Blog

जीण माता के वार्षिकोत्सव में भक्तिमय हुआ माहौल

जीण सखी मंडल की ओर से छठा वार्षिकोत्सव हाल ही में एसआरके अग्रवाल सभा भवन में जोर-शोर के साथ मनाया गया। वार्षिकोत्सव के आयोजक बसेसर लाल ने बताया कि इस आयोजन से यह एकबार फिर साबित कर दिया कि हम अपने काम में कितने भी व्यस्त क्यों न हों भगवान के संत-कीर्तण का मौका मिले सभी एक न एक बार जयकारा लगाने जरूर आ जाते हैं। भजन गायक रामावतार अग्रवाल और नीरज अग्रवाल ने जीण माता का मंगलपाठ किया है। भाजन कार्यक्रम ने लोगों को भावविभोर कर दिया। माता के जयकारें में पूरा हॉल झूम रहा था। इस मौके पर बसेसरलाल गोकुलका और उनकी पत्नी संतोष गोकुलका ने मा जीण की ज्योती प्रचंड की। दोनों ने मिलकर भजन गायक रामावतार अग्रवाल और नीरज अग्रवाल का सम्मान किया। जीण मंदिर ट्रस्ट बेंगलुरु के अध्यक्ष अनूप अग्रवाल अपनी टीम सहीत इस मौके पर मौजूद थे। इनलोगों का सम्मान महेश अग्रवाल, सुरेश अग्रवाल, संतोष गोकुलका, साक्षी अग्रवाल, मधु च...

अपनी चेतना को जानना और उसी का ध्यान करना है कायोत्सर्ग: उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि

चेन्नई. रविवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज का प्रवचन कार्यक्रम हुआ। उपाध्याय प्रवर ने जैनोलोजी प्रेक्टिल लाइफ सत्र में कायोत्सर्ग के बारे में बताया। कायोत्सर्ग किया नहीं जाता बल्कि स्थापित किया जाता है। इसका अर्थ है बोलना नहीं, सोचना नहीं, करना नहीं। मस्तिष्क जब एक्टिव होगा तो सकारात्मक या नकारात्मक कुछ ना कुछ चलता है, इन सबसे मुक्त होना कायोत्सर्ग कहते हैं। आगम में यही सूत्र है सारे कर्मों और दु:ख क्षय करने के लिए कायोत्सर्ग का विधान बताया गया है। कायोत्सर्ग चलते, बोलते, खाते हुए भी किया जा सकता है। शरीर का जो सूक्ष्म संचालन है, जो शरीर के लिए आवश्यक है उसके अलावा कोई संचालन नहीं होगा। वहां पूरा ध्यान होना चाहिए। हमारी चेतना एक समय में एक ही उपयोग में रह सकती है, एक समय में दो कार्यों को नहीं करती है। इसी को व्यवहार ...

श्रावक के बारह व्रतों में नौवां व्रत है सामायिक: महाश्रमण

चेन्नई. श्रावक अनावश्यक यात्राओं से भी बचने का प्रयास करे। श्रावक यात्राओं का अल्पीकरण कर ले। श्रावक के बारह व्रतों में नौवां व्रत है सामायिक। श्रावक एक मुहूर्त के लिए कुछ साधु के समान हो जाता है। श्रावक परिग्रह का पूर्ण त्यागी नहीं बन सकता, किन्तु परिग्रह का सीमाकरण अवश्यक कर सकता है। इसलिए श्रावक को परिग्रह का सीमाकरण करने का प्रयास करना चाहिए। श्रावक को शनिवार की सायं सात से आठ बजे के बीच सामायिक करने का प्रयास करना चाहिए। माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में आचार्य महाश्रमण ने कहा सिद्ध जीवों को छोड़ दिया जाए तो छह निकाय के समस्त जीव जन्म-मरण करने वाले हैं। सिद्धों के सिवाय सारे जीव इन्हीं छह जीव निकायों में समाविष्ट होते हैं। जीव जन्म लेता है और अपने कृत कर्मों के आधार पर मरकर नरक, तिर्यंच, मनुष्य अथवा देव गति में पैदा होता रहता है। जीव अपने कृत कर्मों के आधार पर चारों...

