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उत्कृष्ट भावना बाले होते हैं महान: साध्वी सुमित्रा

चेन्नई. कोडमबाक्कम-वड़पलनी जैन भवन में विराजित साध्वी सुमित्रा ने कहा मनुष्य की राग द्वेष की भावना ही उसके भवों का नाश कर रही है। सुद्ध भाव से मनुष्य अपने जन्म मरण के चक्कर को समाप्त कर सकता है। ऐसा करने के बजाय लोग अपनी गलत भावना की वजह से अनंतकाल से भटक रहे हैं। उन्होंने कहा हिन्दू धर्म के अंदर सुद्ध भावना को भक्ति कहा गया है। भक्ति के जरिये मनुष्य परमात्मा के दर्शन कर सकता है। भावना भक्ति में बहुत शक्ति छिपी होती है। सच्ची भावना अगर भक्ति में दिखे तो जीवन का कल्याण हो सकता है। लेकिन राग द्वेष की भावना से मानव अपने मोक्ष के दरवाजों को बंद कर देता है। उन्होंने कहा कि मोक्ष की प्राप्ति के लिए बहुत सारे महान पुरुषो ने राज सिहांसन का सुख भी छोड़ दिया था। लेकिन मनुष्य झूठे सांसारिक सुख को नही त्याग पा रहा है। प्रभु के प्रति तड़प होने पर मानव जन्म मरण के चक्कर को दूर कर सकता है। आज के समय मे मनु...

धर्म ही हमारे जीवन का प्राण है: आचार्य तीर्थ भद्रसूरिश्वर

किलपाक में चातुर्मासार्थ विराजित आचार्य तीर्थ भद्रसूरिश्वर ने कहा धर्म ही हमारे जीवन का प्राण है। कोई भी कार्य की सिद्धि दो कारण के बिना नहीं होगी- उपादान कारण यानी मुख्य कारण और निमित्त कारण। मोक्ष की प्राप्ति में उपादान कारण हमारी आत्मा है और मोक्ष का निमित्त कारण परमात्मा है। आत्मा का स्वरूप परमात्मा स्वरूप में रुपान्तर होने का कारण परमात्मा है। यदि आत्मा को परमात्मा का योग नहीं मिलेगा तो मोक्ष नहीं मिलेगा। कोई कहे मेरे पुरुषार्थ से मोक्ष प्राप्त कर लूंगा यह मिथ्यात्व है। उन्होंने कहा संसार में कोई भी कार्य निष्पादन के पांच कारण होते है काल, स्वभाव, नियति, कर्म और पुरुषार्थ। परमात्मस्वरुप को देखकर ही मोक्ष की प्राप्ति की इच्छा होती है। निमित्त को ही मुख्य कारण बनाओ। आत्मा उपादान है लेकिन परमात्मा के आलम्बन के बिना परमात्मस्वरुप प्रकट नहीं हो सकता। उन्होंने कहा मन में राग द्वेष होने के क...

साधना के लिए ज्ञान और आचार का योग आवश्यक: महायोगी आचार्यश्री महाश्रमण

कुम्बलगोडु, बेंगलुरु (कर्नाटक): साधना के क्षेत्र में ज्ञान और आचार दोनों का होना आवश्यक होता है। ज्ञान के बिना आचार का कोई विशेष महत्त्व नहीं होता। सम्यक् ज्ञान के बिना भला अच्छे आचार की कामना की कैसे की जा सकती है। ज्ञान विहीन आचार का मूल्य कम हो सकता है। ज्ञान हो और फिर उसका आचरण अच्छा हो तो उसका विशेष महत्त्व होता है। ज्ञानपूर्वक आचार का पालन और ज्ञानपूर्वक होने वाली साधना ज्यादा लाभदायी हो सकती है। साधना के लिए धर्म की आराधना आवश्यक है। धर्म के दो प्रकार बताए गए हैं-संवर और निर्जरा। ‘सम्बोधि’ में बताया गया है कि संवर धर्म से शत् और अशत् संस्कार सर्वथा निरुद्ध हो जाते हैं। यहां संस्कार शब्द का प्रयोग कर्म के अर्थ में प्रयोग किया गया है और शत्-अशत् का अर्थ शुभ और अशुभ के अर्थ के लिए किया गया है। संवर से शुभ और अशुभ कर्म आने से निरुद्ध हो जाता है। मन, वचन और कार्य की प्रवृत्ति योग कहलाती ...

