चेन्नई

मानसिक शुद्धि तो शुभ विचार और शुभ भावों से होती है: साध्वी धर्मप्रभा

एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा कि पर्यूषण हमें मानसिक की शुद्धि और भावों को निर्मल रखने का संदेश देता है। मानसिक शुद्धि तो शुभ विचार और शुभ भावों से होती है। अध्यात्म चिंतन करने से मन शुद्ध होता है। चिंतन व चिंता ये दो शब्द है जिसमें धरती और अंबर जितना बड़ा अंतर है। चिंतन आत्मा को ऊध्र्वगामी बनाता है और चिंता अधोगामी बनाती है। चिंता से मन मतिष्क में तनाव पैदा होता है। चिंता की गर्मी से ज्ञान तंतु नष्ट हो जाते हैं जबकि शुभ चिंतन से बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान हो जाता है। अशांत मन भी शांत और प्रफुल्लित हो जाता है। साध्वी स्नेहप्रभा ने अंतकृत दशांग सूत्र का वाचन करते हुए कहा कि यदि हमारी धर्म भावना सुदर्शन की तरह सुदृढ, सच्ची श्रद्धा व भक्ति और अपने आराध्य के प्रति संपूर्ण समर्पण हो जाए तो हम बड़ी विघ्न बाधाओं का सामना सरलता से कर सकते हैं और उनमें विजय भी प्राप्त...

मन की शुद्धि किए बिना धर्म करने वाला प्राणी भी मोक्ष नहीं जा सकता: संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय के सान्निध्य में प्रभु महावीर का जन्मोत्सव मनाया गया। अपने हाथों में कांच पकड़ कर फिरता हुआ नेत्रहीन प्राणी जिस प्रकार अपना चेहरा नहीं देख सकता, वैसे ही मन की शुद्धि किए बिना धर्म करने वाला प्राणी भी मोक्ष नहीं जा सकता। मुक्ति रूपी स्त्री को वश में करने के लिए दूती के समान ऐसे मन की शुद्धि धारण करने की इच्छा यदि हमारे मन में हो तो कंचन-कामिनी (स्त्री) की ओर जाते हुए अपने मन-हृदय का रक्षण करना चाहिए, क्योंकि जिस तरह पत्थर की शिला पर कमल नहीं उगते वैसे ही लोभ व लाभ के चक्कर में पड़ेे जीव को आत्मधन की प्राप्ति नहीं होती। मन की शुद्धि होने पर ही जन-जन के मन में वर्धमान महावीर बसते हैं। यदि हमारी वाणी विकार रहित हो, नेत्र समता युक्त हो, पवित्र मुख पर उत्तम ध्यान की मुद्रा हो, गति मंद-मंद प्रचार वाली हो, क्रोध आदि का निरोध हो तथा वन म...

धर्म के मार्ग पर किसी को रुकावट नहीं बनना चाहिए: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने पर्यूषण पर्व के पांचवें दिन सोमवार को कहा धर्म के मार्ग पर किसी को रुकावट नहीं बनना चाहिए। भगवान कृष्ण ने धर्म के क्षेत्र में लोगों को संबल दिया था। वेे अपने माता पिता के चरणों को ही चारों तीर्थ मानते थे। माता पिता जिनके घर में है समझो चारों धाम उनके पास है। ऐसे में लोगों को तीर्थ धाम जाने की जरूरत ही नहीं है। श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता पिता की जिस भावना से सेवा की उसी भाव से सभी को अपने माता पिता की सेवा कर अध्यात्म की ओर बढऩा चाहिए। मां बाप की सुंदर सेवा करने वाले ही मोक्ष की मंजिल पाते हैं। अपने कर्तव्य को कभी नहीं भूलना चाहिए। परमात्मा का दिव्य जिनशासन संसार के प्रत्येक आत्मा को शांति और आनंद प्रदान करता है। पर्यूषण पर्व के दिवस का एक एक दिन निकल रहा है। इस दिन में अगर मनुष्य तप, ध्यान और धर्म कर ले तो दिन सार्थक बन सकता है। जीवन...

