।उन्होंने आगे कहा कि त्याग का पर्याय ही साधु जीवन है। घर, पैसा, परिवार, साधन का त्याग तथा पैदल विहार ही साधु जीवन की पहचान है। साधु अपना घर, पैसा, परिवार तथा साधन का त्याग कर ही आगे बढता है।

जैन धर्म में साधु को पैदल विहार करना आवष्यक है, जिससे अनेक जीवो की हिंसा बच सकती है। संसार में जितना पैसा अधिक होगा, उतना ही पाप कार्य अधिक होगा। साधु पद उपाध्याय, आचार्य, अरिहंत एवं सिद्ध की जन्म भूमि है। साधु बने बिना कोई भी पद प्राप्त नही हो सकता। हमें अपने जीवन में साधु तथा अगले जन्म में सिद्ध बनने का लक्ष्य रखना चाहिए।साधू की भक्ति से मोक्षमार्ग की आराधना में सहायता की अपेक्षा रखनी है. साधको की साधना में सदा सहायता करने वाले, अप्रमत्त गुण के धारक, लोक में रहे हुए सभी साधू भगवंतों को हमारी भाव पूर्वक वन्दनाl

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