चेन्नई. मंगलवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज का प्रवचन कार्यक्रम हुआ। उपाध्याय प्रवर ने जैनोलोजी प्रेक्टिल लाइफ सत्र में युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि हमारे औदारिक शरीर का निर्माण कर्मों से होता है। इसमें अनेक ऐसे स्थान होते हैं जहां से हम अपने कार्मण और तेजोशरीर के पास पहुंच सकते हैं। स्वयं के अन्तर की शक्ति का प्रवाह हमें पता होना चाहिए। हमारी ऊर्जा कहां अवरुद्ध हो रही है और कहां ओवरफ्लो है। अपने शरीर के स्पंदनों और ऊर्जा के बिंदुओं को समझने और उनसे अपनी शक्ति को बढ़ाने के प्रयोग बताए। वात, पित और कफ जैसे शरीर का होता है वैसे ही मन का भी होता है। शब्द से कल्पनाएं और कल्पनाओं से शब्द जन्मते हैं। बिना शब्द का चिंतन करें। उन्होंने अन्दर के अवरोध दूर कर अपनी प्रतिभा का जागरण कर कार्मण शरीर को निर्मल बनाने और तेजो शरी...
चारों गति में पैदा होने के कारणों का विवेचन करते हुए “धर्म का टिफिन” तैयार करने की दी प्रेरणा सुनील जी सिंघी, सदस्य, अल्पसंख्यक आयोग, भारत सरकार ने किये दर्शन, पाया पाथेय माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ठाणं सूत्र के छठे स्थान के दसवें श्लोक का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने फरमाया कि जैन धर्म में पानी को भी जीव माना गया हैं| जैसे हम सजीव है, पानी भी सजीव होता है, जब तक शस्त्र परिणत न हो जाए सामान्यतया| कच्चे पानी की एक बूंद में असंख्य जीव होते हैं| पानी में पैदा हुआ जीव, हो सकता है पृथ्वीकाय, अपकाय, तेजसकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय या त्रसकाय में से, कहीं से भी, आया हो सकता है और मर कर वापस इन किसी भी छ: जीवनिकायों में जा सकता हैं, जैसा उसका बन्धन होगा| यही नियम पृथ्वीकाय, तेजसकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय के लिए है| सम्पूर्णतया देखे तो त्रसकाय के जीव भ...
चेन्नई. ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा गुणवान व्यक्तियों को देखकर उनके प्रति प्रीति भाव और प्रमोद भाव पैदा होना चाहिए। उनके प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार एवं ह्रदय में प्रसन्नता का अनुभव होना चाहिए। जो भी हम देखते, सुनते, स्पर्श करते हैं वह हमारे स्मृति पटल पर अंकित हो जाता है। मन इतना तरल एवं संवेदनशील हैं कि वह प्रत्येक बात के संस्कार को अपने भीतर सुरक्षित कर लेता है। उसके संस्कार अपने में प्रवेश कर जाते हैं। गुण अनंत हैं। उन्हें ग्रहण करने में संतुष्ट मत बनिए। गुणीजन चन्द्रमा एवं कमल में अच्छाई देखता हैं। अवगुणी चांद में भी दाग एवं कमल में कीचड़ तलाशता है। गुणानुरागी को कहीं भी कमी नजर नहीं आती। बुराई नहीं दिखती। अवगुणी को कहीं भी अच्छाई नहीं दिखती। साध्वी ने कहा, जीवन में कैंची की तरह नहीं, सुई की तरह बनो। पुल की तरह बनो। फूल की तरह खिलो। साध्वी सुप्रतिभा ने कहा कि हमे...
वेलूर. वेलूर स्थित शांति भवन में विराजित ज्ञानमुनि ने कहा मन ही मंदिर है, मन ही पूजा एवं परमात्मा है। मन साफ व निर्मल है तो खुद परमात्मा वास करते हैं। धर्म के चार अंग दान, शील, तप एवं भावना हैं। मनुष्यों को अच्छी भावना रखना चाहिए। कभी कभी जगह अच्छी नहीं रहने पर भाव बिगड़ जाता है। भावना में कभी घटाव न करें। अच्छी जगह जैसे धर्मस्थल व मंदिरों में भावना सही रहती है। पदार्थ का भी भाव पर असर डालती है। मानवों को परमात्मा व महापुरुषों ने हमेशा सही राह दिखाई है। अगर आंखें दी हैं गुरु व परमात्मा के दर्शन करने के लिए। हाथ दिए हैं दान देने व गरीबों की सहायता व भलाई करने के लिए दिए हैं। पैर दिए हैं शुभ कार्य करने, अच्छी जगह एवं तीर्थ स्थलों में जाने के लिए। जीभ दी है तो प्रभु एवं महापुरुषों के गुण गाने व कान दिए हैं ज्ञान की बातें, गुुरुओं व महापुरुषों की वाणी एवं परमात्मा के भजन सुनने के लिए तथा नाक ...
