चेन्नई

सुख एवं दुख मनुष्य को उसके विचारों से मिलता है:

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने गुरुवार को पर्यूषण पर्व के आखिरी दिन संवत्सरी के अवसर पर कहा कि यह बहुत ही महान पर्व है। सुख और दुख मनुष्य को उसके विचारों से मिलता है। यह जानकर प्रत्येक व्यक्ति को प्राणीमात्र के साथ मित्रता का भाव रखना चाहिए तभी मनुष्य जीवन में शांति, आनंद और सुख प्राप्त कर पाएगा। इस दिन अपने करीबी से क्षमायाचना करनी चाहिए। संवत्सरी पर्व की दिव्य आराधना से किया हुआ प्रतिक्रमण मनुष्य की समस्त आलोचनाओं को दूर कर आत्म को हल्का बनाने का कार्य करती है। प्रतिक्रमण से शुद्धि करण होता है। यदि कोई दोष है तो प्रतिक्रमण से उसकी शुिद्ध की जा सकती है। अगर कोई दोष नहीं है तो प्रतिक्रमण से आत्मा को और शुद्ध किया जा सकता है। मनुष्य की आत्मा के मैल को दूर करने के लिए प्रतिक्रमण करना जरूरी होता है। उन्होंने कहा कि संवत्सरी मनाने के बाद लोग क्षमायाचना करते हैं। ज्ञानी क...

वैर से वैर कभी शांत नहीं होता: संयमरत्न विजय

साहुकार पेठ स्थित श्री राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने बारसासूत्र का सार बताते हुए कहा कि वैर से वैर कभी शांत नहीं होता, सिर्फ प्रेम से ही वैर शांत होता है। उन्होंने स्वरचित ‘देर क्यूं करता है अभी, आज कह दे प्रभु को सभी’ क्षमा का गीत गाते हुए कहा कि पापों से भरी हुई पोटली को प्रभु व गुरु चरणों में सौंपकर अपनी आत्मा को हल्की बना देना चाहिए। क्षमा मांगनी चाहिए, क्षमा देनी चाहिए, शांत रहना चाहिए। जो व्यक्ति क्रोध, मान, माया, लोभ व राग-द्वेष को शांत कर क्षमा-याचना करता है,उ सी की आराधना सार्थक होती है। अभिमान के कारण हम अपना अपराध स्वीकार नहीं कर पाते। हमारी आत्मा सब कुछ जानते हुए भी सत्य बोलने से कतराती है और भ्रम का भूत हटाने से घबराती है। प्रभु के पास प्रायश्चित करने से सब पाप मिट जाते हैं और भजन से सारे वजन सिर से हट जाते हैं। क्षमा रूपी जल से हमारा जीवन निर्मल हो जाता है। ...

पतन के लिए एक ही कुअवसर काफी: आचार्य पुष्पदंत सागर

कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मुथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि पतन के लिए एक ही कुअवसर काफी है। नौ माह की गर्भ पीड़ा से जन्मा बालक गलत औषधि के कारण एक क्षण में मरण को प्राप्त हो सकता है। जन्मों -जन्मों के पुरुषार्थ से प्राप्त सुसंस्कारित जीवन एक गलत आदत से बदनाम हो जाता है। मन को विकृत करने वाली कामना-वासना मन को रावण बना देती है। आपके सुदंर बगीचे में सभी प्रकार के कमल खिले हैं और यदि आपका मित्र वहां आकर कांटे डाल जाए और आप उसे संकोच वश कुछ नहीं कहते तो उस बगीचे का हाल क्या होगा। अगर आपके दोस्त व्यसनी हैं और आप उनसे कुछ नहीं कहते और न ही उनका साथ छोड़ते तो आपके जीवन की क्या दुर्दशा होगी। क्या आपने कभी सोचा है कि आप की एक छोटी सी भूल जीवन को बरबाद कर सकती है। यह एक सच है कि पानी की एक बूंद उपवन को हरा-भरा नहीं कर सकती लेकिन एक चिंगारी पूरे भवन को जला सकती है। इसका अर्थ है कि सुस...

