एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन कहा कि पर्यूषण शाश्वत भी है और अशाश्वत भी। भाव की दृष्टि से शाश्वत है और काल की दृष्टि से अशाश्वत है। सत्य दिवस रूप में मनाए गए इस दिवस पर कृष्ण चरित्र का वाचन करते हुए उन्होंने कहा वे महान कर्मयोगी भी थे और ध्यानयोगी भी। उन्होंने लोकनीति और अध्यात्म का समन्वय किया। वे एक सफल राजनीतिज्ञ भी थे। नम्रता और विनय की पराकाष्ठा के दर्शन उन महान योगीश्वर के जीवन में होते हंै। समाज सुधारक, शांति दूत, ज्ञानेश्वर, अध्यात्म योगी,प्रेम की मूर्ति, उदारता जैसे कई गुणों के स्वामी थे। सााध्वी स्नेह प्रभा ने सत्य दिवस पर चर्चा करते हुए कहा कि भगवान सत्य है यह कहने के बदले ये कहना उचित होगा कि सत्य ही भगवान है। मनुष्य के धर्म की जितनी भी क्रियाएं हैं उन सबका लक्ष्य सत्य ही है। हमारी आत्मा अनादि काल से असत्य के अंधकार में फंसकर द...
एसएस जैन संघ ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि वैराग्य और गुरु दुख में ही याद आते हैं। यदि दुख के सागर में सुख के मोती बंटोरने हैं तो दो शर्तो को स्वीकार करना पड़ेगा-पहली भूलना सीखो एवं दूसरा विचार को नया मोड़ दो। दूसरों पर किए उपकार को भूल जाओ। सर्दी हो जाए तो ये मत समझो कि क्षय रोग हो जाएगा। सुख और दुख जीवन के दो फूल हैं। हमें दुख में से सुख निकालने की कला सीखनी चाहिए। सुख का कमल भी दुख के कीचड़ में एवं गुलाब कांटों की डाल पर खिलता है। जीवन में दुख आने पर रोने से काम नहीं चलता। सुख का काम है तो दुख भी निकम्मा नहीं है। वह अपने और परायों की पहचान कराता है। विचारों को नया रूप दो। तभी दुख में सुख मिलेगा। सुख-दुख मन के ही प्रतिबिंब हैं। मन को मोड़ देेंगे तो आनंद का सागर लहराता मिलेगा। सुख में सावधान रहें, दुख में समाधान करें। साध्वी सुप्रतिभा ने अंतगड़ सूत्र के माध्यम से देवकी के 6...
एसएस जैन संघ मदुरान्तकम में पर्यूषण पर्व पर पधारे स्वाध्याय संघ की स्वाध्यायी प्रेमलता बंब ने कहा शास्त्रों ने देने के भाव को श्रेष्ठ कहा है। प्रकृति के नियम भी यही कहते हैं कि जो देता है वो पाता है। जो रोकता है वो सड़ता है। देने वाले निस्वार्थ होते है, अपना सब कुछ लुटाने के बाद भी उनको आंतरिक संतुष्टि और सुख की अनुभूति होती है। देने से जो दुआएं मिलती हैं उसके सामने बड़े से बड़ा भौतिक सुख भी फीका पड़ जाता है इसलिए हमें देने का संस्कार अपने भीतर उजागर करना चाहिए और आने वाली पीढ़ी में भी इसके लिए जागरूकता बढ़ानी चाहिए। आज के समय में यह दुर्भाग्यपूर्ण सत्य है कि हम अपना उचित हिस्सा दिए बिना सामने वाले से सिर्फ लेने का कार्य करते हैं। जब आप किसी को देते हैं तो आप उसकी ही नहीं खुद की नजर में भी बड़े बन जाते हैं। विश्वास रखने वाले की झोली कभी खाली नहीं होती, प्रकृति हमेशा उसकी भरपाई करती है। संच...
शुक्रवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल सेटर, पुरुषावाक्कम, चेन्नई मे चातुर्मासार्थ विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि महाराज एव तीर्थेशऋषि महाराज द्वारा पर्युषण पर्व के अवसर पर विशेष प्रवचन का कार्यक्रम आयोजित हुआ। उपाध्याय प्रवर ने उपस्थित जन मैदिनी को पर्युषण पर्व का सकल्प कराया। पर्युषण पर्व की महिमा बताते हुए कहा कि प्रतिक्रमण करने का महत्व बताते हुए कहा कि राजा स ́प्रति द्वारा अपने पूर्व जन्म मे बिना जाने-समझे मा ̃ा अपनी भू१ शा ́त करने के लिए एक दिन से भी कम समय का साधु जीवन और आधी-अधूरी धर्म क्रिया की थी जिसके बाद उसका आयुष्य पूर्ण हो गया, जिसके फलस्वरूप वह राजा बना। इसलिए जो बिना जाने-समझे भी धर्मक्रिया करता है, उसका फल बहुत मिलता है। हमे अपना इतिहास जानना चाहिए कि हमारे पूर्वज कैसे धर्म शि१र पर पह ́ुचे और उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। परमात्मा प्रभु कहते है कि जो सारे दु:१ो के मूल पापो को...