चैन्नई माधावरम की पुण्य धरा पर* तेरापंथ धर्म संघ के ग्यारहवें आचार्य महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमणजी की मंगलमय सन्निधि में अभातेममं के 43वें राष्ट्रीय अधिवेशन का आगाज कर्तृत्व की कलम से विकास के स्वस्तिक रचने वाली राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती कुमुद कच्छारा के नेतृत्व में हुआ।सुदूर क्षेत्रों से पधारीं केसरिया परिधान में सजी बहनों ने चीफ ट्रस्टी श्रीमती सायर बेंगाणी ,राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती कुमुद कच्छारा सहित सम्पूर्ण अभातेममं टीम के साथ संकल्प रैली के रूप में पूज्य आचार्यप्रवर का मंगल पाठ श्रवण कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया और श्रद्धा अर्पण करते हुए संकल्पों को ग्रहण किया । असाधारण महाश्रमणी साध्वी प्रमुखाश्री कनकप्रभा जी ने अधिवेशन के पूर्व अपने मंगल उद्बोधन में फरमाया कि आधी दुनिया का प्रतिनिधित्व करने वाली नारी शक्ति संकल्प की डोर से बंधकर परिवार, समाज ,संस्था का विकास...
चेन्नई. जीवन में आचरण का बहुत महत्व है आचरण है तो सब कुछ है। पुस्तक से पढ़ कर विद्या मिलती है लेकिन जब उसे जीवन में उतारते है तो वह ज्ञान बन जाता है। पानी का स्वभाव ठंडा होता है लेकिन आग पर रखने पर गर्म हो जाता है। उसी प्रकार आत्मा शांत होती है पर कषाय आने पर लोभ, मोह और माया में फंस कर दुख झेलती है। साधना और तप से मनुष्य अपने दुखों से उबर सकता है। साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा देव, गुरु और धर्म जीवन के ऐसे तत्व हैं जिनसे मनुष्य अपने जीवन का उद्घार कर सकता है। इन तत्वों को समझ कर अगर मनुष्य उनके बताए मार्ग का अनुसरण करें तो जीवन सफल हो जाएगा। संयम के प्रति खुद को तैयार रखना चाहिए, क्योंकि संयम से जीवन बदला जा सकता है। इसके साथ ही ज्ञान, ध्यान और तप से जीवन को सजाने का कार्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि महापुरुषों का सानिध्य मनुष्य को नए मार्ग पर ले जाता है। धर्म ...
चेन्नई. संसार में दो तरह के पदार्थ होते हैं-एक मुख्य और दूसरा प्रथम। युद्ध संग्राम में सैनिक के लिए तलवार मुख्य है जबकि युद्ध की घोषणा करना, मस्तक पर तिलक लगाना, मंगल कामना करना प्रथम हैं। रोगी के लिए दवाई मुख्य और पथ्य प्रथम है। इलाज ले और परहेज नहीं रखे तो वह जल्दी स्वस्थ नहीं होता। वैसे ही मोक्ष के लिए यथास्थान चारित्र मुख्य है और समकित प्रथम। सम्यकत्व की नींव के बिना यथास्थान चारित्ररूपी महल प्राप्त नहीं होता। इस जगत में मिथायत्वी मनुष्य ज्यादा हैं समदृष्टि कम। दुनिया में अनेक तरह के बल इन्सान के पास हैं रूप, धन, सत्ता का बल, परन्तु ये बल स्थायी नहीं हैं। इन बलों का अंत सुखद भी हो सकता है और दुखद भी। सम्यकत्व को साध्वी ने फाइव-इन-वन बताते हुए कहा कि पांच धाराओं का नाम सम्यकत्व है सम, संवेद, निर्वेद, अनुकंपा और आस्था। मुक्ति के तीन मुसाफिर हैं सम्यकदृष्टि, श्रावक व साधु। संसार एक जेल है...
चेन्नई. जिस दान के पीछे नाम की भूख और अहंकार पुष्टि की भावना होती है वह दान नहीं अपितु सौदा और व्यापार होता है। व्यक्ति की सम्पन्नता तभी सार्थक है जब उसका एकत्रित धन किसी की उन्नति का आधार बने। जब दान बगैर शोर किये निस्वार्थ भाव से किया जाता है तभी पाप कर्म के क्षय और पुण्य कर्म में वृद्धि का निमित्त बनता है। दान और सेवा सही मायने में धर्म के दो प्रमुख स्तम्भ हैं जिनके बिना जीवन अधूरा और मूल्यहीन है। अत: जब तक जीवन में सांस चलती रहे तब तक तन मन धन से पुण्य उपार्जन और धर्माचरण में कभी पीछे नहीं हटना चाहिए। गोपालपुरम स्थित भगवान महावीर वाटिका में विराजित कपिल मुनि ने कहा भगवान महावीर द्वारा प्रतिपादित नव तत्व में पुण्य ही ऐसा तत्व है जो जीवन उपयोगी साधन और भौतिक उपकरण की प्राप्ति में सहायक होता है। पुण्यार्जन के ये नौ राजमार्ग है जिन पर चलकर कोई भी भी व्यक्ति अपने वर्तमान और भविष्य को उज्ज्व...
