जैन धर्म के क्षमावानी पर्व पर बोलते हुए डाक्टर राजेन्द्र मुनि जी ने क्षमा मांगने व करने वाले को वीरता की निशानी बतलाते हुए प्रभु महावीर ने क्रोध करना कायरता तो क्षमा करना वीरता का घोटक है! अहंकारी मायावी लोभी व्यक्ति क्रोध का प्रयोग करता है इसके विपरीत शान्त स्वभावी विनयी धर्म स्वभावी हमेशा क्षमा को धारण करता है! क्षमा मात्र शब्द उच्चारण न होकर जीवन का अंग अंग बन जाए!

कड़वे से कड़वे प्रसंग हृदय से क्षमाभाव निकले! प्रभु महावीर के जीवन मे अनेकानेक ऐसे प्रसंग कष्टप्रद आए, संगम नामक देव ने प्रभु की क्षमा धर्म परीक्षा हेतू तरह तरह के डरावने व भयंकर रूप बनाकर साधना से विचलित करने का भयंकर प्रयास किया किन्तु क्षमामूर्ति महामानव महावीर ने स्वयं मे तो क्षमा धारण की ही साथ मे उसको भी अभयदान दे दिया!मुनि जी ने दुश्मनी को मैत्री भाव से समाप्त कराने का आग्रह किया!
एक राजा के हजारों हजार दुश्मन थे वो आशीर्वाद लेने गुरु के पास आया तब गुरु ने कहा जितने दुश्मन तुझे नजर आते उनको अपने घर बुलाकर आतिथी सेवा का लाभ लो, गुरु की आज्ञा अनुसार दुश्मनों को घर पर मेहमान स्वरूप बुलाकर आदर सत्कार करता है परिणाम स्वरूप सामने वाले सारे दुश्मन हमेशा के लिए मित्र बन जाते है! हम भी हमारे जीवन मे जो भी दुश्मन है उनको मित्र बनाने का प्रयास करें!साहित्यकार श्री सुरेन्द्र मुनि जी द्वारा भक्तामर स्तोत्र की महिमा प्रदर्शित की गई एवं महामंत्री उमेश जैन आदि ने संघ समाज की गतिविधिओ को प्रदर्शित करते हुए प्रतिदिन भक्तामर प्रवचन मे सबको आमंत्रित किया।