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कुछ न मिलने के कारण अपने मन की शांति न गंवाएं : उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि

जरूरत पडऩे पर पराये नही, अपने ही काम आते हैं कल उत्तराध्ययन का भव्य वरघोड़ा निकाला जाएगा चेन्नई. मंगलवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज का प्रवचन कार्यक्रम हुआ। उपाध्याय प्रवर ने आचारांग सूत्र में बताया कि द्रुपद और द्रोण का प्रसंग बताते हुए कहा कि बिना सम्मान को चोट पहुंचे केवल दो ही जगहों से मिल सकता है, एक तो परमात्मा और दूसरा मित्र से। हमें जो भी प्राप्त हुआ है वह इस संसार से ही हमें प्राप्त हुआ है, अच्छा-बुरा सभी कुछ। जिन दु:खों से हम स्वयं दु:खी होते हैं, वैसे कष्ट किसी अन्य को न मिले ऐसा प्रयत्न करने वाला व्यक्ति सम्यक आत्मा होता है और जो ऐसा नहीं सोचता वह शैतान बनता है। जब व्यक्ति सामथ्र्य होते हुए भी दूसरों के काम नहीं आता है तो उसकी सारी शालीनताएं बेकार हो जाती हैं, जिस प्रकार द्रोणाचार्य एकलव्य को शिष्य बना सक...

अध्यात्म की साधना में दो आयाम: महाश्रमण

माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ठाणं सूत्र के छठे स्थान के पन्द्रहवें सूत्र का विवेचन करते हुए धर्मसभा में आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा कि संवर छ: प्रकार का प्रज्ञप्त हैं| अध्यात्म की साधना में दो आयाम हैं- संवर और निर्जरा| संवर वह तत्व है, जो नये सिरे से कर्मों के आगमन को रोकता हैं| निर्जरा वह तत्व है, जो पहले से आये हुए कर्म हैं, उनको बाहर निकालता हैं, तोड़ता हैं, क्षीण करता है, नष्ट करता हैं| जैसे एक हॉल हैं, सभागार हैं, कमरा है, उसकी सफाई के लिए एक बार दरवाजा बन्द करके अन्दर के कचरे को इकठ्ठा करके बाहर निकाल कर सफाई करते हैं, यानि नये सिरे से बाहर से रजे आये नही, भीतर की है, उनको बाहर निकाल दिया| तो भले थोड़े काल के लिए, संवर भी हुआ और निर्जरा भी हुई| त्याग करने से व्रत संवर होता निष्पन्न आचार्य श्री ने आगे फरमाया कि हमारी आत्मा में जो कर्म है, अब नये सिरे से कर्मो...

चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत रस की सरिता: वीरेन्द्र मुनि

कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत रस की सरिता बह रही है, जैन दिवाकर दरबार में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि नें आज वीर स्तुति की तीसरी गाथा पर धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि आर्य सुधर्मा स्वामी के जंबू स्वामी के प्रश्न उत्तर फरमा रहे थे। कल खेदज्ञ के विषय बताया था – अब आगे सुने क्षेत्रज्ञ क्षेत्र – आकाश इसके दो प्रकार है ( 1 ) लोकाकाश ( 2 ) आलोकाकाश है। आयुष्यमान जम्बू भगवान दोनों प्रकारके आकाश द्रव्य को जानते थे लोका काश में रहे हुवे धर्म , अधर्म जीव काल और पुदगल के अनंत समूह को भी जानते थे , और आत्म रूप स्वक्षेत्र को जानने वाले होने से क्षेत्रज्ञ कहलाये। कुशल भगवान आठ प्रकार के कर्म रूपी तिरवे कुश को काटने में कुशल थे ,उसी तरह धर्मोपदेश देकर के कर्म निर्जरा के उपाय बता कर भव्य जीवो के कर्म को दूर करने में भी कुशल थे। महेशी – महर्षि ...

