चेन्नई

वाणी का उपयोग कैसे करना है इस पर चिंतन करना चाहिए: साध्वी कुमुदलता

अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता ने हमें अपनी वाणी का उपयोग कैसे करना है इस पर चिंतन करना चाहिए। वाणी हमेशा मधुर होनी चाहिए। कोयल भले ही काली हो लेकिन उसे वाणी का सौंदर्य प्राप्त है इसीलिए वह सबको प्यारी लगती है। वाणी का सौंदर्य संसार का सबसे बड़ा सौंदर्य है। हमें बोलने पर संयम बरतना चाहिए। ऐसे शब्दों का उपयोग नहीं करना चाहिए जिसे सुनकर किसी को ठेस पहुंचे बल्कि ऐसी वाणी बोलनी चाहिए कि सुनने वाला प्रसन्न हो जाए। शिक्षक दिवस के अवसर पर अपने उद्बोधन में कहा जीवन पथ पर आगे बढने में शिक्षक की अहम भूमिका होती है। शिक्षक ही हमारा मार्गदर्शन करते हैं। उन्होंने अतिथि संविभाग व्रत की चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में अतिथि को देवता का रूप माना जाता है। भगवान महावीर ने दान देने का सुंंदर वर्णन किया है कि दान हमेशा शुद्ध भाव से देना चाहिए। चंदनबाला का वर्णन...

पुण्य का गलत उपयोग मत करो: साध्वी धर्मलता

ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा पुण्य का गलत उपयोग मत करो। पुण्य का भुगतान करते समय यह स्मृति होना चाहिए कि मेरे पाप का बंध तो नहीं हो रहा। यद्यपि पुण्य भी मोक्ष मार्ग में बाधक है। बंधन तो बंधन ही होता है। चाहे लोहे का हो या सोने का हो। पुण्य को एकत्रित करना भी जरूरी है। समयानुसार छोडऩा भी जरूरी है। जब तक पुण्य प्रबल हैं तब तक कोई भी कष्ट नहीं दे सकता। पुण्य कमजोर होते ही व्यक्ति गिर जाता है। आध्यात्म जीवन को टिकाने के लिए चार विकल्प है। विचारबल, श्रद्धाबल, संयमबल और तीनों को पुष्ट करने पर आता है त्यागबल।  जितना त्याग बढ़ेगा उतना पुण्य मजबूत होगा। साध्वी ने कहा कि 9 प्रकार के पुण्य बांधकर 42 प्रकार के भुगतान किया जाता है। साध्वी अपूर्वा ने कहा कि संसार दुख से भरा है। एक-एक जीव अनेक दुखों से पीडि़त है। जिस प्रकार पर्वत दूर से रमणीय नजर आता है परन्तु पास से काजल के समान।...

बुद्धि की समृद्धि दूर कर देती है चुगली

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में  विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा यदि हम पापों को नष्ट व शत्रु को परास्त करना चाहते हैं, क्लेश को लेशमात्र भी रखना नहीं चाहते, सर्व अपराधों व अपकीर्ति से दूर होना चाहते हैं तथा अगले भव में लक्ष्मी प्राप्त करना चाहते हैं तो अपने मन में चुगली को मत आने दो। जैसे अग्नि में कमल, सर्प की जिह्वा में अमृत, पश्चिम दिशा में सूर्य का उदय, आकाश में फसल, पवन में स्थिरता तथा मारवाड़ में कल्पवृक्ष नहीं होता, वैसे ही दुर्जनता में चंद्र जैसे उज्ज्वल यश की प्राप्ति नहीं होती। जो मानव चुगली करता हुआ सौभाग्य चाहता है, वह मानो बिना परिश्रम के संपदा, कलह करता हुआ कीर्ति, प्राणियों के प्राण लेकर पुण्य, लज्जा रखकर नृत्य करना, अभक्ष्य भोजन करके निरोगता व निद्रा लेता हुआ विद्या प्राप्त करना चाहता है जो असंभव है। चुगली करने वाला धर्म की गली को तोड़ देता है, बुद्धि की समृद्धि दूर क...

