दुर्ग / जय आनंद मधुकर रतन भवन बांधा तालाब दुर्ग में आज पयुर्षण पर्व का दूसरा दिन था। हर्ष और उल्लास के वातावरण में जैन समाज के धर्मावलंबियों ने बड़ी संख्या में आज धर्म सभा में हिस्सा लिया। संत गौरव मुनि का प्रवचन मां की ममता विषय पर केंद्रित था। मुनि श्री ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए मां के संदर्भ में दिल को झकझोर कर देने वाली बातों से मां के ममतव को परिभाषित किया। उन्होंने कहा जिस धर के अंदर बहू सास को मां माने और सास बहू को बेटी माने उस घर को नंदनवन बनने में देरी नहीं लगेगी। अगर घर एक मंदिर है तो उस घर की मां उस मंदिर की मूरत है और जहां मां है वहां हर दिल में हर जीवन में प्रकाश है। मां के उपकारो को इस जीवन में नहीं सात जन्म लेकर भी नहीं चुकाया जा सकता। धर्म सभा को आदित्य मुनि ने भी संबोधित किया एवं छोटे-छोटे भजनों से संत सौरव मुनि ने भी समा बांधा। आज पयुर्षण पर्व के दूसरे दूसरा सा काल...
4 सितंबर अशोक नगर स्थानकवासी जैंन समाज के आध्यात्मिक पयूषण महापर्व के अष्टदिवसीय आयोजन अर्तगत प्रथम दिवस शनिवार को प्रवर्तक सुकनमुनि महाराज ने विज्ञान समिति मे सैकड़ों श्रध्दालुओं को सम्बोधित करतें हुयें कहां कि मानव के मोक्ष मार्ग की प्रथम सिंढ़ी है पर्वाधिराज पयूषण महापर्व। जैन धर्म मे इस त्यौहार का काफी महत्व है। भगवान महावीर स्वामी के मूल सिंद्धात अहिंसा परमो धर्म, जिओ और जिने दो की राह बताता है पयूषण पर्व। अहिंसा के मार्ग को अपनाने वाला प्राणी शास्वत सुख के साथ अपनी आत्मा के बंधे कर्मो के बंधनो को तोड़कर मोक्ष पा सकता है। इस दौरान उपप्रवर्तक अमृतमुनि महेशमुनि, हरीश मुनि, हितेश मुनि व अखिलेश मुनि, डॉक्टर वरूण मुनि आदि ने संतों ने कहां कि जिन धर्म मे हिंसा का कौई स्थान नहीं है। तप त्याग के साथ किसी भी अवस्था मे तन मन कर्म वचन और वाणी से किसी प्राणी की हिंसा न करना ही अहिंसा होगी !
पर्युषण आराधना करवाने आये उपासकद्वय आरकोणम :- भारतीय संस्कृति एक प्राणवान संस्कृति हैं। यह त्यागमय भावना से अनुप्राणित हैं। इसने सहिष्णुता, धैर्य की भावना से भारतीय जनमानस को आंदोलित कर रखा है – उपरोक्त विचार तेरापंथ सभा भवन, आरकोणम में आचार्य श्री महाश्रमणजी की अनुज्ञा से पर्युषण पर्वाराधना करवाने आये उपासक स्वरूप चन्द दाँती (चेन्नई, बालोतरा) ने कहें। पर्वाधिराज के प्रथम दिवस पर आत्मोत्थान की प्रेरणा देते हुए कहा कि यह पर्युषण महापर्व आत्मा की मैली चादर धोने का पर्व है। ह्रदय की कलुषता को मिटाने का पर्व है। पंच परमेष्ठी की आराधना कर, रोग-शोक पर प्रहार करने का पर्व है। राग-द्वेष से अविरत होने का पर्व है। इस गंगा रूपी महापर्व में डुबकी लगाने वाला व्यक्ति अपने भवभ्रमण को कम कर सिद्ध, बुद्ध, मुक्त बन सकता है। उपासक शोभागमल सांड (कडलूर) ने तीर्थंकर स्तुति के साथ कहा कि हमारा आहार संयम...
जैन संत डाक्टर राजेन्द्र मुनि जी ने महापर्व पर्युषण पर्व के सम्बन्ध में बोलते हुए कहा कि परि उपसर्ग वस धातु अन प्रत्यय मिलाकर इस शब्द का निर्माण हुआ है! जिसका भावार्थ है सभी तरह से मन को हटाकर पूर्णतः अपने आप में अर्थात आत्मा के समीप रहना आत्मा का ही चिंतन मनन करना, हम अनन्त काल से शरीर व शरीर से सम्बंधित पदार्थों का ही संग्रह करते रहे खाना पिना कमाना तन को अच्छा रखना ही हमारा भव भव में एकमात्र लक्ष्य रहा है! प्रभु महावीर ने पर्युषण के इन आठ दिनों में आत्मपर कार्य करने की प्रेरणाएं प्रदान की है! जैन इतिहास इस बात का साक्षी है कि राजा महाराजा सम्राट व तत्कालीन उद्योगपति लोग अपने सारे लौकिक कार्य बन्द कर इन दिनों में आत्मा लोकन में लग जाते थे! मैं वास्तव मे कौन हूं मेरी आत्मा कहाँ से आई है भविष्य मे यहाँ से मरकर कहाँ जाँऊगा! यदपी ये बातें असम्भव सी लगती है किन्तु धर्म का ज्ञाता इन बातों को आ...
