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जिस घर में माता-पिता हंसते हैं वहां भगवान बसते हैं : साध्वी रमणीक कुंवर जी

सबसे बड़े तीर्थ हैं माता-पिता, उनके आशीर्वाद को ईश्वर भी नहीं काट सकते : साध्वी नूतन प्रभाश्री जी Sagevaani.com @शिवपुरी। पोषद भवन में जैन साध्वियों ने उन कथित समाजसेवियों पर कड़े प्रहार किए जो समाजसेवक के रूप में अपनी पहचान रखते हैं, अखबारों में अपने फोटो छपवाते हैं, सार्वजनिक कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बनकर गौरवान्वित होते हैं, लेकिन घर में अपने माता-पिता की कोई देखभाल नहीं करते। यहां तक कि महीनों तक उनसे बातचीत भी नहीं करते। साध्वी रमणीक कुंवर जी ने कहा कि जिस घर में माता-पिता हंसते हैं वहां भगवान बसते हैं। वहीं साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने अपने उद्बोधन में बताया कि वैष्णो देवी, शिखरजी और गिरिनार जी तीर्थ जाने से पहले सबसे बड़े तीर्थ अपने माता-पिता का आशीर्वाद तो ले लो। बकौल साध्वी नूतन प्रभाश्री जी, माता-पिता के आशीर्वाद को भगवान भी नहीं काट पाते। जो माता-पिता का आशीर्वाद होता है उनके ...

जिसके पास जितने सद्गुण हैं, वह उतना ही बड़ा अमीर है : देवेंद्रसागरसूरि

श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में प्रवचन देते हुए आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने कहा कि जीवन की वास्तविक सफलता और लोकप्रियता पाने के लिए धन- दौलत अथवा शक्ति-संबल की आवश्यकता नहीं, उसके लिए आवश्यकता है – गुण, कर्म और स्वभाव की श्रेष्ठता की। जब तक गुण-कर्म-स्वभाव में श्रेष्ठता का समावेश नहीं होगा, बहुत कुछ धन- दौलत एवं शक्ति-संपन्नता होने पर भी मनुष्य वास्तविक लोकप्रियता नहीं पा सकता। जो गुणी है, उसका आदर क्या धनवान और क्या निर्धन दोनों ही करते हैं।उसकी पूजा-प्रतिष्ठा बाह्य आधार पर नहीं होती, आंतरिक गुणों के कारण ही होती है। सहानुभूति, संवेदना, सहयोग, सेवा का गुण मनुष्य को वह लोकप्रियता प्राप्त करा सकता है, जो एक धनवान लाखों-हजारों रुपया खर्च करके भी नहीं पा सकता। सहानुभूति का एक शब्द, संवेदना का एक आंसू और सेवा का एक कार्य टनों स्वर्ण से भी अधिक मूल्यवान है...

विवेक बॉम्ब अध्यक्ष रोटरी क्लब ऑफ मद्रास ट्रडिशनल के 

रोटरी क्लब ऑफ़ मद्रास ट्रडिशनल का सातवां शपथ ग्रहण समारोह रविवार 6 अगस्त 2023 को होटल डेक्कन प्लाजा, रोयपेत्ताह, के प्रांगण में संपन्न हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में रोटरी के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर, AKS रवि रमन उपस्थित थे! सर्वप्रथम श्री महावीर गुलेचा ने 2022 23 वर्ष की सफलता हेतु सभी का धन्यवाद दिया एवं सभी का स्वागत किया, और श्री चंद्रेश जी जगावत ने अपने सचिव कार्यकाल की रिपोर्ट प्रस्तुत की। तत्पश्चात मेडल पहनाते हुए श्री विवेक बॉम्ब को कर्तव्य धनी के साथ सभी ने अध्यक्ष 2023 24 के लिए घोषित कर निर्वाचित किया! उन्होंने अपने शपथ समारोह में संस्था को अगले आयामों तक कैसे छुआ जाए एवं जो सहभागी रोटरी संस्थाएं हैं उनके साथ मिलकर राष्ट्र निर्माण की बात रखी!  रोटरी क्लब ऑफ मद्रास ट्रडिशनल द्वारा नेल्लूर की एक स्कूल को अडॉप्ट करने की घोषणा कि गई! श्री विपिनचंदजी जिन्हे सब अंकलजी के नाम से बुलाते हैं, उनक...

