चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मुथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि कुछ पाने के लिए झुकना आवश्यक होता है लेकिन अहंकार व्यक्ति को झुकने नहीं देता। कुछ हासिल करने के लिए व्यक्ति को समर्पित होने पड़ता है, अधिकार जता कर कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। परमात्मा के द्वार पर जाने के लिए प्रार्थी बनना पड़ता है, दीन-हीन बनकर विनम्रता पूर्वक प्रार्थना करनी पड़ती है। व्यक्ति के मन में हमेशा दूसरों को नीचा दिखाने की कोशिश चलती रहती है। दूसरों को दबाने के तरीके अलग-अलग होते हैं, कभी धन के माध्यम से, कभी पद तो कभी बल और कभी ज्ञान के माध्यम से। उन्होंने कहा, अपने लिए सब सुख, धन, सौंदर्य, सम्मान चाहता है लेकिन दूसरों का सुख, धन, सौंदर्य, सम्मान देखा नहीं जाता। दूसरों के दुख में सहानुभूति जताने वाला व्यक्ति दूसरों के सुख से प्रसन्न इसलिए नहीं होता है क्योंकि उसके अहंकार को ठेस पहुंचती है। यही...
चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने रविवार को कहा कि उत्तम कार्य ही मनुष्य को ऊंचाइयों पर ले जाता है। जीव दया करने से जीवन में बहुत लाभ मिलते हैं। सौभाग्यशाली ही अपने जीवन को ऐसे उत्तम कार्यों में जोडऩे का प्रयास करते हैं। मनुष्य जीवन का लाभ अगर लेना चाहते हैं तो जीव दया के कार्यों में सदैव आगे रहना चाहिए। इसके साथ ही मानव जाति के प्रति अपने हृदय के अंदर क्षमा का भाव रखें। प्राणि मात्र के प्रति दिल में द्वेष का भाव नहीं रखने पर ही सच्चे अर्थों में क्षमापना का भाव उत्पन्न हो पाएगा। उन्होंने कहा, क्षमा करने और मांगने में जीत होती है, हार नहीं। क्षमा मांगना वीरों का भूषण है कायरों का व्यवहार नहीं। क्षमा दान देने-लेने से स्नेह बढ़ता है। जीवन को क्षमामय बनाने के लिए प्राणी मात्र के प्रति अपने हृदय के अंदर दया के भाव आने चाहिए। जीवों पर दया करने वाले वास्तव में उत्तम क...
चेन्नई. रविवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर, पुरुषावाक्कम, चेन्नई में चातुर्मासार्थ विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि महाराज एवं तीर्थेशऋषि महाराज के प्रवचन का कार्यक्रम आयोजित किया गया। उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषिजी ने आचारांग सूत्र में त्रसकाय जीवों की श्रेणी के बारे में बताया। वे जीव त्रसकाय कहलाते हैं जिन्हें पीड़ा का अनुभव हो। जो बन भी सकता है और बिगड़ भी सकता है। दो इन्द्रिय जीवों से पंचेन्द्रियों तक के जीवों में सुधरने और बिगडऩे दोनों की स्थितियां हो सकती है। जो त्रसकाय जीव अपनी पांचों इन्द्रियों का सदुपयोग करता है वह शिखर को छू सकता है, मोक्ष को आसानी से प्राप्त कर सकता है, एकलव्य के समान बन सकता है। पंचेन्द्रिय जीव स्वयं में सुधार भी ला सकता है और बिगड़ भी सकता है। जिस प्रकार दुर्योधन को सुधारने के लिए अनेक वाक्य लगे लेकिन वह द्रोपदी के मात्र एक वाक्य से बिगड़ा और परिणाम महाभारत ...
परम पूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी एवं मातृहदया साध्वीश्री प्रमुखाश्री जी के सान्निध्य मे श्री जैन महासंघ के तत्वावधान में आचार्य महाश्रमण चातुर्मास व्यवस्था समिति द्वारा आयोजित महिला वर्ग सामुहिक क्षमायाचना कार्यक्रम का आयोजन आचार्य महाश्रमण चातुर्मास प्रवास स्थल माधावरम में किया गया। मूर्तिपूजक सम्प्रदाय से आचार्य श्री हेमचंद्रसूरीश्वरजी म.सा. की शिष्या साध्वीश्री जी अमीरसाश्रीजी म.सा.एंव आचार्य तीर्थभद्रसूरीश्वरजी म. सा. की आज्ञानुवर्तिनी श्री पुर्णगुणाश्रीजी महाराज सा की शिष्या पुर्ण ज्योतिश्री जी महाराज महती कृपा करके पधारे। आचार्य महाश्रमण जी ने भी महती कृपा कर प्रवचन पंडाल में सान्निध्य प्रदान किया और अपने मंगल उद्बोधन में फरमाया “आज जैन सम्प्रदाय की बहनो का सामूहिक क्षमायाचना पर सभी को यह संकल्प करना चाहिए हमे अपने जीवन को राग, द्वेष से मुक्त रखना है, हमे किसी का दिल दुखाया हो ...
