बेंगलुरु। श्री वासुपूज्यस्वामी जैन धार्मिक पाठशाला के रजतोत्सव के उपलक्ष में यहां अक्कीपेट जैन मंदिर के प्रांगण में आचार्यश्री देवेंद्रसागरसूरीश्वरजी म.सा. की निश्रा में पाठशाला के विद्यार्थियों द्वारा भव्य स्नात्र महापूजा का आयोजन हुआ। पंडितवर्य मीठालालजी एवं संगीत मंडल ने संगीत के माध्यम से श्रद्धालुओं को परमात्मा भक्ति करवाई। आचार्यश्री ने पूजन में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि हमे पूजा सांसारिक सुखों की प्राप्ति की वांच्छा से नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे निदान दोष लगता है। हमें आपनी आत्म के कल्याण के भाव जैसे मेरे कर्म कट जाए, मैं मोक्षमार्ग पर चल सकूं इतनी शक्ति प्राप्त हो, आदि से पूजा करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सांसारिक सुख तो बोनस के रूप में स्वयं ही मिलते है। ऐसा करने से आत्म कल्याण होगा और सांसारिक सुख भी बिना मांगे मिलेंगे। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन में सारी ...
किलपाॅक में विराजित आचार्य तीर्थ भद्रसूरिश्वर ने कहा मोह का क्षय का मानव भव में ही संभव है। हमें यह मौका मिला है लेकिन हम मोह की वृद्धि कर रहे हैं। शरीर का राग, रिश्ते नाते, धन सम्पत्ति, सुख सुविधा का राग बढ़ता जा रहा है। जहां हमें मोह का क्षय करना है वहां मोह, ममत्व से आसक्ति लगाकर बैठे हैं। उन्होंने कहा उस बुद्धि को हटा दो जो परमात्मा व आपके बीच अड़ंगा डाल रही है। उन्होंने कहा बुद्धि दो प्रकार की होती है सद् बुद्धि व कुबुद्धि। सद् बुद्धि हमेशा हमें प्रोत्साहित करेगी, वह परमात्मा के मिलन के बीच नहीं आएगी, उसकी सलाह अच्छी होगी। वहीं कुबुद्धि कहेगी परलोक, मोक्ष किसने देखा है, तेरी आत्मा ही परमात्मा है। तू तेरी आत्मा को देख, परमात्मा के मंदिर जाने की जरूरत नहीं है। बुद्धि को हमें पहचानना है और यह देखना है कि सद् बुद्धि को कैसे पुष्ट करें। सद् बुद्धि जो सलाह दे उसी अनुसार चलो, वह आपके साथ में...
जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में वेपेरी स्थित जय वाटिका मरलेचा गार्डन में जयधुरंधर मुनि ने श्रावक के 12 व्रतों के शिविर के अंतर्गत तीसरे व्रत का विवेचन करते हुए कहा ग्रहस्थ को अपने जीवन निर्वाह हेतु धन की आवश्यकता होती है लेकिन धन प्राप्ति की लालसा में इंसान को अन्याय, अत्याचार, छल कपट और धोखाधड़ी का सहारा नहीं लेना चाहिए। अर्थ के लिए सब व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। धन का उपार्जन न्याय और नीति से होना चाहिए । जब तक व्यक्ति नैतिक और प्रामाणिक नहीं बनता तब तक वह सच्चे अर्थों में धार्मिक भी नहीं बन सकता। अन्याय और अनीति से तथा गलत तरीके से कमाया हुआ धन संपत्ति का नहीं अपितु विपत्ति का रूप धारण करता है । अनीति का धन सुख और चैन छीन लेता है। जिस अर्थ की जड़ में पाप है वह कभी सुखद फल नहीं दे सकता। अनीति का धन लंबे समय तक नहीं टिखता । पाप का पैसा कभी बरकत नहीं करता । ऐसा पैसा अपने साथ बीमारी ,...
