Share This Post

Featured News / Featured Slider / ज्ञान वाणी

ज्ञान से होता है आत्म कल्याण: डॉ श्री वरुण मुनि जी

ज्ञान से होता है आत्म कल्याण: डॉ श्री वरुण मुनि जी

श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म.सा. ने जीवन में ज्ञान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ज्ञान आत्मा का दर्पण है। बिना ज्ञान के जीवन पशु के समान है।

पांच इन्द्रिय तथा मन से जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह मतिज्ञान है तथा पढ़ने और सुनने से जो ज्ञान होता है वह श्रुत ज्ञान कहलाता है। लौकिक ज्ञान के साथ साधक को आध्यात्मिक ज्ञान भी प्राप्त करना चाहिए। आत्म ज्ञान ही ईश्वर ज्ञान है। मुनि आत्म शोधक होता है। वह वीतराग धर्म का पथिक है।

व्यक्ति को अपने जीवन में आध्यात्मिक शांति और जीवन निर्माण के साथ सच्चे सुख का रहस्य जानने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना परम आवश्यक है। आत्म विकास और आत्महित की साधना के लिए गुरु का अवलंबन ,शरण ग्रहण करना चाहिए। बिना गुरु शरण स्वीकार किए सच्चे आत्म बोध की शिक्षा नहीं प्राप्त हो सकती है।

उन्होंने कहा कि अध्यात्म ज्ञान या उससे विकास केलिए जीवन में कुशल मार्गदर्शक एवं प्रतिबोध की आवश्यकता होती है। साधना पथ पर आगे बढ़ने के लिए एवं जीवन में सही दिशा में आगे कदम बढ़ाने के लिए कुशल मार्गदर्शक या गुरु न हो तो साधक विपरीत पथ पर या सुविधावादी मार्ग पर भी चल सकता है।

मुनि श्री ने धर्म सभा में कार्मिकी बुद्धि और पारिणामिकी बुद्धि पर भी सारगर्भित विवेचना प्रस्तुत की। मधुर वक्ता युवा मनीषी श्री रुपेश मुनि जी ने अंतगड सुत्र की वाचनी श्रावक श्राविकाओं को देते हुए अपने विचार व्यक्त किए। उप प्रवर्तक श्री पंकज मुनि जी महाराज ने सबको मंगल पाठ प्रदान किया। कार्यक्रम का संचालन राजेश भाई मेहता ने किया।

Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

Skip to toolbar