सामायिक है आत्मा के लिए भोजन के समान: साध्वी कंचनकंवर

चेन्नई. पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम जैन मेमोरियल सेन्टर में साध्वी कंचनकंवर के सानिध्य में राजगुरुमाता उमरावकंवर ‘अर्चनाÓ के 18वें जन्मोत्सव के अंतर्गत 20 अगस्त को चतुर्थ दिवस सामायिक दिवस के रूप में मनाया गया। बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने सामायिक और उनके जीवन प्रसंगों को स्मरण कर गुरुमाता को श्रद्धांजलि अर्पित की।   साध्वी डॉ.सुप्रभा ‘सुधाÓ ने कहा कि सामायिक की वेशभूषा हमें प्रेरणा देती है कि समता भाव रखें, क्रोध, अहंकार, माया और परिग्रह नहीं करें। सामायिक में मन नहीं लगे तो भी जरूर करें, क्योंकि धीरे-धीरे ही सही आप 14 गुणस्थान पार कर सिद्ध, बुद्ध, मुक्त हो जाएंगे। सामायिक आत्मा के लिए भोजन के समान है, दिन के 24 घंटों में से कम से कम एक घंटे जरूर सामायिक करें।  साध्वी डॉ.उदितप्रभा ‘उषाÓ ने कहा बारह व्रतों के चार शिक्षा व्रत में सामायिक व्रत को प्रमुख माना है। जब तक...

द्वादसांगी का अभ्यास साधु, साध्वी ही कर सकते हैं: आचार्य भगवंत तीर्थ भद्रसूरिश्वर

किलपाॅक में चातुर्मासार्थ विराजित आचार्य भगवंत तीर्थ भद्रसूरिश्वर के सान्निध्य में शनिवार को उनके प्रथम शिष्य मुनि तीर्थ रतिविजय ने गणि पंन्यास पदवी प्रदान के पहले आगम का अपना अध्ययन शुरू किया। इसके पहले उन्होंने अन्य साधु साध्वी एवं चतुर्विध संघ से आशीर्वाद लिया और अपनी प्रतिबद्धता के लिए अनुष्ठान किया। अनुष्ठान की पूर्णाहुति के पश्चात उपस्थित साधु साध्वी एवं चतुर्विध  संघ ने वधामणा कर उनका अभिनंदन किया और शुभकामनाएं दी। इस मौके पर आचार्य ने कहा द्वादसांगी का अभ्यास साधु, साध्वी ही कर सकते हैं। यह एक कठिन प्रक्रिया है। इसमें तांत्रिक, यांत्रिक व मांत्रिक क्रियाएँ होती है। थोड़ी सी चूक होने पर प्रायश्चित लेना पड़ता है।  मुनि अब तक नौ बार इस तरह के योग सफलतापूर्वक कर चुके हैं। दूसरे संत उत्तरसाधक बन कर उनकी सहायता करते हैं। मुनि की यह साधना छः महीने चलेगी। मुनि को 1 फरवरी 2020 को गणि पंन्यास...

दुख में दूसरों को दोष देने के बजाय अपने ही कर्मों को दोष देना चाहिए: जयधुरंधर मुनि 

वेपेरी स्थित जय वाटिका मरलेचा गार्डन में विराजित जयधुरंधर मुनि ने कहा संसार में सुख चार है तो दुख हजार है। हर जीव दिन-रात सुख प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहता है , लेकिन ना चाहते हुए भी उसे संसार के दुख भोगने ही पडते हैं। संसार में जन्म, मरण, बुढ़ापा और रोग का दुख सभी जीवो के साथ जुड़ा हुआ रहता है। शरीर व्याधि का मंदिर कहा जाता है जिसके कारण कोई ना कोई रोग उत्पन्न होते रहते हैं। जन्म और मरण के समय होने वाले दुख को भले प्रकट ना किया जा सके लेकिन उसकी अनुभूति अवश्य ही होती है। एक ज्ञानी जीव दुख भरे संसार में भी सुखी रहने की कला सीख लेता है। जिस प्रकार बत्तीस दांतो के बीच जीभ सुरक्षित रहती है, वैसे ही साधक दुख रूप दलदल में भी सुख की अनुभूति कर सकता है। जहां समस्या होती है वही समाधान भी मिलता है। व्यक्ति चाहे तो दुख में भी सुखी और सुख में भी दुखी बन सकता है। कांटों में रहकर भी फुल सुखी होता है ...

