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तप की साधना का वैज्ञानिक व धार्मिक दृष्टिकोण से बहुत महत्व है: श्री रुचिकाश्री जी महाराज

तप की साधना का वैज्ञानिक व धार्मिक दृष्टिकोण से बहुत महत्व है: श्री रुचिकाश्री जी महाराज

बेंगलुरु। श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी बावीस संप्रदाय जैन संघ ट्रस्ट, गणेश बाग श्री संघ के तत्वावधान में एवं शासन गौरव महासाध्वी पूज्या डॉ. श्री रुचिकाश्री जी महाराज, पूज्या श्री पुनितज्योति जी महाराज, पूज्या श्री जिनाज्ञाश्री जी महाराज के पावन सानिध्य में सोमवार प्रातः दिनांक 6 सितम्बर 2021 को श्री गुरु गणेश जैन स्थानक, गणेश बाग में पर्वाधिराज महापर्व पर्युषण के तीसरे दिन सूत्र वाचन, प्रवचन एवं धर्माराधना प्रतियोगिताएं आयोजित किया गया।

पर्वाधिराज महापर्व पर्युषण के तीसरे दिन के अवसर पर महासाध्वी पूज्या डॉ. श्री रुचिकाश्री जी महाराज ने अपने विशेष प्रवचन कैसी करे तपस्या जो दूर हो समस्या विषय पर फ़रमाया की हमारा देश तप त्याग प्रदान देश है। वैभव कितना भी महान क्यों न हो लेकिन तप त्याग उससे भी महान होता है। तप की साधना का वैज्ञानिक व धार्मिक दृष्टिकोण से बहुत महत्व है। शरीर को निरोगी बनाये रखने के लिए भी तप बहुत जरूरी है होता है। तप किसी भी रूप में हो सकता है उपवास, एकासना, रात्रि भोजन न करना, उणोदरी तप, आयम्बिल, प्रतिदिन नियत द्रव्य से ज्यादा सेवन न करना। जैन धर्म में तप का एक महत्वपूर्ण साधना माना गया है। तपस्या मनुष्य की ऐसी शक्ति है, जिसके बल पर वह साधारण से असाधारण बन जाता हैं। जैन धर्म में साधु संत, श्रावक श्राविका वर्ष भर में तो तप करते ही है मगर तप विशेष रूप से चातुर्मासिक काल में विशेष रूप से करते है इसका महत्वपूर्ण कारण यह है कि इस चार महीना में तपस्या की साधना मौसम की अनुकूलता भी है और दूसरा कारण इस काल में साधु संत वर्षावास हेतु स्थायी हो जाते है और सभी धर्म प्रेमी श्रावक श्राविकाओं को विशेष रूप से साधु संतों से तप की आराधना करने हेतु प्रेरणा मिलती है। तप से हमें नई ऊर्जा प्राप्त होती है।

हमे तप अपने शरीर की शक्ति के अनुसार जरूर करना चाहिए। मोन साधना व ध्यान की साधना से मस्तिष्क को बहुत आराम मिलता है। उपवास जिस तरह आत्म शुद्धी और आत्म नियंत्रण का साधन है, उसी प्रकार देह शुद्धी और दैहिक आंतरिक क्रियाओं को नियंत्रित नियमित करने का भी साधन है। उपवास करने से शरीर के आंतरिक धन कचरे का निकाल होता है। शरीर में बढे हुए पित्त, कफ, वायु का उपशमन अथवा तो उत्सर्जन होता है, और शरीर शुद्ध होता है। उपवास के दुसरे या तीसरे दिन बहुतो को पित्त की उल्टियां होती है। वस्तुतः: इन उल्टियों द्वारा शरीर के अंदर का पित्त निकल जाने से शारीरिक शांति का अनुभव होता है। उपवास दरम्यान सिर्फ गर्म किया हुआ पानी पीने से शरीर में रहने वाले अधिक मात्रा के मल का निकाल होता है।

