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आभ्यंतर संस्कार का त्याग ही सच्ची साधना: आचार्य तीर्थभद्र सूरीश्वर

चेन्नई. किलपॉक में विराजित आचार्य तीर्थभद्र सूरीश्वर ने कहा इस भव में अकेले आए हैं और अकेले जाएंगे। कर्म भी अकेले ही भोगना है। कोई चीज स्थायी रुप से साथ नहीं रहने वाली है। फिर हम किसके लिए इतना पुरुषार्थ व मेहनत कर रहे हैं। व्यवहार की दृष्टि से आपके स्वजन हैं लेकिन परमार्थ दृष्टि से वे आपके कोई नहीं। उन्होंने कहा संसार में कुल जीवों की संख्या के मुकाबले मनुष्य एक प्रतिशत भी नहीं है। जो 99 प्रतिशत को नहीं मिला वह मनुष्य भव हमें मिला है। जिसे सर्वज्ञ शासन की प्राप्ति नहीं हुई वह निष्पुण्यक है। सिद्धर्षिगणि ने अपने ग्रंथ में संसार के स्वरूप को प्रकट करने की कोशिश की है। बाह्य संस्कार का त्याग दीक्षा है। अभ्यंतर संस्कार का त्याग करना ही सच्ची साधना है, यही मोक्ष मार्ग है। उन्होंने कहा सिद्धर्षिगणि कहते हैं कि जो सुख का सही कारण है उसे हम दुख का कारण मानते हैं और यह विपरीत बुद्धि का परिणाम है। ...

माता-पिता को नित्य करें वंदन, जीवन हो जायेगा चंदन : डॉ. वसंतविजयजी म.सा.

पर्यूषण पर्व पर स्वर्ग सरीखा बनेगा हृींकारगिरी धाम इंदौर। कृष्णगिरी पीठाधिपति, राष्ट्रसंत, यतिवर्य डॉ. वसंतविजयजी म.सा. ने रविवार को कहा कि मनुष्य को प्रतिदिन माता-पिता को धोक देना अर्थात श्रद्धा से वंदन करना चाहिए। इससे आत्मिक शांति, शक्ति और बल मिलेगा। उन्होंने कहा कि नियमित अपने माता-पिता को वंदन से आपका जीवन चंदन हो जाएगा। श्री नगीनभाई कोठारी चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में हृींकारगिरी तीर्थ धाम में दिव्य भक्ति चातुर्मास कर रहे डॉ. वसंतविजयजी म.सा. श्रद्धालूओं को सुरक्षा, शांति, सफलता विषय पर प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने कहा कि जीवन में अपनी ऊर्जा को काम में लोगे तो निश्चित सकारात्मक परिणाम व्यक्ति के जीवन में आएंगे। जिंदगी अपनी बुद्धि, विवेक से जीने की सीख देते हुए उन्होंने श्रेष्ठ बनने की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा भी दी। डॉ. वसंतविजयजी म.सा. ने यह भी कहा कि जिंदगी में श्रेष्ठ बनने के ...

चमत्कारी मांगलिक प्रदाता व वचनसिद्ध योगी थे संतद्वय ‘गुरुमिश्री-रुप’: साध्वीश्री डाॅ.कुमुदलताजी

तपस्वीवृंद श्रीमती कलावती-मेहंदी दरड़ा को आदर्श सास-बहू अवार्ड से पुलिस कमिश्नर ने नवाजा बेंगलूरु। यहां वीवीपुरम स्थित महावीर धर्मशाला में श्रमण सूर्य वरिष्ठ प्रवर्तक मरुधर केसरी श्रीमिश्रीमलजी म.सा. व लोकमान्य संत, शेरे राजस्थान संतश्री रुपचंदजी ‘रजत’ के जन्मजयंती के उपलक्ष्य में पंचदिवसीय विभिन्न कार्यक्रमों का समापन रविवार को हुआ। गुरु दिवाकर केवल कमला वर्षावास समिति के तत्वावधान में विश्वविख्यात अनुष्ठान आराधिका एवं शासनसिंहनी साध्वीश्री डाॅ.कुमुदलताजी आदि ठाणा-4 की निश्रा मेें तपस्वीवृंद श्रीमती कलावती एवं मेहंदी दरड़ा के मासक्षमण की ओर अग्रसर होने पर वरघोड़ा (शोभायात्रा) भी निकाला गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि दीपचंद पप्पू लूणिया, विशिष्ट अतिथि बेंगलूरु के पुलिस कमिश्नर भास्कर राव, अखिल भारतीय साधुमार्गी जैन संघ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शांतिलाल सांड, गौसेवी एवं प्रमुख समाजसेवी महेंद...

