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सत्य बोलने से तो कुछ भी नुकसान नहीं होता: मुनि संयमरत्न विजय

चेन्नई. साहुकार पेठ स्थित श्री राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा कि ज्यादा दान देने से धन कम होता है, शील का पालन करने से भोगों का वियोग होता है, तप करने से शरीर दुर्बल होता है, लेकिन सत्य बोलने से तो कुछ भी नुकसान नहीं होता। सत्य ही शिव है, सत्य ही सुंदर है, आज सत्य तो चला गया, मात्र सुंदर बनने में लगे हैं। सत्यवादी के समक्ष अग्नि शांत हो जाती है, समुद्र क्षुभित नहीं होता है, रोगों का समूह नष्ट हो जाता है। हाथियों की भयंकर श्रेणी निकट नहीं आती, सिंह शिथिल हो जाता है, सर्प भी उसके नजदीक नहीं आता तथा चोर व रणसंग्राम का भय तो तुरंत ही दूर चला जाता है। कीर्ति को कलंकित करने के लिए काजल के समान, विश्वास रूपी पृथ्वी को उखाडऩे के लिए हल के समान, अनेक प्रकार के अनर्थ रूपी वन को बढ़ाने के लिए मेघ समान, दुष्ट कार्यों की क्रीड़ा करने के लिए घर समान, सन्मान रूपी अंकुर को नष्ट करने क...

अच्छा सोचना और करना चाहिए: गौतममुनि

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा हमेशा अच्छा सोचना और करना चाहिए। जब काया से कोई भी अच्छी प्रवृति होती है तो उससे जीवन का भला और आत्मा का हित होता है। मनुष्य अपनी अज्ञानता से जीवन में दुख उत्पन्न करता है। ऐसा करके वह पूर्व भव के वैभव को भी खो देता है। लेकिन याद रहे गलत हरकत जीवन को गलत मार्ग पर पहुंचा देती है। जब तक पुण्य का उदय है तब तक कोई भी गलती करो दुख नहीं होगा, लेकिन पापों का उदय होने पर हर गलती सामने आने लगती है। गलतियों का परिणाम किसी न किसी रूप में भुगतना ही पड़ेगा, इसमे कोई माफी नहीं मिलती। जीवन को उज्ज्वल और पावन बनाने के लिए व्यक्ति की प्रत्येक प्रवृति उसके व्यवहार के अनुरूप होनी चाहिए। अगर मनुष्य अपने व्यवहार से हट कर कोई भी कार्य करता है तो उसे जीवन में दुखों का सामना करना पड़ता है। व्यवहार के अनुरूप चलने वाला मनुष्य अपने जीवन में अमृत घोलने ...

जीवन में संयम बहुत जरूरी है: आचार्य पुष्पदंत सागर

चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा संयम के अभाव में मन चंचल है। जीवन में संयम बहुत जरूरी है। प्रकृति व आध्यात्मिक व्यवस्था संयमबद्ध है तथा सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था भी संयमबद्ध है। आत्मा राग द्वेष के कीच में फंसी हुई है और विभिन्न योनियों की यात्रा जारी है। हम अंधे बने हुए हैं। जिसने भी संयम का उल्लघन किया वह दुखी हुआ है। आप सडक़ पर नियमबद्ध चलते हैं तो गिरते नहीं हैं। आपने प्रकृति का उल्लंघन किया तो प्राकृतिक प्रकोप बढ़ गया। ऋतुएं अब समय पर नहीं आती। नट रस्सी पर बैलेंस बनाकर चलता है तो गिरता नहीं है। बैलेंस बिगड़ता है तो गिर जाता है। परमात्मा व्यक्ति की तरह नहीं सिद्धांत की तरह है। जो उस सिद्धांत को मानकर जाग जाता है नियम व संयम के साथ एकमेव हो जाता है वह स्वयं परमात्मा हो जाता है। मनुष्य संयम के अनुकूल चलता है तो स्वयं की गहराई को पा लेता है...

चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत धारा : वीरेन्द्र मुनि

कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत धारा जैन दिवाकर दरबार में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि नें धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि प्रभु महावीर स्वामी 12 व्रतों का वर्णन फरमा रहे हैं। जिसमें आज ग्यारहवां प्रति पूर्ण पोषध करने का आह्वान किया है। पोषध याने आत्मा के समीप रहना आत्मा का पोषण करना हम अपने शरीर की इंद्रियों को पोषण चौबीसों घंटे करते हैं। पर कभी – कभी शरीर की ममता को छोड़कर आत्मा को पोषण करें हम भगवान महावीर के श्रावक हैं। जैन है, धर्मी है, तो हमारा कर्तव्य बनता है कि हम वर्ष भर में कम से कम एक पोषध अवश्य करें पोषध करने के लिये हमें कुछ नियमों का पालन करना होगा। पोषध के निमित से स्नान इतर सेंट माला अलंकार गहने आभूषण आदि का त्याग करना होगा। ब्रम्हचर्य का मन वचन काया से पालन करना होगा। पोषध करने के निमित्त खांडना पीटना कूटना इत्यादि सवद्यक्रिया ...

शिवमुनिजी मे विनम्रता व सरलता कुट-कुट कर भरी थी : लोकेश मुनि

सुरेश मूर्ति, वेलूर आचार्य श्री शिवमुनिजी मे विनम्रता व सरलता कुट-कुट कर भरी थी वेलूर मे आचार्य श्री शिवमुनिजी का जन्म दिवस मनाई गई यहा शाति भवन मे मगलवार को एसएस जैन सघ के तत्वाधान मे एव श्री ञ्जरूाानमुनिजी व लोकेश मुनि जी के सन्निध्य मे आचार्य श्री शिवमुनिजी का जन्म दिवस मनाया गया। इस अवसर ञ्जरूाानमुनिजी ने बताये कि आचार्य श्री शिवमुनिजी के गु ण् ाो को व णर्् ान करना असभव है। वे समता,विनम्रता एव सरलता के प्रतिमूर्ति थे। सरलता इतनी की कोई भी आये सभी के साथ वार्तालाप करते थे। वे महान कर्मयोगी, ध्यान योगी एव ́ तपस्वी थे। जवानी मे ́ ही वे तपस्या व ध्यान मे ́ लीन रहते थे। हजारो ́ लोगो को तपस्या, उपासना,सत्य एव साधना की राह दिखाए थे। आचार्य श्री शिवमुनिजी का जन्म पजाब के रानिया ́गावजो उनका ननिहाल था वहा जन्म हुआ था। उनके माता पिता छोटे उम्र से ही उन्हे ́ स ́तो ́ के सेवा मे लेकर जाते थे। उनके घ...

प्रायश्चित प्रार्थना से मिलता है और सजा या अपराध सिद्ध होने पर: प्रवीणऋषि

चेन्नई. पुरुषवाक्कम स्थित एमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि कहा प्रायश्चित प्रार्थना से मिलता है और सजा या अपराध सिद्ध हो जाने पर मिलती है। प्रायश्चित करने और देने वालों में आपसी प्रेम बना रहता है और दण्ड या सजा देने पर आपस में वैर-दुश्मनी पनपती है। इसलिए अपने किए गए पापों के लिए कभी स्वयं को अपराधी बनाकर दंड न दें बल्कि उसका प्रायश्चित करें जो आपका जन्म-जन्मांतर सुधारकर कर्मों की निर्जरा करता है। अपने सामथ्र्य को स्वीकार करने पर ही वह आपका आचरण और स्वभाव बनेगा। अपनी आत्मा के शाश्वत स्वरूप को पहचानकर उसे स्वीकार करें। क्षमापना की प्रक्रिया का पहला सूत्र है- अपनी गलतियों को स्वीकार करना, न कि स्वयं को अपराधी मानना। जो व्यक्ति स्वयं को क्षमा कर सकता है उसी में दूसरों की गलतियों को भी क्षमा करने का सामथ्र्य होता है। जिसकी अन्तरात्मा में उजाला है उसमें कभी अंधकार हो ही नहीं सकता। सजा...

