Sagevaani.com @रायपुर. टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन में रविवार को धन वर्षा हुई थी। मौका था सैकड़ों गौतम लब्धि कलश में बीते डेढ़ साल से जमा हो रही दान की रकम को इकट्ठा करने का। इन पैसों से अब समाज के जरूरतमंदों की शिक्षा, इलाज, रोजगार में मदद की जाएगी। दान का ये महानुष्ठान उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने संपन्न कराया। रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने कार्यक्रम में बोलियां लगवाईं। इस दौरान पूर्व मंत्री राजेश मूणत बतौर मुख्य अतिथि मौजूद थे। पटवा ने बताया कि डेढ़ साल पहले प्रवीण ऋषि जब रायपुर आए थे, उन्होंने तभी समाज के घरों में गौतम लब्धि कलश की स्थापना कराई थी। अब जब वे चातुर्मास के लिए रायपुर आए हैं तो रविवार को उनकी मौजूदगी में ही कलश खोले गए। इनसे बड़ी धन राशि इकट्ठी हो गई है। इसे अब समाज के लोगों की भलाई में खर्च किया जाएगा। कार्यक्रम में रायपुर के अलावा आसपास के शहरों से भी ब...
वनिता श्री श्रीमाल ने लिए मास खमण के प्रत्याख्यान श्री एस.एस.जैन संघ माम्बलम के तत्वावधान में चातुर्मासार्थ विराजित पूज्य श्री वीरेन्द्रमुनिजी म.सा. ने रविवारीय धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि तप एक दिग्दर्शन है। भारतीय जैन श्रमण संस्कृति तप -त्याग प्रधान रही हैं। प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव से लेकर चरम तीर्थंकर महावीर स्वामी ने स्वयं दीर्घ तपस्चर्या की एवं प्राणी मात्र को तप त्याग करने की प्रेरणा दी। जिस प्रकार सोना तपकर कुन्दन हो जाता हैं ठीक उसी प्रकार अनन्त आत्माओ ने दीर्घ तप धारण कर केवल ज्ञान -केवल दर्शन को प्राप्त किया। मुनिश्री ने श्रावक के 12 व्रतों में सातवें व्रत के अंतर्गत 26 बोलों का विवेचन किया। संघ अध्यक्ष डॉ एम. उत्तमचन्द गोठी ने बहन वनिता श्री श्रीमाल के मास खमण तप की माम्बलम संघ से अनुमोदना करते हुए बताया कि जैन दर्शन में 12 प्रकार के तप बताए गए हैं। जिसमे छः बाह्य...
नार्थ टाउन में पुज्य गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि जिनवाणी कहती है श्रावक संसारिक लौकिक अपेक्षा से अमीर-गरीब दो प्रकार के होते है। जिसका आधार व्यापार है । व्यापार में सफल अमीरी को व्यापार में सफलता और असफल गरीबी को प्राप्त करता है पुण्यवानी से ही लौकिक कार्य में सफल होते है। संसार के सारे उत्तम पदार्थ पुण्यवाणी से प्राप्त होते हैं। पुण्यवाणी बढ़ाने के लिए जीव को चार बातों का ध्यान रखना चाहिए। 1) नास्तिक की संगत मत करो, क्योंकि जो श्रद्धा से रहित है भगवान व जिनवाणी को नहीं मानता वह न स्वयं सफल होता है और न वह दूसरो को पाप में रमण करता है। वो दूसरो को भी धर्म से दूर ले जाकर व्यसनी बना पुण्यवाणी का नाश कर देता है। ऐसा नास्तिक बंजर भूमि के समान होता है। नास्तिक मिथ्यात्वी होता है । मिथ्या तत्व सभी पापो का पाप है। ज्ञानीजन कहते है कि पुण्यवाणी यदि बढ़ानी है तो नास्तिक से दूर रहो श...
गुरु अंबेश सौभाग्य मदन , गुरुणीमैया प्रेम के आशीर्वाद व मेवाड़ उपप्रवर्तक सेवाभावी गुरुदेव श्री कोमल मुनि जी म.सा.,व मेवाड़ उपप्रवर्तनी, वर्षीतप आराधिका श्री विजयप्रभा जी म.सा. आदि ठाणा की प्रेरणा से श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन मेवाड़ महिला मंडल मुंबई द्बारा उपसंघ भाईंदर में उपप्रवर्तनी संथारा प्रेरिका पू.श्री सत्य साधना जी म.सा आदि ठाणा सात के सानिध्य में अधिवेशन की बोलियां व धर्म पहेली पुंज कार्यक्रम रखा गया। 7 अक्टूबर 2023 को ओस्तवाल बगीची़ भायंदर ईस्ट में मेवाड़ महिला मंडल मुंबई अध्यक्षा कंचन एस. सिंघवी व महामंत्री कंचन एल. सिंघवी के नेतृत्व में भव्य महिला अधिवेशन होने जा रहा है। जिसका बोलियों का आयोजन कल भाईंदर उपसंघ में किया गया। भाइंदर मंडल नकी बहनों ने मंगलाचरण व स्वागत गीत प्रस्तुत किया। जिसमें पूरे मुंबई के 35 उपमंडलों ने भाग लिया। जिसमें लगभग हजार से अधिक बहनों ने शिरकत की। बहनो...
