Blog

मन की स्थिरता और शांति के ध्यान आवश्यक: साध्वी महाप्रज्ञा

चेन्नई. मन को स्थिर और शांत बनाने के लिए ध्यान की आवश्यकता है। जहां संसार के कार्यों में मन लगता है, उसी मन को प्रभु भक्ति में लगाकर धार्मिक कार्यों में संलग्न करेंगे तो परमात्मा से मिलन हो जाएगा। जीवन चेतना दर्पण की तरह होनी चाहिए। दर्पण सदा रिक्त रहता है, उस पर स्थायी तस्वीर नहीं बनती। प्रतिबिंब हटते ही दर्पण शून्य हो जाता है। अयनावरम स्थित दादावाड़ी में विराजित साध्वी महाप्रज्ञा ने कहा मन बड़ा चंचल होता है। मन इतना चंचल होता है कि इस पल यहां तो अगले पल किसी दूसरी जगह चला जाता है। एक अलग ही दुनिया में घूमकर आ जाता है। संसार में व्यक्ति मन के वशीभूत ही रहता है जिसके कारण उसे दुखों का सामना करना पड़ता है। व्यक्ति अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के कारण इतना दुखी नहीं है जितना मन के कारण है। मन हमेशा इस खोज में लगा रहता है कि दूसरा मुझसे बेहतर और खुश क्यों है। साध्वी राजकीर्ति ने कहा पुण्य की प्...

सपनों के पीछे परिवार को न भूलें: संयमरत्न विजयजी

चेन्नई. हम सपनों के पीछे परिवार को समय नहीं दे पा रहे हैं। जिंदगी के अंत में वे पल ही मायने रखते हैं जो हमने अपने परिवार या मित्र के साथ गुजारे हैं। राजेन्द्र भवन में मुनि संयमरत्न विजयजी व भुवनरत्न विजय युवा क्रांति शिविर में ‘सपनों के चक्कर में जीना भूल गए’ विषय पर प्रवचन दिया। मुनिद्वय ने कहा जिंदगी गुजर जाने के बाद परिवार याद आए तो वह  व्यर्थ है। पहले हमारी जिंदगी बीतती थी और आज वो भागती है। पहले हम पूरे मोहल्ले को जानते थे,लेकिन आज हमें यह भी पता नहीं कि दो घर छोडक़र कौन रहता है? पहले हम थोड़े में ही बहुत ज्यादा खुश रहते थे लेकिन आज बहुत ज्यादा होने पर भी हम खुश नहीं रह पाते। इस तरह से जीते हुए यदि हम हमारे सपने को पूरा कर भी लेते हैं तो हमारे साथ खुशियां बांटने वाला कोई नहीं होगा। कार्य और जिंदगी के बैलेंस को समझने की कोशिश करना चाहिए। लेकिन दोनों में से किसे महत्व देना यह हम पर निर्भ...

चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत रस

कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत रस की सरिता बह रही है, जैन दिवाकर दरबार में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि नें धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि मुनि श्री ने वीरस्तुति की तीसरी गाथा का विवेचन करते हुए कहा कि – भगवान महावीर स्वामी संसारी जीवों के कर्मों से होने वाले दुखों को जानते थे। इसलिये प्रभु ने उपदेश दिया कि अपने – अपने कर्मों की वजह से जो दुख आते हैं। उनको दूर करने के लिये धर्म की आराधना करने का मार्ग बताया ! प्रभु महावीर स्वामी स्वयं ने कर्मों को भुगता है ! कहा – ” काने खिला ठोक्या , पावे रांधी खीर, कर्मों ने बहू दुख दिया, चौबीसमा महावीर ” ! अर्थात भगवान के कानों में खिले ठोकें गये और ध्यान साधना में जंगल में खड़े थे, तब व्यापारियों ने अपनी भूख मिटाने के लिये अंधेरे में भगवान के पावों को जमीन पर गड़े पत्थर समझ कर चुल्...

चिंतन दो प्रकार के होते है: साध्वी धर्मलता

चेन्नई. ताम्बरम विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा की व्यक्ति का चिंतन दो प्रकार के होते है। हम अपने बारे में क्या चाहते है वह पहला पक्ष है और दुसरो के बारे क्या चाहते है वह दूसरा पक्ष है लोग हमेशा अपने बारे में सोचते है। मेरा भला कैसे हो दुसरो के बारे में बहुत कम लोग सोचते है। मनुष्य का जीवन तभी सफल है जब वह अभिमान त्याग कर सभी जीवो के सुख के बारे में सोचे संसार जितना सुन्दर दीखता है। हम अपनी आत्मा को साधना के माध्यम से उतना ही सुन्दर बना सकते है। कोई आपसे प्रेम, ईर्ष्या, घृणा व भेदभाव करे उससे भी प्राणी को प्यार करना चाहिए। सुख दो प्रकार के होते है। एक इंद्री जन्य तो दूसरा आत्मिक जन्य इन्द्रियों का सुख सच्चा सुख नहीं है और आत्मिक सुख अविनाशी है।

