उत्तराध्ययन सूत्र का भव्य वरघोड़ा आज 19 अक्टूबल से उत्तराध्ययन आराधना चेन्नई. बुधवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज का प्रवचन कार्यक्रम हुआ। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि जो जीव मंजिल प्राप्त करना चाहता है, स्वयं को शांति और उन्नति के शिखर पर पहुंचाने की तड़प लिए रहता है उसे भवि जीव कहा गया है और जो जीव केवल रास्तों पर ही चलते रहना चाहता है, वह अपनी मंजिल प्राप्त करना नहीं चाहता वह अभवि जीव कहलाता है। ऐसे अभवि जीवों को जीवन में दूसरों को बोझा उठाना पड़ता है। वह सोचता है कि समस्याओं का समाधान है ही नहीं, यह जीवन समस्याओं, कष्टों और बिना टेंशन के हो ही नहीं सकता। वह कभी सोच नहीं सकता है स्वयं भी परमात्मा बना जा सकता है, कोई सदाचारी भी हो सकता है। ऐसे जीवों की सोच कभी बदलती नहीं है। परमात्मा कहते हैं कि जो धर्म को भोग, सत...
इन्द्रिय विजय की साधना, अध्यात्म की एक बहुत ही महत्वपूर्ण साधना होती हैं| व्यक्ति पांचों इंद्रियों एवं मन का संवरण करने का प्रयास करें| अनावश्यक इन्द्रियों का व्यापार न करे, प्रवृत्ति न करे| प्रवृत्ति करनी अपेक्षित हो तो राग द्वेष का भाव न आये, ऐसा प्रयास करना चाहिए, उपरोक्त विचार माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ठाणं सूत्र के छठे स्थान के 16वें सूत्र का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहे| इन्द्रियों का संवरण, कल्याण की दिशा में सहायक आचार्य श्री ने आगे कहा कि यह तो मुश्किल है कि कान में शब्द पड़े ही नहीं, यह असत्यता है कि आँख रूप देखे ही नहीं, नाक में गंध आये ही नहीं, जिह्वा पर पदार्थ आये ही नहीं, त्वचा में स्पर्श हो ही नहीं, यह कठिन बाते हैं| परन्तु उसमें राग द्वेष नहीं करे, अनासक्त रहें| यह इन्द्रियों का संवरण करने से कल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं| आश...
चेन्नई. गोपालपुरम स्थित भगवान महावीर वाटिका में विराजित कपिल मुनि के सान्निध्य व श्री जैन संघ गोपालपुरम के तत्वावधान में भगवान महावीर स्वामी के 2544वें निर्वाण कल्याणक के उपलक्ष्य में शुक्रवार से 21 दिवसीय श्रुतज्ञान गंगा महोत्सव का आयोजन किया जाएगा। इस दौरान भगवान महावीर की अंतिम देशना उत्तराध्ययन सूत्र का वाचन और विवेचन किया जाएगा। कपिल मुनि ने इस सूत्र की महिमा बताते हुए कहा यह पवित्र सूत्र संपूर्ण जैन आगम साहित्य का प्रतिनिधि शास्त्र है। इसमें भगवान महावीर ने अपने निर्वाण से कुछ समय पहले जो देशना दी उसका संकलन है। इसका श्रवण करने से ज्ञानावर्णीय कर्म के क्षय होने के साथ बुद्धि निर्मल और विचारों का परिष्कार होता है। प्रतिवर्ष निर्वाण उत्सव पर उत्तराध्ययन सूत्र के वाचन की जिनशासन में एक परंपरा प्रचलित है। संघ के अध्यक्ष अमरचंद छाजेड़ ने बताया श्रुतज्ञान गंगा महोत्सव में बड़ी संख्या में ...
चेन्नई. आत्मा भी सिद्ध पद की साधना से मोक्ष की ओर बहने लगती है। लेकिन जब इंसान में सरलता नहीं है, बाहर कुछ अंदर कुछ है तो सिद्ध पद की साधना नहीं हो सकती है। सिद्ध में जो शक्ति है वह शक्ति हर भव में है। एसएस जैन संघ ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि नवकार महामंत्र का द्वितीय पद भगवान की साधना करना है। जो व्यक्ति सरल बन जाता है वो तरल बन जाता है। ठोस वस्तु एक जगह पड़ी रह जाता है। तरल पदार्थ बहाव की दिशा में बह जाता है। हमारी शक्ति बादलों में ढंके सूर्य के समान है। सिद्धों का हम पर अनंत उपकार है। जैसे अंगारा लाल होता है और घास के ढेर को जला कर राख कर देता है वैसे ही सिद्ध पद के लाल वर्ण हमारे कर्मों को जलाकर राख कर देता है। साध्वी सुप्रतिभा ने कहा कि संसार में दो प्रकार के प्राणी होते हैं। जीवों का शरीर होता है तो समस्या भी साथ रहती है। जिनवाणी मोक्ष प्राप्ति का रास्ता है। जिसके ब...
