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आलोचना आत्मा और मन का स्नान है – साध्वी सुधा कंवर

आलोचना आत्मा और मन का स्नान है – साध्वी सुधा कंवर

जय जितेंद्र, कोडमबाक्कम् वड़पलनी श्री जैन संघ के प्रांगण में आज तारीख 27 जुलाई सोमवार, परम पूज्य सुधाकवर जी मसा के मुखारविंद से:-आलोचना आत्मा और मन का स्नान है। जैसे स्नान करने पर शीतलता, स्वच्छता एवं ताजगी का अनुभव होता है उसी प्रकार आलोचना करने पर साधक का मन भी स्वच्छ एवं शीतल हो जाता है। आलोचना करने वाला आराधक होता है और आलोचना नहीं करने वाला विराधक होता है। प्रभु ने फरमाया कि गुरु के चरणों में आलोचना करने के लिए जाते हुए अंतः करण इतना विशुद्ध एवं पवित्र हो जाता है कि यदि उस समय काल धर्म को भी प्राप्त हो जाए तो भी विराधक नहीं होकर आराधक ही होता है। आलोचना वही कर सकता है जो पापों से डरता हो एवं जिसका मन सरल हो।

सुयशा श्रीजी महाराज साहब के मुखारविंद से:-चिंता एक ऐसी चिता है जो इंसान को जीते जी ही मृत्यु शैया पर सुला देती है। मनुष्य संसार में रहता है और सांसारिक जीवन में कोई ना कोई परेशानी होती ही है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हम हमेशा ही अपनी जिंदगी चिंता में गुजारते रहे। आज का मनुष्य अनेकानेक चिंताओं से ग्रसित है। कुछ चिंताएं सचमुच में परेशान करने वाली हैं लेकिन कुछ चिंताएं ऐसी है जिनमें परेशान होने वाली कोई बात ही नहीं है। मनुष्य अपने जीवन से ज्यादा दूसरों के जीवन के लिए परेशान होता रहता है और यही उसकी चिंता का सबसे बड़ा कारण है। तो परमात्मा कहते हैं की चिंता नहीं चिंतन करें क्योंकि चिंता से सिर्फ परेशानियां बढ़ेगी लेकिन चिंतन से समाधान निकलेगा।

आज की धर्म सभा में श्रीमान अशोक जी तालेड़ा ने 24 उपवास, श्रीमती सुशीला जी बाफना ने 16 उपवास, एवं श्रीमती प्रकाश बाई लालवानी ने 15 उपवास के प्रत्याख्यान किए। इसी के साथ कई धर्म प्रेमी बंधुओं ने विविध तपस्याओं के प्रत्याख्यान ग्रहण किए एवं जैन भवन में महिला शिविर बहुत ही उल्लास पूर्वक गतिमान है।

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