मूल्यवान शब्दों का हो व्यापार : आचार्य श्री महाश्रमण

समयानुकूल, अर्थात्मक, हितकारी भाषा बोलने की दी पावन प्रेरणा शब्द हमारे ज्ञान का बड़ा माध्यम बनते हैं| कोई वक्ता बोलता है, तो हम सुनते है, शब्द कान में पड़ते हैं, तब हम बात को, फिर समझते हैं, ग्रहण करते हैं, जानते हैं, उसके अनुसार आचरण भी कर सकते हैं, उपरोक्त विचार माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ठाणं सूत्र के छठे स्थान के चौवदहवें सूत्र मे छ: इन्द्रियों का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहे| आचार्य श्री ने आगे फरमाया कि शब्द का अपना महत्व हैं| हम बोलते हैं, दूसरे सुनते है| दूसरे बोलते हैं, हम सुनते हैं| हम खुद बोलते हैं, खुद ही सुन लेते हैं| वक्ता स्वयं बोलता हैं, वक्ता अपने व्यक्तव्य को सुन भी रहा हैं| बोलते समय भी सुनता हैं और बाद में संग्रहीत हो जाता हैं, कैसेट, टेप आदि में रेकॉर्ड हो जाता है, उसको बाद में भी वक्ता अपने भाषण को ...

भक्ति में लीन रहने से सारे उपसर्ग लुप्त हो जाते है: मुनि सौम्यसागर

पुदुचेरी. मुनि सौम्यसागर ने कहा कि जीवन में अनेक विपदाएं आती है जिसके निवारण के लिए हम लगातार कोशिश करते रहते है। आचार्य मातुंग की तरह भक्ति में लीन रहने हेतु सारे उपसर्ग अपने आप ही लुप्त हो जाते है। अडिग भक्ति का जीता जागता उदाहरण है मांतुगाचरित्र।कोई भी परेशानी जीवन में आये तो मात्र 48 बार पहला काव्य का जाप कर लें,बस पल भर में सारी परेशानियां भाग खड़ी होती दिखाई पड़ती है।   अरिजीत सागर ने इस अवसर पर कहा कि जो भी आठ अंगों के साथ धर्म अध्ययन की शुरुआत करते हैं उन्हें शब्दाचार, अर्थाचार, उव्याचार, बहुमानाचार, विनायाचार और कालाचार, उपधानाचार, निन्हवाहचार का ध्यान रखना चाहिए। हमे दिन में तीन बार सामायिक करना चाहिए। इन आठ अंगों के साथ शास्त्र का अध्ययन करने से ही तीर्थंकर पद्धति का बंध होता है।

प्रशंसा से बचने का प्रयास करें, निन्दा से नहीं: उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि

आयंबिल ओली की तप–आराधना आज से चेन्नई. सोमवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज का प्रवचन कार्यक्रम हुआ। उपाध्याय प्रवर ने आचारांग सूत्र में बताया कि प्रमाद ही सबसे बड़ा पाप है। एक पल की भूल से सालों की मेहनत बेकार हो जाती है। प्रमादी व्यक्ति हर समय भयग्रस्त रहता है। भरत चक्रवर्ती द्वारा पूछने पर ऋषभदेव परमात्मा कहते हैं कि इस धर्मसभा के दरवाजे पर जो मरीची है वह भावी तीर्थंकर बनेगा जिसने साधुचर्या छोड़ दी, संयम छोड़ दिया वह वासुदेव, तीर्थंकर और चक्रवर्ती भी बनेगा। ठाणं सूत्र में चार प्रकार के व्यक्ति कहे गए हैं– एक जो साधु का वेश छोड़ देता है लेकिन धर्म नहीं छोड़ता। दूसरा जो धर्म छोड़ देता है लेकिन साधु का वेश नहीं छोड़ता और तीसरा दोनों को छोड़ देता है और चौथा जो इन दोनों को नहीं छोड़ता। इन चारों में सबसे सर्वश्र...