जीवन सार्थक तभी जब कुछ करके दिखाओ: संयमरत्न विजय

चेन्नई. इस दुनिया में आए हैं तो कुछ करके दिखाओ, कुछ बनकी दिखाओ, अपना नाम इस दुनिया में छोडक़र दिखाओ। बंद द्वार से वापस लौटने से पूर्व हमें उसे धक्का देकर खोलने की कोशिश करनी चाहिए, क्या पता द्वार के उस ओर सांकल भी न हो। साहुकारपेट स्थित राजेंद्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय व भुवनरत्न विजय के सान्निध्य में रविवारीय युवा क्रांति शिविर में ‘कोई मुझे तोड़ नहीं सकता, मैं हर चीज से लड़ सकता हूं’ विषय पर प्रवचन देते हुए कहा किसी की तरक्की को देखकर हम उससे नफरत कर सकते हैं, उसकी मजाक उड़ा सकते हैं, किंतु उसे तोड़ नहीं सकते। हम दूसरों को तोड़ते हैं, लेकिन खुद को नहीं जोड़ते, क्योंकि हम अंदर से अधूरे हैं। हमारी सच्ची ताकत किसी की उम्मीद या आत्मविश्वास को तोडऩे में नहीं, अपितु उसकी हिम्मत बनने में है। गिरकर उठना और उठकर चलना, यही क्रम है संसार का, कर्मवीर को फर्क नहीं पड़ता, किसी जीत या हार का।...

मन को बिठाने के लिए चौदह रजनु लोक भी कम: साध्वी धर्मलता

चेन्नई. मन यदि शुभ है तो मरुदेवी की तरह कल्याण मार्ग पर बढ़ सकता है और मनोबल अशुभ बना तो कालू कसाई की तरह जीवन बिगड़ जाता है। आश्चर्य की बात है कि तन को बिठाने के लिए तीन फीट जगह चाहिए और मन को बिठाने के लिए चौदह रजनु लोक भी कम पड़ रहे हैं। ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा मानव का मन सागर सदृश है। सागर पर लहरें नाचती रहती हैं और लहरों पर ही लहरों का जन्म होता है। नई-नई लहरें जन्मती एवं पुरानी लहरें विलीन होती रहती हैं। यह चक्र अनादिकाल से अनवरत चला आ रहा है। मानव मन में भी प्रतिपल विचारों की लहरें एवं भावों की तरंगें उठती रहती हंै लेकिन सागर और मानव मन में उठने वाली लहरों में एक अंतर होता है। सागर की लहरों का गुण-धर्म एक समान है जबकि मानव के भाव दो प्रकार के हैं-शुभ और अशुभ। शुभ भाव से उत्थान होता है और अशुभ भाव से पतन। यह शुभ भाव बन गए तो कर्म निर्जरा होगी और आत्मा मोक...

गुरु ही सिखाते हैं जीवन जीने की कला: साध्वी कुमुदलता

चेन्नई. गुरु ही सिखाते हैं जीवन जीने की कला। भटकते हुए किसी राही को सच्ची राह दिखाने वाला केवल गुरु ही है। अयनावरम जैन दादावाड़ी में विराजित साध्वी कुमुदलता ने कहा हमारे जीवन में गुरु का बहुत महत्व है। ढूंढऩे से ही मिलते हैं गुरु। जिनके साथ गुरु हैं उनके जीवन की गाड़ी शुरू है। साध्वी ने कहा तिर्यंच प्राणी चंडकौशिक सर्प ने जब भगवान महावीर को डसा तो उन्होंने सोचा इससे तो मेरे शरीर के अलावा मेरी आत्मा को कोई नुकसान नहीं होगा। इसी प्रकार गजसुकुमार के सर पर जलते अंगारे रखे होने पर भी वह अपनी आत्मा में लीन रहा वैसे ही खडकऋषि के शरीर से जब खाल उतारी गई तब वे भी प्रभु भक्ति में लीन रहे। यानी हर चीज अपनी लाइफ में पॉजीटिव हो तो हर कार्य मंगल हो सकता है। केसर पीली है और संतों का रंग भी पीला है। इसी प्रकार अरिष्ठनेमि भगवान ने राजुल से अप्सरा को ठोकर मार कर संयम पथ की ओर बढ़े जबकि भगवान गौतम स्वामी की ...

