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क्षमापना मुक्ति का शिखर है, नम्रता का परिणाम है 

क्षमापना मुक्ति का शिखर है, नम्रता का परिणाम है 

श्री जैन महासंघ के तत्वावधान में आयोजित हुआ सामुहिक क्षमावाणी पर्व

Sagevaani.com @चेन्नई; जैन एकता के प्रतीक श्री जैन महासंघ के तत्वावधान में आज शुक्रवार को सामूहिक क्षमावाणी, श्रमण भगवंतों की निश्रा में, चारों सम्प्रदायों के श्रावकों का श्री जैन आराधना भवन में सामूहिक रूप से मनाया।

प पू आचार्य श्री वर्धमानसागर सूरीश्वरजी के मंगलाचरण के माध्यम से धर्मसभा की शुरुआत हुई। अध्यक्ष श्री राजकुमार ने धर्मसभा में पधारे समस्त धर्मप्रेमियों का अभिनन्दन स्वागत किया। महामंत्री सुरेशकुमार कागरेचा ने संघ द्वारा संचालित सम्पूर्ण गतिविधियों को सक्षिप्त में अवगत करवाया एवं संघ के मार्गदर्शक श्री पुखराजजी जैन को याद किया।

श्री चंद्रप्रभु जैन नया मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष श्री रमेशजी मुथा ने कहा कि क्षमा के भाव जैनों का मूल मंत्र है। श्री तेरापंथ समाज अध्यक्ष श्री उगमराजजी सांड ने सभी सम्प्रदायों से पधारे भव्यजनों को खमतखामणा की। स्थानकवासी समाज से श्री राजेशजी चोराडिया ने गुरुओं के गुणगान कर के सभा से सामूहिक क्षमा मांगी। तमिलनाडु अल्पसंख्यक आयोग सदस्य श्री प्यारेलालजी पितलिया ने अपने विचार व्यक्त करते हुए सभी से कहा कि क्षमा मन से मांगनी चाहिए। श्री पन्नालालजी सिंघवी ने आदरणीय प्रधानमंत्री द्वारा नये संसद भवन के प्रथम सत्र के प्रथम दिन समग्र विश्व से क्षमा मांगी और विश्व को जैन दर्शन की इस अद्भुत अकल्पनीय क्रिया से अवगत करवाया।

मुनिराज श्री वैभवरत्नविजयजी म सा के शिष्य ने कर्मसता की महत्ता को समझाया। प पू उपाध्याय श्री अभ्युदयप्रभ विजयजी ने कहा कि हमें अपने रिश्तों में जिनसे हमारा मतभेद हुआ हो, उनसे मन वचन काया से क्षमा मांगनी चाहिए। प पू आचार्य युगोदयप्रभ सूरीश्वरजी म सा ने कहा कि अपनी की हुई साधना आराधना का प्रतिफल वैर विरोध को खत्म किए बिना नहीं प्राप्त किया जा सकता। सभी जीव करूं शासन रसी। सभी को क्षमा करना, लेकिन एक को करना भूल जाते है, तो क्षमा नही होती है। सभी गुरु एक पाट पर आने से गुरु की उदारता है।

प पू आचार्य श्री देवेंद्र सागरजी ने कहा कि नवकार गिनने वाले सभी साधर्मिकों को अन्तःकरण से शुद्धता से अपनाने से ही जैन शब्द की सार्थकता होगी। प पू ग आचार्य श्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म सा ने कहा कि क्षमापना मुक्ति का शिखर है। जैन दर्शन में क्षमावाणी आदि काल से है, हमें शम, नम, तम, अर्थ क्षमता का परिणाम, नम नम्रता का परिणाम और तम क्षमा जैसा गुण नहीं, क्षमा जैसी साधना नहीं, क्षमा जैसा आदर नहीं, क्षमा जैसा भाव नहीं। प पू ग आचार्य श्री विज्ञानप्रभ सूरीश्वरजी म सा ने बताया कि मैत्री भावना, प्रमोद भावना, कारुण्य भावना (कोमल), मध्यस्थ भावना इन चार पायों को मजबूत बनाना है। प पू पन्यास प्रवर श्री कल्याणपद्म सागरजी ने ज्ञान को आचार में अगर नही ला सको तो मान में बदल जाता है। सुनते सभी महात्मा को है, लेकिन उसको स्मरण करना और अनुकरण करना भी होना चाहिए।

इस विशिष्ट अवसर पर श्री मांगीलालजी देशरला, श्री कान्तिलाल भण्डारी, श्री गौतमचन्दजी कांकरीया, श्री सरोजजी जैन, श्री अशोकजी खतंग, श्री सुनिलजी काला, श्री रमेशजी फोलामुथा, श्री मुकेशजी गुलेच्छा इत्यादि कई संघों के अग्रणी गणमान्यगणों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। धन्यवाद ज्ञापन महामंत्री श्री सुरेशकुमार कागरेचा ने दिया और सभी से स्वामी वात्सल्य लाभ देकर पधारने का अनुरोध किया। कुशल मंच संचालन श्री संघवी विपिन सतावत ने मधुर वाणी से किया।

समाचार सम्प्रेषक : स्वरूप चन्द दाँती

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