जैन साध्वी चन्दन बाला ने सुख विपाक सूत्र के मध्याम से आमेट के जन सभा को फरमाया दान का महत्व
दानं भोगो नाश:, तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुत्ते, तस्य तृतीया गतिर्भवति।।’
दान, भोग और नाश, धन की ये तीन ही गति हैं। जो न दान देता है और न उपभोग ही करता है उसके धन का ‘नाश’ हो जाना यही तीसरी गति होती है। तात्पर्य यही है जो अपने धन को पात्र दान आदि सत्कार्यों में लगा देते हैं वे तो अपने धन को इस लोक में भी बहुत काल तक स्थायी रहने वाला बना लेते हैं और परलोक में नवनिधि आदि के रूप में अनेक गुणा प्राप्त कर लेते हैं।
इसके अतिरिक्त जो बड़े श्रम से धन कमाकर अपने गार्हस्थ जीवन के भोगों में ही लगा देते हैं वे तत्काल में तो कुछ उसका उपयोग कर ही लेते हैं भविष्य में उसका फल भले ही कटुक ही क्यों न हो किन्तु जो न देते हैं न खाते हैं उनके धन को चोर या डाकू लूट लेते हैं या दामाद के लोग छीन लेते हैं या सरकार के टैक्स चुकाने में लगाना पड़ता है या कोर्ट कचहरी के झगड़े में ही समाप्त हो जाता है।
साध्वी विनीत प्रज्ञा ने कहा जो पुरुष कभी न तो भगवान की पूजा करते हैं, न सुपात्रों को दान देते हैं, वे अत्यंत दीन दुर्गति के पात्र हो जाते हैं। कंजूस का संचित धन धर्म-प्रभावना, परोपकार व पात्रदान के लिए नहीं होता। अतिथि की पूजा न करने वाला व्यक्ति मृत्यु के समय में पछताएगा की हाय, मैंने इतना धन संचय किया, लेकिन वह कुछ काम नहीं आया।
साध्वी आनन्द प्रभा जी ने कहा यदि कोई पर से दान दिलाता है तो वह दान वैसा है? सो ही आचार्य बताते हैं कि- ‘धर्म के कार्य, स्वामी की सेवा और सन्तानोत्पत्ति को कौन समझदार मनुष्य दूसरे के हाथ सौंपता है? अर्थात् धर्म के कार्य-दान, पूजा आदि क्रियाएं, स्वामी की सेवा और संतान उत्पत्ति के कार्य, स्त्री भोग ये कार्य बुद्धिमान लोग स्वयं ही करते हैं।
जो अपना धन देकर दूसरों के द्वारा धर्म कराता है वह उसका फल दूसरों के भोग के लिए ही उपार्जित करता है इसमें संदेह नहीं है। खाद्यपदार्थ, भोजन करने की शक्ति, रमण करने की शक्ति, सुन्दर स्त्रियाँ, संपत्ति और दान करने की शक्ति ये सब चीजें स्वयं धर्म करने से ही प्राप्त होती हैं। मुनियों को नाई, धोबी, कुम्हार, लुहार, सुनार, गायक, भाट, दुराचारिणी स्त्री तथा नीच लोगों के घर आहार नहीं लेना चाहिए। उत्तम वर्ण और उत्तम कार्य करने वालों के यहाँ ही आहार लेना चाहिए ऐसा विधान है।
इस सभा मे भीम से 6 की तपस्या लेकर पधारी
श्रीमान घेवरचंद जी दरला की पोत्री रिद्धि जी दरला जिन्होंने गुरु माता तपाचार्य श्री जयमाला महाराज से 6 उपवास के पच्चाखाण लिए जिनके आगे के भाव है। श्रीमती सीमा जी बाबेल ने तेला लेकर आपका स्वागत शल माला से किया, इस शुभ अवसर पर शुक्रवार को आमेट के महिला मंडल ने पद्मावती एकसना व्रत रखा भोजन की व्यवस्था श्री संघ में रखी गई।।