दृष्टि से बदल सकती हैं सृष्टि: आचार्य श्री महाश्रमण

आदमी के जीवन में  विकास की दृष्टि होनी चाहिए| जब तक दृष्टि नहीं है और कोई दृष्टि दे दे तो दृष्टि सृष्टी में बदल सकती हैं| आदमी विकास करें, न कर सके तो मूल को तो सुरक्षित रखें, उपरोक्त विचार माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में विकास महोत्सव के अवसर पर विकास-रथ के सारथी आचार्य श्री महाश्रमण ने कहे| आचार्य श्री ने आगे फरमाया कि तेरापंथ के आध्यप्रर्वतक आचार्य श्री भिक्षु ने विरवा (पौधा) रौपा और स्वयं विकास किया एवं संघ को विकास की ओर अग्रसर किया| आचार्य श्री ने उत्तरवर्ती आचार्यों का मंगल स्मरण करते हुए कहा कि उन्होंने धर्म संघ की सुरक्षा की और धर्म संघ के विकास में योगभूत बने|   आचार्य श्री ने आगे कहा कि आज भाद्रपद शुक्ला नवमीं गुरूदेव तुलसी का पट्टोत्सव हैं, वर्षो तक आज का दिन पट्टोत्सव के रूप में मनाया गया, पर *आचार्य श्री तुलसी ने अपने पद का विसर्जन करते हुए युवाचार्य श्र...

मोक्षलक्ष्मी की प्रिय सखी है दया: संयमरत्न विजय

चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा ज्ञानियों के कथनानुसार इंद्र का जैसे ऐरावत हाथी, विष्णु का गरुड़, धनद का पुष्पक विमान, महादेव का वृषभ (नंदी), कार्तिकेय का मयूर तथा गणपति का वाहन मूषक है, वैसे ही मोक्ष मार्ग की ओर जाने के लिए दया रूपी वाहन ही सर्वश्रेष्ठ है। दया रूपी कामधेनु जो हमेशा विविध प्रकार के स्वर्ण, मोती, प्रवाल, मणि तथा धन रूपी गोमय (गोबर) को देती है। श्वेत यश रूपी दूध देती है ऐसी दया रूपी कामधेनु नष्ट न हो, इस तरह हमें उसकी रक्षा करनी चाहिए। जो बुद्धिहीन मानव प्राणियों का वध करके धर्म की इच्छा रखता है, वह मानो पश्चिम दिशा से सूर्योदय, नमक में से मिठास, सर्प के मुख में से अमृत, अमावस से चंद्र, रात्रि से दिन, लक्ष्मी के संग्रह से दीक्षा की इच्छा रखता है। भव रूपी सागर को पार करने के लिए जहाज रूप, उत्तम बुद्धि रूपी वृक्षों के स्कंद रूप तथा ...

उत्कर्ष के द्वार खोलता है संघर्ष: साध्वी धर्मप्रभा

चेन्नई. एमकेबी नगर जैन स्थानक में साध्वी धर्मप्रभा ने कहा जिंदगी में आने वाले इम्तिहानों से घबराना नहीं चाहिए। गगन में जब उजाला होने वाला होता है तब अंधकार सघन हो जाता है। सुख हमारा इंतजार कर रहा है बस एक बार दुख रूपी दरवाजे को पार करना है। संघर्षों का सामना करो परिश्रम और विवेक के बलबूते पर साधनों के अभाव में प्रतिभाएं, उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं। जीवन में संघर्ष उत्कर्ष के द्वार खोलता है। दुख और संघर्ष से ही ऊर्जा बल निर्मित होता है। साध्वी स्नेहप्रभा ने कहा सच्चा साधु वही होता है जो आत्मा, मन और इंद्रियों को साधने का प्रयत्न करता है। मोक्ष प्राप्ति के लिए संयम या भाव साधुता जरूरी है। आज तक जितने भी जीव सिद्ध, बुद्ध और मुक्त हुए हैं उन्होंने अपनी आत्मा को त्याग और वैराग्य की साधना में तल्लीन किया है तभी सुख के अधिकारी बने। कार्यक्रम का संचालन सज्जनलाल सुराना ने किया।