बाह्य उपकरणों को नहीं, गुणवत्ता को दें महत्त्व: महातपस्वी महाश्रमण

कुम्बलगोडु, बेंगलुरु (कर्नाटक): फूलों की नगरी बेंगलुरु में आध्यात्मिक सुवास प्रसारित करने के लिए अपने विशाल संघ के साथ भव्य चतुर्मास सुसम्पन्न कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, मानवता के मसीहा शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में रविवार को बेंगलुरुवासियों को ज्ञान, चेतना और अध्यात्म के साथ-साथ आचार्यश्री द्वारा ऐसी मंगल प्रेरणाएं प्राप्त हुईं, जिससे जन-जन आप्लावित नजर आया। जिस तरह रविवार होने के कारण श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ी थी, उसी प्रकार आचार्यश्री के अलावा अन्य चारित्रात्माओं के उद्बोधन और फिर आचार्यश्री द्वारा चारित्रात्माओं के जिज्ञसाओं का समाधान का प्रत्यशदर्शी बनकर उनके भीतर आचार्यश्री के प्रति अगाध श्रद्धा, भक्ति और समर्पण का भाव उमड़ने लगा था। रविवार को महासभा द्वारा आयोजित तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन में आए प्...

आचार्य शुभचंद्र का जीवन सरलता, सादगी और संयम का त्रिवेणी संगम

चेन्नई. वेपेरी स्थित जय वाटिका मरलेचा गार्डन में विराजित जयधुरंधर मुनि, जयकलश मुनि, जयपुरंदर मुनि एवं समणी प्रमुखा श्रीनिधि, श्रुतनिधि एवं सुधननिधि के सानिध्य एवं जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में आचार्य शुभचंद्र का 81वां जन्मोत्सव सामूहिक भिक्षु दया एवं तीन सामायिक की साधना के साथ तप-त्याग पूर्वक मनाया गया। इस अवसर पर जयधुरंधर मुनि ने कहा आचार्य शुभचन्द्र सर्व संप्रदाय समुदाय के लोगों के बीच विशेष श्रद्धा एवं अनन्या आस्था के केंद्र थे। उनका जीवन सरलता, सादगी और संयम का त्रिवेणी संगम था। आप अपने नाम के अनुसार ही उनका आचरण, चिंतन, मनन, वाणी, व्यवहार सब शुभमय था। वह हर पल स्वाध्याय एवं अनुप्रेक्षा में रक्त रहते हुए शुभ भावों में रमन करते थे। वे सरलता की जीती जागती प्रतिमूर्ति एवं सौम्य व्यक्तित्व के धनी थे। स्वयं प्रशांतचेता होने के कारण उनके सानिध्य में जो भी जाता व अमित शांति की अनुभूति...

महासभा के त्रिदिवसीय तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन का भव्य शुभारम्भ

कुम्बलगोडु, बेंगलुरु (कर्नाटक): जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की ‘संस्था शिरोमणि’ जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के तत्त्वावधान में तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन के त्रिदिवसीय सम्मेलन का भव्य शुभारम्भ महातपस्वी, शांतिदूत, अहिंसा यात्रा के प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी से महासभा के पदाधिकारियों व सैंकड़ों प्रतिनिधियों के मंगलपाठ श्रवण के पश्चात् हुआ। महासभा द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले इस सम्मेलन में इस वर्ष देश-विदेश के 242 सभाओं से कुल लगभग 764 प्रतिनिधि संभागी बने हैं। प्रातः लगभग 8.11 बजे महासभा के पदाधिकारीगण और सभाओं के सैकड़ों प्रतिनिधि आचार्यश्री के प्रवास स्थल में उपस्थित हुए तो आचार्यश्री ने मंगलपाठ सुनाया और मंगल आशीष प्रदान की। आचार्यश्री ने ‘महाश्रमण समवसरण’ में पाथेय हेतु उपस्थित महासभा के पदाधिकारियों, सभाओं के प्रतिनिधियों तथा उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने ‘सम्बो...

निर्मल मन से बोलने पर ही मिलेगी शांति : डॉ. वसंतविजयजी म.सा.