जीवन का उत्थान व पतन मनुष्य के हाथ में

चेन्नई. गुरु वाणी का अनुसरण करने वाले हर दुखों से मुक्त हो जाते है। संतो का समागन प्राप्त होने पर पिछे नहीं जाना चाहिए। पूरी जिंदगी मनुष्य संसार के लिए बिता दे तो जीवन का कोई लाभ नहीं मिलता है। सचमुच में जो इन बातों को समझ लेते हैं वहीं आगे जा पाते है। साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने रविवार को कहा कि आत्मा अपने सदगुणों से महान और अपनी बुराईयों से निचे गिरता है। मनुष्य को दूसरा न कोई बनाने बाला होता है और नहीं ही कोई गिराने वाला होता है। ज्ञानी कहते है जब मनुष्य सत्य की प्रवृत्तियों का आचरण करता है तो वह स्वयं ही परमात्मा के मार्ग पर चल कर जीवन में बदलाव कर लेता है। उन्होंने कहा कि जब मनुष्य किसी बुराई या गलत आचरण करता है तो अपने हाथों से ही पतन का निर्माण करता है। जीवन का उत्थान और पतन दोनों ही मनुष्य के हाथों में होता है। मनुष्य उत्थान कर जीवन से जो लाभ लेना चाहे ले ...

चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत धारा: वीरेन्द्र मुनि

कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत धारा बरस रही है, जैन दिवाकर दरबार में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि नें धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि भगवान महावीर स्वामी की स्तुति करते आर्य सुधर्मा स्वामी अपने शिष्य जंबू स्वामी से कहते हैं। हे आयुष्यमान आर्य जम्बू तुम प्रभु महावीर स्वामी के विषय में क्या जानना चाहते हो। आर्य जंबू स्वामी ने अपने गुरु देव पांचवे गणधर श्री सुधर्मा स्वामी से पूछा – अहा – देखिये जम्बू स्वामी में कितना विनय है – क्या कह रहे हैं मेरे ( अपने )गुरुदेव – आज तो हम देखते हैं गुरु को गुरु बोलते हुवे भी जीभ लड़खड़ाती है। गुरु के प्रति शिष्य का कितना विनय भाव होना चाहिये, आणाए धम्मो – गुरु की आज्ञा में ही धर्म है! गुरु कहे तो उठे बैठे आये जाये सोये , अर्थात हर कार्य के लिये गुरु की आज्ञा का पालन ही शिष्य का कर्तव्य ह...

अहंकार के मूल को समझें और इसे नष्ट करें: उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि

चेन्नई. शनिवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज का प्रवचन कार्यक्रम हुआ। उपाध्याय प्रवर ने जैनोलोजी प्रैक्टिकल लाईफ सत्र में बताया कि जन्म-जन्म के संस्कारों के कारण ही व्यक्ति की अच्छी या बुरी धारणाएं बनती है, बार-बार के जन्मों के पाप कर्मों का निर्घातन करना और फिर उसे निकालना। यदि अपने अहंकार, माया, लोभ, हिंसा और मोह को सपोर्ट न मिले तो उसे निकाला जा सकता है। कर्म चिंगारी है और इसे सपोर्ट मिलना बारूद है, इसे निष्क्रिय करने की व्यवस्था को बनाना कि वे पनप ही नहीं पाएं, इसे ही कर्मों का निर्घातक कहलाता है। परमात्मा कहते हैं कि वह पाप दृष्टि के कारण ही नकारात्मक चिंतन करता है। जिन कर्मों के कारण से नकारात्मक विचार मन में आते हैं उसके कारण को मिटाया जाए तो वह सकारात्मक बन सकता है। इसके लिए परमात्मा ने कहा है कि काया में रहते ह...