संवत्सरी के हैं पांच प्रमुख कर्तव्य: साध्वी धर्मलता

एसएस जैन संघ ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि संवत्सरी के पांच कर्तव्य हैं लोच, प्रतिक्रमण, आलोचना, तपस्या और क्षमा। क्षमा राग द्वेष तोड़ती है और प्रेम के पुल बांधती है। क्षमा रूपी महल में प्रवेश पाने के लिए पासपोर्ट है मिच्छामी दुक्कड़म। यदि यह पासपोर्ट होगा तो क्रोध रूपी द्वारपाल क्षमा के महल में प्रवेश करने की स्वीकृति अवश्य देगा। भूलों को भूल जाओ तो भगवान बन जाओगे और नहीं भूले तो भव परंपरा बढ़ जाएगी। सवंत्सरी के पावन पर्व पर समता को जोडऩा और ममता को तोडऩा है। पापी को पवित्र, पराजित को विजयी, रागी को वैरागी, अज्ञानी को ज्ञानी, कठोर को दयालु, दुर्जन को सज्जन और दुखी को सुखी बनाने का पर्व है संवत्सरी। हमें कैमरे की तरह भूलों को पकडऩा नहीं है, दर्पण की तरह भूल जाना है। क्षमा के इस विशाल सागर में वैर का विर्सजन करके वैरी से जौहरी बनना है। क्षमापना विषय कषाय और ऋण से मुक्त करवा क...

पर्युषण महापर्व के अंतर्गत आज जप दिवस के रूप में तेरापंथ सभा भवन में मनाया गया

तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमणजी की अनुज्ञा से पर्युषण महापर्व की आराधना कराने के लिए पधारे उपासक श्री पदमचन्द आंचलिया (चेन्नई) ने कहा कि किसी एक शब्द पर बार-बार अनुचिंतन करना ही जप कहलाता हैं| यह मनुष्य जीवन हमारा घर अस्थाई निवास है! हमें हमारा स्थाई निवास मोक्ष को बनाना चाहिए!खाने से हम पुष्ट नहीं होते, जबकि उसे पचाने से| जो बहुत पढ़ता हैं, वह ज्ञानी नहीं होता, याद रखने वाला ज्ञानी बनता है! धन कमाने वाला धनी नहीं होता, जो धन के अपव्यय से बचने वाला धनी कहलाता है| हमारी आत्मा आठ कर्मों से बंधी हुई है! एक कथानक के माध्यम से हमें समझाया कि हमें उन कर्मों को कैसे काटना है| धर्म रूपी फावड़ा लेकर हमें खुद को अपने भीतर से आत्मा पर बंधे इन 8 कर्मों को काटने की प्रेरणा दी! हमारे भीतर अनंत शक्ति, चेतना का सागर लहरा रहा है! उन शक्तियों को जागृत करने के लिए! मंत्र जप अवश्य क...

महावीर के प्रतिनिधि के मुख से महावीर की अध्यात्म यात्रा श्रोताओं के लिए बन रही प्रेरणास्पद

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि महातपस्वी शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में पर्युषण महापर्व सानंद और भक्तिमय माहौल में निरंतर प्रवर्धमान है। अनेकानेक श्रद्धालु अपनी क्षमतानुसार तपस्या, ध्यान, साधना, जप, उपासना, स्वाध्याय आदि के माध्यम से धर्म की कमाई करने में जुटे हुए हैं। एक ऐसा धर्म का माहौल बना है, जैसे कोई देवनगरी की स्थापना हो गई हो। चेन्नई महानगर का माधावरम किसी देवलोक की भांति प्रतीत हो रहा है। भौतिकता की चकाचैंध से अलग 24 घंटे धर्म की चर्चा, धर्म की आराधना, धर्म की साधना से पूरा वातावरण आध्यात्मिक बना हुआ है। पर्युषण पर्वाधिराज का छठा दिवस ‘जप दिवस’ के रूप में समायोजित हुआ। नित्य की भांति ‘महाश्रमण समवसरण’ में महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में चतुर्विध धर्मसंघ की उपस्थिति थी। सर्वप्रथम मुख्यमुनिश्री म...