यहां शांति भवन में विराजित श्री ज्ञानमुनिजी ने कहा कि इस संसार में भाग्य से मनुष्य जन्म जी रहे हैं। सब ग्रन्थ,पंत सभी मनुष्य जीवन को दुर्लभ बताते हंै सभी जीव भी मनुष्य जीवन जीना व जन्म लेना चाहते हैं। इन्द्र सहित अन्य देवतागण भी चाहते हैं कि अगला जन्म किसी जैन श्रावक के घर में हो। सार धर्म सभी को नहीं मिलता है,सभी को जैन कुलीनता नहीं मिलती है। विश्व में सबसे अच्छा जैन धर्म है। जैन धर्म का सार ज्ञान है। ज्ञान को कोई पार नहीं ज्ञान तो अनन्त है। प्रभु के पास ज्ञान का खजाना है। जितने भी ज्ञान को बांटते हैं घटता नहीं। भगवान का नाम लेने से ही आधी शक्ति मिलती है। जीभ में अमृत भी है जहर भी है। अच्छे से अच्छे बोलना किसी से कडुवा वचन न बोले। अच्छा बोलो,मीठा बोलो। शब्दो में अमृत बरसाओ। वचन तो रत्न है एक एक शब्द सोचकर बोले। शब्दों को तौलकर बोले। इस अवसर पर एसएस जैन संघ के मंत्री धर्मचन्द छोरलिया ने बत...
मुंबई: संत महोपाध्याय श्री ललितप्रभ सागर महाराज ने कहा कि दुनिया में अच्छाइयाँ भी हैं और बुराइयाँ भी। आपको वही नजर आयेगा जैसा आपका नजरिया है। अच्छी दुनिया को देखने के लिए नजारों को नहीं, नजरिये को बदलिए। केवल अच्छे लोगों की तलाश मत करते रहिए, खुद अच्छे बन जाइए। आपसे मिलकर शायद किसी की तलाश पूरी हो जाए। उन्होंने कहा कि लोग कहते हैं जब कोई अपना दूर चला जाता है तो तकलीफ होती है। परंतु असली तकलीफ तब होती है जब कोई अपना पास होकर भी दूरियाँ बना लेता है। किसी को सजा देने से पहले दो मिनट रुकि ये। याद रखिये, अगर आप किसी की एक गलती माफ करेंगे, तो भगवान आपकी सौ गलतियाँ माफ करेगा। गलती जिंदगी का एक पेज है, पर रिश्ते जिंदगी की किताब। जरूरत पडने पर गलती का पेज फाड़िए, एक पेज के लिए पूरी किताब फाडने की भूल मत कीजिए। उन्होंने कहा कि बड़ी सोच के साथ दो भाई 40 साल तक साथ रह सकते हैं वहीं छोटी सोच उन्हीं भाइय...
कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में विराजित जैन दिवाकर दरबार में विमलशिष्य वीरेन्द्रमुनि ने धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि आज हम यह एकाभवतारी आचार्य सम्राट परम पूज्य श्री जयमलजी म सा की – व श्रमण संघीय आचार्य डॉ श्री शिवमुनिजी म सा की जन्म जयंती मना रहे हैं। जय जाप के साथ, पूज्य श्री जयमलजी म सा का जन्म मरुधरा के शस्य शामला भूमि में सुंदर सा गांव लांबिया में मेहता मोहनदासजी समदड़िया के घर महिमादेवी की कुक्षी से विक्रम संवत 1765 भादवा सुदी 13 के दिन हुआ था। आपके बड़े भाई रीडमलजी थे आपकी शादी रिया के सेठ शिवकरणजी की पुत्री के साथ हुआ था गोना नहीं हुआ था। एक बार आप मेड़ता व्यापार के लिये गये थे तब वहां दुकानें बंद थी, पूछने पर मालूम हुआ श्री भूधरजी म सा का प्रवचन चल रहा है। जब तक व्याख्यान नहीं हो जाता तब तक मार्केट सब बंद है। आप भी पहुंच गये प्रवचन में, जिसमें ब्रम्हचर्य क...
चेन्नई .जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ माधवरम के महाश्रमण समवसरण में आचार्य महाश्रमण कहा कि अनाहार की तपस्या के बाद आज क्षमापना दिवस है। भीतर के भावों में शरीर और वाणी दोनों पर प्रभाव पड़ता है। शाब्दिक उपचार होता है तो शारीरिक उपचार भी होना चाहिए। हम सभी छद्मस्त हैं। सामूहिक जीवन में कभी कटुता हो सकती है। कभी तेजी भी आ सकती है अथवा किसी को कोई बात अप्रिय भी लग सकती है। जिस प्रकार मैले कपड़े को धोकर साफ कर दिया जाता है उसी प्रकार दैनिक जीवन में हृदय पर जमने वाली कटुता रूपी मैल को खमतखामणा के माध्यम से धोने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अंतरात्मा से खमताखामणा कर लेना चाहिए कि समस्त जीव हमें क्षमा करें और हम सभी जीवों को क्षमा प्रदान करें तो मन का मैल भी दूर हो सकता है। मुनि दिनेशकुमार ने क्षमापना से संबंधित गीत का संगान किया। तेरापंथी सभा के मंत्री विमल चिप्पड़, जैन विश्व भारती के अध्यक्ष रम...