समय के साथ जीवन को सार्थक बनाने वाले सफल होते हैं: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा समय के साथ जीवन को सार्थक बनाने वाले सफल हो जाते हैं। ऐसा नहीं करने वालों के हाथ में निराशा ही लगती हैं। जिनका भाग्य अच्छा होता है उनको गुरु का इशारा ही बदल देता है। देव गुरु की भक्ति जब भी पाने का मौका मिले तो दिल से स्वीकार कर आनंद पूर्वक करना चाहिए। दिव्य जिनशासन प्रत्येक आत्माओं को दिव्यता प्रदान करता है। देव गुरु का सानिध्य मिलने पर अनन्य भक्ति आस्था के साथ अपने अमुल्य जीवन को सार्थक बनाना चाहिए। उन्होंने कहा इस भव को बेहतर करने के लिए धर्म का मार्ग अपनाना चाहिए। मन में जिज्ञासा होने पर मनुष्य दिल से धर्म को अपनाता है। यह कार्य मनुष्य के जीवन को बदल देता है। परमात्मा की वाणी का श्रवण सिर्फ भाग्यशाली ही कर पाते हैं। इसका लाभ उठाने वालों का जीवन बदल जाता है। सागरमुनि ने कहा हमारी संस्कृति में कुछ ही ऐसे पर्व है जिनका जैसा नाम होत...

अपनी गलतियों का पश्चाताप करने वाला सम्यक: प्रवीणऋषि

पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा श्रद्धा में बुद्धिमत्ता का प्रयोग करना चाहिए लेकिन श्रद्धा करते हुए बुद्धि का प्रयोग नहीं करना चाहिए। परमात्मा की आज्ञा को बिना अपनी तुच्छ बुद्धि का उपयोग कर श्रद्धा के साथ स्वीकार करें और उन्होंने जो सत्य मार्ग दिखाया है उसका अनुसरण करना चाहिए। सुरक्षा की चाह रखने वाले को नियम और आज्ञा का पालन करना जरूरी है। जो स्वयं परमात्मा की आज्ञा में नहीं रहता वह स्वयं परेशान होता है और दूसरों को भी दु:खी और परेशान करता है। गोशालक, रावण और दुर्योधन जैसे अनेकों उदाहरण ऐसे हैं जिन्होंने अपने अहंकार को नहीं छोड़ा और दूसरों को परेशान किया, जो व्यक्ति आत्मा का मूल्य भूलकर विषयों को प्राथमिकता देता है उन्हीं में रस लेता है, स्वत्व को भूलकर पर तत्त्व चिंतन करता है उसका स्वभाव कपट और छद्मस्थ बन जाता है। कोई उसे इससे बाहर निकालना चाहे तो भी...

पाप अज्ञान में पैदा होता है: पुष्पदंत सागर

कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा पाप अज्ञान में पैदा होता है। पत्ते मत तोड़ो, नींव तोड़ो, जड़ को काटो। पापी से नहीं पाप से नफरत करो। पापी को नहीं पाप को मिटाना है। तीर्थकंर का ज्ञान शास्त्रीय पुस्तक नहीं था। उनकी साधना से प्रकट हुआ था। जब महावीर को कैवल्य ज्ञान हुआ देवताओं ने समवशरण की रचना की। सभी प्राणियों को शरण दी। तरुणसागर ने भी सभी को शरण दी। सबको सुनाया, जगाया, मार्ग दिखाया। हजारों जुगनू मिलकर प्रकाश नहीं कर सकते। अज्ञान तो परमात्मा के पास जाने ही नहीं देता है। अज्ञान का पहला मित्र है स्वार्थ, दूसरा है हिंसा और तीसरा है अधिकार ये सब महावीर में नहीं थी। तुम्हारे पास टीवी ,अखबार और पुस्तकों से एकत्रित ज्ञान है जो तुम्हें संभलने नहीं देता। स्कूली ज्ञान ने सिर्फ प्रतिसपर्धा सिखाई है। जिस ज्ञान में राग द्वेष है मोह माया है वह हानिकारक है और जो ज्ञान...