आध्यात्म जगत के महासूर्य श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता-शांतिदूत-अहिंसा यात्रा के प्रणेता-महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने धर्मसभा में संबोधि ग्रंथ के आधार पर प्रवचन करते हुए कहा कि साधु को ज्यादा सुख सुविधा की कामना नहीं कर समता में रहना चाहिए। समता से मोहनीय कर्म का क्षय होता है। साधु की भांति श्रावक को भी कुछ अंशों में भीतर में समता रखनी चाहिए। केवल्य ज्ञान गृहस्थ के वेश में भी हो सकता है परंतु उसके लिए भीतर में साधुता आनी जरूरी है। वेश मुख्य नहीं होता भाव धारा मुख्य होती है। आचार्य प्रवर ने भरत चक्रवर्ती का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्हें भी सामान्य जीवन में ही कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई परंतु उनके भीतर साधुता आ गई थी। आदमी को जीवन में श्रम करना चाहिए जिससे ना केवल शारीरिक बल्कि मानसिक एवं आध्यात्मिक जीवन भी सुफल बनता है। जो व्यक्ति केवल सुख सुविधा की ताक में ...
जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में जयधुरंधर मुनि के सानिध्य में वेपेरी स्थित जय वाटिका मरलेचा गार्डन में श्रावक के 12 वर्तों का शिविर गतिमान है। इस अवसर पर मुनि ने कहा अहिंसा कायरता नहीं वीरता है। जहां अहिंसा है , वही धर्म है । हर धर्म की आधारशिला अहिंसा पर ही टिकी हुई है । अहिंसा को परम धर्म कहा गया है । अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए प्रयत्नशील इंसान यदि दूसरों के प्राण छीनने से बड़ा अधर्म कोई और नहीं हो सकता। अहिंसा ही वह अमोघ शस्त्र है जिससे सामने वाले को आसानी से जीता जा सकता है । अहिंसा में वह शक्ति है जो आतंकवाद की जड़ को समूल उखाड़ सकती है। कायर व्यक्ति कभी अहिंसा का पालन नहीं कर सकता है। अहिंसा के सिद्धांत को जन-जन तक पहुंचाना वर्तमान युग की नितांत आवश्यकता है। श्रावक के पहले व्रत का वर्णन करते हुए मुनि ने कहा किसी भी निरपराधी प्राणी को जानबूझकर योजना बनाकर क्रूरतापूर्वक नही...
बेंगलुरु। आचार्यश्री देवेंद्रसागरसूरीश्वरजी ने मंगलवार को अपने प्रवचन में कहा की मधुर वाणी एक प्रकार का वशीकरण है। जिसकी वाणी मीठी होती है, वह सबका प्रिय बन जाता है। प्रिय वचन हितकारी और सबको संतुष्ट करने वाले होते हैं। वाणी के द्वारा कहे गए कठोर वचन दीर्घकाल के लिए भय और दुश्मनी का कारण बन जाते हैं। उन्होंने कहा कि अधिकांश समस्याओं की शुरुआत वाणी की अशिष्टता और अभद्रता से ही होती है। इसलिए हमें तिरस्कारपूर्ण अनादरसूचक शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। आचार्यश्री बोले, प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हमें वाणी की मधुरता का दामन नहीं छोडऩा चाहिए। मीठी वाणी व्यक्तित्व की विशिष्टता की परिचायक होती है। मीठी वाणी को जीवन के सौंदर्य को निखारने वाली तथा व्यक्तित्व की अनेक कमियों को छिपाने वाली बताते हुए देवेंद्रसागरसूरीश्वरजी ने कहा कि हमें इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिए कि अपने स्वार्थ के लिए हमें...
