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आमेट के जैन स्थानक मे मनाई गई आचार्य भगवंत श्री आनन्द श्री महाराज की 124 वा जन्मदिवस

साध्वी विनीत प्रज्ञा ने कहा व्यक्तिगत अपेक्षाओं को गौण कर धैर्य व दूरदर्शिता के साथ श्रमणसंघ का चहुंमुखी विकास किया तथा तत्कालीन जन मानस के श्रद्धेय व वंदनीय बने। संपूर्ण भारतवर्ष की पदयात्रा करते हुए उन्होंने भगवान महावीर के सिद्धांतों का प्रचार व प्रसार कियाआचार्य भगवन श्रुत व शील के आगार थे। प्रतिभा सम्पन्न दिव्य महापुरुष ने अपनी योग्यता व पात्रता के आधार पर नवकार महामंत्र के 3 पदों का स्पर्श कर श्रमणसंघ के उपाध्याय, प्रधानमंत्री व आचार्य सम्राट बने। साध्वी डॉ चन्द्र प्रभा कहा आचार्य सम्राट श्री आनंद ऋषि महाराज का जन्म चिचोड़ी गांव महाराष्ट्र में माता हुलसा देवी एवं पिता देवी चंद के घर हुआ। उन्होंने 13 वर्ष की आयु में रतन ऋषि महाराज के चरणों में जैन दीक्षा ली। उन्होंने 80 वर्ष की आयु तक अपना संयम पाला। आपको कई भाषाओं का ज्ञान थाआगमोद्धारक, राष्ट्रसंत, आचार्य सम्राट आनंद ऋषि जी महाराज ज्...

विभाग आगम में 4 अनुयोग कहे हैं 

*🌧️विंशत्यधिकम्* *📚📚📚श्रुतप्रसादम्🌧️* 1️⃣5️⃣ अनुयोग अर्थात विभाग आगम में 4 अनुयोग कहे हैं ⚡ 1–चरणकरणानुयोग (चारित्र संबंधित ज्ञान) 2–धर्मकथानुयोग (चारित्र प्रेरक कथाएं) 3–गणितानुयोग (चारित्र अनुष्ठान हेतु मुहूर्त) 4–द्रव्यानुयोग (समकित शुद्धि हेतु तत्त्वाभ्यास) 🪔 समकित शुद्धि चारित्र का कारण है.! 🔅 सारांश: चारो अनुयोग महान है लेकिन चरण करणानुयोग सबसे अधिक महान है क्योंकि बाकी तीन चारित्र विकास के लिए ही हैं.! *📔श्री ओघनियुक्ति सूत्र)📔* 💫 *तत्त्व चिंतन:* *समयज्ञ गीतार्थ गुरुदेव* *सूरि जयन्तसेन कृपापात्र शिष्य* श्री वैभवरत्नविजयजी महाराजा 🌅🧘‍♂️🌅 *श्रुतार्थ वर्षावास 2024* श्रीमुनिसुव्रतस्वामी नवग्रह जैन संघ @ कोंडीतोप, चेन्नई महानगर

एएमकेएम में नौ दिवसीय आनंद जन्मोत्सव का आठवां दिन

आचार्य आनंद ऋषि महान् साधक, सलाहकार व आशीर्वाद दाता थे- युवाचार्य महेंद्र ऋषि एएमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर में चातुर्मासार्थ विराजित श्रमण संघीय युवाचार्य महेंद्र ऋषिजी ने रविवारीय प्रवचन में कहा कि साधक चार प्रकार के होते हैं। एक वे, जो अपने दुःख का, अपने भव का अंत करने वाले होते हैं लेकिन औरों का नहीं। अपने पुरुषार्थ, आराधना से वे अपनी नैया को संसार सागर से पार कर लेते हैं लेकिन औरों के लिए कुछ नहीं कर पाते। एक वे होते हैं जो दूसरों के दुःख का अंत कर देते हैं लेकिन अपने भव भ्रमण का अंत नहीं कर पाते। हम सोचते हैं इस संसार में जैसै को तैसा होना चाहिए लेकिन आज की दुनिया आसान नहीं है। उन्होंने कहा आचारांग सूत्र में कहा गया है अशस्त्र से बढ़कर कोई शस्त्र नहीं होता है। एक वे होते हैं जो अपने भव भ्रमण को मिटा देते हैं और दूसरों को भी आगे बढ़ा देते हैं, चाहे वो गणधर हो या आचार्य आनंद ऋषिजी। उन्हों...