चेन्नई. सोमवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज का प्रवचन कार्यक्रम हुआ। उपाध्याय प्रवर ने जैनोलोजी प्रेक्टिल लाइफ सत्र में कायोत्सर्ग के बारे में बताया। कायोत्सर्ग की मुद्राएं बताई। भगवान महावीर के प्रवचन के चार प्रकार थे- स्टोरी, गणित, फिलासोपी और क्रिया। जिनाज्ञा को बिना प्रश्न किए और शंका किए बिना स्वीकार करें। जिनाज्ञा को पूर्व के सभी तीर्थंकरों ने पालन किया, वर्तमान के कर कर रहे हैं और भविष्य में भी सभी करेंगे। यह आज्ञा मानी जाती है। परमात्मा कहते हैं कि जिस समय आपका मन और शरीर पूर्णत: प्रसन्न है, आपका शरीर आपको सपोर्ट कर रहा होता है, उस समय आप साधना कर सकते हैं। ध्यान या साधना करने के समय का कोई दिशा, समय, स्थान का बंधन नहीं है। कहीं पर भी की जा सकती है। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि चार गति और ८४ लाख योनि परमात्मा ने बत...
चेन्नई. मनुष्य अपने जीवन को उज्ज्वल करना चाहता है तो संस्कारों से जुडऩे का प्रयास करे। मनुष्य कितनी ही ऊंचाई पर क्यों न चला जाए अगर संस्कार अच्छे नहीं हैं तो उसकी ऊंचाई बेकार है। अच्छे संस्कार होने पर मनुष्य जीवन को धर्म, तप और त्याग से जोड़ते हुए जीवन में सुझार लाता है। ऐसा करके ही मानव जीवन को सफल और सार्थक किया जा सकता है। साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा जब भी परमात्मा की भक्ति का अवसर मिले उसका लाभ उठा लेना चाहिए। पुण्य से मिली चीजों को कभी गंवाना नहीं बल्कि उसका पूरा लाभ लेने के लिए तत्पर रहना चाहिए। छोटे बच्चों में जब लगन होती है तो वे धर्म के क्षेत्र में बहुत आगे निकल जाते हंै। युवाओं में दिखने वाली धर्म भावना उनके बचपन के संस्कार दर्शाती है। इस लिए बचपन से ही बच्चों को धर्म संस्कारों से भावित करना चाहिए। बच्चे जब धर्म ध्यान से जुड़ कर गुरु भ...
तमिलनाडु: चेन्नई महानगर के माधावरम में चतुर्मास प्रवास कर रहे अहिंसा यात्रा प्रणेता महातपस्वी शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सोमवार को ‘महाश्रमण समवसरण’ से अपनी अमृतमयी वाणी से उपस्थित श्रद्धालुओं को पावन अभिसिंचन प्रदान करते हुए कहा कि जैन दर्शन आत्मवादी और पुनर्जन्मवादी दर्शन है। जैन दर्शन में आत्मवाद का सिद्धांत है। दो प्रकार की विचारधाराएं होती हैं-आस्तिक विचारधारा और नास्तिक विचारधारा। आस्तिक विचारधारा, आत्मा, पुनर्जन्म, मोक्ष और पाप-पुण्य का फल, नरक-स्वर्ग इन विषयों में विश्वास व्यक्त किया गया है, इन विषयों का वर्णन भी किया गया है। नास्तिक विचारधारा पुनर्जन्म को न मानना, आत्मा को नहीं मानना, स्वर्ग-नरक, मोक्ष आदि न मानने वाले और आत्मा के शाश्वत अस्तित्व को नकारना नास्तिक विचारधारा होती है। नास्तिक विचारधारा में तो विशेष रूप से कुछ भी करणीय शेष नहीं रहता है, क्योंकि जब आत्मा का अस्...
बोरीवली में आयोजित हुआ सत्संग और प्रवचन मुंबई। राष्ट्र-संत चन्द्रप्रभ महाराज ने कहा कि हम अपने भोजन, भाषा, भेष और भावनाओं को अच्छा बनाएं। भोजन को ठीक करने की सीख देते हुए उन्होंने कहा कि कुछ लोग खाने के लिए जीते हैं तो कुछ लोग जीने के लिए खाते हैं। स्वाद के लिए खाना पाप है, जीने के लिए खाना बुद्धिमानी है और संयम जीवन जीने के लिए खाना साधना है। अगर हम घर का बना हुआ खाना खाएंगे तो ज्यादा स्वस्थ रहेंगे और बाजार का खाएंगे तो पेट भी बर्बाद होगा और बीमारियाँ भी फ्री में आएंगी। अगर कोई रसोइयों के हाथों का खाना पाँच दिन लगातार खा ले तो वह गारन्टेड बीमार पड़ेगा। हम हितकारी, सीमित और ऋतु अनुसार भोजन लें। मिठाइयाँ और तली हुई चीजों को सप्ताह में अधिकतम एक बार लें। चुटकी लेते हुए संतश्री ने कहा कि हमारा पेट क्रबिस्तान थोड़े ही है जो आए जैसा डालते जाएं। संतश्री मां मांगल्य भवन, योगी नगर सर्कल के पास, मेटर...