एसएस जैन संघ ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि पर्वाधिराज पर्यूषण हमें संदेश दे रहे है कि संत हो या गृहस्थ साधना के क्षेत्र में सभी को आगे बढऩा है। यह पर्व राग से विराग और विराग से वीतराग का संदेश लेकर हमारे द्वार आया है। हमें आध्यात्मिक भाव से इसका स्वागत करना है। संस्कार में संस्करण करने वाली ,चार संज्ञा और चार कषायों को काटने वाली दान, शील, तप भाव की अराधना करना है। पानी से शरीर पवित्र होता है परन्तु कल्याण मार्ग के सोपान पर चढऩा है तो मोक्ष रूपी झरने में स्नान कर पवित्र बनना होगा। यह पर्व आत्मा की भाव दरिद्रता को दूर करता है। जैसे दिवाली पर धन का हिसाब लगाते हंै वैसे ही आत्म धन का हिसाब लगाना है कि कितना कमाया। पर्व के संदेश को ग्रहण कर आत्मा से परमात्म स्वरूप प्राप्त करें। उन्होंने ने कहा कि तुम क्लेश हो ऐसा मत बोलो, रोग हो ऐसा मत खाओ, कर्ज हो ऐसा मत खर्चो, पाप हो ऐसा काम ...
एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा व स्नेहप्रभा के सान्निध्य में पर्यूष्यण पर्व के पहले दिन नवकार मंत्र का अखंड जाप शुरू हुआ। इस अवसर पर साध्वी धर्मप्रभा ने कहा यह पर्व आत्मा की परम शुद्धि करने वाला है। यह प्रत्येक आत्मा को अध्यात्मोन्मुखी दृष्टि प्रदान करता है। वैर विरोध का शमन कर प्रेम क्षमा मैत्री की त्रिवेणी प्रवाहित करता है। किसी दूसरे की निन्दा न कर स्वयं में झांकना ही पर्यूषण पर्व का संदेश है। यह पर्व हमें अंतरमुखी दृष्टि देता है। सरलता से जीवन को सरस और सहज बनाने में पर्यूषण की सार्थकता है। तप, त्याग और अनुष्ठान श्रद्धा से अंगीकृत करें। बड़े ही पुण्य से ये अवसर मिलता है। इसका लाभ लेना चाहिए। उन्होंने कृष्ण चरित्र का वाचन भी किया। इससे पहले साध्वी स्नेहप्रभा ने अंतगढ़ सूत्र का वाचन करने के बाद अहिंसा दिवस पर कहा कि भगवान महावीर का धर्म दया, अहिंसा और करुणा का धर्म ह...
साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में मुनि संयमरत्न विजय ने व्रत रूपी आभूषण से विभूषित होने का अवसर ही पर्यूषण है। यह पर्व हमें अपने कर्तव्य पथ पर चलने का संदेश देता है। मानव भव ही एक ऐसा भव है, जिसमें मानव कुछ कर सकता है, बाकी नरक, तिर्यंच व देव गति में तो टाइम पास के अलावा कुछ नहीं। पर्यूषण पर्व के पहले दिन कहा जो हमारे आत्म प्रदूषण, कषाय दूषण व कर्मों की उष्णता दूर कर दे, वास्तव में वही पर्यूषण है। अध्यात्म के महल में चढऩे की प्रथम सीढ़ी है-‘अमारि प्रवर्तन’ अर्थात् अहिंसा का पालन करना और करवाना। नीचे देखकर चलने से जीव जंतुओं की रक्षा होती है, ठोकर नहीं लगती और पढ़ी वस्तु भी मिल जाती है। दया धर्म का पालन करने से हमारा हृदय कोमल होता है, परिणाम स्वरूप हृदय रूपी धरती पर हम साधार्मिक भक्ति, क्षमापना, त्याग, तपश्चर्या आदि के बीज बो सकते हैं। धर्म का मूल ही दया है और बिना मूल के तो ...
साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने पर्यूषण पर्व के पहले दिन कहा पर्यूषण पर्व जन जन को जाग्रत करने के लिए आता है। इसका लाभ लेकर जीवन को सफल बनाएं। इसका लाभ लेने से चूकना नहीं चाहिए। पर्यूषण के आठ दिनों में मनुष्य अपने आत्मा के हित के लिए जो भी करना चाहे वे कर सकता है। जीवन की खाली झोली को त्याग नियम से भर लेना चाहिए। सुज्ञान की ज्योति से मनुष्य को अपने अज्ञान के अंधेरे को दूर करना चाहिए। अपनी दिव्य धर्म भावनाओं के साथ पर्यूषण का लोगों को लाभ लेना चाहिए। जब भी ऐसा दिव्य प्रसंग भाग्यशाली आत्मा को प्राप्त होता है तो वह इसका लाभ लेकर जीवन को धन्य बना लेती है। परमात्मा के प्रति लोगों को भक्ति दिखानी चाहिए। जब तक संतों का प्रवचन चलता हो उठने के बजाय ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्रवचन में दिया हुआ समय जीवन को बदल सकता हैं। लेकिन उससे पहले उसे भाव पूर्वक जीवन में उतारने की जरूरत है...