गुरु तो ईश्वर का रूप ही होता है: साध्वी आनन्द प्रभा

  आमेट के जैन स्थानक मे चातुर्मास हेतु विराजित तपाचार्य साध्वी जय माला मा. सा. आदि ठाणा-6 के सानिध्य मे मित्र दिवस पर विशेष प्रवचन हुआ जिसमे साध्वी आनन्द प्रभा ने कहा की अपने शिष्य को ईश्वर का नाम दान देता है वो गुरु तो ईश्वर का रूप ही होता है। अगर शिष्य ने गुरु से ज्ञान लेना है तो उनकी दी गई शिक्षा को सच्चे हृदय से ग्रहण करे। सच्चे गुरु की पहचान कैसे करनी चाहिए जिसमें शिष्य को ज्ञान देने की क्षमता हो। ऐसे में ज्ञान प्राप्त गुरु की इससे भी पहचान होती है, जो गुरु सदैव अपने शिष्य को योग्यता अनुसार ज्ञान दे!! जैन साध्वी डॉ चन्द्र प्रभा ने कहा जैसा होगा मित्र, वैसा बनेगा चरित्र एक अच्छा और सच्चा मित्र हीरे के समान होता है जो जीवन को सजा- संवार देता है। गलत मित्र कोयले समान होता है। जलता कोयला उठाने पर हाथ जलेगा तो बुझा हुआ उठाने पर हाथ में कालिख लग जाएगा।जीवन में मित्र का बहुत महत्वपूर्ण ...

चंचल मन कभी सही निर्णय नही करने देगा

*🏳️‍🌈प्रवचन वैभव🏳️‍🌈* 1️⃣5️⃣ 🪔   71) अपने लक्ष्य के अनुसंधान के लिए ही चातुर्मास की प्राप्ति हुई है.! 72) प्रायश्चित भाव में पलभर में संसार को नष्ट करने का सामर्थ्य है.! 73) भावधर्म की सिद्धि के लिए द्रव्यधर्म का उद्देश्य हैं.! 74) समकित वासित क्रिया ही आचरणीय हैं.! 75) चंचल मन कभी सही निर्णय नही करने देगा.. चंचालता को भगाने निरंतर स्वाध्याय एवं ध्यान चिंतन का अभ्यास जरूरी है.! 🌧️ *प्रवचन प्रवाहक:* *मार्गस्थ कृपानिधि* *सूरि जयन्तसेन कृपापात्र* श्रुत संस्करणप्रेमी,शिष्यरत्न मुनि श्रीवैभवरत्नविजयजी म.सा. *🦚श्रुतार्थ वर्षावास 2024🦚* श्रीमुनिसुव्रतस्वामी नवग्रह जैनसंघ @ कोंडीतोप, चेन्नई महानगर

बाल सामायिक एव धार्मिक-संस्कार पाठशाला के पुरस्कार वितरण कार्यक्रम

🙏🏻श्री महावीराय: नम 🙏🏻          🙏श्रमण संघ जयवन्त हो🙏       🙏जय गुरु श्री जैन दिवाकर🙏 श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ ( पूर्वी क्षेत्र) *श्री जैन दिवाकर सामयिक साधना भवन , महावीर नगर इंदौर *🏳️‍🌈 प्रतिदिन प्रवचन प्रातः 9:00 से 10:00 एव रात्रि 8:00 से 9:00 जाप🏳️‍🌈* *आचार्य सम्राट ध्यान योगी श्री शिव मुनि जी महाराज, उत्तर भारतीय प्रवर्तक पूज्य गुरुदेव श्री सुभद्र मुनि जी महाराज एवं संयम शिरोमणि जैन भारती श्री सुशील कुमारी जी महाराज की शिष्या सेवाभावी श्री सौरभ जी महाराज की महावीर नगर स्थानक में विराजमान सुशिष्या सरलात्मा मृदु स्वभावी पू श्री शीतल जी मा सा एव साध्वी मण्डल के प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 9:00 से 10:00 तक निरंतर जारी है।   बाल सामायिक एव धार्मिक-संस्कार पाठशाला के पुरस्कार वितरण कार्यक्रम आज दिनांक 4/8/24 रविवार को पू गुरुनीजी शीतलजी मा सा एव साध्वी मण्डल की प्रेरणा से बाल सामा...