राजस्थान की माटी ने कई संत महापुरुषों को जन्म दिया: साध्वी कुमुदलता

अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में बुधवार को साध्वी कुमुदलता व अन्य साध्वीवृन्द के सान्निध्य एवं गुरु दिवाकर कमला वर्षावास समिति के तत्वावधान में प्रवर्तक पन्नालाल का 131वां जन्म जयंती सामयिक के साथ गुरु गुणगान के रूप में मनाई गई। साध्वी कुमुदलता ने अपनी भावांजलि अर्पित करते हुए कहा कि कुछ संतों का आभामंडल ऐसा होता है कि उन्हें बार-बार देखने का मन करता है, ऐसे ही महान संत पुरुषों में प्रवर्तक पन्नालाल भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि राजस्थान की माटी ने कई संत महापुरुषों को जन्म दिया। प्रवर्तक पन्नालाल का जन्म राजस्थान के नागौर जिले में एक माली परिवार में हुआ। उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए साध्वी ने कहा उनका नाम ही अनमोल है। पन्ना अनमोल रत्न होता है। पन्ना ऐसा रत्न होता है जिसे हर व्यक्ति धारण कर सकता है। इसका हरा रंग शांति का संदेश देता है। पन्नालाल को माता-पिता से ऐसे संस्कार मिले थे कि ब...

धर्म को प्रभावी तरीके से दुनिया तक पहुंचाने की जरूरत: उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि

बुधवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर, पुरुषावाक्कम, चेन्नई में चातुर्मासार्थ विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि महाराज एवं तीर्थेशऋषि महाराज द्वारा पर्युषण पर्व के अवसर पर ‘‘व्यवसाय की सफलता’’ विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित हुआ। उपाध्याय प्रवर ने बताया कि पर्युषण पर्व पर अधिक से अधिक धर्माराधना के द्वारा अपने तन, मन और चेतना को सदा-सदा के लिए निर्मल बनाएं। यदि घड़ा बनाया जाए और उसे आग में नहीं तपाया जाए तो वह कभी भी पुन: किचड़ में बदल सकता है। मिट्टी की सारी तपस्या और सहनशीलता मिट्टी में मिल सकती है। इसी प्रकार यदि धर्माराधना करने के बाद भी उसे अपने जीवन में बनाए रखें, आचरण में ढ़ाल लेंगे तो ही जीवन की सफलता है। गोशालक यदि अंतिम समय में जो क्षमायाचना की थी वह परमात्मा से कर लेता तो कितने ही जीव भव से तर जाते। परमात्मा ने परंपराओं को तोडक़र भी उसे दीक्षा दी लेकिन उसने उन्हीं से विश्वासघात ...

जीवन में ज्ञान दृष्टि से दिशा बदलती है: साध्वी धर्मलता

ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा जीवन में ज्ञान दृष्टि से दिशा बदलती है और दिशा बदलने से दशा बदलने में देर नहीं लगती। ज्ञान के दो काम है सावधान करना और समाधान करना। ज्ञान का लगे बोध तो हो आत्मा का शोध। ज्ञान रूपी लाइट लगाकर आत्मा को ब्राइट बनाओ। हेय-ज्ञेय, उपादेय की सम्यक जानकारी के अभाव में हमारा ज्ञान अधूरा रहता है मन रूपी मंदिर में ज्ञान का दीप जलाकर प्रभु का साक्षात्कार किया जा सकता है। बच्चे को उपदेश देना है तो पहले स्वयं उदाहरण बनो क्योंकि दूध और बच्चे दोनों ही समान है। दूध में जावण डालो तो दही जम जाता है लेकिन नींबू के रस की एक बूंद से फट जाता है वैसे ही बच्चे में सुंसस्कारों की जावण डालो तो राम कृष्ण बनते देर नहीं लगेगी पर कुसंस्कारों का तेजाब डालने से रावण और कंस भी बन सकता है। इसलिए  ज्ञान व चारित्र से संसार सागर पार करो। इंसान के जीवन में अज्ञान रूपी अंधकार क...