पुरुषवाक्कम स्थित एमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने पर्यूषण पर्व के प्रथम दिन इस पर्व की महिमा बताते हुए कहा पर्यूषण पर्वों का सिरमोर है। सिद्ध, बुद्ध और मुक्त हो चुके परमात्मा तीर्थंकर भगवन्त जो स्वयं तीर्थ हैं वे भी स्वयं को पर्यूषण की आराधना करने से रोक नहीं सकते। उनका मन, रोम-रोम इस पर्व की आराधना करता है। संवत्सरी पर्व का कोई विकल्प नहीं है। जो विश्व को निर्मल बनाकर जगत का दु:ख दूर करने में हिमालय के समान अटल, अविचल है, जो जीवन, तन, मन और आत्मा को तीर्थ बनाता है ऐसा है जैन धर्म। तीर्थंकर परमात्मा जैसे देव कोई नहीं जो सबका कल्याण करते हैं। संसार के प्रत्येक जीव चाहे नारकी हो, देव हो या तिर्यंच हो, सभी को अपनी संतानें मानकर वात्सल्य भाव रखते हैं। वे चाहते हैं कि उनकी संतान भी उनके जैसे शुद्ध, बुद्ध और मुक्त बने, परमात्मा बन जाए।भगवान महावीर ने विश्व के दुर्भाग्य को सौभाग्य...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा प्रेम सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ तत्व है। प्रेम की ताकत के सामने आदमी झुकता है। रावण ने वासना के तूफान में सीता का अपहरण किया था। रावण को राम ने नहीं उसके काम ने मारा था। हिरणी अपने बच्चे के प्रेम के कारण सिंह का सामना करती है और सफल भी होती है। यह बात अलग है कि प्रेम के नाम पर ही धोखा हो रहा है। लोग वासना को प्रेम का नाम दे रहे हैं। हम दुर्गति में भटकने के लिए पैदा नहीं हुए। यदि परमात्मा बनना है तो ऊर्जा को ऊध्र्वगामी बनाओ। ऊर्जा पुरुषो का ध्यान करो। जैसे मोबाइल की बैटरी चार्ज करते हो, परमातमा की ऊर्जा से स्वयं को चार्ज करो। इससे हमारी आत्मा को इस अंधकार में फिर न भटकना न पड़े। आत्मा सीता कर्मो के कारागर में कैद है। राम की तरह संयम के तीर से कामना -वासना के रावण का अंत करो। धर्म के अभाव में जीवन नरक है। प्रेम सर्वांग का र...
यहा गोपालपुरम स्थित छाजेड़ भवन में विराजित कपिल मुनि ने पर्वाधिराज पर्यूषण की शुरुआत पर कहा हमारा यह सौभाग्य है कि हमें पर्व प्रधान देश की संस्कृति में जन्म लेने का अवसर मिला है। पर्व पावनता के प्रतीक होते हैं। पर्यूषण पर्व एक लोकोत्तर पर्व है जिसका सन्देश और उद्देश्य आत्मा का शुद्धिकरण है। ये पर्व आत्म स्मरण और आत्म जागरण की पावन वेला है। इन ८ दिनों में अपनी आत्मा का हित चाहने वाले को देह के धरातल से ऊपर उठकर चेतन के धरातल पर जीने का पुरुषार्थ करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस लोकोत्तर पर्व को रीति रिवाज के तौर पर नहीं हार्दिकता से मनाना चाहिए। यह पर्व जीवन के लिए वरदान बने इसके लिए जीवन में धर्म की प्रेरणा का प्रकाश और आत्मगुणों के विकास के लिए वीतराग वाणी का श्रवण करना जरूरी है। इस संसार में सत्ता, संपत्ति, सम्मान और संतान सभी को प्रिय है लेकिन तत्वदर्शियों ने गहन चिंतन करके इन सभी को नश्व...
अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में विराजित साध्वी कुमुदलता ने गुरुवार को पर्यूषण पर्व आरंभ होने के अवसर पर कहा कि साल भर के लंबे इंतजार के बाद पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व की सुनहरी बेला का आगमन हो गया है। इस महापर्व में सारे पर्व समाहित हो जाते हैं। भगवान ऋषभदेव और परमात्मा महावीर स्वामी के शासन में पर्यूषण की परंपरा है जबकि अन्य तीर्थंकरों के शासन में यह परंपरा नहीं है। पर्यूषण पर्व के दौरान हमें आत्मा के समीप रहने का अवसर प्राप्त होता है। यह पर्व हमें दया व करुणा का संदेश देता है। इस पर्व के आठ दिनों के दौरान आत्मा में लगे कषाय, राग-द्वेष आदि दागों को मिटाकर आत्मा की शुद्धि के लिए ज्यादा से ज्यादा तपस्या, धर्म ध्यान और परमात्मा की आराधना कर कर्मों की निर्जरा करने का प्रयास करना चाहिए। पर्वाधिराज पर्व हमें अहिंसा सिखाता है। हमें ऐसी चीजों का उपयोग करने से बचना चाहिए जिसमें किसी न किसी प्रकार की ...