पुण्य के बिना मनुष्य को देव दर्शन नहीं: गौतममुनि

चेन्नई. मनुष्य द्वारा किए गए कई भवों में पुण्य के बाद ही उसे एक संत का दर्शन मिलता है। पुण्य के बिना मनुष्य को देव गुरु के दर्शन नहीं होते। साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक  गौतममुनि ने सोमवार को कहा कि देव गुरु को देखकर मन में प्रसन्नता और दिल में खुशी मिलती तो समझो जीवन सफलता की ओर बढ़ रहा है। श्रेणिक अगर मुनियों को देखकर प्रभावित होते है तो उनकी भावना उत्तम होती है। गुरु भगवंतों को देख कर श्रावकों का मन खुश हो जाना चाहिए। महापुरुषों का व्यक्तित्व सामने वाले मनुष्य को प्रभावित कर देने वाला होता है। उन्होंने कहा कि जब भी ऐसा अवसर मिले तो दुनिया के हर काम छोडक़र दर्शन के लिए तत्पर रहना चाहिए। उनके सेवा और भक्ति का आनंद लेना चाहिए। संतों का कार्य लोगों को धर्म से जोडऩे का होता है। महापुरुष चले जाते है लेकिन उनकी भावनाए हमेशा साथ होती है। यह कार्य तभी संभव होगा जब मनुष्य सदगुणों से भ...

क्लेश का कारण कटु वचन: साध्वी धर्मलता

चेन्नई. समाज, घर और परिवार में क्लेश का कारण कटु वचन है। कुरुपता को बदला जा सकता है। श्याम वर्ण को कितनी ही क्रीम लगाकर सफेद नहीं किया जा सकता पर कठोर वाणी को अच्छा करके ही सुदंर, पवित्र बन सकते है। एसएस जैन संघ ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि वाणी का सदुपयोग सत्य, मधुर और हितकर बोलना है। सत्य बोलने से वाणी जीवंत हो जाती है। उसका प्रभाव अमोघ बन जाता है। ऐसे वचन बोलना चाहिए जो सभी को प्रिय हो। अप्रिय, कटु तीक्ष्ण वचन बोलने से हिंसा और विवाद हो सकता है। माधुर्य वचन का रस है। विग्रह बढ़ाने और मर्मघाती वाणी का प्रयोग न करे। बोलने के पहले विचार जरुरी है। बिना विचारे शब्दों का प्रयोग और शस्त्रों का प्रयोग मत करो। तीर कमान से, बात जुबान से और प्राण शरीर से निकलने के बाद वापस आने वाले नहीं है। साध्वी सुप्रतिभा ने कहा कि दुनिया में दो चाजे प्रसिद्ध है मां की ममता और साधु की समता। मां श...

युवा, शक्ति का करे सदुपयोग : आचार्य श्री महाश्रमण

युवामनीषी, युवाओं के सरताज, करूणा निधान, तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमणजी ने युवा शक्ति को विशेष प्रेरणा पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि युवाओं में ज्ञान का विकास हो, तत्वज्ञ रहने का प्रयास करें| दूसरी बात छोटी तुच्छ बातों को लेकर के कभी मन मुटाव का भाव न हो|  बात हो तो मिल बैठ कर खत्म कर दे, आपस में गांठ क्यों बांधे? जबकि एकजुटता बनी रहे और ऐसा भी नहीं कि यह अलग गुट, ऐसे आपस में गुट-गुट नहीं, एकजुटता बनी रहे, तो शक्ति अच्छी रह सकती हैं| आचार्य श्री ने आगे फरमाया कि शनिवार की सामायिक अपने परिवार, परिवारों में भी जितनी हो सके, अनुकूलता बैठे, ये क्रम अच्छा चलता रहना चाहिए| अपना व्यक्तिगत जीवन है, इसमें प्रमाणिकता, ईमानदारी रहे| जो भी काम करे, कोई भी काम करे, कार्य क्षेत्र अलग हो सकते हैं, संभव हो सके उसमें ईमानदारी, प्रमाणिकता रखे। जीवन मे अपने नैतिक मूल्य भी बने रहे औ...

