कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत धारा जैन दिवाकर दरबार में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि ने सुख विपाक सूत्र पर विवेचन करते हुवे कहा कि भगवान महावीर स्वामी सुबाहूकुमार को श्रावक के 12 व्रतों को सुना रहे थे जिसमें दसवें व्रत में कहा की छठे दिशि व्रत में जो दिशाओं की मर्यादा की है। वही यहाँ पुनः दसवें व्रत में मर्यादा करने का कहा गया है। जितनी भूमिका की मर्यादा की है उसके आगे जाकर पांच आश्रव सेवन करने का त्याग कहा है। पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण चारों दिशाओं की व विदिशा ऊपर-नीचे कुल मिलाकर 10 दिशा व विदिशा है। इनका विवेक रखना मर्यादित भूमि से बाहर की कोई वस्तु मंगाना नहीं नौकर-चाकर को भेजकर संदेश देकर मंगवाना या भिजवा ना। शब्द करके दूसरों को आकर्षित करके बाहर की वस्तु मंगवाना साथ ही अपना रूप सौंदर्य दिखाकर के हाव भावों के द्वारा बाहर की चीज वस्तु आदि को मंगाना औ...
चेन्नई. अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता ने सोमवार को प्रवचन के विषय ‘तीन लाख की तीन बात’की विवेचना करते हुए कि ब्रह्ममुहूर्त पर उठ जाना, अतिथि का सम्मान करना और क्रोध के प्रसंग पर शांत रहना ये तीन बातें जीवन में महत्वपूर्ण होती हैं। ब्रह्ममुहूर्त में सोकर उठने से मन शांत रहता है। अपने स्वभाव को छोडक़र विपरीत स्वभाव में रहना ही कलयुग है। इन्सान आज के कलयुग में कान व जुबान का कच्चा हो गया है। इसी कारण धर्म लुप्त होता जा रहा है। उन्होंने कहा, अपने जीवन में अगर संतों की जिनवाणी को उतारोगे तो जीवन का कल्याण हो जाएगा। जहां क्रोध की किलकारियां गूंजती हैं वहां सभी तरह के उपदेश व्यर्थ हो जाते हैं। क्रोध सबकुछ बर्बाद कर सकता है। प्रेम शब्द के उच्चारण मात्र से ही सुख की प्राप्ति होती है। अगर प्रेम एक इन्सान पर ही सीमित हो तो वासना, पाप बन जाता है और अगर प्रेम स...
चेन्नई : मानवता का शंखनाद करते, जन-जन के मानस को पावन बनाते, लोगों को सद्भावना का पाठ पढ़ाते, नैतिकता की शिक्षा प्रदान करते और नशामुक्त होकर सुन्दर जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान करते जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता भगवान महावीर के प्रतिनिधि महातपस्वी अखंड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ अहिंसा यात्रा लेकर भारत की राजधानी नई दिल्ली से 9 नवम्बर 2014 को प्रस्थान किया। दृढ़ इच्छा शक्ति के धनी और महान संकल्पधारी आचार्यश्री जब गतिमान हुए तो उन्होंने चार वर्षों के भारत के चैदह राज्यों सहित दो विदेशी धरा नेपाल और भूटान को भी माप लिया और उन्हें अपने ज्यातिचरण से पावन बनाया और अपनी मंगलवाणी से लोगों को मानवता का संदेश प्रदान किया। इस दौरान आचार्यश्री ने अनेक प्राकृतिक अनुकूलताओं, प्रतिकूलताओं, विपदाओं, मौसम परिवर्तन को भी समभाव से सहन किया और निरंतर गतिमान रहे। आचा...
चेन्नई. रविवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर, पुरुषावाक्कम, चेन्नई में चातुर्मासार्थ विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि महाराज एवं तीर्थेशऋषि महाराज के प्रवचन का कार्यक्रम आयोजित किया गया। उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषिजी ने आचारांग सूत्र में त्रसकाय जीवों की श्रेणी के बारे में बताया। वे जीव त्रसकाय कहलाते हैं जिन्हें पीड़ा का अनुभव हो। जो बन भी सकता है और बिगड़ भी सकता है। दो इन्द्रिय जीवों से पंचेन्द्रियों तक के जीवों में सुधरने और बिगडऩे दोनों की स्थितियां हो सकती है। जो त्रसकाय जीव अपनी पांचों इन्द्रियों का सदुपयोग करता है वह शिखर को छू सकता है, मोक्ष को आसानी से प्राप्त कर सकता है, एकलव्य के समान बन सकता है। पंचेन्द्रिय जीव स्वयं में सुधार भी ला सकता है और बिगड़ भी सकता है। जिस प्रकार दुर्योधन को सुधारने के लिए अनेक वाक्य लगे लेकिन वह द्रोपदी के मात्र एक वाक्य से बिगड़ा और परिणाम महाभारत ...