साधु को तो सावद्य योग का जीवनभर के लिए त्याग होता है: आचार्य महाश्रमण

माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन को सामायिक दिवस रूप में मनाया गया। इस मौके पर आचार्य महाश्रमण ने कहा साधु को तो सावद्य योग का जीवनभर के लिए त्याग होता है। श्रावक को अल्पकालिक सावद्य योग जबकि साधु को पूर्णकालिक सावद्य योगों का त्याग होता है। सामायिक समता की आय वाला उपक्रम हो। आदमी को यह ध्यान रखना चाहिए कि यदि शादी समारोह का अवसर भी शनिवार को है और शादी में देर है तो शादी के मण्डप और आसपास भी सभी स्वजनों के साथ सामूहिक रूप में सामायिक की जा सकती है। इस प्रकार शादी का मण्डप भी सामायिक का मंडप हो सकता है। ऐसा हो तो कितनी अच्छी बात हो सकती है।  सामायिक में गृहस्थ भी साधु जैसा ही बन जाता है। जैसे साधु के मुखवस्त्रिका होती है और गृहस्थ के भी मुखवस्त्रिका होती है। वस्त्र, वेशभूषा के हिसाब से दोनों में कुछ समानता होती है। इतना ही नहीं, सावद्य योगों के...

स्वधर्मी वात्सल्य सम्यग् दर्शन का आचार है: कपिल मुनि

गोपालपुरम स्थित छाजेड़ भवन में विराजित कपिल मुनि ने स्वधर्मी वात्सल्य सम्यग् दर्शन का आचार है जिससे व्यक्ति का सम्यग् दर्शन परिपुष्ट होता है। अपनी स्वार्थपूर्ति और अहम् पुष्टि में संपत्ति का उपयोग दुरुपयोग मात्र है। सजगता और सेवा भावना से ओतप्रोत जीवन ही सही मायने में जीवन है जिसके चारों तरफ शांति और समता का निवास होता है।  पर्यूषण के चौथे दिन कहा जीवन तो एक समझौते का नाम है इसलिए सामंजस्य करके ही जीवन यात्रा तय करने में भलाई है।  सबके प्रति प्रेम और मैत्री का व्यवहार और परस्पर सहयोग की भावना से जीना ही सफल और सार्थक जीवन की निशानी है। अपनी अर्जित सम्पदा का सम्यक उपयोग तभी होगा जब विपन्न व्यक्ति को संपन्न बनाने की दिशा में कुछ उपक्रम किया जाएगा।  इस संसार में प्रत्येक आदमी के साथ समस्याएं हैं। व्यक्ति का पुण्य कमजोर व कर्म भारी है। उग्र पुरुषार्थ और व्यवस्थित आयोजन करने के बावजूद जीवन प्रत...

गीता शिक्षा का महान खजाना दिया: साध्वी धर्मप्रभा

एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा व स्नेहप्रभा के सान्निध्य में पर्यूषण पर्व का चौथा दिन प्रमोद दिवस के रूप में मनाया गया। इस मौके पर साध्वी धर्मप्रभा ने कहा कल्पसूत्र में जिन दस कल्पों का वर्णन मिलता है उनमें से पर्यूषण एक अनित्य कल्प है। प्रथम व अंतिम तीर्थंकर के समय में ही पर्यूषण कल्प होता है मध्य के 22 तीर्थंकरों के समय में पर्यूषण नहीं होता है। साध्वी ने अचिलक्य, अद्विशिक, शय्यातर, राजपिंड, कृतिकर्म व व्रत आदि कल्पों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कृष्ण चारित्र के माध्यम से बताया कि संसार में अनंत प्राणी जन्मते व मरते हैं लेकिन सभी को पुरुषोत्तम नहीं कहा जाता। कोई भी मानव केवल सुंदर रूप, रूप, ऐश्वर्य या बल से पुरुषोत्सम नहीं कहला सकता। पुरुषोत्तम वही ंकहलाते हंै जो धरती पर जन्म लेकर धर्म की रक्षा करते हैं और धर्म रक्षा के लिए जरूरत पडऩे पर प्राण भी न्यौछावर क...