दुर्ग जय आनंद मधुकर रतन भवन बांधा तालाब दुर्ग में संत श्री रतन मुनि एवं विवेक मुनि के सानिध्य में चातुर्मास गतिमान है। यह धार्मिक अनुष्ठान याद तपस्या त्याग तपस्या के साथ प्रदूषण पर्व की तैयारियां पूर्ण रुप से की गई है, जिसमें संत गौरव मुनि से मार्गदर्शन ने आठ दिवसीय कार्यक्रम की रुपरेखा तैयार या चुकी है। पयुर्षण पर्व के दैनिक आयोजन के रूप में 4 सितंबर से धार्मिक अराधना प्रारंभ होगी जिसमें प्रातः 6:00 बजे से धर्म आराधना का क्रम प्रारंभ होगा। श्रमण संघ दुर्ग प्रचार प्रसार प्रमुख नवीन संचेती ने जानकारी देते हुए बताया प्रार्थना, अंतागढ़ सूत्र का वाचन, अमृत मय जिनवाणी, भक्तांबर स्त्रोत का जाप, नंदी सूत्र का वाचन, लोगस्स सूत्र का वाचन, महा मांगलिक, जाप साधना, कल्प सूत्र का वाचन, धार्मिक प्रतियोगिता, स्वाध्याय, प्रतिक्रमण एवं आचार्य सम्राट जयमल जी महाराज का जाप प्रतिदिन पर्युषण पर्व के दौरान चलेग...
विधायक दिप्ती माहेश्वरी का संघ अशोक नगर ने किया सम्मान 3 सितंबर अशोक नगर विधायक दीप्ति माहेश्वरी नेअशोक नगर मे विराजमान प्रवर्तक सुकनमुनि महाराज से शुक्रवार को आर्शीवाद प्राप्त करते हुयें कहां कि संत समाज की धरोवर है। राजनिति मे धर्म होगा तभी देश और समाज आगे बढ़ पायेगा। इस दौरान सुकनमुनि ने कहां कि पद सम्मान और सेवा के लिए होते न कि स्वार्थ सिद्धि के लिये। पद पर रहकर जन सेवा करोगे तभी आगें बढ़कर देश मे अपना नाम रोशनकर कर सकती हो ! इस दौरान श्री संघ के अध्यक्ष कांतिलाल जैन ने उपप्रवर्तक अमृत मुनि, तपस्वी मुकेश मुनि, हरीश मुनि, हितेश मुनि, सचिन मुनि आदि संतो के सानिध्य मे लोकाशाह जैन स्थानक मे राजसंमद विधायक दिप्ती माहेश्वरी व प्रज्ञा सिंघवी का शोल माला पहनाकर स्वागत किया गया ! संघ महामंत्री राजेन्द्र खोखावत ने बताया कि पयूषण महापर्व मे संतो के प्रवचन विज्ञान समिति अशोक नगर मे प्रातः 8: 30 से ...
जैन संत डाक्टर राजेन्द्र मुनि जी ने लोभ को दुःख का कारण बतलाते हुए कहा कि शरीर के व मन के समस्त रोग लोभ से पैदा होते है! लोभ की मात्रा घटती नहीं, मगर दिनों दिन घटने की बजाय निरंतर बढ़ती चली जाती है! प्रभु महावीर ने कहा ज्यों ज्यों लाभ होता है त्यों त्यों लोभ और अधिक मात्रा में बढ़ता चला जाता है! आज तक जितने भी युद्ध -मन मुटाव -हिंसा -अत्याचार या अनाचार हुए है उसके पीछे एक ही कारण लोभ का रहा है! इन्सान की इच्छाएं अनन्त होती है जो कदापि पूर्ण नहीं हो पाती! इन्सान खाली हाथ आता है एवं एक दिन खाली हाथ ही प्रस्थान कर जाता है!लोभ तन का, मन का, धन का, कुटुम्ब कबिला, जमीन जायदाद का या पद प्रतिष्ठा का नानाभांति जीवन में प्रगट होता रहता है!मन में हजारों कल्पनाएं उभरती रहती है! प्रभु महावीर ने इस लोभ को जीतने के लिए संतोष का मार्ग बतलाया जैन श्रावको के लिए परिग्रह परिणाम व्रत की व्याख्या की! वस्तुओं की ...