चेन्नई. ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा भाव की नाव में बैठकर साधक भवसागर से पार होता है। यात्री अपनी मंजिल प्राप्त करता है। भावनाओं से ही भव का नाश होता है। विरोधक भाव आत्मा को संसार में भटका देता है। आराधना भाव संसार सागर के पार उतार देता है। दानशील तप के साथ भावों का महत्व है। जैसी भावना हो वैसी सिद्धि मिल जाती है। दानवी, मानवी, देवी और ब्रह्म भावना क्रमश: दुर्योधन, पांडव, रामचंद्र और महावीर ने अपने जीवन में व्यक्त की। भाव मनुष्य के स्वभाव के इर्दगिर्द परिक्रमा करता है पर हमें अपने स्वभाव पर विभाव का प्रभाव नहीं होने देना है। भाव के प्रवाह में बहकर मनुष्य अपने अंतर में बसे परमात्मा को भी दूर कर देता है। ब्रह्म भावना सबसे श्रेष्ठ है। न तेरा न मेरा यह जग झूठा झमेला और इंसान अकेला। मार्केट के भावों को जानने के साथ-साथ मन के भावों को जानकर जीवन को उच्च बनाएं। साध्वी अपूर...
चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा परमात्मा के चरणों में पहुंचने पर मनुष्य का प्रत्येक कदम लाभ देने वाला होता है। तप वही कर सकते हैं जिनका मनोबल मजबूत होता है। जन्म लेने के साथ ही मानव जीव ने खाने की प्रवृत्ति शुरू की थी। ऐसे में कुछ समय तप के लिए भी निकालने की कोशिश करनी चाहिए। शरीर कब अंगूठा बता दे पता नहीं, इसलिए जब तक इन्द्रियां सही रूप में कार्य कर रही हों तभी धर्म के कार्य कर लेने चाहिए। परमात्मा की ओर कदम बढ़ाने से जो अनुभूति होती है वैसी अनुभूति करोड़ा रुपए का लाभ होने पर भी नहीं होती। दिल में धर्म जागृत होने पर आत्मा अनंत कर्मो की निर्जरा करते हुए हल्की हो जाती है इसलिए धर्म के प्रत्येक प्रवृत्ति को श्रद्धा, निष्ठा और भावनाओं के साथ कर जीवन को आनंदित करने का प्रयास करें। मनुष्य कम उम्र में भी ऐसे धर्म को अपने जीवन में स्वीकार कर सकता है। ज्यादा से ज्...
चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव, दूसरे महादेव और तीसरे रामदेव, इन तीन महापुरुषों के नाम में ही ‘देव’शब्द आता है। जब-जब धर्म की हानि होती है, महापुरुषों का अवतरण भारतभूमि पर होता है। नारी सोने की तरह है, तो पुरुष लोहे की तरह है। लोहा खुले स्थान में पड़ा रहे तो कोई खतरा नहीं किंतु सोना खुले में रहे एवं उस पर पर्दा न हो, तो लुटेरे लूट ले जाते हैं और हम अपना सिर कूटकर, फूट-फूट कर रोने लग जाते हैं। स्त्री, धन और भोजन इन तीनों को पर्दे में ही रखना चाहिए जिससे सुरक्षा बनी रहे। जिस प्रकार दही की तपेली से ढक्कन हटते ही उसे कुत्ते, बिल्ली, चूहे, कौए खराब कर देते हैं, वैसे ही नारी यदि अपने बदन का प्रदर्शन करती रहे, तो वासना के भेडि़ए उसे नष्ट करने में देर नहीं लगाते। जहां नारियों की पूजा होती है, वहां देवताओं का निवास होता है। नारी हम...
चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा सरलता धर्म है एवं वक्रता अधर्म। सीधी लकड़ी फर्नीचर बनाने के काम आती है और टेढ़ी चूल्हा जलाने के। सरल बनना अलग है और बड़ा बनना अलग। आदमी ऊपर से बड़ा बन जाता है पर अंदर से वक्र मायावी बना रहता है। रावण विद्वान था पर महाकपटी व छली था। भीतर की वक्रता को निकालना कठिन है। हमने जिंदगी को बाजार बना दिया है। एक दुकानदार का रूप दे दिया है। हर आदमी बिक रहा है। किसी का थोड़ा किसी का ज्यादा दाम है। कोई खुशामद से बिकता है, कोई पैसे से। सभी कैरियर की तरफ भाग रहे हैं। सबके मन में चालाकी, वक्रता छल कपट भरा पड़ा है। राजनीति, मायाचारी का अजब घर है। सोने के लिए भी जाएं तो छल कपट है। धुला तकिया स्वयं ले लेंगे गंदा दूसरों को देंगे। पढऩे जाएं या मंदिर जाएं तो छल कपट है। वस्तु की उपयोगिता के कारण मायाचारी होती है। उपयोगिता हटाएं तो छल...