राजनीति के साथ धर्मनीति से होता उत्थान : आचार्य श्री महाश्रमण

माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ठाणं सूत्र के दूसरे स्थान के 448वे सूत्र का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा कि दो चक्रवर्ती ऐसे हुए हैं जिन्होंने काम-भोगों का परित्याग नहीं किया और मृत्यु के बाद सातवें नरक लोक में अप्रतिष्ठित नैरयिक के रूप में उत्पन्न हुए| वर्तमान अवसर्पिणी काल में १२ चक्रवर्ती हुए| इनमें से दो चक्रवर्ती सुभूम और ब्रह्मदत जो की क्रमशः आठवें और बारहवें चक्रवर्ती थे! जो अंतिम समय में साधना नहीं करने के कारण मृत्यु के बाद सातवीं नरक में गये| आचार्य श्री ने आगे कहा कि चक्रवर्ती एक सत्ताधीश व्यक्ति होता है| दुनिया में चक्रवर्ती से बड़ा और कोई सत्ताधीश नहीं होता| चाहे वह प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति भी क्यों न हो| प्रभुत्व के क्षेत्र में सर्वोच्च स्थान, छः खण्ड के अधिपति होते हैं, चवदह रत्नों के स्वामी होते हैं| पहले भरत , आठवें सुभूम और बारहवें ब...

तरुणसागर के कड़वे वचनों से मिली जैन समाज को नई पहचान

श्री सकल जैन समाज और श्री खण्डेलवाल दिगम्बर जैन समाज के तत्वावधान में बुधवार को शहर में विराजित सर्व जैन सम्प्रदायों के आचार्यों, उपाध्याय प्रवर, प्रवर्तक, उपप्रर्वतक और साध्वियों की निश्रा में साहुकारपेट स्थित श्री प्रवीणभाई मफतलाल मेहता गुजराती जैनवाड़ी में राष्ट्रसंत तरुणसागर के देवलोकगमन के उपलक्ष्य में गुणानुवाद सभा का आयोजन हुआ। इससे पहले पुष्पदंतसागर की प्रेरणा से कोण्डितोप स्थित सुंदेशा मूथा जैन भवन से कलश रथयात्रा निकाली गई जो गुजराती जैनवाड़ी पहुंची। गुणानुवाद सभा में तरुणसागर के गुरु आचार्य पुष्पदंतसागर ने कहा दुनिया ने तो एक संत खोया है लेकिन मैंने तो अपना बेटा खो दिया। तरुणसागर दिल पर राज करना चाहते थे लोगों को जगाना चाहते थे यह उनका विचार था। वे हमेशा इसी के लिए जीए। उनका अभाव कोई भी पूरा नहीं कर सकता। उन्होंने कहा उनकी यही प्रार्थना है कि तरुणसागर जैसा ही शिष्य सभी को मिले। ...

अपनी गलतियों का पश्चाताप करने वाला सम्यक : उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि

पर्युषण पर विशेष कार्यक्रम शुरू बुधवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर, पुरुषावाक्कम, चेन्नई में चातुर्मासार्थ विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि महाराज एवं तीर्थेशऋषि महाराज के प्रवचन कार्यक्रम आयोजित हुआ। उपाध्याय प्रवर ने बताया कि श्रद्धा करने में बुद्धिमत्ता का प्रयोग करना चाहिए लेकिन श्रद्धा करते हुए बुद्धि का प्रयोग नहीं करना चाहिए। परमात्मा की आज्ञा को बिना अपनी तुच्छ बुद्धि उपयोग किए श्रद्धा के साथ स्वीकार करें और उन्होंने जो सत्य मार्ग दिखाया है उसका अनुसरण करना चाहिए। आचार्य मानतुंग ने अपनी बेडिय़ां तोडऩे के लिए किसी अन्य का आह्वान न कर अपनी श्रद्धा और सामथ्र्य को जगाया। आचारांग सूत्र में बताया कि सुरक्षा की चाह रखने वाले को नियम और आज्ञा का पालन करना जरूरी है। जो स्वयं परमात्मा की आज्ञा में नहीं रहता वह स्वयं परेशान होता है और दूसरों को भी दु:खी और परेशान करता है। गोशालक, रावण और...