जोधपुर में चतुर्मासिक प्रवचन के दौरान श्री ऋषि मुनि जी ने कहा कि मन में किसी व्यक्ति या प्राणी के लिए जिस प्रकार का भाव पैदा होता है चाहे वह राग का हो या द्वेष का हो उसे आरंभ कहते हैं। जिसके चित् में तीव्रता से राग द्वेष पैदा होता है तब आपका कर्म कल्याणकारी कभी नहीं होगा। तमस काया, व्यक्ति को ज्ञान का अंधा बना देता है। तमस काया वाले व्यक्ति के सामने देवता भी खड़े हो जाएं तो वह उसे पहचान नहीं सकता। थोड़ी में कहीं जाने वाली बात को व्यर्थ का लंबा ना करे। उपाध्याय प्रवर रविंद्र मुनि जी कहते हैं कि व्यक्ति को अपने भाव तो गागर में सागर के समान समझाना चाहिए। साधक को आवश्यकता से अधिक नहीं बोलना चाहिए। नपी तुली बात समझे हुए शब्दों में कहना चाहिए, उससे व्यक्ति का प्रभाव अधिक जमता है। सम्यक दृष्टि साधक को सत्य का अपलान नहीं करना चाहिए। किसी भी प्राणी के साथ बैर-विरोध का भाव नहीं बढ़ाना चाहिए। जिन्हों...
माधावरम में होगा पर्युषण साधना शिविर का आयोजन साहुकारपेट, चेन्नई :- तेरापंथ सभा भवन में साध्वी श्री अणिमाश्रीजी ने धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति ऊर्ध्वारोहण की दिशा में गतिशील होना चाहता है। वह अपने हर कदम पर सफलता के दर्शन करना चाहता है। सुख व समृद्धि की आकांक्षा में इतस्ततः परिभ्रमण कर रहा है, किन्तु व्यक्ति इस बात को भूल रहा है कि जीवन के सारे महत्वपूर्ण पक्ष कर्म के साथ जुड़े हुए हैं। व्यक्ति का वर्तमान अतीत से बंधा हुआ है। वर्तमान जीवन की सफलता एवं विफलता का दावेदार व्यक्ति का अतीत है। साध्वीश्री ने आगे कहा कि जैन दर्शन के अनुसार जिसने जैसे कर्म किए हैं उसी के अनुरूप परिणाम भोगने ही पड़ेगे। कर्म के कर्ज से भारी बना हुआ आदमी अपनी लक्षित मंजिल को नहीं पा सकता। आज अपेक्षा यह है कि व्यक्ति स्वयं को देखे। अपने मन, वचन व कर्म का आत्मविश्लेषण करे। भीतर की कलुषता, भाव...
2 सितंबर अशोक नगर उदरयपुर सुख दोगें तो सुख ही मिलेगा प्रवर्तक सुकनमुनि महाराज गुरूवार को लोकाशाह जैन स्थानक मे उपस्थित श्रध्दांलूओ सम्बोधित करतें हुयें कहां कि इंसान जैसा करेगा वैसा ही फल प्राप्त करेगा। किसी को दुखः देकर सुख की अपेक्षा नहीं करें, वरना जीवन मे कभी भी सुख मिलने वाला नहीं है। सुख से ही सुख मिलता है प्राणी के चाहने पर नहीं इसलिए मानव जीवन मे किसी भी जीव को कष्ट नहीं पहुंचावे! सबके प्रति शुभ भावना रखे तभी प्राणी सुखी रह सकता है! हरीश मुनि सचिन मुनि ने कहांकि इंसान दुसरों के सुख को देखकर स्वंय दुखीः रहता है ! श्री संघ अध्यक्ष कांतिलाल जैन बताया नियमित तपस्या के दौर मे अजमेर से भंवरी बाई मूथा ने ग्यारह उपवास के संतो से पच्खाण लेने पर संघ व महिला मण्डल ने चुंदड़ी व चांदी का सिक्का देकर तपस्वी बहन का सम्मान किया। मीडिया प्रवक्ता सुनिल चपलोतलोकाशाह जैन स्थानक, अशोक नगर, उदयपुर
जैन स्थानक बठिंडा में प्रवचन करते हुए डाक्टर राजेन्द्र मुनि जी ने शरीर की क्षण भंगुरता का वर्णन किया, हमारा यह शरीर आगमिक भाषा में औदारीक शरीर कहलाता है! जो पंच भूतों से विनिर्मित हुआ है अर्थात पृथ्वी पानी वायु अग्नि व आकाश तत्व से इस देह का निर्माण हुआ है जिसे संक्षपित में कहा जाता है यह माटी की काया एक दिन पुन : माटी में ही समा जाती है! जानते हुए भी हम अनजान बन कर व्यर्थ के कार्यों में इस मानव जीवन को गंवा बैठते है! मुनि जी ने मानव रत्न की मूल्यता को उदारहण रूप में समझाया गरीब किसान को रत्न के प्रभाव से मन में जो जो कल्पना करता जाता उस रत्न के प्रभाव से उसकी तमाम इच्छाएं खाने पीने घर परिवार दास दासी सब कुछ पा गया हाथ में बहुमूल्य रत्न था, सोते हुए एक कौआ नजर आया, उसे भगाने उडाने के लिए उस अमूल्य रत्न को ज्यों ही फेंकता है त्यों ही उसकी सारी रिद्धि सिद्धि सम्पदा समाप्त हो जाती है! कमोबेश ...