तपस्या में जो हमारे शरीर में ऊर्जा पैदा होती हैं इससे अधिक आत्मा को शक्ति प्रदान होती है। अपने अंतःकरण की बुराइयों और विकृतियों को खपाने का नाम ही सच्चा तप हैं। मनुष्य ज्यों ज्यों तप करता हैं, उसके तप की आंच में उसके भीतर के कर्म-कलुष गल गल करके निकल जाते हैं और जैसे ही कर्म-कलुष पूरी तरह निकलते हैं, आत्मा कुंदन की तरह चमक उठता हैं। समस्याओं का निवारण के लिए आयम्बिल की तपस्या अवश्य करना चाहिए। तन मिला तुम तप करो, करो कर्म का नाश।

साध्वी श्री रुचिकाश्री जी ने प्रेरणा दी कि जब भी कोई समस्या आए, उसे समता से स्वीकार कर लो, तपस्या बन जाएगी। सच्ची तपस्या वही हैं जो जीवन में मधुरता का रस घोले, माधुर्य का संचार करें। शरीर को तपाने से माधुर्य हो, इसमें संदेह हैं पर मन को तपाने वाले का चित्त हमेशा मधुर होता हैं, इसमें कोई संशय नहीं। मनस्वी बनो, मन में पवित्रता रखो, विचारों में पवित्रता रखो, भाव में विशुद्धि रखो और इंद्रियों को निग्रहीत रखो।

छोटे छोटे संकल्प ले और तपमय जीवन बनाएं। अपने मन को प्रसन्न रखें, सौम्य भाव रखें, पवित्रता को अपने हृदय में विकसित करें, इन्द्रियों का निग्रह करें, अपनी विषयों की आसक्ति को नियंत्रित करें, इच्छाओं का शमन करें; ये सब तपस्या है। अगर ऐसी तपस्या हम सबके जीवन में प्रकट हो जाए तो फिर कोई समस्या शेष नहीं रहेगी और निश्चित हमारे जीवन का उद्धार होगा।

साध्वी श्री जिनाज्ञाश्री जी महाराज ने श्री अंतकृतदशांग सूत्र वाचन किया। अपने प्रवचन में फ़रमाया कि पर्युषण पर्व एक ऐसा अवसर हमें प्रदान करता है कि अधिक से अधिक तपस्या करे। तपस्या से मनुष्य हर प्रकार के विकारों को दूर कर सकते हैं। जैसे क्रोध, लोभ, अहंकार विकार स्वतः समाप्त हो जाते हैं। इच्छा के निरोध को तप कहते हैं, हमारी इच्छा खत्म हो गई, रात में हमने पानी भी छोड़ दिया अब रात्रि भोजन की इच्छा समाप्त। आप निराकुल हो गए कि नहीं हो गए। आप की आसक्ति घटी कि नहीं घटी। आप पाप से भी बच गए, यह एक तपस्या हो गई। साध्वी जी ने मन की तपस्या, वचन की तपस्या और शरीर की तपस्या पर प्रकाश डाला। व्रत करना, त्याग करना, उपवास करना तपस्या करना आदि ये सब शारीरिक तप है।

वाचिक तप मतलब वाक-संयम, अर्थात कोई अपशब्द बोले तो उस समय मौन रख लें। मानसिक तप: मन में समता, प्रतिकूल प्रसंगों को समता से सहना। साध्वी जी ने बताया की शक्ति के अनुरूप त्याग करो और शक्ति के अनुरूप तपस्या करो। कई लोग बोलते हैं की हम में शक्ति नहीं। शक्ति है, पर अभी तुम्हारे मोह से ढकी हुई हैं। मन बन जाए तो सब शक्ति जग जाए। मन जगने से शक्ति जगती हैं तो तपस्वी बनिये, जीवन में तपस्या को धारण कीजिए।

साध्वी श्री पुनितज्योति जी महाराज द्वारा कल्पसूत्र का वाचन हुआ। साध्वी जी ने फ़रमाया कि कल्पसूत्र महामंगलकारी है। इसके श्रवण से अनेक विघ्नों का नाश होता है। कल्पसूत्र आगम ग्रंथों में सर्वाधिक उपकारी ग्रंथ है जिसे सुनने वाले भवसागर से पार हो जाते हैं।