अवस्थाएं बदलती रहती है द्रव्य कभी नहीं बदलता

अवस्थाएं बदलती रहती है द्रव्य कभी नहीं बदलता.! 67) विष और संसार दोनो में संसार अधिक घातक है लेकिन दोनो में एक समानता यह है की दोनों की मारकता कभी दूर नही होती.! 68) शासनयोग सफल बनाने परिणति सुधार करना आवश्यक हैं.! 69) भोग तो हर जनम में मिलेंगे, आराधना के अवसर प्रत्येक जन्म में नही मिलते.! 70) चिंता नहीं,चिंतन करें कलह नही, कीर्तन करें.. भ्रमण नही,आत्म रमण करें अतिक्रमण नही,प्रतिक्रमण करें.! 🌧️ *प्रवचन प्रवाहक:* *मार्गस्थ कृपानिधि* *सूरि जयन्तसेन कृपापात्र* श्रुत संस्करणप्रेमी,शिष्यरत्न मुनि श्रीवैभवरत्नविजयजी म.सा. *🦚श्रुतार्थ वर्षावास 2024🦚* श्रीमुनिसुव्रतस्वामी नवग्रह जैनसंघ @ कोंडीतोप, चेन्नई महानगर

प्रपंच और कपट से दूर रहें: साध्वी डॉ चन्द्र प्रभा

आमेट के जैन स्थानक मे चातुर्मास विराजित तपाचार्य श्री जयमालाजी मा. सा. के शुभ सानिध्य में साध्वी डॉ चन्द्र प्रभा ने कहा की छल प्रपंच और कपट से दूर रहें! प्राणी का जीवन सरल होना चाहिए। कपटपूर्ण व्यवहार से धोखा, हिंसा जैसी बुराइयों का जन्म होता है।निश्छल व्यक्ति कभी भी दूसरे से छल नहीं करता। बेईमानी की प्रवृत्ति से अनाचार फैलता है। जैन धर्म में अरहंत देव ने कहा कि मन बचन काय (शरीर) से एक होना उत्तम आर्जव धर्म है। कपट या छलावा करने वाला दुख को भोगता है। सुखी रहने के लिए उत्तम आर्जव धर्म का पालन जरूरी है।जहां छल और कपट जीवन में आया, वहां चाहे सांसारिक मित्रता हो या आध्यात्मिक मित्रता, वो टिक नहीं सकती। भगवान महावीर ने कहा-मित्रता में भेद नहीं होना चाहिए, कपट नहीं होना चाहिए। साध्वी आनन्द प्रभाने कहा कपट रहित प्रभु का कीर्तन करना चतुर्थ भक्ति है। ये नहीं कि मुंह में राम-राम और बगल में छुरी। बाह...

त्याग वो है जो मिली हुई सामग्री का स्वेच्छा छोड़ दें: साध्वी आगमश्री जी

श्री हीराबाग जैन स्थानक सेपिंग्स रोड में विराजित साध्वी आगमश्री जी म सा ने कहा कि संकल्प का प्रत्याख्यान केवल खाने की रोटी, मिठाई, सब्जी, दाल नहीं मिला तो क्या वह त्याग हे? नहीं त्याग वो है जो आपको मिली हुई सामग्री का स्वेच्छा से उपयोग नहीं किया वह त्याग है। पानी को बांधने का काम पाईप ने किया, बिजली को बांधने का काम बल्ब ने किया, हवा को बांधने का काम ट्यूब ने किया उसी प्रकार जीवन को बांधने का काम प्रत्याख्यान ने किया। ऐसे अम्बड संन्यासी ने प्रत्याख्यान किये उपवाई सूत्र में बताया है एक नहीं 700 जनों अपने प्राण त्याग दिए क्योंकि वहां पानी की आज्ञा देने वाला कोई नहीं था। साध्वी धैर्याश्री जी म सा ने बताया समझदारी से पेश आना नहीं आया तो जिंदगी में हमने क्या पाया? छः घड़ों के माध्यम से बताया जिसका वर्णन नंदीसूत्र में है अज्ञानी होना उतना खतरनाक नहीं है जितना अधूरा ज्ञानी होना बहुत खतरनाक है। गौ...