इंदौर। सांसारिक जीवन में मनुष्य का मन ही सबसे बड़ा प्रधान है। यदि प्राणी बुरे मन से बोलते है या कुछ समझकर करते हैं तो दु:ख उसके बराबर पीछे-पीछे चलता है ठीक उसी तरह जैसे बैल के पीछे गाड़ी का चक्का चलता हो और यदि प्राणी निर्मल मन से बोलेगा और फिर समझकर करेगा तो शांति ठीक वैसे ही पीछे चलेगी जैसे उसके पीछे चलने वाली छाया। यह बात कृष्णगिरी पीठाधिपति राष्ट्रसंत डॉ. वसंतविजयजी म.सा. ने शनिवार को हृींकारगिरी तीर्थ धाम में चातुर्मास प्रवचन के दौरान कही। उन्होंने कहा कि व्यक्ति विभिन्न तरह के कर्म अपने जीवन में करता है, कर्म जिस तरह शुभ-अशुभ वह करेगा ठीक परिणाम भी उसी तरह शुभ-अशुभ ही होंगे और उनके अनुसार ही वह भोग भोगेगा। यदि हम कुछ भोगेंगे तो वह हमारे किए का ही फल हमें मिलेगा। डॉ. वसंतविजयजी म.सा. ने यह भी कहा कि जो जैसा करेगा वैसा ही पाएगा, कर्म व्यक्ति के वश की बात है इसलिए हम जैसा चाहेंगे वैसा ह...

जीवन में दौलत बढ़ाने के लिए दानधर्म करना व मर्यादाओं का पालन जरुरी: साध्वीश्री डाॅ.कुमुदलताजी

बेंगलूरु। विश्वविख्यात अनुष्ठान आराधिका एवं शासनसिंहनी साध्वीश्री डाॅ.कुमुदलताजी के सान्निध्य में यहां वीवीपुरम स्थित महावीर धर्मशाला में श्रमण सूर्य, वरिष्ठ प्रवर्तक मरुधर केसरीश्री मिश्रीमलजी म.सा. की 129वीं तथा लोकमान्य संत, शेरे राजस्थान संतश्री रुपचंदजी म.सा. 95वीं जन्मजयंती के पांच दिववसीय कार्यक्रमों की श्रृंखला के तहत शनिवार को दान दिवस के रुप में मनाया गया। इस अवसर पर पुण्य की दुकान लगाकर जरुरतमंदों को अनेक प्रकार की सामग्री का वितरण किया गया। रविवार को इसी प्रसंग में संतद्वय जन्मजयंती गुणानुवाद सभा व मासक्षमण की ओर अग्रसर हो रही तपस्वीवृंद श्रीमती कलावती एवं मेहंदी दरड़ा की शोभायात्रा (वरघोड़ा) आयोजित होगी। गुरु दिवाकर केवल कमला वर्षावास समिति के तत्वावधान में अपने चातुर्मासिक प्रवचन में साध्वीश्री ने कहा कि एक साधक ज्ञान बांटकर अपना ज्ञान बढाता है जबकि श्रावक दान करके अपनी दौलत बढ़...

पुण्य कर्मों के आधार पर ही मिलता है सुख : डॉ. वसंतविजयजी म.सा.

सभी बाधाओं से पूर्ण सुरक्षा, शांति एवं सम्पूर्ण सफलता पर डॉ. वसंतविजयजी म.सा. के विचार 11 को इंदौर। विश्वशांति दूत, राष्ट्रसंत, विश्वविख्यात कृष्णगिरी धाम के पीठाधिपति, यतिवर्य डॉ. वसंतविजयजी म.सा. ने शुक्रवार को कहा कि भगवान ने इस संसार में व्यक्ति के लिए बीतने वाले सुख-दु:ख उसके कर्मों के अनुसार ही बनाए है। हमें इस जन्म में परिवार के सदस्य के रुप में मिले माता-पिता, पति-पत्नि, भाई-बहन तथा बच्चों का भी सुख मिला है तो वह भी हमारे कर्मों का ही फल है। उन्होंने हृींकारगिरी तीर्थ धाम में दिव्य भक्ति चातुर्मासिक प्रवचन में कहा कि कर्मों के अनुसार ही हमें हमारे रिश्तेदार, पड़ौसी, जानवर, पक्षी सम्पर्क में आ पाते हैं। इसके लिए हमें निरंतर पुण्य कर्मों को करते रहना चाहिए ताकि अगले जन्म में भी हम कर्मों के अनुसार ही अच्छा सुख भोग सकें। डॉ. वसंतविजयजी म.सा. ने यह भी कहा कि यदि व्यक्ति को इस जन्म में ...

