चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा ज्ञानियों के कथनानुसार इंद्र का जैसे ऐरावत हाथी, विष्णु का गरुड़, धनद का पुष्पक विमान, महादेव का वृषभ (नंदी), कार्तिकेय का मयूर तथा गणपति का वाहन मूषक है, वैसे ही मोक्ष मार्ग की ओर जाने के लिए दया रूपी वाहन ही सर्वश्रेष्ठ है। दया रूपी कामधेनु जो हमेशा विविध प्रकार के स्वर्ण, मोती, प्रवाल, मणि तथा धन रूपी गोमय (गोबर) को देती है। श्वेत यश रूपी दूध देती है ऐसी दया रूपी कामधेनु नष्ट न हो, इस तरह हमें उसकी रक्षा करनी चाहिए। जो बुद्धिहीन मानव प्राणियों का वध करके धर्म की इच्छा रखता है, वह मानो पश्चिम दिशा से सूर्योदय, नमक में से मिठास, सर्प के मुख में से अमृत, अमावस से चंद्र, रात्रि से दिन, लक्ष्मी के संग्रह से दीक्षा की इच्छा रखता है। भव रूपी सागर को पार करने के लिए जहाज रूप, उत्तम बुद्धि रूपी वृक्षों के स्कंद रूप तथा ...
चेन्नई. एमकेबी नगर जैन स्थानक में साध्वी धर्मप्रभा ने कहा जिंदगी में आने वाले इम्तिहानों से घबराना नहीं चाहिए। गगन में जब उजाला होने वाला होता है तब अंधकार सघन हो जाता है। सुख हमारा इंतजार कर रहा है बस एक बार दुख रूपी दरवाजे को पार करना है। संघर्षों का सामना करो परिश्रम और विवेक के बलबूते पर साधनों के अभाव में प्रतिभाएं, उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं। जीवन में संघर्ष उत्कर्ष के द्वार खोलता है। दुख और संघर्ष से ही ऊर्जा बल निर्मित होता है। साध्वी स्नेहप्रभा ने कहा सच्चा साधु वही होता है जो आत्मा, मन और इंद्रियों को साधने का प्रयत्न करता है। मोक्ष प्राप्ति के लिए संयम या भाव साधुता जरूरी है। आज तक जितने भी जीव सिद्ध, बुद्ध और मुक्त हुए हैं उन्होंने अपनी आत्मा को त्याग और वैराग्य की साधना में तल्लीन किया है तभी सुख के अधिकारी बने। कार्यक्रम का संचालन सज्जनलाल सुराना ने किया।
चेन्नई. ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा अरिहंत होने की दशा में इंसान का पहला कदम होता है अपनी ही खोज। अपनी आंखों में अपने ही अस्तित्व को निहारना। मैं कौन हूं ये चिंतन करना। राग को घटाने के लिए अनित्य भावना का माध्यम है। द्वेष को कम करने के लिए मैत्री करुणा, प्रमोद भाव है। राग में स्वार्थ है अनुकंपा में नहीं। क्रोध से द्वेष की उत्पत्ति होती है और माया से राग पैदा होता है। आध्यात्मिक विकास के तीन सोपान हैं त्याग, वैराग्य और वीतराग। त्याग से पदार्थ छूटता है और वैराग्य से ममत्व टूटता है। वीतरागता से आनंद फूटता है। जब व्यक्ति स्व का राग, जाति का राग और संप्रदाय का राग छोड़ देता है तो वीतरागी बन जाता है। साध्वी अपूर्वा ने कहा कि जहां संसार की स्मृति वहां आत्मा की विस्मृति और जहां आत्मा की स्मृति वहां संसार की विस्मृति होती है। शुद्ध सामायिक करने से भगवान की आज्ञा का पालन होत...
चेन्नई. अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता ने प्रवचन में कहा कि ध्यान स्वर्ग का सिंहासन होता है। यह नकारात्मक ऊर्जा को खत्म कर शरीर को स्वस्थ बनाने का मार्ग है। ध्यान के माध्यम से क्रोध, मान, माया, लोभ, राग-द्वेष रूपी कर्मों का क्षय कर जीवन का उद्धार करें। उन्होंने कहा, काउसग्ग चार प्रकार के होते हैं आर्तध्यान, रौद्रध्यान, सूक्ष्म धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान। भगवान महावीर ने सरल, सूक्ष्म रास्ते बताए धर्म ध्यान और सरल ध्यान करने के लिए। आप अपने सारे काम कर लें लेकिन यह नहीं भूलें कि आपकी जीवन डोर परमात्मा से जुड़ी हुई है। आर्तध्यान और रौद्रध्यान छोडक़र कर्म निर्जरा करें। साध्वी पदमकीर्ति और राजकीर्ति मन की चंचलता की विवेचना करते हुए कहा कि मन बड़ा चंचल होता है। इसका पेट कभी नहीं भरता क्योंकि इसकी आकांक्षाएं मिटती ही नहीं। जब तक मन में संतुष्टि का भाव नहीं आएग...
चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने आचार्य शिवमुनि की 77वीं जन्म जयंती पर कहा आत्मा का ध्यान करने वाले शिवगुणवान होते हैं। परमात्मा की भक्ति और प्रार्थना मनुष्य को जीवन में हमेशा आगे ले जाती है। ऐसा करने से मनुष्य के गुणों में वृद्धि होती है। उन्होंने कहा उत्तम जिन भक्ति रूपी तप को जीवन में अपनाने के लिए हमेशा आगे रहना चाहिए। समय प्रतिकूल हो या न हो लेकिन अपने मन में निष्ठा के साथ चलने वाले काम को पूरा किए बिना नहीं रुकना चाहिए। गुरुदेवों की बातों को स्वीकार करना प्रवचन की रस वाली बात बन जाती है। परिवार में अगर तप त्याग होता है तो खुशी होती है। उन्होंने कहा कि आचार्य शिवमुनि का जीवन बहुत ही सरल था वे सरलता के मूर्ति हैं। उन्होंने कभी भी मान अभिमान की बात नहीं की। जिस प्रकार परिवार में किसी का जन्मदिन होता है तो उसे मनाने के लिए लोग कई तरह के उपक्रम कर खुशी मनाते ह...
चेन्नई. अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता व अन्य साध्वीवृन्द के सान्निध्य में शनिवार को आचार्य शिवमुनि की 176वीं जन्म जयंती श्रद्धा व तप अभिनंदन के साथ मनाई गई। साध्वी कुमुदलता ने शिवमुनि को भावांजलि अर्पित करते हुए कहा कि मात्र 24 वर्ष की उम्र में शिवमुनि ने माता-पिता की आज्ञा से दीक्षा लेकर ज्ञान के प्याले को पी लिया। उन्होंने यौवन अवस्था में दीक्षा लेकर जिनशासन की गौरव गरिमा को बढाया। वर्ष 1987 में डॉ. शिवमुनि को युवाचार्य घोषित किया गया। 1999 में उन्हें आचार्य पद से सुशोभित किया गया। फिर श्रमण संघ दो टुकड़ों में बंट गया। आचार्य शिवमुनि ने पुरुषार्थ किया और 1300 संतों का संघ बनाया। उन्होंने कहा, आचार्य शिवमुनि की जन्म जयंती से सीख मिलती है कि आषाढ महीने में पुण्यार्जन नहीं करेंगे तो जीवनभर पश्चाताप करना पड़ेगा। जिस प्रकार पेड़ से नीचे गिरकर पत्ता धूल ...
चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मुथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि कुछ पाने के लिए झुकना आवश्यक होता है लेकिन अहंकार व्यक्ति को झुकने नहीं देता। कुछ हासिल करने के लिए व्यक्ति को समर्पित होने पड़ता है, अधिकार जता कर कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। परमात्मा के द्वार पर जाने के लिए प्रार्थी बनना पड़ता है, दीन-हीन बनकर विनम्रता पूर्वक प्रार्थना करनी पड़ती है। व्यक्ति के मन में हमेशा दूसरों को नीचा दिखाने की कोशिश चलती रहती है। दूसरों को दबाने के तरीके अलग-अलग होते हैं, कभी धन के माध्यम से, कभी पद तो कभी बल और कभी ज्ञान के माध्यम से। उन्होंने कहा, अपने लिए सब सुख, धन, सौंदर्य, सम्मान चाहता है लेकिन दूसरों का सुख, धन, सौंदर्य, सम्मान देखा नहीं जाता। दूसरों के दुख में सहानुभूति जताने वाला व्यक्ति दूसरों के सुख से प्रसन्न इसलिए नहीं होता है क्योंकि उसके अहंकार को ठेस पहुंचती है। यही...
चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने रविवार को कहा कि उत्तम कार्य ही मनुष्य को ऊंचाइयों पर ले जाता है। जीव दया करने से जीवन में बहुत लाभ मिलते हैं। सौभाग्यशाली ही अपने जीवन को ऐसे उत्तम कार्यों में जोडऩे का प्रयास करते हैं। मनुष्य जीवन का लाभ अगर लेना चाहते हैं तो जीव दया के कार्यों में सदैव आगे रहना चाहिए। इसके साथ ही मानव जाति के प्रति अपने हृदय के अंदर क्षमा का भाव रखें। प्राणि मात्र के प्रति दिल में द्वेष का भाव नहीं रखने पर ही सच्चे अर्थों में क्षमापना का भाव उत्पन्न हो पाएगा। उन्होंने कहा, क्षमा करने और मांगने में जीत होती है, हार नहीं। क्षमा मांगना वीरों का भूषण है कायरों का व्यवहार नहीं। क्षमा दान देने-लेने से स्नेह बढ़ता है। जीवन को क्षमामय बनाने के लिए प्राणी मात्र के प्रति अपने हृदय के अंदर दया के भाव आने चाहिए। जीवों पर दया करने वाले वास्तव में उत्तम क...