स्वाध्याय भवन में डॉ. धर्मेंद्रकुमार का व्याख्यान और सम्मान

Sagevaani.com /चेन्नई: केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर में वरिष्ठ प्राकृत विकास अधिकारी ब्रह्मचारी डॉ. धर्मेन्द्रकुमार जैन शास्त्री का शुक्रवार सुबह साहुकारपेट स्थित स्वाध्याय भवन में आगमन हुआ | इस पावन प्रसंग पर श्री जैन रत्न हितैषी श्रावक संघ तमिलनाडु के कार्याध्यक्ष आर. नरेन्द्र कांकरिया और साहित्यकार डॉ. दिलीप धींग ने शॉल,मुक्ताहार और साहित्य प्रदान करके सम्मान किया | डॉ. दिलीप धींग ने नौ पुस्तकों के लेखक और अनेक पुरस्कारों से सम्मानित डॉ. जैन का परिचय दिया | इस अवसर पर आयोजित स्वाध्याय कक्षा में डॉ. धर्मेन्द्रकुमार जैन ने कहा कि हमें आगम की भाषा प्राकृत को पढ़ना चाहिये | मूल पाठ के स्वाध्याय का विशेष महत्व होता है | स्वाध्याय से पाप का प्रक्षालन होता है | हित- अहित का ज्ञान होता है | पुण्य, संवर और निर्जरा का लाभ मिलता है | डॉ. जैन ने कहा कि प्राकृत सिर्फ आगम की ही भाषा नह...

माँ होती पहला तीर्थ, पहला मंदिर : साध्वी डॉ गवेषणाश्री

Sagevaani.com /चेन्नई: आचार्य महाश्रमणजी की सुशिष्या साध्वी डॉ गवेषणाश्रीजी ने जैन तेरापंथ नगर, माधावरम् के तीर्थंकर समवसरण में फरमाया कि दुनिया में अनेक बड़े बड़े तीर्थ है, हर तीर्थ पर काफी मात्रा में भीड़ होती है, लाइन लगानी पड़ती है, किंतु दुनिया का जीता जागता तीर्थ और मंदिर है- माँ। गणेशजी का शरीर भारी था, तीनों लोक की यात्रा करनी थी, किंतु उन्होंने अपने माता-पिता की 3 बार परिक्रमा की और विजय को प्राप्त हुए। जो माँ की परिक्रमा कर लेता है वह सबसे बड़े तीर्थ की यात्रा कर लेता है। माँ मंदिर है, माँ मूरत है, माँ पूजा की जाती है। ठाणं सूत्र में कहा गया है कि तीन व्यक्तियों के ऋण से कोई उऋण नहीं हो सकते वो है- माता, पिता और गुरु। उसमें भी सबसे पहले माँ को स्थान दिया है। माँ की ममता विशाल बरगद की तरह होती है, जिसके शीतल छांव में बैठकर व्यक्ति सुकून की अनुभूति कर सकता है।  साध्वीश्री मयंकप्रभा...

मोड़ने पर वेग गति रुकती नहीं मगर परिवर्तित हो जाती है: धैर्या श्री जी म सा

श्री हीराबाग जैन स्थानक सेपिंग्स रोड में विराजित धैर्या श्री जी म सा ने कहा कि वेग को एक दम रोको मत उसको मोड दो मोड़ने पर वेग गति रुकती तो नहीं मगर परिवर्तित हो जाती है। जो वेग विध्वंश करने वाला था वह निर्माण करने वाला बन जाता है। गति का प्रवाह साधना की ओर उन्मुख हो जाय तो वह वेग संवेग कहलाता है। शरीर में उत्पन्न बीमारी की ओर जब ध्यान केंद्रित है तो सारी शक्ति उसी ओर बहने लगती है तो वेग उद्वेग कहलाता है। वही प्रवाह वासना की ओर उन्मुख हो जाता है तो वह आवेग कहलाता है। आगमश्री जी म सा ने केवल मुनि म सा के बारे मे बताया कि स्वयं पढ़ते और दूसरों को भी पढ़ाते थे।उन्होंने 11 वर्ष की उम्र में संयम धारण किया। आज अध्यक्ष डॉ भीकमचंद सखलेचा ने 101 संगीत एकसान करवाने का लाभ लिया । संचालन श्री गौतम जी नाहर ने संचालन किया।

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