चेन्नई

दान के तीन भेद: आचार्य पुष्पदंत सागर

चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा दान के तीन भेद हैं-तामसिक दान, राजसिक दान और सात्विक दान। त्याग भी तीन प्रकार का होता है राजसिक त्याग, तामसिक त्याग और सात्विक त्याग। दान होता है प्रिय वस्तु का और त्याग होता है अप्रिय वस्तु का। जिसमें प्राण अटके हैं वह प्रिय वस्तु है। भौतिक वस्तुएं जिसके कारण तृष्णा का नाटक चल रहा है उनका दान करना चाहिए। अप्रिय वस्तुएं राग, द्वेष, क्रोध, मान व माया है इनका त्याग करना चाहिए। जिन कषायों व हिंसा के कारण पतन हो रहा है और जन्म मरण हो रहा है उनका त्याग कर देना चाहिए। दान देना मेरा कर्तव्य है इस भावना से जो दान किया जाता है वह सात्विक है। सात्विक दान की विशेषता है दाता समाप्त हो जाता है पर कृत्य जीवित रहता है। अनंत काल तक उसके गुण गाए जाते हैं। सात्विक दान और त्याग का अर्थ है फलाकांक्षा से रहित होकर दान देना और साधना...

आदमी जिस लेश्या में मरता है उसी लेश्या में उसका जन्म भी होता है: आचार्य महाश्रमण

चेन्नई. माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में आचार्य महाश्रमण ने कहा आदमी जिस लेश्या में मरता है उसी लेश्या में उसका जन्म भी होता है। आदमी को अपनी भाव धारा को शुद्ध करने और शुभ लेश्या में रहने का प्रयास करना चाहिए। किसी को नुकसान पहुंचाने, किसी को मारने-पीटने के भावों से भी बचना चाहिए तथा शुद्ध भावों से दूसरों के हित के लिए अन्य को सन्मार्ग पर लाने आदि जैसे भावों को पुष्ट बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। एक आदमी के मन के भीतर न जाने कितने भाव आते-जाते रहते हैं। विभिन्न विचार भावों की अवस्थिति का कारण लेश्याएं होती हैं। उन्होंनेे लेश्याओं के बारे में विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि लेश्याएं छह प्रकार की होती हैं। इनमें से प्रथम तीन लेश्याएं पाप लेश्याएं होती हैं। कहा जाता है कि उन्होंने भाद्रपद शुक्ल द्वादशी से जुड़े तीन प्रसंगों के बारे में बताया कि तेरापंथ धर्मसंघ के सं...

प्रमाद आत्मा का शत्रु है: साध्वी धर्मलता

चेन्नई. ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि प्रमाद आत्मा का शत्रु है,जीव को अधोगति में ले जाता है प्रमादी को हर जगह भय होता है पर अप्रमादी को नहीं। भगवान महावीर के सिद्धांत सम्यक दर्शन की ओर ले जाते हैं। विकृतियों के प्रति चिंतन और स्व के प्रति जागरूकता की आवश्यकता है। स्वयं से हमें साक्षात्कार करना होगा। जीवन में रहकर हमें कहीं न कहीं ऐसी शैली को विकसित करना होगा जो हमें कर्तव्यपूर्ण और बुद्धियुक्त जीवन जीने की प्रेरणा दे सके। आसक्ति के अवसरों के बीच रहकर अनासक्ति का दुर्लभ कार्य मनुष्य को करना होगा। जीवन में यदि दुख वेदना और पीड़ा है तो इसका सृजन हमने ही किया है। अधिक ममता और इच्छा ही वेदना के कारण है। ममता भाव को छोडक़र समता भाव को बढ़ाना होगा। तभी जीवन को शांतिमय बनाया जा सकता है। हम साधना के लिए समय नहीं निकाल पाए इसलिए साधना के क्षेत्र में स्वविवेचना जरूरी है। अपूर...

परमात्मा की वाणी सुनने वाला ही आगे बढ़ता है: गौतममुनि

चेन्नई. गौतममुनि ने कहा भाव पूर्वक परमात्मा की वाणी सुनने वाला ही जीवन में आगे बढ़ पाता है। साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक ने कहा जग की माया पूरी तरह से झूठी है फिर भी जीव इससे मोह करता है व इसमें फंसकर पाप किए जा रहा है। जीवन को सुधारने के लिए पाप का निवारण करना होगा। जो भाग्यशाली आत्मा अपने जीवन में पुण्य का खजाना लेकर आता है, उसे सद्गुरु के सानिध्य में आकर परमात्मा की वाणी सुनने का मौका मिलता है। उन्होंने कहा मानव अपने कान को सजाने की लाख कोशिश कर ले, लेकिन कान की शोभा ज्ञान की बातें सुनने से ही होती है। ज्ञानपूर्ण बातें सुनने से ही जीवन में सुधार का मार्ग मिलता है क्योंकि ज्ञान ही जीवन को नई दिशा देता है। ज्ञान की बातें सुनने वाला जीवन पवित्र कर लेता है। बिना ज्ञान के मनुष्य लाख शोभायमान कर ले लेकिन सब बेकार है। सागरमुनि ने कहा जहां धर्म है वहां सुख है इसलिए मनुष्य को आगे बढ...

