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मनुष्य जीवन क्षणभंगुर है, समयमात्र भी प्रमाद न करें: साध्वी डॉ.सुप्रभा

चेन्नई. एएमकेएम में विराजित साध्वी कंचनकुंवर व साध्वी डॉ.सुप्रभा ‘सुधाÓ के सानिध्य में साध्वी डॉ.हेमप्रभा ‘हिमांशुÓ ने भगवान महावीर की अंतिम देशना उत्तराध्ययन सूत्र मूल का नवें अध्ययन से वाचन कराया और उपरांत विवेचन करते हुए कहा कि प्रभु महावीर ने दसवें अध्ययन में कहा कि केवलज्ञान को पाने के लिए राग को जीतना परम आवश्यक है। जीवन की नश्वरता है जैसे- वृक्ष पर लगा पत्ता हराभरा मनोहर लगता है, समय व्यतीत होने पर पीला पड़ता जाता है। समय निकलता है और एक हवा के झोंके से पत्ता गिर पड़ता है। महापुरुष कहते हैं जो नए उत्पन्न होते हैं उन्हें गिरते हुए पत्ते कहते हैं कि जैसे आज तुम हो वैसे हम भी थे, हम जिस दशा में आज हैं वैसी तुम्हारी भी होगी। सदा एकसा जीवन किसी का नहीं रहा है। समय व्यतीत होता, आयुष्य बीतता है। इसी प्रकार यह मनुष्य जीवन भी क्षणभंगुर है, समयमात्र का भी प्रमाद नहीं करना चाहिए। इ...

इंद्रिय सुख की अपेक्षा आत्मिक सुख की ओर बढ़े : आचार्यश्री महाश्रमण

तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें अधिशास्ता महातपस्वी युग प्रणेता आचार्य श्री महाश्रमणजी ने महाश्रमण समवशरण से अपने पावन पाथेय में फरमाया कि सुख दो प्रकार के होते हैं। पहला सुख मानसिक और दूसरा आत्मिक सुख होता है। व्यक्ति दोनों सुखों में अनुकूलता का अनुभव करते हैं परंतु दोनों सुखों की प्रकृति में बहुत अंतर होता है। इंद्रियजनित मानसिक सुख अंशकालिक और बाधायुक्त होता है। इसमें बीच-बीच में रुकावट आती रहती है। आत्मिक सुख निर्बाध और अनन्तकालिक होता है। हमारा मन इंद्रियों से जुड़ा होता है और जब तक मन को अच्छा लगे तब तक इन्द्रियजनित सुख अच्छा लगता है परंतु इन्द्रियों के विपरीत जब बात होती है तो इसमें दुख का अनुभव होने लग जाता है। व्यक्ति को दोनों सुखों में चुनाव करना हो तो आत्मिक सुख को चुनना चाहिए क्योंकि इंद्रियजनित शुभ क्षणिक होते हैं और उसके बाद उसमें दुख का अनुभव होने लग जाता है। आत्मिक सुख निरंतर रहता...

सम्यक्त्व की शक्ति को पहचाने:  साध्वी सिद्धिसुधा

साहुकारपेट के जैन भवन में विराजित साध्वी सिद्धिसुधा ने .कहा कि मनुष्य  अनुष्ठान की ओर बढऩा है तो बहुत सारी बातों को ध्यान में रखना होगा। पाप क्या है क्या करने से होता है और पुण्य क्या है इस पर विचार करना बहुत जरूरी है। अगर मनुष्य बिना किसी को बताये उसकी चीजें लेता है तो यह महापाप होता है। आज अगर बिना बताये समान ले लिया तो इसका भुकतान करना ही होगा। लोग सोचते है कि ऐसा करने से किसको पता चलेगा पर याद रहे तुरंत फर्क पड़े या ना पड़े लेकिन समय आने पर भुकतान करना ही होगा। जीवन मे आगे जाना है तो पाप के मार्गो से बचे।  वर्तमान में सम्यक्त्व की शक्ति और उसके रोल के बारे में लोगो को पता नहीं है, इसलिए लगातार धर्म के कार्य करने के बाद भी जीवन में परिवर्तन नहीं आ रहा है। लोग अभी भी मिथ्यात्व में फंस कर धर्म के कार्य कर रहे है जिससे जीवन पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। जब तक लोगो को सम्यक्त्व की शक्ति का पता...