मुनियों से सीखें महाव्रत और संयम

पुदुचेरी. मुनि सौम्यसागर ने कहा कि कर्म की निर्जरा करने के लिए कभी मत सोचो। हर पल अपने कार्य में ही ध्यान दो। मुनियों से महाव्रत और संयम सीखो। मरण और मरता की तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि मरण तो संयम से जुड़ा है जैसे साधु का होता है। मरता का मतलब तो साधारण मरण से है जो कि बिना संयम- व्रत से है। जब अटूट श्रद्धा हमारे मन में बैठ जाती है तभी बड़ी से बड़ी मुश्किल भी पल भर में लुप्त होती दिखती है। मुनि अरिजीत सागर ने विनय भावना को विस्तार से बताते हुए कहा कि भक्ति में जितना झुकोगे उतना ही आगे बढ़ोगे। इस संदर्भ में उन्होंने रावण का दृष्टांत बताया। जिसमें विनय भाव के कारण राम,रावण से भी विद्या सीखते है।

तीर्थंकर बनने की पहली शर्त है, नई शुरुआत : उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि

चेन्नई. शनिवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज का प्रवचन कार्यक्रम हुआ। उपाध्याय प्रवर ने सामायिक सूत्र में बताया कि लोगस्स के पाठ में तीर्थंकर परमात्मा के बारे में बताया। लोगस्स का पाठ और नमुत्थणं का पाठ दोनों में ही तीर्थंकर की स्तुति है। तीर्थंकर का व्यक्तित्व, सामथ्र्य और अस्तित्व का सुंदर चित्रण है। अपने जीवन में सफल, समाधान व संतुष्ट रहना हो तो नमुत्थण का पाठ उनके लिए आदर्श है। धर्म ही तीर्थंकर है। जीवन में जितनी समस्याएं आती है सब अधर्म के कारण। कर्म की समस्याओं का समाधान व्यक्ति करने का प्रयास करता है लेकिन बिना धर्म के वह समस्या बन जाती है। जीवन में धर्म का तीर्थ बनाना बहुत कठिन है। जहां से समस्या का समाधान मिलता है उसे तीर्थ और जहां समाधान समस्या में बदल जाए उसे अनर्थ और व्यर्थ कहते हैं। संसार की पूरी सस्याओं से...

अहिंसा एक पीयूष हैं : आचार्य श्री महाश्रमण

माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में फ्यूरेख और आचार्य श्री महाश्रमण चातुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित *“विश्व शांति प्रार्थना“* समारोह में विभिन्न धर्मों से आये हुए धर्म गुरूओं, अनुयायीयों को संबोधित करते हुए विश्व शांति के पुरोधा पुरुष आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा कि आज के इस समारोह में विभिन्न धर्मों के, विभिन्न व्यक्तित्व पहुंचे हैं| भारत एक ऐसा देश हैं, जहां कितने-कितने धर्म, सम्प्रदाय हैं, कितने संत या धर्मों से जुड़े हुए लोग हैं| *भारत के पास धर्मगुरु संपदा भी है और भारत के पास धर्म ग्रन्थ संपदा भी हैं|*    आचार्य श्री ने आगे फरमाया कि धर्मगुरु अपने अपने अनुयायीयों को अहिंसा का संस्कार बताते रहे, ईमानदारी की बात बताते रहे| नशा मुक्ति शराब, सिगरेट, बीड़ी, गुटका, खैनी आदि नशीले पदार्थों से लोग बचे रहे|   आचार्य श्री ने आगे फरमा...

चिंतन करने से जीवन में होगा प्रकाश

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने शुक्रवार को कहा सेवा धर्म मनुष्य के लिए सुखों के मार्ग का निर्माण करता है। ऐसे मौके आने पर खुद को हमेशा आगे रखना चाहिए। इन मार्गो पर चलने से माता पिता, गुरु और परमात्मा भी प्रसंन्न हो जाते है। उन्होंने कहा जीवन को धन्य बनाने के लिए सेवा धर्म करना ही चाहिए। अंधकार रूपी जीवन से बाहर निकलने के लिए धर्म के कार्य बहुत ही लाभदाई होते है। बिना भेद भाव से किया हुआ सेवा कभी निष्फल नहीं जाता। प्रत्येक मानव जाति को मन में ऐसे पावन विचार रखकर जीवन को परम पावन बनाने का प्रयास करना चाहिए। सेवा के प्रभाव से जीवन के बड़े से बड़े कष्ट भी दूर हो जाते है। लेकिन इस क्षेत्र में मनुष्य को किसी प्रकार का मोह और छलकपट नहीं करना चाहिए, अन्यथा जीवन का पतन संभव है। जब भी मौका मिले तो दिल से सेवा करनी चाहिए। सागरमुनि ने कहा कि समय के महत्व को जानने वाला मन...

