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रूपचतुर्दशी पर बाह्य रूप नहीं आत्मा को बनाएं सुंदर: साध्वी कंचनकंवर

रूपचतुर्दशी पर बाह्य रूप नहीं आत्मा को बनाएं सुंदर: साध्वी कंचनकंवर

चेन्नई. पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम में विराजित साध्वी कंचनकंवर व  के सानिध्य में साध्वी डॉ.सुप्रभा ‘सुधाÓ ने कहा कि दीपावली पर पंचपर्वों की श्रृंखला का दूसरा दिन रूपचतुर्दशी है। इसका प्रतिकात्मक अर्थ समझने की आवश्यकता है।

हमें बाह्य, शारीरिक रूप ही नहीं आत्मा का रूप निखारना है। आत्मा का रूप ही सबसे अधिक सुंदर होता है। सबसे अधिक रूपवान तीर्थंकर परमात्मा हैं, अपनी आत्मा को साधारणता से परमात्मा तक ले जाना रूपचतुर्दशी की सार्थकता होगी।

भगवान महावीर ने आज के दिन से अंतिम देशना शुरू की थी। रूपचौदस के दिन श्रीकृष्ण द्वारा क्रूर राक्षस नरकासुर का वध कर देव, मानव, ऋषिमुनि सभी को भयमुक्त करने से इसे नरक चतुर्दशी भी कहा गया है। मात्र सुंदर वस्त्र पहनने, अच्छा भोजन करने से पहले मन के कषाय और गंदगी को दूर करने और अन्तर के तत्वों को समझने से यह पर्व मनाने की सार्थकता होगी।

स्वयं के साथ दूसरों का भी ध्यान रखकर न्याय-नीति से अर्थोपार्जन करने तथा झूठ, चोरी, जुए, शराब, व्यभिचार आदि कुव्यसन छोड़कर सदाचारी और मर्यादित जीवन जीना होगा, तभी धन-संपत्ति की देवी लक्ष्मी का आगमन और स्थाई निवास आपके घर होगा। बुराई की कमाई ज्यादा नहीं टिकती, कुकर्मों से आपकी आत्मा भारी न हो इसका ध्यान रखें।

साध्वी डॉ.इमितप्रभा ने उत्तराध्ययन मूलपाठ का सामूहिक वाचन किया। तैतीसवें अध्याय में भगवान महावीर ने अनन्त प्रकार के कर्मों में से इस लोक में आठ कर्म को मुख्य बताया है। ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय, मोहनीय, आयुष्य, नामर्क, गौत्रकर्म, अंतरायकर्म इन आठों प्रकार के कर्मों 148 प्रकृतियां कही है।

आत्मा प्रतिपल सात कर्मों का बंध करती है और आयुष्यकर्म जीवन में एक बार बंधता है। सदैव सजग रहें कि आयुष्यकर्म का बंध न हो। यह आत्मा अनादीकाल से कर्मों का बंध कर रही है। जब तक दृष्टि आत्मदृष्टि नहीं बनेगी तब तक कर्मों का बंध होगा। कर्मबंध के चार प्रकार हैं- प्रकृति, स्थिति, अनुभाग, प्रदेश। हमारी आत्मा असंख्या प्रदेशी है, जिसके सूई की नोक के बराबर प्रदेश में अनन्त कर्मवर्गणा चिपके हैं।

जब तीर्थंकर प्रभु की बताई साधना, आराधना करते हैं तो वे कर्मों के द्वारा चंचलता स्थिति होकर कर्म परमाणु कंपायमान होकर निर्जरित होते हैं। सम्यक साधना-आराधना से आत्मा से संचित कर्म हटते हैं। इसीलिए समय-समय पर तीर्थंकर, आचार्य, साधु-साध्वी हमें धर्म आराधना और तप करने को प्रेरित करते हैं।

धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उत्तराध्ययन श्रवण किया। श्री मधुकर उमराव अर्चना चातुर्मास समिति के मंत्री शांतिलाल सिंघवी ने कार्यक्रमों की जानकारी प्रदान की और सहमंत्री किशोर चोरडिय़ा ने भजन गीतिका प्रस्तुत की।

27 अक्टूबर से 24 दिन की लोगस्स साधना की शुरुआत होगी। 28 अक्टूबर को प्रात: 6.15 बजे से उत्तराध्ययन के अंतिम 36वें अध्याय का वाचन और नववर्ष मंगलपाठ होगा। 02 नवम्बर को पू.गणेशीलालजी महाराज की जन्मजयंती मनाई जाएगी।

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