जैन संत डाक्टर राजेन्द्र मुनि जी ने आज पर्युषण पर्व के तीसरे दिन प्रवचन करते हुए श्रद्धा विश्वास को प्राण की तरह अमूल्य बतलाया। जीवन के प्रत्येक कार्यों में चाहे घर के व्यपार के यात्रा के कोर्ट कचहरी या पार्टी इत्यादि प्रत्येक कार्य में एक दूसरे पर श्रद्धा न हो तो वो कार्य कदापि सफल नहीं हो सकता! धर्म आराधना साधना में तो देव गुरु धर्म के प्रति प्राण तुल्य श्रद्धा होनी ही चाहिए, शरीर का महत्व प्राण से तो धर्म का महत्व श्रद्धा से होता है! मुनि जी ने देव शब्द को पवित्र मानते हुए अरिहंत प्रभु की व्याख्या की जिनके जीवन में तनिक मात्र भी राग द्वेष नहीं रहता, समस्त जीवों को एक नजर से समता से देखते है!

भगवान महावीर के जीवन में भयंकर से भयंकर उपसर्ग परिषह आए किन्तु कभी भी विचलित नहीं हुए चेहरे पर सदा करुणा दया वात्सल्य भाव बना रहा! इसी के साथ गुरु शब्द को त्यागी संयमि जीवन का प्रतीक माना गया! जो अरिहंत के उपासक होते है उनके बतलाए मार्ग पर सदा अडिग rahte हुए अपनी संयम साधना में रत रहते है! धर्म की परिभाषा करते हुए कहा अहिंसा सत्य क्षमा अचोर्य ब्रह्मचर्य अपरिग्रह को मान्यता देने वाला ही धार्मिक होता है!

आज मानव मन सुख साधनों के पीछे अपना धर्म खोता जा रहा है! श्रद्धा हमें इस पर अडिग रहने की व समकित धारण करने का सन्देश देती है! सभा में साहित्यकार श्री सुरेन्द्र मुनि जी द्वारा अंतगढ़ सूत्र का स्वाध्याय करते हुए श्री कृष्ण माता देवकी का वृतांत सुनाते हुए कहा हमें भी श्री कृष्ण जीवन से सामाजिक धार्मिक जीवन व्यतीत करते हुए पुण्य परोपकार दया दान को अपनाना चाहिए भगवान आदि नाथ की प्रार्थना स्वरूप आचार्य मान तुंग रचित भक्तामर स्तोत्र का दिनांक 13 सितम्बर से विधिवत साधना करने की प्रेरणा दी!महामंत्री उमेश जैन द्वारा तपस्वीओ का स्वागत व अन्य सूचनाएं प्रदान की गई।