मातृ-पितृ पूजन के साथ दिव्य नवरात्रि महामहोत्सव संपन्न 

राष्ट्रसंत डॉ वसंतविजयजी म.सा. के चातुर्मासिक पर्व का अंतिम महामांगलिक 13 को रामकृष्ण बाग में  इंदौर। विश्व विख्यात कृष्णगिरी तीर्थ धाम शक्तिपीठाधिपति राष्ट्रसंत डॉ वसंतविजयजी महाराज साहब की पावन प्रेरणा से यहां फूटी कोठी स्थित श्रीजी वाटिका में मध्य प्रदेश के इतिहास में पहली बार बगैर डांडिया के मनाई गई महानवरात्रि पर्व का भक्ति आराधना के साथ धूमधाम से समापन हुआ। श्री नवरात्रि दिव्य भक्ति आराधना महामहोत्सव के तत्वावधान में 10 दिवसीय आयोजन में जैन समाज के साथ-साथ सर्वसमाज के लोगों ने भी भाग लिया। इस दिव्य भक्तिमय आयोजन के समापन से पूर्व संतश्री की निश्रा में इंदौर शहर में पहली बार 1008 मातृ-पितृ पूजन का कार्यक्रम भी विधान पूर्वक संपन्न हुआ। यहां श्रीजी वाटिका के विशाल पंडाल में विराजित मां पद्मावती की विशाल 13 फीट की प्रतिमा व 9-9 फिट की मां लक्ष्मीजी तथा मां सरस्वतीजी की प्रतिमाओं सहित पहल...

दीक्षा के लिए उम्र नहीं, उच्च भाव होने चाहिए : मुनि श्री रमेशकुमार

दीक्षार्थी मुमुक्षु कुणाल  और मुमुक्षु खुश का मंगलभावना समारोह आचार्य श्री महाश्रमणजी के विद्वान शिष्य मुनि श्री रमेशकुमारजी के सान्निध्य में रविवार सुबह खुश बाबेल और कुणाल सावनसुखा का मंगल भावना समारोह रखा गया। चेन्नई के इन दोनों मुमुक्षु भाइयों की दीक्षा आगामी 20 अक्टूबर 2019 को बेंगलुरु में आचार्य श्री महाश्रमणजी के कर कमलों द्वारा दी जाएगी।   इस अवसर पर सभा भवन में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए मुनि श्री रमेशकुमार ने फरमाया कि अक्सर बालकों से पूछा जाता है कि आप बालपन में क्यों दीक्षा लेते हो? अभी तक आपने दुनिया देखी कहां है? तो मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से पुछा कि आप लोग तो बचपन से पचपन के हो गए हो, दुनिया पूरी देख ली है। क्या आप तैयार हैं, दीक्षा के लिए? नहीं, तो ध्यान दें, दीक्षा के लिए उम्र नहीं, उच्च भाव होने चाहिए। जिसमे जब भाव जागृत हो जाए, तब दीक्षित हो जाए और भव सागर रूपी नैया...

नवरात्रि का आध्यात्मिक भक्तामर अनुष्ठान मंगलवार को

श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथ ट्रस्ट टंडियारपेट में नवरात्रि का 8वा दिवस मुनि श्री ज्ञानेन्द्र कुमार जी ठाणा 3 के सानिध्य में भक्तामर अनुष्ठान में नियमित 325 संभागियो की भव्य उपस्थिति में आयोजित हुआ। दिनांक 8-10- 2019 मंगलवार नवरात्रि का आध्यात्मिक भक्तामर अनुष्ठान की पूर्णाहुति एवं मुनि श्री ज्ञानेंद्र कुमार जी की एकांत साधना के समापन के सुअवसर पर आयोजित आध्यात्मिक वृहद मंगल पाठ एवं अभिनंदन कार्यक्रम आयोजित होगा। 8- 10- 2019 मंगलवार को प्रातः-5-45 से 7-15 बजे दिनांक अनुष्ठान में संभागी सभी महानुभावों से विनम्र अनुरोध वृहद मंगल पाठ एवं अभिनंदन कार्यक्रम में अवश्य संभागी बने।    कार्यक्रम का आयोजन श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथ ट्रस्ट टंडियारपेट प्रबंध न्यासी- श्री इंद्र चंद्र डूंगरवाल, मंत्री- श्री पूनमचंद मांडोत व अन्य सदस्यों के सहयोग से होगा।