चेन्नई. एसएस जैन संघ ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि जप दो प्रकार के होते हैं। वाचिक जप और मानसिक जप। दोनों आत्म उत्थान के लिए उपयोगी हैं। साध्वी ने कहा कि जप और तप का संबंध दूध और पानी सा नहीं बल्कि दूध और बादाम सा है। भारतीय संस्कृति में उपासना का विशेष महत्व है। सभी धर्मों की उपासना पद्धति अलग-अलग है। परन्तु सरलतम उपाय है जप करना। आत्म विकास की साधना का नाम है जप। ज का अर्थ है जन्म-मरण का विच्छेद करना, प का अर्थ है पवित्र बनना। कोई अरिहंत का जाप करता है तो कोई राम राम का। कोई अल्लाह अकबर का। हिंदु धर्म में गायत्री मंत्र का, बौद्ध धर्म में त्रिशरण मंत्र का और जैन धर्म में नमस्कार मंत्र का महत्व है। महामंत्र का चौदह पूर्व का सार है। जिसका पहला अक्षर णमो यानि नरक से निकलकर मोक्ष की यात्रा करना है।
चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मुथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि पर्यूषण एक ऐसा पर्व है जिसके अंदर न भय है, न लोभ है और न लालच। विस्मय भी नहीं है, न इह लोक सुख की भावना है, न कामना है। मात्र आंतरिक शुद्धि की भावना, मनोविकार, इंद्रिय विकार से मुक्त होने की साधना है। तपे हुए दूध में जमी हुई मलाई की भावना के रूप में हमारा हृदय तैयार हो जाए। आत्मा का सबसे बड़ा शत्रु क्रोध है। आदमी सबसे ज्यादा क्रोध, मान, माया और लोभ को संभालता है। क्रोध के सद्भाव में प्रकाश की यात्रा, परमात्मा की यात्रा संभव नहीं है। आत्मदर्शन संभव नहीं है। आत्म शांति संभव नहीं है। उत्तम क्षमा का पर्व कहने आया है कि जो अभी तक किया है जिसे संभाला है उस क्रोध को समाप्त कर दो। उससे मुक्त होने का क्षण आया है। स्वभाव की प्रचंडता, वैर की मजबूत गांठ क्रोध के कारण है। यह अग्नि तुम्हारे भीतर की है। जो मात्र धुआं ही धु...
चेन्नई. एमकेबी नगर के एस एस जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा कि समय का चक्र अविराम गति से निरंतर चलता रहता है। जैसे किसी घड़े में एक एक बूंद रिसकर घड़े का पानी पूरा खत्म हो जाता है वैसे ही पल-पल करते जीवन खत्म हो रहा है। तमाम कोशिशों के बवाजूद जीवन की क्षणभंगुरता अटल है। जन्म के पश्चात मत्यु की निश्चयता नियति का एक ऐसा फैसला है जिसे स्वीकार करने के लिए हम साधन संपन्न होते हुए भी विवश हैं। याद रहे अमूल्य हीरे सदृश्य इस जीवन को हम विषय वासना, भोग विलास या प्रमाद में पड़कर यूं ही तो नहीं गंवा रहे। इस मनुष्य जीवन का सद्उपयोग हो रहा है कि नहीं या पूरी जिंदगी छलनी से पानी निकालने का कार्य तो नहीं कर रहे। साध्वी स्नेह प्रभा ने कहा कि दान तीन प्रकार के होते हैं अभयदान, सुपात्र दान और अनुकंपा दान। मरते हुए प्राणी के प्राण की रक्षा और भयभीत प्राणी को भय से रक्षा करना अभय दान है। साध्वी...
चेन्नई. अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता ने शनिवार को प्रवचन के विषय ‘सेवा भावनाÓ पर उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि जिस प्रकार इमारत निर्माण के लिए मजबूत नींव की जरूरत होती है उसी प्रकार मानव जीवन की नींव का निर्माण सेवा भावना से होती है। बच्चा जब जन्म लेता है मां-बाप के प्यार, वात्सल्य में लालन-पालन होता है। जब बड़ा होता है तो शादी के बाद पत्नी का साथ मिलता है। लेकिन इस संसार में ऐसे भी महापुरुष हुए हैं जिनको युगो-युगों से याद किया जा रहा है क्योंकि उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन की आहूति दे दी। प्रभु महावीर स्वामी कहते हैं कि परस्पर सहयोग से ही जीवन निर्माण होता है। जो दूसरों के काम नहीं आ सके वह जीवन व्यर्थ होता है। दूसरों के प्रति दया भाव नहीं हो, दूसरों के दुख को देखकर आंखें नम न हो तो जीवन बेकार है। हर इंसान को दीन-दुखियों की सेवा करनी चाहिए। उन्...