Share This Post

Featured News / ज्ञान वाणी

लोभ के कारण व्यक्ति स्वयं संकट में फंस जाता है: जयधुरंधर मुनि

लोभ के कारण व्यक्ति स्वयं संकट में फंस जाता है: जयधुरंधर मुनि
श्री जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में वेपेरी स्थित जय वाटिका मरलेचा गार्डन में जयधुरंधर मुनि के सानिध्य में जयपुरंदर मुनि ने उत्तराध्ययन सूत्र  के आठवें अध्ययन का विवेचन करते हुए कहा भगवान की वाणी पाप पंक का प्रक्षालन करने वाली होती है। भगवद् वाणी के श्रवण एवं आचरण से पापी आत्मा भी पावन बन जाती है। लोग पाप का बाप होता है उससे बचना चाहिए।
जो प्राप्त है उसका संग्रह करना और जो अप्राप्त है, उसे पाने की लालसा करना लोभ हैं। इच्छाएं आकाश के समान अनंत होती है। आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है, लेकिन इच्छाएं कभी पूरी नहीं होती। एक इच्छा पूरी होने पर दूसरी इच्छा उत्पन्न हो जाती है।
मुनि ने कपिल केवली के जीवन चरित्र का वर्णन करते हुए कहा जैसे – जैसे लाभ बढता है, वैसे-वैसे लोभ भी बढ़ता जाता है। तृष्णा एक ऐसी प्यास है, जो संसार के किसी भी जल से शांत नहीं होती अपितु वृद्धिगत होती जाती है। तृष्णा ही दुख का मूल कारण है। लोभ अनर्थो की जड़ है। लोभी लोभ में  फंसकर कई बार ऐसा अंधा बन जाता है, जिसके कारण वह स्वयं संकट में फंस जाता है। लोभ के वश दूसरों को ठगने वाला स्वयं ठगा जाता है।
लोभी व्यक्ति अपनी स्वार्थ- परायणता के कारण रिश्ते – नाते एवं समस्त उपकारों को भूल कर दूसरों को धोखा देने में भी नहीं हिचकिचाता। लोभ के कारण अनेक पापों का सेवन कर लिया जाता है। आज मनुष्य इसलिए दुखी है कि जो उसके पास होता है वह उसकी परवाह नहीं करता, लेकिन जो उसके पास नहीं होता, उसे पाने के लिए दिन – रात एक कर देता है।
मनुष्य लोभ के वशीभूत भूख – प्यास, ठंडी – गर्मी, अपमान आदि अनेक दुखों को भोगता है। जिस प्रकार बिल्ली दूध को देखती है, स्वयं पर पड़ने वाले लाठी का प्रहार नहीं देखती, उसी प्रकार लोभी मनुष्य धन को देखता है, किंतु उससे होने वाली आपदाओं को नहीं देखता।

Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

Skip to toolbar