तप के तीन भेद: पुष्पदंत सागर

चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि तप के तीन भेद हैं तामसिक तप, राजसिक तप और सात्विक तप। तामसिक तप वाला हिंसा से भरा हुआ है। राजसिक तप वाला सम्मान की आकांक्षा से भरा हुआ है। सात्विक तप वाला साधना में लीन होता है तो परमात्मा का आकांक्षा से भरा है। सदियों से मनुष्य की ऊर्जा अधोगति की ओर बह रही है। जीवन की अग्नि नीचे की ओर बह रही है। अग्नि को ऊपर ले जाने के लिए साधन नहीं साधना चाहिए। यंत्र नहीं, मंत्र चाहिए। पदार्थ नहीं परमात्मा चाहिए। ध्यानाग्नि कुछ नहीं मांगती। हमारी आदतों ने स्वभाव को दबा दिया है। आदतों के पत्थर चेतना के ऊपर पर्वतों की तरह खड़े हैं। आदत हमारी मालिक बन गई है। वो हमें आदेश देती है और हम पालन करते हैं। सम्यक तप का अर्थ है स्वभाव को खोजो, स्वभाव में जीओ। मिथ्या तप का अर्थ है विभाव में जीओ। पदार्थ मांगो, पद मांगो। प्रशंसा के पीछे ...

मृत्यु के पश्चात् आदमी कोई भी परिग्रह लेकर नहीं जाता: महाश्रमण

चेन्नई. माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में आचार्य महाश्रमण ने कहा आदमी को यह सोचने का प्रयास करना चाहिए कि धन, संपत्ति, भौतिक सुख-सुविधाएं सब यहीं रह जाएंगी। मृत्यु के पश्चात् आदमी कोई भी परिग्रह लेकर नहीं जाता। उसके साथ जाता है तो उसके द्वारा किए हुए कर्मों का फल। उसके साथ आगे केवल उसका धर्म ही जाता है। आदमी को अपने धर्म के टिफिन को तैयार रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को समय रहते धर्म की कमाई करने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए उसे ध्यान, साधना और स्वाध्याय आदि के माध्यम से धर्मार्जन करने की कोशिश करनी चाहिए। बारह देवलोकों में चौथा देवलोक माहेन्द्र देवलोक होता है। इसमें केवल देवता ही होते हैं। देवलोक में जाने वाले प्राणी मानो कोई विशेष धर्म-साधना करने वाले होते हैं। इस देवलोक में उत्पन्न होने वाली आत्मा का सबसे जघन्य आयुष्य दो सागरोपम का होता है। इसमें पैदा होने वाला क...

परमात्मा वहीं है जो राग-द्वेष से परे हो: साध्वी धर्मलता

चेन्नई. तांबरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि परमात्मा वहीं है जो राग-द्वेष से परे हो। ऐसे परमात्मा की भक्ति सभी को करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि राग द्वेष के विजेता अरिहंत देव के लिए न तो कोई अपना है और न ही पराया। वे अपने और पराए की परिधि को पार कर चुके हैं। उनके लिए न तो शत्रु है और न ही मित्र। वे उपकारी और अपकारी दोनों के प्रति समान दृष्टि रखते हैं। उन्होंने भक्ति का अर्थ समझाते कहा कि अपने आराध्य के प्रति स्वयं को पूरी तरह से समर्पित कर देना ही भक्ति है। जहां अहं जल जाए, ममत्व विसर्जित हो जाए, वासना विदा हो जाए भक्ति के फूल वहीं पर खिलते हैं। साध्वी अपूर्वा ने कहा कि जिन वचन पर संदेह करना दोष है।

मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता खुद

चेन्नई. एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा कि यदि मनुष्य का भाग्य अच्छा होता है तो प्रतिकूल स्थितियां भी अनुकूल बन जाती हैं और भाग्य अच्छा नहीं हुआ तो अनुकूल स्थितियां भी प्रतिकूल बन जाती हैं। जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए अपने अच्छे भाग्य का निर्माण करना चाहिए। सबके प्रति मन में भलाई की भावना, वाणी में सत्यता व मधुरता और विचारों में स्वच्छता, आचार में नैतिकता, शरीर से सहयोग, सेवा-सुश्रुषा करने से हमारे अच्छे भाग्य का निर्माण होता है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता खुद होता है। औषध, मंत्र, नक्षत्र, गृह देवता ये चारों अनुकूल होते हैं तब हमारा भाग्य भी अनुकूल होता है। साध्वी स्नेहप्रभा ने कहा सतयुग में तप, त्रेता में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ और कलियुग में दान को श्रेष्ठ माना गया है। जैन दर्शन में भी मोक्ष के चार भाग बताए गए हंै- दान, शील, तप और भावना। सच्चा धनवान वही...

