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ज्ञानपंचमी है ज्ञान की आराधना का महान पर्व : देवेंद्रसागरसूरि

ज्ञानपंचमी है ज्ञान की आराधना का महान पर्व : देवेंद्रसागरसूरि

श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने ज्ञान पंचमी के दिन विशेष प्रवचन देते हुए कहा कि ज्ञानपंचमी पर्व ज्ञान की आराधना का महान् पर्व है, जो मानव समाज को वीतरागी संतों की वाणी, आराधना और प्रभावना का सन्देश देता है।

इस पवित्र दिन श्रद्धालुओं को श्रद्धाभक्ति से महोत्सव के साथ आगमो की पूजा-अर्चना करनी चाहिएl अज्ञान के अन्धकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले इस महापर्व के सुअवसर पर प्राकृत, संस्कृत, प्राचीन भाषाओं में हस्तलिखित प्राचीन मूल शास्त्रों को शास्त्र भंडार से बाहर निकालकर, शास्त्र-भंडारों की साफ-सफाई करके, प्राचीनतम शास्त्रों की सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें नए वस्त्रों में लपेटकर सुरक्षित किया जाता हैl

इन ग्रंथों को उचित स्थान पर विराजमान करके उनकी पूजा-अर्चना करनी चाहिए। आचार्य श्री ने आगे कहा कि यदि एक मंदिर गिर भी जाता है तो उससे भी सुंदर दूसरा मंदिर निर्मित करवा सकते हैं ,मूर्ति के टूटने पर दूसरी मूर्ति विराजमान करवा सकते हैं लेकिन शास्त्रों का एक पृष्ठ भी नष्ट होता है तो उसके स्थान पर दूसरा पृष्ठ नहीं लगा सकते हैं।

जैन परंपरा का साहित्य भारतीय संस्कृति का अक्षय भंडार है । जैन आचार्यों  ने ज्ञान -विज्ञान की विविध विधाओं पर विपुल मात्रा में स्व- परोपकार की भावना से साहित्य का सृजन किया।  आज भी अनेक शास्त्र भंडारों में हस्तलिखित प्राचीन ग्रंथ विद्यमान हैं ।जिनकी सुरक्षा, प्रचार-प्रसार, संपादन, अनुवाद निरंतर हो रहा है। प्राचीनकाल में मंदिरों में देव प्रतिमाओं को विराजमान करने में जितना श्रावक पुण्य लाभ मानते थे उतना ही शास्त्रों को ग्रंथ भंडार में विराजमान करने का भी मानते थे। यह ज्ञान पंचमी महापर्व हमें जागरण की प्रेरणा देता है कि हम अपनी जिनवाणी रूपी अमूल्य निधि की सुरक्षा हेतु सजग हों तथा ज्ञान के आयतनों को प्राणवान स्वरूप प्रदान करें।

जैन प्राचीन आगमों में हमारी सभ्यता आचार-विचार और अध्यात्म विकास की कहानी समाहित है । उस अमूल्य धरोहर को हमारे पूर्वजनों ने अनुकूल सामग्री एवं वैज्ञानिक साधनों के अभाव में रात-दिन खून पसीना एक करके हमें विरासत में दिया है। इस पर्व पर संकल्प लें कि जैन आगमों का सूचीकरण करके व्यवस्थित रखवाया जाये, लेमिनेशन करके अथवा माइक्रोफिल्म तैयार करवा कर सैकड़ों हजारों वर्षों तक के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है और अप्रकाशित शास्त्रों के पदार्थो को  प्रकाशित किया जाए । मां जिनवाणी को संरक्षित करने, उसका हम संरक्षण  और संवर्द्धन करने के लिए आगे आएं।

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