श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म. सा. ने गुरुवार को धर्म सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि ज्ञान आत्मा का तीसरा नेत्र कहा गया है।
जिसके द्वारा जाना जाय, वह ज्ञान है। संसार के भौतिक पदार्थों और आध्यात्मिक तत्वों के स्वरूप को समझने के लिए ज्ञान के समान दूसरा और कोई नेत्र नहीं है। भगवान महावीर ने भी कहा है कि पहले ज्ञान प्राप्त करो और फिर दया, आचरण करें। उन्होंने आगे कहा कि ज्ञान आत्मा का दर्पण है। ज्ञान मन के समस्त विकारों को नष्ट करके उसे शुद्ध पवित्र, निर्मल बनाता है। पहले जानकारी ज़रुरी है।
बिना ज्ञान के यह अमृत है, विष है, इसका पता नहीं चलेगा। यदि आपको जानकरी, उस चीज का सही बोध, ज्ञान हासिल है तो आप अमृत और विष को जान सकते है। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने भी कहा है कि इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र और कुछ नहीं हैl ज्ञान प्रकाश करने वाला है। ज्ञान ही मनुष्य जीवन का सार है।
आत्मा का सच्चा ज्ञान ही हमारे जन्म मरण के दुख मिटाने वाला है। अतः साधक ज्ञान प्राप्ति में स्वयं प्रयत्नशील बनें तभी हमारे लिए यह अनमोल मानव जीवन प्राप्त करने की सार्थकता है। प्रारंभ में युवा मनीषी मधुर वक्ता श्री रुपेश मुनि जी ने भजन प्रस्तुत किया। उप प्रवर्तक श्री पंकज मुनि जी महाराज ने सबको मंगल पाठ प्रदान किया।