साधना संघर्ष है: परम साधक आचार्यश्री महाश्रमण

कुम्बलगोडु, बेंगलुरु (कर्नाटक): शनिवार को ‘महाश्रमण समवसरण’ महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित श्रद्धालुओं को ‘सम्बोधि’ प्रवचनमाला के माध्यम से पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि पदार्थ उसी आदमी के मन में राग-द्वेष पैदा करने में योगभूत बनता है जो आदमी अवीतरागी होता है। एक से छठे गुणस्थान में जीने वाला व्यक्ति में राग-द्वेष पैदा करने के लिए पदार्थ ही योगभूत बनता है। ‘सम्बोधि’ में वीतराग व्यक्ति में विषय और पदार्थ प्रियता अथवा अप्रियता के भाव पैदा नहीं कर सकते। जो आदमी संकल्प-विकल्प में रहता है, वह व्यक्ति पदार्थों के प्रति आसक्ति की भावना से ग्रसित हो सकता है। आसक्ति का नाश करने के लिए आदमी को संकल्प-विकल्प से बचने का प्रयास करना चाहिए। प्रथम चार घाति कर्मों का नाश कर आदमी केवलज्ञानी बन सकता है। उसके उपरान्त शेष चार कर्मों का क्षय कर वह केवलज्ञानी व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त कर सकता ह...

आत्मा के विकास के लिए चिंतन करें: साध्वी सुमित्रा

चेन्नई. कोडमबाक्कम-वड़पलनी जैन भवन में विराजित साध्वी सुमित्रा ने कहा की मनुष्य जन्म का मिलना अति दुर्लभ है। इस जीवन को पाने के बाद अगर इसका सही जगह उपयोग नही किया तो समय व्यर्थ हो जाएगा। मनुष्य अपने इस भव का जितना सदुपयोग कर सकता है उतना अन्य कोई प्राणी नहीं कर सकता। मानव अपने शरीर के माध्यम से तप, जप, आराधना और साधना कर पाप के मार्ग को भी पूण्य का मार्ग बना सकता है। इतना सब होने के बाद भी अगर धर्म के मार्ग पर नहीं गए तो जीवन बेकार हो जाएगा। उन्होंने कहा कि अगर मनुष्य समय रहते नही चेतेगा तो दुखों से दूर नही हो पायेगा। मोह माया में फस कर अगर आत्मा के कल्याण का चिंतन नही किया गया तो जीवन के दुख कभी दूर नही होंगे। जैसे मनुष्य व्यापार के विकास के बारे में चिंतन कर काम करता है वैसे ही आत्मा के विकास के बारे में भी चिंतन करनी चाहिए। आत्मा में अनंत सुख होती है उसे देखने की जरूरत है।  दुनिया के म...

राष्ट्र सुरक्षित रहने पर ही धर्म सुरक्षित: जयधुरंधर मुनि

चेन्नई के वेपेरी स्थित जय वाटिका मरलेचा गार्डन में विराजित जयधुरंधर मुनि ने स्वतंत्र दिवस के अवसर पर कहा देश की एकता, अखंडता एवं स्वतंत्रता अक्षुण्ण रहे। शहीदों का बलिदान व्यर्थ ना जाए इसके लिए हर देशवासी के अंदर राष्ट्रीयता की भावना पल्लवित पुष्पित और विकसित होने चाहिए। जातिवाद , संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद इत्यादि से ऊपर उठकर राष्ट्रहित का चिंतन होना चाहिए। राष्ट्र सुरक्षित रहने से ही धर्म सुरक्षित रह सकता है । उन्होंने गुलामी की लंबी दास्तान सुनाते हुए कहा कि कैसे विदेशी आक्रांताओं ने सैकड़ों वर्ष तक देश को लूटा अत्याचार किए गुलामी की बेड़ियों में जकड़े हुए रखा। उन्होंने बर्बरता की अनेक घटनाओं का भी जिक्र किया। रक्षाबंधन के अवसर पर मुनि ने कहा कि धर्म ही आत्मा का सच्चा रक्षक है । हर जीव सुरक्षित रहना चाहता है तो उसके लिए दूसरों की रक्षा करनी होगी । रक्षाबंधन का यहां पर सामाजिक एवं राष्ट्रीय...