सत्य बोलने से तो कुछ भी नुकसान नहीं होता: मुनि संयमरत्न विजय

चेन्नई. साहुकार पेठ स्थित श्री राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा कि ज्यादा दान देने से धन कम होता है, शील का पालन करने से भोगों का वियोग होता है, तप करने से शरीर दुर्बल होता है, लेकिन सत्य बोलने से तो कुछ भी नुकसान नहीं होता। सत्य ही शिव है, सत्य ही सुंदर है, आज सत्य तो चला गया, मात्र सुंदर बनने में लगे हैं। सत्यवादी के समक्ष अग्नि शांत हो जाती है, समुद्र क्षुभित नहीं होता है, रोगों का समूह नष्ट हो जाता है। हाथियों की भयंकर श्रेणी निकट नहीं आती, सिंह शिथिल हो जाता है, सर्प भी उसके नजदीक नहीं आता तथा चोर व रणसंग्राम का भय तो तुरंत ही दूर चला जाता है। कीर्ति को कलंकित करने के लिए काजल के समान, विश्वास रूपी पृथ्वी को उखाडऩे के लिए हल के समान, अनेक प्रकार के अनर्थ रूपी वन को बढ़ाने के लिए मेघ समान, दुष्ट कार्यों की क्रीड़ा करने के लिए घर समान, सन्मान रूपी अंकुर को नष्ट करने क...

अच्छा सोचना और करना चाहिए: गौतममुनि

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा हमेशा अच्छा सोचना और करना चाहिए। जब काया से कोई भी अच्छी प्रवृति होती है तो उससे जीवन का भला और आत्मा का हित होता है। मनुष्य अपनी अज्ञानता से जीवन में दुख उत्पन्न करता है। ऐसा करके वह पूर्व भव के वैभव को भी खो देता है। लेकिन याद रहे गलत हरकत जीवन को गलत मार्ग पर पहुंचा देती है। जब तक पुण्य का उदय है तब तक कोई भी गलती करो दुख नहीं होगा, लेकिन पापों का उदय होने पर हर गलती सामने आने लगती है। गलतियों का परिणाम किसी न किसी रूप में भुगतना ही पड़ेगा, इसमे कोई माफी नहीं मिलती। जीवन को उज्ज्वल और पावन बनाने के लिए व्यक्ति की प्रत्येक प्रवृति उसके व्यवहार के अनुरूप होनी चाहिए। अगर मनुष्य अपने व्यवहार से हट कर कोई भी कार्य करता है तो उसे जीवन में दुखों का सामना करना पड़ता है। व्यवहार के अनुरूप चलने वाला मनुष्य अपने जीवन में अमृत घोलने ...

जीवन में संयम बहुत जरूरी है: आचार्य पुष्पदंत सागर

चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा संयम के अभाव में मन चंचल है। जीवन में संयम बहुत जरूरी है। प्रकृति व आध्यात्मिक व्यवस्था संयमबद्ध है तथा सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था भी संयमबद्ध है। आत्मा राग द्वेष के कीच में फंसी हुई है और विभिन्न योनियों की यात्रा जारी है। हम अंधे बने हुए हैं। जिसने भी संयम का उल्लघन किया वह दुखी हुआ है। आप सडक़ पर नियमबद्ध चलते हैं तो गिरते नहीं हैं। आपने प्रकृति का उल्लंघन किया तो प्राकृतिक प्रकोप बढ़ गया। ऋतुएं अब समय पर नहीं आती। नट रस्सी पर बैलेंस बनाकर चलता है तो गिरता नहीं है। बैलेंस बिगड़ता है तो गिर जाता है। परमात्मा व्यक्ति की तरह नहीं सिद्धांत की तरह है। जो उस सिद्धांत को मानकर जाग जाता है नियम व संयम के साथ एकमेव हो जाता है वह स्वयं परमात्मा हो जाता है। मनुष्य संयम के अनुकूल चलता है तो स्वयं की गहराई को पा लेता है...

प्रायश्चित प्रार्थना से मिलता है और सजा या अपराध सिद्ध होने पर: प्रवीणऋषि

चेन्नई. पुरुषवाक्कम स्थित एमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि कहा प्रायश्चित प्रार्थना से मिलता है और सजा या अपराध सिद्ध हो जाने पर मिलती है। प्रायश्चित करने और देने वालों में आपसी प्रेम बना रहता है और दण्ड या सजा देने पर आपस में वैर-दुश्मनी पनपती है। इसलिए अपने किए गए पापों के लिए कभी स्वयं को अपराधी बनाकर दंड न दें बल्कि उसका प्रायश्चित करें जो आपका जन्म-जन्मांतर सुधारकर कर्मों की निर्जरा करता है। अपने सामथ्र्य को स्वीकार करने पर ही वह आपका आचरण और स्वभाव बनेगा। अपनी आत्मा के शाश्वत स्वरूप को पहचानकर उसे स्वीकार करें। क्षमापना की प्रक्रिया का पहला सूत्र है- अपनी गलतियों को स्वीकार करना, न कि स्वयं को अपराधी मानना। जो व्यक्ति स्वयं को क्षमा कर सकता है उसी में दूसरों की गलतियों को भी क्षमा करने का सामथ्र्य होता है। जिसकी अन्तरात्मा में उजाला है उसमें कभी अंधकार हो ही नहीं सकता। सजा...

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