आचार्य श्री महाश्रमणजी के विद्वान सुशिष्य मुनि श्री ज्ञानेंद्रकुमारजी सहवर्ती मुनि श्री विनीतकुमारजी, मुनि श्री विमलेशकुमारजी का 2 माह (पूर्वाद्ध का) चातुर्मास संपन्नता पर तेरापंथ सभा चेन्नई के तत्वाधान में मंगलभावना का भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ। इस कार्यक्रम में ट्रिप्लीकेन में प्रवासित मुनि रमेशकुमारजी, मुनि सुबोधकुमारजी ने भी अपना सान्निध्य प्रदान किया। चैन्नई साहूकारपेट के श्रावक श्राविकाओं की श्रद्धा, सेवा-भाव का उल्लेख करते हुए मुनि ज्ञानेन्द्रकुमार ने कहा कि चातुर्मास एक सनातन परंपरा है| इस समय विशेष आध्यात्मिक साधना-आराधना, तप-त्याग , ध्यान-स्वाध्याय करने का एक जगह लंबा अवसर सबको मिलता है। इस दो माह में हमने देखा कि चैन्नई का श्रावक समाज विनीत और जागरूक है। जहाँ चातुर्मास अपने आप में विशेष उपयोगी हो जाता है। हमने पूरा प्रयास किया, लोगों को प्रेरणा दी, जिससे बहुत अच्छी धर्म प्रभावन...
आचार्य जयमलजी का 312वां जन्मदिवस मनाया ब्रह्मचर्य की साधना से जीवन का नन्दनवन महकता है चेन्नई. पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम में आचार्य जयमलजी की जयंती पर पंचदिवसीय कार्यक्रमों में तीसरे दिन गुणगान दिवस तप, त्याग और सामायिक के साथ मनाया और आचार्यश्री के जीवन चरित्र का गुणगान किया। इस अवसर पर जयमल हाउजी प्रतियोगिता व साहुकारपेट महिला नवयुवति मंडल द्वारा वर्तमान परिदृश्य पर नाटिका का मंचन किया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। धर्मसभा में विराजित साध्वी कंचनकंवर के सानिध्य में साध्वी डॉ.सुप्रभा ‘सुधाÓ ने कहा कि इस संसार में स्वयं को देखना, जानना सबसे कठिन है। हम प्राय: दूसरों को देखते हैं बल्कि स्वयं की अच्छाईयों और कमियों को नहीं देखते। आचार्य पद पर होते हुए भी आचार्य जयमलजी अपने जीवन में सदा आत्मसाधना और परोपकार में तल्लीन रहे। 18वीं सदी में उन्होंने जो धर्म-पौधे लगाए थ...
संसार में सभी सुख चाहते है दुःख कोई नहीं चाहता। लेकिन सुख-दुःख का कर्ता कौन? भोगने वाला कौन? भगवान महावीर ने कहा कि आत्मा ही सुख-दुःख की कर्ता है, भोक्ता है। यह एक निश्चिय नय है। आत्मा ही सुख देती है व दुःख देती है। हमारी आत्मा ही हमारी मित्र एवं शत्रु है। उपरोक्त उद्गार अणुव्रत अनुशास्ता शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी ने धर्मसभा में व्यक्त किए। श्रद्धालुओं को संबोधि द्वारा अमृत देशना देते हुए गुरुदेव ने आगे कहा- सामान्य आदमी को सारे सुख मिलना कठिन है। उनके अनुकूलता होते हुए भी प्रतिकूलता आ जाती है। आत्मकर्त्तृत्ववाद का सिद्धांत है। जैसा आदमी कर्म करता है वैसा ही उसे भोगना पड़ता है। सुख-दुःख हमारे स्वयं के हाथ में है। महात्मा महाप्रज्ञ का पाठ करते हुए महातपस्वी महाश्रमण जी ने आचार्य महाप्रज्ञ के बाल्यकाल के प्रसंगों की व्याख्या की। कार्यक्रम में श्री गौतम डागा ने जैन विश्व भारती, लाडनूं ...