क्षमापना से एक कदम आगे बढ़ें, प्रेम की ओर: उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि

चेन्नई. रविवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज का प्रवचन कार्यक्रम हुआ। उपाध्याय प्रवर ने आज श्रेणिक चरित्र का समापन करते हुए बताया कि श्रेणिक की भावना धर्म करने की थी वैसा आचरण व संयम स्वयं नहीं कर पाया लेकिन जो लोग भौतिक कारणों से धर्म नहीं कर पाए उनके लिए अपनी सारी समृद्धि समर्पित कर दी और तीर्थंकर नामकर्म का बंध किया। ऐसे समय में श्रेणिक ने परमात्मा के सानिध्य में तीर्थंकर नामकर्म का बंध किया जब उसका नरक का बंध हो चुका था। लेकिन अपने अंतिम समय में श्रेणिक ने अच्छे भावों को न समझ पाने की नकारात्मकता के कारण कृष्ण लेश्या का बंध किया। श्रेणिक आने वाली चौबीसी में पद्मनाभ बनेगा। श्रेणिक अपने मन में भगवान महावीर को स्वयं के हृदय में बसा लिया था और पूरी तरह तल्लीन हो गया। इसी के कारण वे पूरी तरह भगवान महावीर की प्रतिलिपी हों...

चिंतामणि रत्न के समान हैं दुर्लभ मनुष्य भव : आचार्य श्री महाश्रमण

माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में  दादा दादी “चित्त समाधि शिविर” के संभागीयों को समाधि प्रदाता आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा कि आदमी पहले बच्चा होता हैं, कभी वह पड़पोता था, कभी पोता था, कभी पिता बनता हैं और आज वह दादा बन गया| दादा यानि जीवन का लगभग आधा समय चला गया| दादा के नीचे दो सीढ़ियां हैं, पुत्र और पौत्र| दादा तभी, जब पोता हैं आचार्य श्री ने आगे कहा कि दादा तीन पीढ़ियों का मालिक हैं, जैसे तीन मंजिला मकान| दादा पोते की जोड़ी होती हैं| कभी-कभी पोते की बात दादा मान लेता हैं, पर दादा तभी है, जब पोता हैं| आचार्य श्री ने आगे कहा कि दादा पोते की ओर ध्यान दे, कि उसमें कैसे सद् संस्कारों का बीजारोपण हो? यह भी ध्यान दे कि 70 के बाद चित्त समाधि कैसे रहे? 80-85 की उम्र में तो मन में शांति रहे| परिवार के लोग भी ध्यान रखे कि अगर वे असमाधि हैं, तो भी उन्हें सहन करे, उनक...

अहिंसा, करुणा, दया से युक्त ही धर्म है: साध्वी धर्मलता

चेन्नई. जो दुर्गति में गिरती हुई आत्मा को बचाए वही धर्म है। जो अहिंसा, करुणा, दया से युक्त है वही धर्म है। आज के युग में हर व्यक्ति सफल और लोकप्रिय होना चाहता है। लोकप्रियता दो प्रकार से होती है कुख्यात और विख्यात। प्रसिद्धि भी दो प्रकार की होती है स्थायी और दीर्घकालीन। स्थायी प्रसिद्धि के लिए स्वभाव उदार होना चाहिए एवं मुख पर प्रसन्नता व मुस्कान होनी चाहिए। ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा संसार में प्रत्येक प्राणी अपने कर्मों के अनुसार ही सुख और दुख भोगता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो सुकाल में भी दुष्काल का दुख भोगते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जो अकाल में भी सभी तरह से संपन्न होते हैं। दुष्काल के दुख के ताप का अनुभव नहीं हो पाता है। उन्होंने कहा यह शरीर धर्म साधना के लिए प्राप्त हुआ है। पानी जिस प्रकार मछली के लिए प्राण है, वैसे ही धर्म मनुष्य का प्राण है। समय, शक्ति और समझ ये तीनो...

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