साधार्मिक भक्ति तो सम्यक्त्व की महान् उपासना है: आचार्यश्री उदयप्रभ सूरिजी

किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ में योगनिष्ठ आचार्यश्री केशरसूरीजी के समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने प्रवचन में कहा चित्त को अपने वश में करने से अपने जीवन में के तीन शत्रु खड़े हो जाते हैं वचन, शरीर और व्यवहार। ये तीनों शत्रु जैसे बर्ताव करने लग जाते हैं। क्रोधी व्यक्ति के शब्द हमेशा अशांत निकलते हैं। वचन, शरीर और व्यवहार को शांत बनाना है तो मन को शांत बनाओ। जिसकी काया शांत होती है, उसकी इंद्रियां शांत रहती है। ऐसा कहा जाता है चंचलता मन का स्वभाव है, व्याधि शरीर का स्वभाव है, क्यों न हम उसे बदल डालें यानी शुभ विचारों में डाल दें? हमारा मन विचार करे बिना रहता नहीं है। ज्ञानी कहते हैं मन जब भी अशुभ विचारों में चला जाता है तब उसे शुभ आलंबन देना शुरू कर दो। साहित्य, स्थान, संगति तीनों बदल दो तो मन शुभ विचार के अंदर चला जाएगा। क्रिया को स्थिर करने के लिए काय...

जीवन में सदैव धर्म का समावेश रखो: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में जयगच्छीय गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आत्मा बन्धुओ, जैन दर्शन में अभयकुमार का एक महत्वपूर्ण स्थान है विलक्षण बुद्धि वाले, राज कुल में होते हुए भी वे हर प्रवृति में धर्म का समावेश होता थाl जिससे उनके निकाचित कर्म का गृहस्थ होते हुए भी धर्म का समावेश अपने जीवन में करो जिससे भवयत्व और सम्यक्त्व दोनो सुरक्षित रहे। ज्ञानी जन कहते हैं कि जीवन में सदैव धर्म का समावेश रखो। धर्म शब्द का अर्थ ध यानि धारण करना ‘र यानि रक्षा ‘म’ यानि मरण-मोह धर्म छोड़ने योग्य, दिखावट, सजावट व मिलावट करने योग्य नही है। धर्म का सही अर्थ जानने से ही धर्म के प्रति श्रद्धा उत्पन्न होगी। धर्म धारण करने वाला दुर्गति से बचता है। जन्म-मरण की श्रृंखला को नष्ट करता है शास्वत सुख प्रदान करता है। जैसे चौकीदार सुरक्षा करता है। वैसे ही धर्म सदा काल रक्षा करते हुए जन्म मरण से मुक्ति कर...

 मानव भव और जैन दर्शन की प्राप्ति होना कठिन है: डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.

🏰☔ *साक्षात्कार वर्षावास* ☔🏰           *ता :06/8/2023 रविवार*      🛕 *स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई*  🪷 *विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, दीक्षा दाणेश्वरी प.पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा. के प्रवचन के अंश  🪔 *विषय: भवयात्रा कि भव्यता*🪔 ~अनंतकाल तक हमारे जीव ने जहाँ अनंत दुःख सहन किया हो वह स्थान है निगोद का. आँख की एक पलक मे 17 1/2 बार जनम मरण का भयंकर दुःख अनंतकाल तक सहन किया था। ~ चिंतामणि रत्न की प्राप्ति होना शायद सरल है किंतु मानव भव और जैन दर्शन की प्राप्ति होना कठिन है। ~ यदि हमारा मन शैतान की तरह है तो मृत्यु के बाद दुर्गति निश्चित है और यदि हमारा मन प्रभु की तरह है तो मृत्यु के बाद सद्गति निश्चित है। स्वभाव, विचार, व्...