भीतर में शक्ति केन्द्र को जागृत करती है जप साधना : कपिल मुनि

चेन्नई: यहाँ गोपालपुरम स्थित भगवान महावीर वाटिका में श्री कपिल मुनि जी म.सा. ने शुक्रवार को अपने प्रवचन के दौरान कहा कि नवरात्री के पवित्र दिन शक्ति उपासना और आराधना का अनुपम अवसर है । अपने व्यक्तित्व को तेजोमय और शक्तिशाली बनाने की साधना करने के लिए काल की दृष्टि से इन दिनों का ख़ास महत्त्व है । इस संसार में जीने के लिए शक्तिशाली बनना बेहद जरुरी है । क्योंकि यहाँ वही जीवित रह सकता है जिस में संघर्षों से जूझने की ताकत है । बेचारा शक्ति विहीन व्यक्ति का तो अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है । अनंत शक्तिमान तीर्थंकर परमात्मा की श्रद्धापूर्ण भक्ति स्तुति के रूप में लोगस्स, उवसग्गहर स्तोत्र, वज्रपंजर स्तोत्र आदि का जाप भी हमारे भीतर शक्ति केंद्र को जागृत करता है जिसके सहारे हम अपने आपको स्वस्थ,सुरक्षित और आत्म निर्भर बना सकते हैं और गुणियों की स्तुति से नमस्कार पुण्य का लाभ भी अर्जित कर सकते हैं ज...

मोक्ष प्राप्ति में सहायक हैं – औदारिक शरीर : आचार्य श्री महाश्रमण

तेजस और कार्मण शरीर हैं संसारी आत्मा के सच्चे मित्र   साध्वी प्रमुखाश्री ने कहा नहीं करे पाण्डित्य का अभिमान माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ठाणं सूत्र के छठे स्थान के ग्यारहवें श्लोक के तीसरे विभाग का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा कि सर्व जीवों को शरीर के आधार पर छ: विभागों में बांटा गया हैं| शरीर क्या है?  जिसका क्षरण होता है, जो गलता है, सड़ता है और जो सुख दुःख के अनुभव का साधन हैं| शरीर पांच होते हैं| पर यह नियम मात्र औदारिक शरीर पर ही लागू होता है, बाकी पर लागू नही होता| साता – असाता का अनुभव शरीर को होता हैं| आचार्य श्री ने आगे फरमाया कि शरीर आत्मा से जुड़ा हुआ हैं| पांचों शरीर का अपना – अपना स्वभाव हैं| औदारिक शरीर में रहने वाली आत्मा ही केवलज्ञान को प्राप्त कर मोक्षगामी बन सकती हैं| औदारिक शरीर में हाड, मांस होता है, पर यह सब पर लागू ...

लोभ, माया और अहंकार होंगे तीर्थंकर शरण से दूर: उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि

16 अक्टूबर से आयंबिल ओली की आराधना चेन्नई. शुक्रवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज का प्रवचन कार्यक्रम हुआ। उपाध्याय प्रवर ने जैनोलोजी प्रेक्टिल लाइफ सत्र में युवाओं को अपने अन्तर की शक्ति को जागृत करने के लिए सामायिक सूत्र के प्रयोग बताते हुए कहा कि हम जो भी तप करते हैं, अखंडित करें। यदि मन में विकार आ भी जाए तो उसे भंग न करें। जब आपका नियम पालन अखिंडित होगा तो आपका प्रत्येक कर्म धर्म में परिवर्तित हो जाएगा। प्रत्येक कर्म परमात्मा के स्मरण के साथ करें कि अपने मन, वचन, काया तीनों से आपनी आत्मा को अलग करके कर रहे हैं। जैसे-जैसे साधना होती जाएगी उच्चता को प्राप्त होती जाएगी। सामायिक करते हुए हम सावध्य को रोकते हैं और बुरे विचारों को ग्रहण नहीं करते और स्वयं की शक्ति का संचयन करते हैं। परमात्मा ऐसा समर्थ बनने का कहते हैं कि...

शक्ति का संचय और नकारात्मकता को रोकना है सामायिक: उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि

16 अक्टूबर से आयंबिल ओली की आराधना चेन्नई. गुरुवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज का प्रवचन कार्यक्रम हुआ। उपाध्याय प्रवर ने जैनोलोजी प्रेक्टिल लाइफ सत्र में युवाओं को अपने अन्तर की शक्ति को जागृत करने के लिए सामायिक सूत्र के प्रयोग बताए। उन्होंने कहा कि सामायिक करने से हमारे अन्तर के यूनिक सिस्टम को सही और उसके प्राकृतिक स्वभाव में लाया जा सकता है। सामायिक या ध्यान करने से तन, मन और आत्मा स्वस्थ रहती है। जब तक तन-मन में थकान अनुभव न हो तब तक चलते रहें अपना कार्य करते रहें। यदि अन्तर के मूल प्रवाह के साथ यदि हम छेडख़ानी करेंगे तो इसके दुष्प्रभाव हमारे सामने आएंगे। आचारांग सूत्र में कहा गया है कि मन, वचन, काया से किसी का बुरा न करना और न ही कराना। मन के सोचने से कार्य संपादित और प्रभावित होते हैं। जब किसी के लिए अच्छा सोचत...

Skip to toolbar