परम पूज्य गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने नार्थ टाउन में फरमाया कि पर्युषण महापर्व चल रहे हैं देखते ही देखते पूरा हो जायेगा समय को रोकने में कोई समर्थ नहीं है व्यक्ति बैठा बैठा सोचता ही रह जाता है कुछ नहीं कर पाता। समय निकल जाता है आप सोचते है मैं तपस्या कर लूंगा लेकिन समय पर नहीं किया तो अवसर हाथ से निकल जाता है तपस्या करने से भय से मुक्त हो जाता है वो रोकने से भी रुकने वाला नहीं है तपस्या से अनुभव की प्राप्ति होती है ।
तपस्या में चारों आहार का त्याग करते हैं मन से, चाह से चारों आहार का त्याग करता है आहार के प्रति उसकी रुचि धीरे धीरे कम हो जाती है पूरी दुनिया माल-ताल खाती है तब भी उसका मन ललचाता नहीं है पुरी दृढ़ता के साथ तपस्या करते है तो भी चारों आहार का प्याग करता है तो उसके कर्मों की निर्जरा होती हैं क्योंकि वह जानता है देव, गुरु, धर्म की कृपा मे मेरा पास सब कुछ उपलब्ध है। तपस्या कुछ दिनों की हैं
संसार के योग विलास कितने दिन साथ देत है कैसे साथ देते है ये कोई नहीं जानता है सोचता, नहीं खाऊंगा तो चक्कर आ जायेगी। चक्कर कर्म के उदय से आती हैं आहार के प्याग से कुछ नहीं होता। मन की भ्रांति है। सोचता है तकलीफ आ जायेगी, ऐसा भी नहीं है ।
आदिनाथ ने 13 महीने आहार की गवेषणा की लेकिन आहार नहीं मिला | आहार नहीं मिलने से उनको कुछ भी नहीं हुआ। वो मरे नहीं, ये भ्रांति मन से निकाल दो कि आहार नहीं मिलेगा तो मर जायेंगे। भगवान ने पुरुषों को प्रधान बताया तो स्त्रीयों को भी श्रेष्ठ बताया है जो आगे कर्मों को क्षय करके मोक्ष प्राप्त करने का प्रयास करती है ये आठ दिन आठ कर्मों को क्षय करने का पर्व है। पारणा यानि – जो मोक्ष नहीं जा सके उनके आहार की व्यवस्था करना। जो मोक्ष को पार कर चुके तो उनको आहार की जरूरत नहीं है।