विकास के तीन सोपान-त्याग,वैराग,वीतराग

चेन्नई. ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा अरिहंत होने की दशा में इंसान का पहला कदम होता है अपनी ही खोज। अपनी आंखों में अपने ही अस्तित्व को निहारना। मैं कौन हूं ये चिंतन करना। राग को घटाने के लिए अनित्य भावना का माध्यम है। द्वेष को कम करने के लिए मैत्री करुणा, प्रमोद भाव है। राग में स्वार्थ है अनुकंपा में नहीं। क्रोध से द्वेष की उत्पत्ति होती है और माया से राग पैदा होता है। आध्यात्मिक विकास के तीन सोपान हैं त्याग, वैराग्य और वीतराग। त्याग से पदार्थ छूटता है और वैराग्य से ममत्व टूटता है। वीतरागता से आनंद फूटता है। जब व्यक्ति स्व का राग, जाति का राग और संप्रदाय का राग छोड़ देता है तो वीतरागी बन जाता है। साध्वी अपूर्वा ने कहा कि जहां संसार की स्मृति वहां आत्मा की विस्मृति और जहां आत्मा की स्मृति वहां संसार की विस्मृति होती है। शुद्ध सामायिक करने से भगवान की आज्ञा का पालन होत...

ध्यान स्वर्ग का सिंहासन होता है: साध्वी कुमुदलता

चेन्नई. अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता ने प्रवचन में कहा कि ध्यान स्वर्ग का सिंहासन होता है। यह नकारात्मक ऊर्जा को खत्म कर शरीर को स्वस्थ बनाने का मार्ग है। ध्यान के माध्यम से क्रोध, मान, माया, लोभ, राग-द्वेष रूपी कर्मों का क्षय कर जीवन का उद्धार करें। उन्होंने कहा, काउसग्ग चार प्रकार के होते हैं आर्तध्यान, रौद्रध्यान, सूक्ष्म धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान। भगवान महावीर ने सरल, सूक्ष्म रास्ते बताए धर्म ध्यान और सरल ध्यान करने के लिए। आप अपने सारे काम कर लें लेकिन यह नहीं भूलें कि आपकी जीवन डोर परमात्मा से जुड़ी हुई है। आर्तध्यान और रौद्रध्यान छोडक़र कर्म निर्जरा करें। साध्वी पदमकीर्ति और राजकीर्ति मन की चंचलता की विवेचना करते हुए कहा कि मन बड़ा चंचल होता है। इसका पेट कभी नहीं भरता क्योंकि इसकी आकांक्षाएं मिटती ही नहीं। जब तक मन में संतुष्टि का भाव नहीं आएग...

परमात्मा की भक्ति और प्रार्थना मनुष्य को जीवन में आगे ले जाती है: गौतममुनि

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने आचार्य शिवमुनि की 77वीं जन्म जयंती पर कहा आत्मा का ध्यान करने वाले शिवगुणवान होते हैं। परमात्मा की भक्ति और प्रार्थना मनुष्य को जीवन में हमेशा आगे ले जाती है। ऐसा करने से मनुष्य के गुणों में वृद्धि होती है। उन्होंने कहा उत्तम जिन भक्ति रूपी तप को जीवन में अपनाने के लिए हमेशा आगे रहना चाहिए। समय प्रतिकूल हो या न हो लेकिन अपने मन में निष्ठा के साथ चलने वाले काम को पूरा किए बिना नहीं रुकना चाहिए। गुरुदेवों की बातों को स्वीकार करना प्रवचन की रस वाली बात बन जाती है। परिवार में अगर तप त्याग होता है तो खुशी होती है। उन्होंने कहा कि आचार्य शिवमुनि का जीवन बहुत ही सरल था वे सरलता के मूर्ति हैं। उन्होंने कभी भी मान अभिमान की बात नहीं की। जिस प्रकार परिवार में किसी का जन्मदिन होता है तो उसे मनाने के लिए लोग कई तरह के उपक्रम कर खुशी मनाते ह...

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