Sagevaani.com @चैन्नाई ।भक्ति हमारी सच्ची है तो जीते जी हो जाएंगे हमें भगवान के दर्शन। श्री एस.एस. जैन संघ साहूकार पेठ के जैन भवन मे रविवार को विषेश धर्मसभा मे भक्ति की शक्ति का महत्व बताते हुए महासाध्वी धर्मप्रभा ने हजारों श्रध्दालूओ से कहा कि नृसिंहजी ने सामान्य मनुष्य का जीवन जीते हुए श्री कृष्ण को प्राप्त कर लिया। उन्होंने अपनी भक्ति से भगवान को प्रसन्न कर प्रभु के दर्शन कर लिए। हम भी भगवान के दर्शन मनुष्य शरीर में रहते हुए कर सकते हैं। नृसिंह जी बचपन से ही गूंगे और बहरे थे। किसी संत ने उन्हें मंत्र दिया। उसका जप करने से उन्हें श्रवण शक्ति के साथ बोलने की शक्ति भी प्राप्त हो गई।तो नृसिंह जी ने अपना जीवन श्री कृष्ण कि भक्ति मे लगा दिया।शक्ति से भक्ति होती हैं।भक्ति में शक्ति होती हैं,यह बात अगर मनुष्य के समझ मे आ जाए और मनुष्य परमात्मा की भक्ति मे लीन हो जाए, तो जीते जी परमात्मा के दर्श...
किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने ध्यान क्रिया में प्रवेश करने के लिए पांच गुण बताए। वे हैं वैराग्य, तत्वज्ञान, निर्ग्रंथता, मन को वश में करना और परिषह को जीतना। ध्यान में एकाग्रता के साथ निर्मलता मिल जाए तो केवलज्ञान भी मिल जाता है। हम शब्दों से लोगों के साथ, ज्ञान से ज्ञानी के साथ और ध्यान से आत्मा के साथ बात कर सकते हैं। ध्यान लाने के लिए भावनात्मक विचार लाने ही पड़ेंगे। ध्यान के तीन साधन है अंतःकरण, बाह्यकरण और परमात्म साधन। अंत:करण के साथ बाह्यकरण से बात करना ध्यान है। शब्द इंद्रियों का धर्म है जबकि ध्यान चिंतन व मन का धर्म है। सही या गलत है, यह बोलना आत्मा का धर्म है। उन्होंने कहा मन व बुद्धि में भी फर्क है। मति, बुद्धि, प्रज्ञा, स्मृति समान अर्थ वाले हैं। मन इनसे हटकर है। मन एक है, जो विचारों की आपूर्ति...
श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई में श्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत प.पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ.वैभवरत्नविजयजी म.सा.के भव्य वर्षावास चल रहा है। ~ संपूर्ण विश्व का हित करने वाले ऐसे तीर्थंकर प्रभु, गणधर भगवान, मुनि भगवान, चक्रवर्ती, महान नेता, शूरवीर, दानवीर, को जन्म देने वाली श्रेष्ठ तत्व है मां। ~ भारत देश में मुगलों एमजेने, अंग्रेजों ने, पुर्तगाल ने, आक्रमण किया और उसके सामने लड़कर जीतने का बल देने वाला कोई है तो मां-बाप और उनके संस्कार। ~ मां और बाप के लिए संतान जैसी भी हो जहां भी हो स्वीकार कर सकते हैं तो बेटे बेटी को भी उनके स्वभाव का पूर्ण स्वीकार करना ही चाहिए। ~ स्वयं को दुख दर्द पीड़ा सहन करने के बाद भी अपने संतानों को सुख शांति समता समाधि ...
राजेन्द्र भवन चेन्नई विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत प.पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा. के भव्य वर्षावास का आनंद लीजिए। ~ दूसरे जीवों की सुरक्षा के लिए दया भाव और स्वयं के जीव की सुरक्षा के लिए जयनाभाव, समता भाव, साक्षी भाव ज्ञानी भगवन्तो प्ररूपित किया है। ~ आत्मा की शक्ति से जुड़ने वाला साधक कभी भी उससे दूर नहीं रह सकता। ~ समझदार व्यक्ति कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अत्यंत सरलता और सहजता से समझ के समाधान ला सकता है। ~ आत्म बल ही सभी सफलताओं का मूल है। ~ हम हमारे जीवन के दूसरों को देख कर उसे बदलने के लिए प्रबल पराक्रम करें तो हमारे दोषों का नाश होता ही है। ~प. प. प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सूरीश्वरजी महाराजा को आज भी विश्व क...
किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म.सा.ने बताया कि शास्त्र गुण के चार अधिकारों वांचना, पृच्छना, परावर्तना और अनुप्रेक्षा के बाद पांचवां धर्मोपदेश होता है। शास्त्र सुन लिया, फिर भी व्यक्ति के जीवन में प्रमाद है तो धर्मोपदेश फलीभूत नहीं होता। प्रमाद के विभिन्न प्रकारों की विवेचना करते हुए उन्होंने बताया कि प्रमाद आठ प्रकार के हैं। उसमें प्रथम दो प्रकार संशय व विपर्यास के है। संशय से जीवन भय से ग्रसित रहता है। संशय और जिज्ञासा अलग-अलग है। जानने की पिपासा, वह जिज्ञासा है। अपने मन में हमेशा शंकाएं बनी रहती हैं, चाहे कितना भी सुन लें, वह संशय है। शंकाशील व्यक्ति कभी स्वस्थ नहीं रहता। ज्ञानियों ने ज्ञान पाने के लिए श्रद्धा व युक्ति का मार्ग बताया है। जहां तर्क काम नहीं करता, वहां श्रद्धा होती है। आगम में जो लिखा है, वह ...
अनेकों जिज्ञासाओं का दिया समुचित समाधान Sagevaani.com @चेन्नई; श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में धर्मपरिषद् में आज शनिवारीय प्रवचन में धर्म, जीवन से सम्बंधित प्रश्नों का समुचित समाधान देते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने कहा कि जिस व्यक्ति के भीतर में कभी भी, कहीं भी, परिस्थितियों से जिज्ञासा पैदा होती है। जिज्ञासा उसी के हृदय में पैदा होती है 1. जो मानता है कि अभी मेरे भीतर सम्पूर्ण ज्ञान पैदा नहीं हुआ (अपनी अज्ञानता की खबर है) और 2. ज्ञानी होने के रास्ते की और कदम बढ़ाने की खबर है। जिज्ञासा से वर्तमान स्थिति का पता चलता है कि मेरे भीतर बहुत अभी शंकाएं है, अज्ञानता है, इसी कारण मेरे भीतर प्रश्न पैदा होते है। वही उज्जवल भविष्य के रूप में जिज्ञासा होना इस संकल्प को बताता है कि मु...
श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में कर्नाटक तप चंद्रिका प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने बताया घर में अगर पांच व्यक्ति है तो सभी के ऊपर एक जैसा स्नेह नहीं होता। अगर वैभव हो तो उस पर द्वेश होता है। एक भी संबंध कायम नहीं रहता है। स्नेहराग, दृष्टिराग, कामराग आदि के बारे में समझाया। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने आ शब्द के बारे में बताया। आओ खेल खेले हम सबका नित्त होवे मेल। खेल खेलने में मेल होना जरूरी है। गेंद के खेल के बारे में बताया गया।अरसिकेरे से महिला मंडल का तथा तपस्वी प्रिया मकाणा का स्वागत अध्यक्ष विजयराज चुत्तर, अभिवादन मंत्री हस्तीमल बाफना ने किया।संचालन सुधीर सिंघवी ने किया।
नार्थ टाउन में आचार्य शुभचन्द्रजी मरासा की जन्म जयंती तप त्याग और दया दिवस के रूप में मनाई गई। श्री एस एस जैन संघ नार्थ टाउन के तत्वावधान में पुज्य गुरुदेव जयतिलक मुनिजी म सा के पावन सानिध्य में आचार्य सम्राट शुभचन्द्रजी मरासा की जन्म जयंती आज दिनांक 29 जुलाई शनिवार को तप त्याग और दीक्षा दिवस के रूप में मनाई गई। सर्वप्रथम अध्यक्ष अशोक कोठारी ने सभी का स्वागत किया। तत्पश्चात महिला मण्डल द्वारा शुभचन्द्रजी मरासा के बारे में गीत प्रस्तुत किया। जयमल श्रावक संघ के अध्यक्ष पारसमल गादिया ने आचार्य प्रवर के जीवन पर प्रकाश डाला। महिला मण्डल सचिव ममता कोठारी ने शुभचन्द्रजी पर भजन गाया। कार्यकारिणी सदस्य ज्ञानचंद कोठारी ने आचार्य शुभचंद्र जी के जीवन पर संबोधित करते हुए कहा कि वे सर्वसंप्रदाय व समुदाय के लोगों के बीच विशेष श्रद्धा एवं अनन्य आस्था के केंद्र थे। आचार्य का जीवन सरलता, सादगी और संयम का ...