अच्छे मार्ग पर चल व्यक्ति अपने जीवन का कल्याण कर सकता है: गौतममुनि

चेन्नई. अपने जीवन में ऐसे सत्कार्य करने चाहिए, जिनसे परिवार वाले ही नहीं पूरा संसार खुश हो। इसके लिए परमात्मा के चरणों में बैठकर सच्चे मन से उनके वचन सुन कर जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए तभी जीवन सफलता की ओर बढ़ पाएगा। अच्छे मार्ग पर चल कर प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का कल्याण कर सकता है। साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा जिस दिन प्रभु का दर्शन होगा उस दिन जीवन धन्य हो जाएगा। मनुष्य चाहे तो अपने ज्ञान दर्शन से तीनों लोकों को प्रकाशित कर सकता है। भाग्यशाली मनुष्य वह होता है जो देव गुरु के चरणों में बैठकर अपनी आस्था देखने का प्रयास करता है। मनुष्य ने दूसरों के अवगुण तो बहुत देखे, अब खुद को देखने का प्रयास करना चाहिए। अब वक्त आ गया है जब खुद को देख कर अपने अवगुणों को दूर करे। यदि परमात्मा की दिव्य वाणी का अनुसरण कर ज्ञान रूपी मार्ग पर चले जो जीवन प्रकाशमय हो जाएग...

जहां कपट है वहां झझट है: साध्वी धर्मलता

चेन्नई. सरलता और कपट एक-दूसरे के विरोधी हैं। जो मन, वाणी और कर्म से एक होते हैं वे महात्मा होते हैं। जिनकी कथनी व करनी में अंतर होता है वे दुरात्मा होते हैं। झूठ और कपट में चोली-दामन का संबंध है। जहां कपट है वहां झझट है।   ताम्बरम स्थित जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा जो सत्य होता है वह सरल भी होता है और जो सरल होता है वह सत्य भी होता है। सत्य की देह में यदि सरलता का प्राण नहीं है तो वह सत्य मृत, भारभूत व अभिशाप है। सत्य शिखर है तो सरलता मार्ग। जहां मार्ग और मंजिल का मिलन होता है वहीं पर सरल-सत्य खिलता है और परमात्मा अवतरित होता है। जो सरलता बालक में बाह्य होती है वह बड़ों में नहीं।   जहां सरलता है वहां निर्भीकता है। सरल का कोई शत्रु नहीं है। वह सभी का मित्र होता है। सरल व्यक्ति त्रिभुज जैसा होता है जो समर्पित होता है। उसका जीवन खुली किताब की तरह होता है। दस धर्मों म...

श्री पाश्र्व पदमावती महापूजन का हुआ भव्य आयोजन

मुंबई,  राष्ट्र-संत महोपाध्याय ललितप्रभ सागर महाराज और डाॅ. मुनि शांतिप्रिय सागर महाराज के सान्निध्य में शांताकु्रज स्थित सवोय रेजिडंेसी के सुरेश जैन के  आवास पर श्री पाश्र्व पदमावती महापूजन का भव्य आयोजन किया गया। इस महापूजन समारोह में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने पूजा के वस्त्रों में पूजन किया। महापूजन के लाभार्थी सुरेश जैन के अनुसार घर, परिवार एवं शहर की सुख, शांति एवं समृद्धि की अभिवृद्धि के लिए आयोजित इस महापूजन समारोह में शरीक होने के लिए सैकड़ों श्रद्धालु अलसुबह सवोय रेजिडेंसी पहुँच चुके थे। श्रद्धा और भक्ति में झूमते हुए श्रद्धालुओं ने सर्वप्रथम दिव्य मंत्रोच्चार के साथ दूध, जल, चंदन, अक्षत, गंध, फल, फूल आदि से पारसनाथ भगवान और पदमावती माताजी की अष्ट प्रकारी पूजा सम्पन्न की। इस अवसर पर संतप्रवर ने चमत्कारी एवं मनवांछित पूर्ण करने वाले पदमावती माता के इकतीसे का सामूहिक संगान करवाया। जब संतप...

Skip to toolbar