चेन्नई. पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम में आचार्य जयमल जयंती पर आयोजित पंचदिवसीय कार्यक्रम के दूसरे दिन महिलाओं के लिए भिक्षुदया कार्यक्रम और आचार्य जयमल की दीक्षा विषय पर आनंदी छाजेड़ द्वारा नाटिका का मंचन किया गया। इस मौके पर साध्वी कंचनकंवर व साध्वी डॉ.सुप्रभा के सानिध्य में साध्वी डॉ. उदितप्रभा ने कहा हमारा जीवन ऐसा है कि कब मृत्यु आ जाए, जीवन बुझ जाए पता नहीं। ज्ञानी कहते हैं कि युद्धभूमि को थर्र-थर्र कंपाने वाला सेनापति भी मौत के सामने हारता है। स्वयं को अमर मानकर पदार्थों पर आसक्त बने हैं कि छोडऩे का मन ही नहीं करते। आज महिला वर्ग भिक्षु दया के लिए तत्पर बने हैं, लगता है हमारे बीस से बाइसवें तीर्थंकर प्रभु के समय की भिक्षुणियां उपस्थित है यहां पर। जिस हृदय में दया नहीं वह सूखी रेत के समान है। सम्यकत्व का लक्षण अनुकम्पा, करुणा भावना है जिसमें दया, करूणा, अनुकम्पा नहीं वह हृदय सम्यकत्व नही...
अहंकार में व्यक्ति फुल सकता है लेकिन फल नहीं सकता जय वाटिका मरलेचा गार्डन में विराजित जयधुरंधर मुनि ने कहा भाषा स्वयं के लिए वरदान या अभिशाप, यश या अपयश दिलाने वाली हो सकती है। श्रावक के 8 वचन व्यवहार का वर्णन करते हुए कहा श्रावक को अहंकार रहित भाषा का प्रयोग करना चाहिए। आदेशात्मक वचन बोलने से काम बनने के बदले बिगड़ जाता है । एक मालिक अपने नौकर से भी प्रेम पूर्वक बात करके आसानी से सब काम करवा सकता है। विनय युक्त भाषा के प्रयोग से हर प्रकार की वस्तु की प्राप्ति सहज में ही हो जाती है। जहां विनय है वहां विवेक भी जुड़ जाता है । भगवान के बताए हुए सूत्र सिद्धांत के विपरीत बोलने से भी मिथ्यात्व अवस्था तक पहुंच जाता है। दूसरों के लिए हितकारी भाषा बोलने से स्वयं का भी हित हो जाता है। जयपुरंदर मुनि ने आचार्य जयमल के जीवन पर प्रकाश डालते हुए उनकी संयमी यात्रा का उल्लेख किया और कहा जिस प्रकार भगवान मह...
बेंगलूरू। अनुष्ठान आराधिका साध्वी डॉ. श्री कुमुदलताजी म.सा. ने रविवार को कहा कि मन को वश में करने के लिए ध्यान साधना जरुरी है। परमात्मा प्रभु महावीर कहते हैं कि हमें धर्मध्यान अपनाना चाहिए। धर्म ध्यान की साधना ही वर्तमान में सर्वोत्कृष्ट मंगलकारी है। वीवीपुरम स्थित महावीर धर्मशाला में चातुर्मास कर रही डॉ. कुमुदलताजी ने यह भी कहा कि यदि तन-मन से स्वस्थ तंदुरुस्त रहना है तो भगवान महावीर की ध्यान साधना पद्धति अपना लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्तमान श्रमण संघीय आचार्य सम्राट श्री शिवमुनिजी म.सा. प्रभु महावीर की जगत को ध्यान को ध्यान की अनमोल देन को जन-जन तक पहुंचाने में अपने भागीरथी प्रयासों को सतत् जारी रखते हुए निरंतर सभी स्थानों पर ध्यान साधना शिविरों का आयोजन कर रहे हैं। साध्वी महाप्रज्ञाजी म.सा. ने भक्ति गीत से भाव विभोर कर दिया। साध्वी पदमकीर्तिजी म.सा. ने वर्षावास समिति के तत्वावधान मे...