दर्शनावरणीय कर्म आत्मा के दर्शन गुण को आवृत्त करता है। जैसे राजा के दर्शन हेतु उत्सुक व्यक्ति को द्वारपाल रोक देता है. ऐसे ही यह कर्म आत्मा की दर्शन शक्ति पर पर्दा डाल कर वस्तु के सामान्य बोध (जानकारी) को रोक देता है।
इस कर्म के प्रभाव से इन्द्रियों का सामान्य एहसास भी स्पष्ट नहीं हो पाता। कान, नाक, आँख, जबान और त्वचा विकृत या नष्ट हो जाती है अथवा यह कर्म प्राणी को मूक, बधिर, नेत्ररोगी या अपंग बना देता है। इसके अतिरिक्त निद्रा भी इस कर्म के प्रभाव से आती है जो वस्तु का सामान्य बोध नहीं होने देती।
नेत्र, कान, नाक, जीभ व त्वचा का दुरुपयोग करने से इस कर्म का बन्ध होता है। बहरे-गूँगे, लूले, लँगड़े और अंधें या अंगविकल का तिरस्कार करने से, उन्हें धक्का देकर निकालने से, उनकी यथाशक्ति सहायता न करने से, उनका उपहास करने से तथा उनके प्रति दयाभाव न रखने से यह कर्म बँधता है।
इसके फलस्वरूप जो कार्मिक स्कन्ध आत्मा से चिपकता है उसका स्वभाव प्राणी को अन्धा, बहरा, गूँगा आदि बना देना तथा आत्मा को निद्रा, आलस्य आदि दुष्फल प्राप्त कराना है।
इस कर्म के दुष्प्रभाव से बचने के लिए जहाँ कहीं मूक, बधिर, पागल, अपंग या अंधे दिखाई दें तो उन्हें सहायता पहुँचाने में तत्पर रहना। उनके प्रति सदा करुणा का निर्झर बहाकर उनकी मदद करना और उन्हें प्रेम-सम्मान देकर हीन भावना से ऊपर उठाने का भी प्रयास करना। श्रुत ज्ञान की आराधना में सतत संलग्न रहने से तथा धार्मिक अनुष्ठानों में तीव्र भावों के साथ निरन्तर पुरुषार्थ करने से दर्शनावरणीय कर्म का क्षय होता है।
सम्यक दृष्टि की निंदा करना, मिथ्या मान्यताओं का समर्थन करना, या सम्यक दृष्टि के प्रति अकृतज्ञ होना, दर्शनावरणीय कर्म के बंधन का कारण बनते हैं.