श्रद्धा में वह शक्ति है जो दुःखों में भी सहनशक्ति भर देती है: आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीजी

Sagevaani.com @चेन्नई: किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरीश्वरजी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी के रविवारीय प्रवचन का विषय था स्टाॅप, लुक एंड गो यानी रूको, देखो और आगे बढ़ो। जब भी कोई सज्जन व्यक्ति कुछ काम करता है, तो वह विचार करके आगे बढ़ता है। विचार किए बिना प्रगति नहीं होती है। वहीं, एक अहंकारी व्यक्ति गति करेगा लेकिन प्रगति नहीं करेगा। अंधकार व अहंकार एक ऐसा वातावरण है जिसमें आंखें होने पर भी नहीं दिखता। व्यक्ति में शक्ति है, फिर भी तप नहीं करता, उसका कारण है प्रमाद।‌ भगवान है, फिर भी भक्ति नहीं करता, उसका कारण है मिथ्यात्व। शक्ति है, फिर भी प्रवचन श्रवण नहीं करता, उसका कारण है विकृत सोच और प्रमाद करने की आद भाग्य की लकीरें स्वयं के कर्मों ने बनाई है। इसके बीज पहले से पड़े हुए हैं, जो आज उसका वृक्ष बना है। उन्होंने कहा हरेक बीज के अंदर वृक्ष...

मुर्ख बनाया जाता हे मूढ़ होता है: प्रकाश मुनि जी मा.सा.

सौभाग्य प्रकाश संयम सवर्णोत्सव चातुर्मास खाचरोद भगवान निर्वाण मुक्ति का उपदेश करते है, अनासक्त भाव से यह बात बताते हुए पुज्य प्रर्वतक की प्रकाश मुनि जी मा.सा. ने फरमाया की→ बोधिदाता – ——–नमः  हम सब मुर्ख है कि मूढ़ ? मुर्ख बनाया जाता हे मूढ़ होता है। जिसके पास विवेक नहीं होता वह *मुढ़* होता है *चालाकी से मुर्ख बनाया जाता हे।* मुढ़ता अन्दर का विषय है। *कार्य व अकार्य विवेक शून्य होना मूढ़ कहलाता है।* यह राग के कारण और प्रबल द्वेष मूढ़ बना देता है। *राग* विवेक शून्य बनाता है। मुढ़ता-विवेक शुन्यता । यह मुढ़ जीव है वह आसक्ति में उलझा है। राग-आसक्ति का कारण है। हम कितनी जगह आसक्त हे, राग के कारण से जिसके बिना रहा नहीं जाय उसका नाम *आसक्ति* । राग आसक्ति का फल दो रूप में आता हे *संताप – असंतुष्टि* रूप में आता है। आसक्ति, अंसतुष्टि व संताप पैदा करती है जीव नये-नये कर्म बांधता...

अपने पापों को प्रकट कर प्रायश्चित करना भी तप है: साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

साध्वी जी ने बताया कि आसान है उपवास करना, लेकिन प्रायश्चित, विनय और सेवा नहीं है आसान Sagevaani.com @शिवपुरी। भगवान महावीर ने तप के जो 12 प्रकार बताए हैं उनमें प्रायश्चित भी एक है। प्रायश्चित में अपने पापों को प्रकट कर आंसू बहाने ्रचाहिए। उक्त उद्गार प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने स्थानीय पोषद भवन में आयोजित एक धर्मसभा में व्यक्त किए। इस अवसर पर मधुर गायिका साध्वी वंदनाश्री जी ने काव्यात्मक अंदाज में भजन गाते हुए कहा कि अपने पापों पर जब तू रो देगा, तेरा एक-एक आंसू पापों को धो देगा…। साध्वी जयश्री जी ने बताया कि इंसान संसार में दुखों, परेशानियों और कष्टों को भोग रहा है। इनसे मुक्ति के लिए वह आत्महत्या तक कर लेता है या उसका विचार उसके मन में आता है, लेकिन वैराग्य की भावना कभी मन में नहीं उपजती है। उन्होंने कहा कि संसार में तो अनेक परिशय हैं, लेकिन संत जीवन में सिर्फ 22 परिशय ...