संतो के आभामंडल में ऊर्जामयी प्रभाव होता है : साध्वी डॉ कुमुदलताजी

तपदिवस पर पद्मावती एकासना में 909 श्राविकाओं ने दिया योगदान बेंगलुरु। विश्वविख्यात अनुष्ठान आराधिका, शासनसिंहनी साध्वीश्री डॉ कुमुदलताजी ने शुक्रवार को तप दिवस के अवसर पर कहा कि ज्ञान, दर्शन, चरित्र और तप मोक्ष मार्ग पर जाने का सुगम रास्ता है। उन्होंने श्रावणी मास में प्रत्येक शुक्रवार को मां पद्मावती एकासना में 909 महिलाओं के द्वारा सामूहिक रूप से तपस्या रूपी श्रद्धा अर्पण की अनुमोदना करते हुए आशीर्वादी मांगलिक प्रदान किया। स्थानीय वीवी पुरम स्थित महावीर धर्मशाला में गुरु दिवाकर केवल कमला वर्षावास समिति के तत्वावधान में अपने दैनिक प्रवचन में साध्वीश्री ने कहा कि संतों के प्रभाव एवं आभामंडल से तप की ऊर्जामयी ताकत अपना सकारात्मक और चमत्कारी असर दिखाती है। यही नहीं बुरे कर्म करने वाले भी अपने हथियार संतों की निश्रा में छोड़ देते हैं। उन्होंने भगवान महावीर के अहिंसा परमो धर्म सहित पर्यावरण सं...

माया-मृषा करने वाले को सताता है चिन्ता, भय और पश्चाताप: आचार्यश्री महाश्रमणजी

कुम्बलगोडु, बेंगलुरु (कर्नाटक): कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में वर्ष 2019 का चतुर्मास कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें देदीप्यमान महासूर्य, अखण्ड परिव्राजक, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने नित्य की भांति शुक्रवार को ‘महाश्रमण समवसरण’ से ‘सम्बोधि’ प्रवचनमाला की एक मनका को आगे बढ़ाया और उपस्थित श्रद्धालुओं को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आदमी कई बार उत्पथगामी बन जाता है। आदमी के व्यवहार में ईमानदारी हो, प्रमाणिकता हो तो मानना चाहिए कि आदमी सत्पथ का पथिक है। ‘सम्बोधि’ में बताया गया है कि माया-मृषा का प्रयोग करने वाले की क्या गति होती है? माया-मृषा करने वाले के जीवन में तीन स्थितियां पैदा होती हैं। पहली स्थिति होती है कि माया-मृषा का प्रयोग करने वाले को पहले चिन्ता हो जाती है। चिन्ता इसलिए होती है कि कहीं झूठ बोला पकड़ा गया तो क्या होगा। इस बात को लेकर उसके दिमाग में चि...

संसार की नश्वरता जान आसक्ति का करें त्याग: साध्वी कंचनकंवर

चेन्नई. शुक्रवार को पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम में विराजित साध्वी कंचनकंवर व साध्वी डॉ. सुप्रभा के सानिध्य में साध्वी डॉ. हेमप्रभा ‘ने कहा इस संसाररूपी जेल में दो तरह के कैदी हैं, एक जो छूटना चाहते हैं लेकिन नहीं छूट सकते। दूसरे जो छूट सकते हैं लेकिन छूटना नहीं चाहते। सभी सांसारिक प्राणी छूट सकते हैं लेकिन वे मोह, ममत्व के कारण संसार को छोडऩा नहीं चाहते, उन्हें संसारिक वस्तु और व्यक्तियों में आसक्ति है। आत्मा की अनन्त शक्ति का दुरुपयोग करना आसक्ति है। ज्ञानियों ने जीवों को जागृति के लिए छह सूत्र दिए हैं। यदि इन्हें जीवन में उतार लिया जाए तो संसार की भीड़ में रहकर भी आसक्ति नहीं होगी। जब भी अपने घर के प्रति आसक्ति के भाव आए तो चिंतन करें कि मुझे यहां से श्मशान भी जाना है। श्मशान वह जगह है जहां पर अफसर-चपरासी सबकी शान समान है। संसार की नश्वरता जानें, विचार करें कि एक दिन मुझे भी जाना है। जो स...

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