मोबाइल नहीं मैनर्स देना जरूरी: साध्वी धर्मलता

ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा गा। जैसी डाई होगी वैसा ही चित्र बनेगा। संतान को संस्कारित करने के लिए सुविधा नहीं संस्कार दीजिए। पैसा नहीं प्रेम व वात्सल्य देना चाहिए। मोबाइल नहीं मैनर्स देना जरूरी है। जीवन को अहंकार से हटाकर संस्कारित बनाना जरूरी है। बच्चों का मन कोरा कागज होता है। कोरे कागज पर जैसा चित्र बनाएंगे वैसा ही बन जाए  जिस प्रकार मकान की नींव पक्की होना जरूरी है वैसे ही बच्चे संस्कारित होंगे तो जीवन सफल होगा। बच्चों को दब्बू नहीं शेर जैसा बनाने का प्रयास करना चाहिए। बच्चों को संस्कारित बनाने के लिए तीन बातें याद रखें- गलत संगत से बचें, गलत स्थानों से दूर रहें और गलत साहित्य पढऩे स बचें। साध्वी सुप्रभा ने अंतगड़सूत्र के वाचन में गजसुकुमाल मुनि का वर्णन किया एवं साध्वी अपूर्वा ने गीतिका सुनाई। इस मौके पर बच्चों का फैंसी डे्रस प्रतियोगिता हुई  जिसमें विजेताओं क...

जीवन को अध्यात्म से जोडऩे पर आनंद का अनुभव होता है: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा जीवन को अध्यात्म से जोडऩे का लक्ष्य बनाने पर जो आनंद का अनुभव होता है। यह कहीं नहीं मिल सकता। समर्पण भावना से परमात्मा के चरणों में जाने वाला जीवन को ज्ञानी बना लेता है। जीवन को सफल बनाने के लिए परमात्मा के चरणों में समर्पित होना चाहिए। ज्यादा से ज्यादा दया व्रत कर पर्यूषण पर्व का लाभ लेना चाहिए। परमात्मा की वाणी भाग्यशाली आत्मा को ही सुनने का मौका मिलता है। इसका लाभ लेने से पीछे कभी नहीं हटना चाहिए। अब तक दूसरों की बातें सुनी लेकिन अब परमात्मा की वाणी सुनकर जीवन को सजाने का अवसर आया है। प्रवचन सुनकर दूध में पड़ा हुआ बताशा जैसे घुल जाता है वैसे ही अपना जीवन बदल सकते हैं। सागरमुनि ने कहा आचरण आत्मा को परमात्मा बना देता है लेकिन सबसे पहले श्रमण कर ज्ञानप्रकाश प्राप्त करें। आचरण का लाभ तप के बाद ही मिल पाता है। बिना तपाराधना के कोई भी ...

बिना मंजिल के रास्तों पर चलेंगे तो भटकते ही रह जाएंगे: प्रवीणऋषि

पुरुषवाक्कम स्थित एमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा बिना मंजिल के रास्तों पर चलेंगे तो भटकते ही रह जाएंगे। जिसे अपनी मंजिल नजर आए उसे परमात्मा श्रद्धाशील कहते हैं। अपनी मंजिल चुनें और फिर उसे प्राप्त करने की तैयारी शुरू करें। अपने रास्ते नहीं मंजिल तय करें। गति ही संसार का नियम है लेकिन जीव की प्रगति तभी हो सकती है जब वह चाहेगा। कोई जीव कैसे प्रगति कर सकता है? कई जीवों को बहुत परिश्रम के बाद भी प्रगति नहीं कर पाते। गति अधो भी हो सकती है और ऊध्र्व भी, यह जीव की इच्छा पर निर्भर करता है। प्रगति का पहला रहस्य है- तुम्हारा लक्ष्य, ध्येय और कामना क्या है। तपस्या करने के बाद भी समाधि का जागरण नहीं हो पाता, पूर्णता व लक्ष्यपूर्ति नहीं हो पाती इसका एकमात्र कारण है कि हमने साधनों को साध्य बना दिया है। युद्ध को भी कला बनाया जा सकता है। इसके लिए स्वयं को कलाकार बनना पड़ता है। अपने इस ...