परिवार को समय दो, संस्कार दो, समाधान दो, स्नेह दो: आगमश्रीजी म.सा.

श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में कर्नाटक तप चंद्रिका प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने प्रवचन में बताया हमारा परिवार कैसा है। परिवार को समय दो, संस्कार दो, समाधान दो, स्नेह दो, तो आपका परिवार एक आदर्श परिवार होगा। बाहर की मीटिंगे बढ़ गई तो घर की सेटिंग बिगड़ गई। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने बताया जो भी कार्य करना है इसमें इमानदारी रखना है। बेईमानी छोड़ना तो ही हमारे जीवन की सार्थकता है। बच्चों का संस्कार शिविर हुआ। संगीत स्पर्धा हुई। बहुत अच्छी तरह से प्रोग्राम हुआ। कांफ्रेंस विहार सेवा मंडल ने दर्शन वंदन धर्म लाभ लिया। मंत्री हस्तीमल बाफना ने अभिवादन किया। अध्यक्ष विजयराज चुत्तर ने स्वागत किया। संचालन सुधीर सिंघवी ने किया।

रजत द्वारा प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का सम्मान

    राजस्थानी एसोशिएशन तमिलनाडु द्वारा आशासिंह मोहता चैरीटेबल ट्रस्ट के सहयोग से 6 अगस्त 2023, रविवार को डी जी वैष्णव कालेज के प्रांगण में प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का सम्मान समारोह आयोजित किया गया। प्रार्थना के पश्चात् मुख्य अतिथि तथा रजत के पदाधिकारियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन किया गया। स्वागतीय भाषण अध्यक्ष मोहनलाल बजाज ने दिया। रजत की गतिविधियों पर महासचिव देवराज आच्छा ने प्रकाश डाला। प्रतिभा सम्मान समिति के चैयरमेन सीए राजेंद्र कुमार जैन ने प्रतिभा सम्मान कार्यक्रम की पूरी जानकारी दी।      मुख्य अतिथि विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव सीए महावीर सिंघवी, आईएफएस तथा विशेष अतिथि इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया में कैरियर काउंसलिंग कमिटी के चैयरमेन सीए रोहित रुवाटिया अग्रवाल पधारें।   मुख्य अतिथि सिंघवी जी का परिचय निखिता लोढा ने दिया तथा विशेष अतिथि रोहित रुवाटिया अग्रवाल का परि...

पापी से पाप छुड़ाने के लिए उससे घृणा छोड़नी होगी: गुरुदेव जयतिलक मुनिजी

एस एस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने बताया कि भगवान कहते हैं पापी से नहीं पाप से घृणा करो। पाप को जानना और पाप को छोडना आवश्यक है। पापी को सुधारा जा सकता है। पापी से पाप छुड़ाने के लिए उससे घृणा छोड़नी होगी। तभी हम पापी को पाप से मुक्त कर सकते है। अभ्यास से ये सब सम्भव है। पापी से पापी व्यक्ति भी पाप को छोड़कर मोक्ष में जा सकता है। ज्ञानीजन कहते है इसलिए पाप, एकान्त रूप से छोड़ने योग्य है। आचरण करने योग्य है क्योकि संसार में सारे दुःखो का कारण पाप है। अत: पाप से निवृत होना आवश्यक है। ज्ञानीजन कहते है भविष्य की चिन्ता छोड़ वर्तमान को सुधारों यदि वर्तमान संवर गया तो भविष्य अपने आप संवर जायेगा और भूतकाल का चिन्तन मत करो इसलिए भगवान कहते हैं कि वर्तमान में पच्चखान करों स्वयं को पाप से निवृत करो जिससे की भविष्य मे दुःख न आये। भूतकाल का चिन्तन करने से आद्र ध्...

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