गौतमचंद धारीवाल का बिलाड़ा में सम्मान

बेंगलूरु/बिलाड़ा। राजस्थान के बिलाड़ा में श्रमण सूर्य मरुधरकेसरी संतश्री मिश्रीमलजी म.सा. के 129वें तथा लोकमान्य संतश्री रुपमुनिजी म.सा. के 94वें जन्मजयंती प्रसंग पर आयोजित कार्यक्रम में बेंगलूरु के श्री गुरु गणेश सेवा समिति के अध्यक्ष एवं गुरुभक्त गौतमचंद धारीवाल का सम्मान किया गया। गुरूद्वय जन्मोत्सव का यह आयोजन प्रवर्तक श्री सुकन मुनिजी व उप प्रवर्तक श्री अमृतमुनिजी सहित अनेक संतवृन्दो की निश्रा में मनाया गया। इस अवसर पर पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं सांसद पीपी चोधरी सहित स्थानीय संघ के पदाधिकारियों ने धारीवाल का शाॅल ओढ़ाकर व मेमेंटो भेंट कर सत्कार किया गया।

मोगड़ा कलां का रामदेव भंडारा 17 से

जोधपुर/बेंगलूरु। लोकदेवता बाबा रामदेवजी के आगामी भादवा मास के मेले में जाने वाले जातरुओं की सेवार्थ प्रतिवर्ष की भांति इस बार भी जोधपुर के श्री कलापूर्णा बाबा रामदेव भंडारा मोगड़ा कलां के सेवादार सदस्यों द्वारा तैयारियां शुरु कर दी गई है। बेंगलूरु की सेवादार श्रीमती शारदा जवाहर चैधरी ने बताया कि इस वर्ष 15वां भंडारा 17 अगस्त से 26 अगस्त तक प्रस्तावित है। उन्होंने बताया कि 15वें भंडारे का शुभारंभ शनिवार को प्रातः 11.15 बजे जोधपुर के पूर्व महाराज गजसिंह के करकमलों से होगा। शारदा चैधरी ने बताया कि बाबा रामदेवजी के दर्शनार्थ जाने वाले पदयात्रियों की विभिन्न प्रकार की सेवाएं जिसमें स्वादिष्ट अल्पाहार व खाद्य सामग्री, चिकित्सा सेवा व थकान मिटाने के मसाज व मोबाईल चार्ज सहित अन्य सेवाएं करके जन सेवा-नारायण सेवा के ध्येय को पूरा करते हैं। फलोदी व जोधपुर के यूसी जैन, भंवरलाल माणकचंद छाजेड़ परिवार प्रम...

सम्यक दर्शन की यात्रा में वंदना का महत्व है : उपाध्याय श्री प्रवीणऋषिजी

बेंगलूरु। यहां गणेश बाग में चातुर्मासार्थ विराजित उपाध्याय प्रवरश्री प्रवीणऋषिजी म. सा. ने प्रवचंन के माध्यम से सम्यक दर्शन की यात्रा में वंदना का महत्व बताते हुए कहा कि वंदना करने की क्रिया के कारण से जीव के नीच गौत्र का क्षय हो जाता है और वह उच्च गौत्र का बंध करता है। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर का संदेश है कि जो दूसरो की निंदा और अपनी प्रशंसा करे वो नीच गौत्र है और जो स्वयं की कमियाॅं और दूसरों की अच्छाई देखे वह उच्च गौत्र वाला व्यक्ति होता है।यदि व्यक्ति उच्च गौत्र वाला हो जाये तो सारी पुण्यवानी अपने आप दौडी चली आती है।उपाध्यायश्री ने कहा कि मनुष्य के जीवन में दो चक्र होते है। धर्म चक्र और संसार चक्र। संसार चक्र की गति उल्टी है तो वहीं धर्म चक्र की गति सीधी है। इसलिए संसार में समाधान प्राप्त करने के बावजूद भी समस्या दूर नहीं होती है एवं धर्म के क्षेत्र में कितने भी समस्याएॅं आ जाए समा...

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