ज्ञान की गंभीरता, आचरणों की ऊँचाई सम्पन्न बने मनुष्य: आचार्य श्री महाश्रमण

माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ठाणं सुत्र दूसरे अध्याय के 447वें श्लोक का विवेचन करते हुए कहा कि मनुष्य क्षेत्र के बीच में दो तरह के समुन्द्र है – लवण और कालोद| जैन भुगोल के आधार पर हम जहां रहते हैं, वह जम्बू द्वीप हैं| इसको चारों ओर वलयाकार में समुन्द्र है, उसका नाम है लवण समुंद्र| उसके बाद एक द्वीप आता है, उसका नाम है धातकी खण्ड| उसके चारों ओर एक समुद्र हैं कालोदधि (कलोद) समुन्द्र| उसके बाद पुष्कर द्वीप, फिर समुन्द्र, इस तरह असंख्य समुन्द्र और द्वप हैं|    आचार्य श्री ने आगे कहा कि हम मनुष्य अढ़ाई द्वीप (पन्द्रह कर्म भूमि) – पांच भरत, पांच ऐरावत, पांच महाविदेह, इन पन्द्रह कर्म भूमियों में मनुष्य होते हैं, उन्हीं में से फिर साधु होते हैं, तीर्थकर होते हैं|      आचार्य श्री ने आगे कहा कि *सिद्ध चन्द्रों से भी ज्यादा निर्मल है, सूर्यों से भी ज्यादा प्रकाशक...

पौषध करना यानी आत्मा का पोषण करना: साध्वी कुमुदलता

दादावाड़ी में विराजित साध्वी कुमुदलता ने कहा पौषध करना यानी आत्मा का पोषण करना। आजकल सब शरीर का पोषण करते हैं। इन आठ दिनों में आत्मा का पोषण करें। सामायिक प्रतिक्रमण पौषध करें। जिस तरह हार्ट सर्जरी करते हैं,उसी तरह पौषध से आत्मा की सर्जरी होती है। इन आठ दिनों में इंद्रियों को ब्रेक दें। भगवान महावीर ने पर्यूषण की दो जरूरी बातें बताई है सामयिक और पौषध। स यानी साधना-समता की साधना करें, म यानी ममता को छोडं़े। य अर्थात यतना, जीवन में यतना से चलें। क यानी करुणा-सभी जीवों के प्रति दया रखें। दूसरा है पौषध- यह दो प्रकार की होती है-देशा बगासिक और प्रतिपूर्ण पौषध। जिस प्रकार पाटे के चार पायों में से एक पाया नहीं होने से पाटा डगमगाने लगता है इसी तरह डगमग जीवन को संतों के समागम से स्थिर बनाएं। हमारे जीवन से आदर्श और मर्यादा गुम हो गई है। यह हमें समझ नहीं आ रहा है कि हमारा जीवन बनावटी हो गया है। संसार ...

लक्ष्मी भी न्यायवंत मानव के पास स्वत: चली आती है: संयमरत्न विजयज

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजयज ने कहा नदी का प्रवाह जिस तरह बिना किसी उपाय के नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार लक्ष्मी भी न्यायवंत मानव के पास स्वत: चली आती है। जिस प्रकार संबंधीजन प्रीति से, तालाब कमलों से, सेना वेगवान घोड़ों से, नृत्य सुरताल से, घोड़े वेग से, सभा विद्वानों से, मुनि शास्त्रों से, शिष्य विनय से और कुल पुत्रों से सुशोभित होता है, वैसे ही राजा न्याय से शोभायमान होता है। इंद्रधनुष के समान चपल कांति वाले प्राण भले चले जाएं, चंचल संपदाएं, पानी के बुलबुले की तरह पिता, पुत्र, मित्र, स्त्री आदि के संबंध भी हमसे दूर हो जाएं, नदी के वेग के समान चंचल शरीर की जवानी एवं गुण भी चले जाएं, लेकिन हमारी कीर्ति फैलाने वाले नीति-न्याय का संग कभी छूटना नहीं चाहिए। नीति कीर्ति रूपी स्त्री को रहने के लिए घर है, प्रसिद्धि पाने वाली है, पुण्य रूपी राजा की प्रिय रानी ह...

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