दुर्जन व्यक्ति का आनंद भीड़ को गुमराह करने में है सुधारने में नहीं: पुष्पदंत सागर

कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा दुर्जन व्यक्ति का आनंद भीड़ को गुमराह करने में है सुधारने में नहीं, ताकि उसकी प्रतिष्ठा बनी रहे। लोगों में उसका दबदबा बना रहे। अपनी उन्नति को पुष्ट करने व अपनी दुर्भावना से सबको जोड़ता रहे। यह जघन्य अपराध है। अच्छा आचरण करना दूसरा व्यक्ति स्वीकार करेगा या नहीं इसमें संदेह है। कोई दुर्जन अपनी दुष्प्रवृत्तियों को जगजाहिर कभी नहीं करता। वह बदनामी से डरता है। भीड़ का नहीं विवेक का अनुसरण करना चाहिए। भीड़ का अनुसरण करने वाला सुधरता नहीं बिगड़ता है। एक कुशल वक्ता हजारों-लाखों को कुछ मिनट के भाषण में गुमराह कर सकता है लेकिन भाषणकर्ता को स्वयं को सुधारने में वर्षों लग सकते हैं। व्यक्ति अपना स्वास्थ्य रोगी को नहीं देता लेकिन अपना रोग दूसरों को दिए बिना नहीं रहता। उन्होंने कहा मेरा प्रयास दुर्जनों को सज्जन बनाने का है एवं जो सज्...

त्योहार मनुष्य की इन्द्रियों, मन और शरीर को पुष्ट करते हैं: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन कहा पर्यूषण आने से घर घर में आनंद छाता है। पर्व और त्योहार हमारे समाज के अंदर हमेशा से चलते आए हैं। त्योहार मनुष्य की इन्द्रियों, मन और शरीर को पुष्ट करते हैं जबकि पर्व मनुष्य के आत्मगुणों को। इससे आत्मा को बहुत बड़ा लाभ होता है। त्योहार पर लोग अच्छे कपड़ा पहनते हैं, लेकिन पर्व के दिनों में त्याग और तप करने की इच्छा होती है।  दिल को सद्गुणों से जोडऩे की इच्छा होती है। पर्यूषण पर्व पर लोगों को तप तपस्या कर अपना  जीवन सफल बनाने की ओर आगे बढऩा चाहिए। इस आठ दिन में अपनी आत्मा की निर्जरा कर लेनी चाहिए। इसका वास्तविक लाभ तब मिलेगा जब अपने द्वारा कोई भी भूल हुई हो तो उससे क्षमा याचना करलें। छोटा हो या बढ़ा, गलती के लिए क्षमा मांग लेनी चाहिए।   पर्यूषण में मनुष्य अपने आत्महित के लिए जो भी करना चाहे कर सकता है। सागरमुनि...

यात्रात्रिक यानी परमात्मा की भक्ति: मुनि संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने पर्यूषण के दूसरे दिन वार्षिक 11 कर्तव्य समझाते हुए कहा जो कर्तव्य पथ पर चलता हुआ ठोकरें नहीं गिनता, वह एक दिन ठाकुर बन जाता है।  स्वरूप अ_ाई महोत्सव करना। नगर के समस्त जन धर्म से प्रभावित हो ऐसी रथयात्रा निकालना, आत्मशुद्धि के साथ सिद्धिकरण हो, स्नात्र महोत्सव यानी विधि-अर्थ-भावपूर्वक प्रभु की पूजा-भक्ति करना, देवद्रव्य वृद्धि अर्थात नीतिपूर्वक कमाई हुई लक्ष्मी का सदुपयोग प्रभु-भक्ति में करना। अष्ट कर्म के आवरण का अनावरण करने के लिए इस पर्व का आगमन होता है। ईहलोक व परलोक कल्याणकारक, कर्म के मर्म को समझाकर निर्मल आत्मधर्म की ओर ले जाने वाला यह पवित्र पर्व है। संघपूजा यानी संघ की पूजा तीर्थंकरों की पूजा के समान है। साधर्मिक भक्ति अर्थात श्री संभवनाथ परमात्मा ने पूर्व के तृतीय भव में साधर्मिक भक्ति करके तीर्थंकर पद को प्राप्त कर...

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