सुपात्रदान से शुभकर्म के साथ होती है कर्मों की निर्जरा: साध्वी डॉ.सुप्रभा

चेन्नई. 04 सितम्बर को पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम में विराजित महासती उमराव ‘अर्चनाÓ सुशिष्याएं साध्वी कंचनकंवर व साध्वी डॉ.सुप्रभा ‘सुधाÓ के सानिध्य में साध्वी डॉ.इमितप्रभा ने कहा कि सभी जीवों से मैत्री भाव रखना प्रेम है। स्वयं की आत्मा के समान दूसरों की आत्मा समझना प्रेम है। प्रेम की भाषा मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी, देव तथा सृष्टि के समस्त जीव समझते हैं। समाज में रहते हुए मनुष्य को तन, मन, धन के सहयोग की आवश्यकता रहती है। जो परस्पर सहयोग नहीं करता वह मानव नहीं है। आपस में सहयोग का आदान-प्रदान रहना चाहिए। देने का नाम दान है, फिर चाहे वह एक रुपए का हो या लाखों का। सहयोग पहले देना चाहिए और फिर लेना चाहिए। आज मनुष्य देना तो भूल रहा है और लेने की भावना रखता है। दान देकर फल की इच्छा से कर्मबंध होता है। दान चार प्रकार का है- पहला सुपात्रदान जो पंचव्रतधारी संयमी को साधना में सहायक वस्तुए...

मोक्ष पाने के लिए कर्मों से मुक्ति आवश्यक : आचार्यश्री महाश्रमण

तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता शांतिदूत अहिंसा यात्रा के प्रणेता-महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी में अपने मंगल पाथेय में फरमाया कि कर्मों का विपाक होता है उसके अनुसार ही जीव प्रवृत्ति करता है। कर्मों के उदय होने के निमित्त और योग बनने से कर्मों का बंधन फिर विपाक और उसी के अनुसार जीव प्रवृत्ति करता है। संवर के द्वारा नए कर्मों का बंध नहीं होता है तो विपाक भी रुक जाता है। नैष्कर्म्य के बिना विपाक का बंध नहीं होता है। पूर्ण नैष्कर्म्य योग को शैलेस्य अवस्था कहा जाता है और यह 14 गुणस्थान अयोगी केवली में प्राप्त होती है और इसके प्राप्त होने के तुरंत बाद जीव मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।   शुभ प्रवृत्ति के लिए अशुभ से निवृत्ति जरूरी है। सत्प्रवृत्ति से पापों का क्षय होता है और शुभ कर्म का बंद होता है। शुभकर्म का उदय होने पर शुभ नाम, शुभ योग, शुभ आयुष्य और शुभ वेदनीय का उदय होता है। आत्मा को ...

सम्यक आजीविका ही श्रावक की पहचान होती है: जयधुरंधर मुनि

जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में वेपेरी स्थित जय वाटिका मरलेचा गार्डन मे जयधुरंधर मुनि के सानिध्य में चल रहे श्रावक के 12 व्रतों के शिविर के अंतर्गत सातवें व्रत का विवेचन करते हुए जयपुरन्दर मुनि ने कहा हर मनुष्य को अपने जीवन का निर्वाह करने के लिए आजीविका का साधन जुटाना पड़ता है। साधक को जीवन का निर्वाह ही नहीं अपितु निर्माण करने का भी चिंतन करना चाहिए। आजीविका जुटाने के अनेक माध्यम होते हैं। एक चोर, लुटेरा, डाकू, वेश्या आदि पापी व्यक्ति की अपने जीवन का निर्वाह करते हैं लेकिन उनकी आजीविका सामाजिक दृष्टि से हीन मानी जाती है जबकि एक आदर्श श्रावक न्याय नीति एवं परिश्रम से अर्जित सम्यक आजीविका का ही आलंबन लेता है । वास्तव में सम्यक आजीविका ही श्रावक की पहचान होती है। एक श्रावक 15 कर्मादान का सेवन न करते हुए ऐसा कोई भी व्यापार नहीं करता जिसमें हिंसा जुड़ी हुई हो और जहां कर्मों का समूह रूप म...