चेन्नई. संत वही होता है जो कभी स्वार्थ के लिए नहीं परार्थ के लिए जीता है। उसका हृदय मक्खन की तरह कोमल होता है यानी दीन एवं जरूरतमदों के दुखों को देखकर वे द्रवित हो जाते थे। इसके बिलकुल विपरीत जब उन पर कष्ट आता है तो वे वज्र के समान कठोर बन जाते है। ऐसे संत दुनिया से जाने के बाद भी अपने कार्यों और गुणों से दुनिया में सदा के लिए अमर हो जाते हैं। एमकेबी नगर जैन स्थानक में श्री जैन संघ के तत्वावधान एवं साध्वी धर्मप्रभा और स्नेहप्रभा के सानिध्य में आचार्य पन्नालाल की जन्म जंयती, अन्नदानम, सामूहिक एकासना, दया और सामायिक दिवस के रूप में मनाई गई। महिला मंडल के गायन से शुरू हुए इस समारोह में स्वागत भाषण अध्यक्ष पवन तातेड़ ने दिया। इस अवसर पर साध्वी धर्मप्रभा ने कहा आचार्य पन्नालाल के हृदय में स्वस्थ समाज और आदर्श व्यक्तित्व के निर्माण की तड़प थी। वे समाज और व्यक्ति को उस बिंदु तक ले जाना चाहते थे ...
एसएस जैन संघ ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि संक्सरी क्षमापना से अप्रत्याख्यानी कषाय का जोर टालता है और अनंतानुबंधी कषाय का उदय नहीं होता है। नमामि और रजयनि ये दो शब्द जिन शासन का अर्क है। उपकारियों को नमन करना है उपकारियों को क्षमा। उपकारी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है। आज समाज में दो शक्ति की जरूरत है समझ शक्ति और सहन शक्ति ये दोनों शक्तिया घर परिवार ,समाज ,देश -राष्ट के पास में हो तो वे कभी भी दुखी नहीं होंगें। समझ शक्ति के अभाव में संघर्ष हो जाता है। जहा समझ है वहा समाधान। सहन शक्ति के अभाव में द्वेष -वैर की गाठें बन जाती है। साध्वी जी ने कहा की आज सवयं आत्मा को खमाना है। परमात्मा से क्षमा मांगनी है और जगत के सर्व जीवो को क्षमा देना भी है और क्षमा याचना मांगना भी है। श्री संघ की और से सामूहिक क्षमायाचना रखी गयी। इस अवसर पर श्री राजेश जी टपरावद तथा प्रियंका डुंगरवाल में ...
आचार्य शुभचंद्र की गुणानुवाद सभा चेन्नई. संत निराकार होता है। शुभचंद्र जहां विराजमान होते थे सभी उनके गुणों से लाभान्वित होते थे। वे सरल और वात्सल्य के प्रतीक थे। श्री अखिल भारतीय श्वेताम्बर स्नाथकवासी जयमल जैन श्रावक संघ और श्री जयमल जैन राष्ट्रीय युवक परिषद के तत्वावधान में रविवार को वेपेरी स्थित मरलेचा गार्डन में आचार्य शुभचंद्र की गुणानुवाद सभा में प्रवीणऋषि ने कहा कि आचार्य शुभचंद्र्र को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्होंने संप्रदाय से बाहर जाकर काम किया और संप्रदाय से बाहर जाकर करने वाला संत असली होता है। कोई व्यक्ति आचार्य शुभचंद्र का एक भी गुण अपने जीवन में उतार ले तो मोक्ष को प्राप्त हो जाएगा। उन्होंने समाज में अपनी विशिष्ट जगह बनाई है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती। उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेषऋषि, उपप्रवर्तक विनयमुनि, उपप्रवर्तक गौतममुनि की निश्रा में गत दिनों देवलोक गमन ह...
चेन्नई. अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता व अन्य साध्वीवृन्द के सान्निध्य में शनिवार को आचार्य शिवमुनि की 176वीं जन्म जयंती श्रद्धा व तप अभिनंदन के साथ मनाई गई। साध्वी कुमुदलता ने शिवमुनि को भावांजलि अर्पित करते हुए कहा कि मात्र 24 वर्ष की उम्र में शिवमुनि ने माता-पिता की आज्ञा से दीक्षा लेकर ज्ञान के प्याले को पी लिया। उन्होंने यौवन अवस्था में दीक्षा लेकर जिनशासन की गौरव गरिमा को बढाया। वर्ष 1987 में डॉ. शिवमुनि को युवाचार्य घोषित किया गया। 1999 में उन्हें आचार्य पद से सुशोभित किया गया। फिर श्रमण संघ दो टुकड़ों में बंट गया। आचार्य शिवमुनि ने पुरुषार्थ किया और 1300 संतों का संघ बनाया। उन्होंने कहा, आचार्य शिवमुनि की जन्म जयंती से सीख मिलती है कि आषाढ महीने में पुण्यार्जन नहीं करेंगे तो जीवनभर पश्चाताप करना पड़ेगा। जिस प्रकार पेड़ से नीचे गिरकर पत्ता धूल ...