पाश्र्वनाथ की साधना हमें राग-द्वेष से दूर रहने की प्रेरणा देती है: संयमरत्न विजयजी

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजयजी ने कहा प्रभु पाश्र्वनाथ की साधना हमें राग-द्वेष से दूर रहने की प्रेरणा देती है। नेमिनाथ चरित्र से हमें जीवों के प्रति करुणा भाव रखने की शिक्षा मिलती है, मूक पशुओं की रक्षा के लिए नेमिनाथ ने राजुल जैसे सुंदर स्त्रीरत्न का त्याग कर दिया, नव-नव भवों की प्रीत एक साथ तोड़ दी। आदिनाथ परमात्मा ने धन्ना सार्थवाह के भव में साधुओं को शुद्ध घी का आहार  समर्पित कर समकित प्राप्त किया था। अभिग्रहधारी प्रभु वीर ने इंद्रभूति के मन में चल रहे जीव के प्रति संदेह का समाधान करते हुए कहा जिस प्रकार दूध में घी, तिल में तेल, काष्ठ में अग्नि, फूल में सुगंध और चंद्र की कांति में अमृत होता है, उसी प्रकार शरीर में आत्मा का निवास रहता है। प्रभु पाश्र्वनाथ के चरित्रानुसार जगत में कमठ की तरह दुर्जन और धरणेन्द्र की तरह सज्जन ये दो तरह के जीव रहते हैं, लेकिन...

पश्चाताप हृदय की प्रज्वलित की गई ज्वाला: साध्वी धर्मप्रभा

एसएस जैन संघ एमकेबी नगर स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा प्रमादवश, कषाय वश हमारे द्वारा किए गए पापों का प्रायश्चित करना चाहिए। पश्चाताप तो हृदय की प्रज्वलित की गई वह ज्वाला है जिसमें हमारे पाप जलकर भस्म हो जाते हैं। बड़े बड़े पापी हत्यारे और पतित भी पश्चाताप की अग्नि में जलकर पावन हो जाते हैं। जिस प्रकार एक भार वाहक अपना भार उतार कर हलका महसूस करता है इसी प्रकार एक साधक अपने दृष्ट कृत्यों की आलोचना निंदा व पश्चाताप कर के पाप से हल्का हो जाता है। हार्दिक रूप से किया गया पश्चाताप व भविष्य में भूलों को नहीं दोहराने का संकल्प ही सच्चा प्रायश्चित है। ऐसा करने पर हृदय की कलुषता कांति में बदल जाती है। भूल का हो जाना पाप है मगर भूल को छिपाना महापाप है और भूल को बार बार दोहराना पशुता की मूर्खता की निशानी है। साधना के कंटकपूर्ण मार्ग पर चलते हुए साधु या गृहस्थ किसी से भी भूल हो सकती है मगर...

जीवन को संपूर्ण रूप से परमात्मा के भक्ति में लगाने की आवश्यकता: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा जीवन को अच्छे भावों से ही बदला जा सकता है। इसके लिए जीवन को संपूर्ण रूप से परमात्मा के भक्ति में लगाने की आवश्यकता है। युवाओं में चेतना जागने पर समाज के अंदर अनुठा भाव उत्पन्न होता है। युवा जिस कार्य को हाथ में लेते है निश्चित रूप से उसे पूरा भी करते हैं। पर्यूषण पर्व मनुष्य को जगा कर परहित करने का संदेश देने के लिए आता है। ऐसे समय को कभी गंवाना नहीं चाहिए क्योंकि परमात्मा की दिव्यवाणी जन-जन के जीवन में अमृत का आलोक भरने वाली होती है। जो भाग्यशाली संसार के कार्य छोड़ कर इसका लाभ लेते है वे अपने जीवन को धन्य और पावन बना लेते है। जैसा मनुष्य का भाव होता है वैसा ही उसके जीवन का निर्माण भी होता है। प्रवर्तक पन्नालाल की जन्म जयंती पर कहा उन्होंने जहां भी चौमासा किया अपनी छाप छोड़ी। उन्होंने शासन के अंदर लोगों को समर्पित होने की प्रेरणा द...

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