भगवान की रथयात्रा और तपस्वियों की शोभा यात्रा निकाली

विजयवाड़ा. श्री संभवनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ-विजयवाड़ा के तत्वावधान में आचार्य श्रीमद विजय अभयचन्द्र सूरीश्वर एवं साध्वी श्रुतिपूर्णाश्री एवं अन्य साधु-साध्वी भगवंत की शुभ निश्रा में चातुर्मासिक आराधना-पर्व पर्यूषण की सुंदर आराधना, मासखमण दीक्षा कल्याणक तप-सम्यग दर्शन तप इत्यादि विविध तपश्चर्या के अनुमोदनार्थ परमात्मा की भव्य रथ-यात्रा एवं शोभायात्रा निकाली गई। रथयात्रा की शुरुआत मारवाड़ी टेम्पल स्ट्रीट स्थित श्री संभवनाथ जीर्णोद्धारित जिनालय से हुई एवं रथ यात्रा बैंड बाजे के साथ विजयवाड़ा के मुख्य मार्गो से श्री संभवनाथ शिखरबद्ध जिनालय, श्री संभवनाथ नूतन जिनालय होती हुई साधारण भवन पहुंची। रथयात्रा में मुख्य आकर्षण भगवान का चांदी का रथ था जिसमें भगवान शांतिनाथ, भगवान पाश्र्वनाथ एवं भगवान महावीरस्वामी की प्रतिमा अलंकृत की गई। चातुर्मास के दौरान विविध छोटी-बड़ी तपस्याओं के तपस्वी सु...

परिग्रह के परिमाण से बदल जाते हैं आत्मा के परिणाम: जयधुरंधर मुनि

जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में वेपेरी स्थित जय वाटिका मरलेचा गार्डन में श्रावक के 12 व्रतों के शिविर के अंतर्गत पांचवें परिग्रह परिमाण व्रत का विवेचन करते हुए जयधुरंधर मुनि ने कहा  सुख की प्राप्ति हेतु श्रावक को पुण्यशील होना जरूरी है और पुण्यवाणी बढ़ाने के लिए व्रत की आराधना करना आवश्यक है। व्रत अर्थात घेरा जिससे साधक अपनी संग्रह वृत्ति को सीमित कर डालता है। जैसे ही श्रावक पांचवें व्रत के अंतर्गत परिग्रह का परिमाण कर लेता है, उसकी आत्मा के परिणाम भी बदल जाते हैं। पांचवा व्रत ग्रहण किए बिना जीवन ब्रेक रहित गाड़ी की तरह हो जाता है जिसके कभी भी दुर्घटना होने की संभावना रहती है। ऐसी गाड़ी चलाते समय मन में जिस प्रकार भय अशांति रहती है उसी प्रकार अगर श्रावक परिग्रह का परिमाण नहीं करता है तो उसके पास संपत्ति होते हुए भी चैन और शांति नहीं रहती ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि किसी के नौ ग्रह अ...

आत्मा को हल्का बनाएं , उर्ध्वारोहण होगा : आचार्यश्री महाश्रमण

अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्य श्री महाश्रमण जी के सान्निध्य में जैन धर्म और सिख धर्म के प्रतिनिधियों के साथ एक संगोष्ठी का आयोजन हुआ। इस संगोष्ठी में उपस्थित सिख समाज के लोगों को आचार्य श्री महाश्रमण ने अहिंसा यात्रा , जैन धर्म आदि के विषय में जानकारी प्रदान करते हुए अहिंसा यात्रा के तीनों सूत्रों को अपनाने का आह्वान किया। हलसुर गुरुद्वारा के पूर्व अध्यक्ष श्री प्रभजोत सिंह बाली और मंत्री श्री हरजिन्दर सिंह भाटिया ने आचार्य श्री महाश्रमण जी की अहिंसा यात्रा को समाज सुधार का महत्वपूर्ण मिशन बताया। इस अवसर पर साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा जी ने जैन धर्म और सिख धर्म की समानताओं को प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के अंत में जिज्ञासा-समाधान का क्रम भी चला, जिसके अंतर्गत दोनों धर्मों की ओर से प्रश्नोत्तर का क्रम रहा। यह संगोष्ठी अहिंसा यात्रा के प्रथम आयाम सद्भावना का साक्षात उदाहरण सिद्ध हुई। कार्यक्रम का संच...

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