चेन्नई. रविवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर, पुरुषावाक्कम, चेन्नई में चातुर्मासार्थ विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि महाराज एवं तीर्थेशऋषि महाराज के प्रवचन का कार्यक्रम आयोजित किया गया। उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषिजी ने आचारांग सूत्र में त्रसकाय जीवों की श्रेणी के बारे में बताया। वे जीव त्रसकाय कहलाते हैं जिन्हें पीड़ा का अनुभव हो। जो बन भी सकता है और बिगड़ भी सकता है। दो इन्द्रिय जीवों से पंचेन्द्रियों तक के जीवों में सुधरने और बिगडऩे दोनों की स्थितियां हो सकती है। जो त्रसकाय जीव अपनी पांचों इन्द्रियों का सदुपयोग करता है वह शिखर को छू सकता है, मोक्ष को आसानी से प्राप्त कर सकता है, एकलव्य के समान बन सकता है। पंचेन्द्रिय जीव स्वयं में सुधार भी ला सकता है और बिगड़ भी सकता है। जिस प्रकार दुर्योधन को सुधारने के लिए अनेक वाक्य लगे लेकिन वह द्रोपदी के मात्र एक वाक्य से बिगड़ा और परिणाम महाभारत ...
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ माधवरम के महाश्रमण समवसरण में आचार्य महाश्रमण कहा कि समाधि के द्वारा साधु समाधिस्थ रह सकता है। निर्जरा के मुख्यत: तीन माध्यम बताए गए हैं-स्वाध्याय, सेवा और अनाहार की तपस्या। साधु को इनमें से कोई न कोई हमेशा अपने पास रखने का प्रयास करना चाहिए। तीनों में से किसी को भी अपना मुख्य माध्यम बनाकर कर्मों की निर्जरा कर आत्मा को निमर्ल बनाने का प्रयास करना चाहिए। तपस्या में बहुत गुण होते हैं। तपस्या केवल निर्जरा की भावना की जानी चाहिए। तपस्या में भौतिक चीजों की कामना नहीं करने का प्रयास करना चाहिए। वर्तमान में लोग अनाहार (आहार का त्याग) को ही तपस्या कहते हैं। मुख्यमुनि महावीकुमार ने ‘सुरंगों शील सजो’ गीत का संगान किया। उसके बाद आचार्य महाश्रमण ने ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के 25वें भव राजर्षि नन्दन के भव का वर्णन करते हुए कहा कि एक समय ऐसा आया जब राजा नंदन राजर...
गुरुवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर, पुरुषावाक्कम, चेन्नई में चातुर्मासार्थ विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि महाराज एवं तीर्थेशऋषि महाराज द्वारा पर्युषण पर्व के अंतिम दिन संवत्सरी महापर्व पर उपस्थित जैन मैदिनी को प्रवचन में कहा कि साधर्मिक की सेवा करना तीर्थंकर परमात्मा की भक्ति करने के समान है। जो इस भावना के साथ अपने साधर्मिक भाइयों की सहायता करनी चाहिए। आज महापर्व पर ऐसी भावना भाएं कि इस संसार से आज तक बहुत कुछ लिया है और अब मुझे इस संसार को देना है और मानव, साधर्मिक, और संघ सेवा को अपना उद्देश्य बनाएं। जीवन में यदि किसी के विचारों से असहमती हो तो उसे अपने मन में गांठ की तरह न बांधें, दुश्मनी का रूप न दें। क्षमा के महापर्व पर प्रण लें कि यदि किसी से एग्री न हो तो कभी भी एंग्री न होंगे। यदि संघ में किसी बात पर असहमति हो जाए तो भी ऐसा प्रयास करें कि संघ की प्रभावना ही हो विरोध नहीं।...
आचार्य तीर्थभद्रसूरीश्वर के सान्निध्य में श्री चन्द्रप्रभु जैन नया मंदिर ट्रस्ट के तत्वावधान व श्री गुजराती श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ के सहयोग से श्री तमिलनाड जैन महामंडल द्वारा अ_ाई व इससे ऊपर के तपस्वियों के पच्चक्खाण की शोभा यात्रा निकाली गई। श्री प्रवीणभाई मफ़तलाल मेहता गुजराती वाड़ी में तपस्वी एकत्र हुए। मुनि चंद्रयशविजय ने सभी तपस्वियों को मांगलिक सुनाया। तमिलनाड जैन महामंडल द्वारा सभी तपस्वियों का बहुमान किया गया। यहां से रवाना हुई तपस्वियों की शोभा यात्रा घोड़ा बग्गी, बैंड व ढोल की मधुर ध्वनि के साथ विभिन्न मार्गों से होते हुए श्री आराधना जैन भवन पहुंची। यहां आचार्य तीर्थभद्रसूरीश्वर ने सभी तपस्वियों के तप के महत्व को समझाया व केसरवाड़ी में आयोजित होने जा रहे उपधान तप में सभी के जुडऩे की प्रेरणा देते हुए सभी तपस्वियों को पच्चक्खान दिया। श्री आदिनाथ जैन युवक मंडल, सहुकारपेट व ...