धर्म सभा का संचालन करते हुए गणेश बाग श्री संघ के सदस्य सुनील सांखला जैन ने श्री संघ की और से तपस्वियों का अनुमोदना अभिनन्दन करते हुए कहा कि जैन धर्म में उपवास तपस्या का ही एक महत्वपूर्ण अंग हैं। उपवास आत्मा के उच्च भावों में रमण और आत्मा के सात्विक भावों के चिंतन में सहायक है। महावीर स्वामी ने आत्मज्ञान को प्राप्त करने के लिए अपने महल के साथ राजपाट छोड़ दिया था। भगवान् महावीर दीर्घ तपस्वी कहलाते थे। उन्होंने बड़ी-बड़ी तपस्या की। उनका साधना-काल साढ़े बारह वर्ष और पंद्रह दिन का था। उन्होंने गंभीर उपवास और शारीरिक यातनाएं लीं। भगवान् ने साधना काल में सिर्फ तीन सौ पचास दिन भोजन किया।

नित्य भोजन कभी नहीं किया। उपवास काल में कभी जल भी नहीं पिया। उनकी कोई भी तपस्या दो उपवास से कम नहीं थी। तप के पश्चात ही भगवान महावीर को ज्ञान की प्राप्ति हुई और वो तीर्थंकर कहलाए। भगवान् महावीर कहते है तप से आत्मा शुद्ध होती है, कषाय मिट जाते है। तप मोक्ष का आधार है। इस पर्युषण में हमे शरीर पोषण के स्थान पर आत्म पोषण पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

प्रवचन के पश्चात पार्सल पासिंग प्रतियोगिता का आयोजन किया गया और श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया और विजेताओं को पुरस्कृत किया गया। साध्वी वर्या की प्रेरणा से प्रेरित होकर अनेक श्रद्धालुओं ने छोटे छोटे तप त्याग के संकल्प लिए। अनेक श्रावक श्राविकाएं तपस्या के प्रत्याख्यान लिए। महापर्व पर्युषण तृतीया दिवस के अवसर पर गणेश बाग में बेंगलुरु के उप नगरों से अनेक संघ संस्था के पदाधिकारी एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही। धर्म सभा में गणेश बाग श्री संघ के पदाधिकारी, सदस्य, युवती मंडल, युवक मंडल की उपस्थिति रही। धर्म सभा का संचालन एवं आभार श्री संघ सदस्य सुनील सांखला जैन ने किया। श्री संघ के अध्यक्ष लालचंद मांडोत ने सभी का स्वागत किया।

उन्होंने बड़ी-बड़ी तपस्या की। उनका साधना-काल साढ़े बारह वर्ष और पंद्रह दिन का था। उन्होंने गंभीर उपवास और शारीरिक यातनाएं लीं। भगवान् ने साधना काल में सिर्फ तीन सौ पचास दिन भोजन किया। नित्य भोजन कभी नहीं किया। उपवास काल में कभी जल भी नहीं पिया। उनकी कोई भी तपस्या दो उपवास से कम नहीं थी। तप के पश्चात ही भगवान महावीर को ज्ञान की प्राप्ति हुई और वो तीर्थंकर कहलाए। भगवान् महावीर कहते है तप से आत्मा शुद्ध होती है, कषाय मिट जाते है। तप मोक्ष का आधार है। इस पर्युषण में हमे शरीर पोषण के स्थान पर आत्म पोषण पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

प्रवचन के पश्चात पार्सल पासिंग प्रतियोगिता का आयोजन किया गया और श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया और विजेताओं को पुरस्कृत किया गया। साध्वी वर्या की प्रेरणा से प्रेरित होकर अनेक श्रद्धालुओं ने छोटे छोटे तप त्याग के संकल्प लिए। अनेक श्रावक श्राविकाएं तपस्या के प्रत्याख्यान लिए। महापर्व पर्युषण तृतीया दिवस के अवसर पर गणेश बाग में बेंगलुरु के उप नगरों से अनेक संघ संस्था के पदाधिकारी एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही। धर्म सभा में गणेश बाग श्री संघ के पदाधिकारी, सदस्य, युवती मंडल, युवक मंडल की उपस्थिति रही। धर्म सभा का संचालन एवं आभार श्री संघ सदस्य सुनील सांखला जैन ने किया। श्री संघ के अध्यक्ष लालचंद मांडोत ने सभी का स्वागत किया।

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