चेन्नई. भक्त तो प्रतिकूलता में भी अनुकूलता का अनुभव करता है। परमात्मा सर्वकालिक है। सच्चा साधक कभी भी निज आत्म का अनुभव कर सकता है। कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि स्वर्णकार सोने से आभूषण बनाता है , मूर्तिकार मिट्टी से मूर्ति बनाता है और चित्रकार रंगों से चित्र प्रकट करता है। साधक तपस्वी साधना से परमात्मा को प्रकट करता है। सच्चा परमात्म प्रेम प्रकट हो जाए तो वह अपनी आत्मा को जान जाता है। परमात्मा की गरिमा- महिमा को जान जाता है। तुम्हारी नवरात्रि की साधना में प्राणी के प्रति प्रेम बढ़े तो साधना सार्थक है नहीं तो समझना समय व्यर्थ गंवाया है। जिसे जीवन में आगे बढऩा है वो पहले अनीति से नीति में और फिर अतिनीति में आए। विवेक से बनाई गई नीति जीवन में सफलता का कारण है। सांसारिक नीति से उठकर धर्मनीति में आना सम्यक है। संप्रदायों ने आदमी को संकुचित बना दिया है। धन अ...
चेन्नई. जीवन में कभी भी अभिमान नहीं करना चाहिए। किसी भी चीज के लिए अगर अभिमान किया तो उसे टूटने में समय नहीं लगता है। साहुकारपेट जैन भवन में उपप्रवर्तक विनयमुनि ने नवपद आयंबिल आराधना के दूसरे दिन बुधवार को कहा कि श्रीपाल और मैना सुंदरी का चारित्र चल रहा है। इसे ध्यान से सुनना चाहिए और अपने जीवन में बदलाव करने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा जीवन में जो लिखा है वही होगा अपने से सुख और दुख नहीं लाया जा सकता है। प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन की स्थिति पर विचार करना चाहिए। इस बात पर विशेष चिंतन करने की जरूरत है कि मनुष्य की पहचान उसके गुणों से हो रही है या उसके पिता के नाम से उसे जाना जा रहा है। उन्होंने कहा कि मीठे वचनों का प्रयोग कर मनुष्य अपने जीवन को सुखमय बना सकता है। सागरमुनि ने कहा कि अगर मनुष्य एक दिशा को जान ले तो वह सभी दिशाओं को जान लेगा। आगे बढऩे के लिए सबसे पहले मार्ग जानने की ज...
चेन्नई. साहुकार पेठ स्थित राजेन्द्र भवन में आचार्य जयन्तसेनसूरि के शिष्य मुनि संयमरत्न विजय ने कहा कि अष्टकर्म के क्षय होते ही अष्टगुण प्राप्त होते हैं। ज्ञानावरणीय कर्म के क्षय से अनंत ज्ञान गुण। दर्शनावरणीय कर्म के क्षय होते ही अनंत दर्शन गुण। वेदनीय कर्म के क्षय होते ही अव्याबाध गुण। मोहनीय कर्म के क्षय से चारित्र गुण। आयुष्य कर्म के क्षय से अक्षय स्थिति गुण। नाम कर्म के क्षय से अरूपी निरंजन गुण। गौत्रकर्म के क्षय से अगुरुलघु गुण और वीर्यांतराय के क्षय से अनंत वीर्य गुण प्रकट होता है। सिद्ध पद प्राप्त करने के इच्छुक साधक जहाँ भी जाता है, घुलमिल कर रहता है। सबसे मैत्रीभाव रखता है, सरलता से जीवनयापन करता है। जो जीव सीधा होता है, वही सिद्धशिला की ओर जाता है, टेढ़ा चलने वाला बीच रास्ते में ही भटक जाता। सीधा चलने वाला अपना घर यानि सिद्ध गति को प्राप्त हो जाता है। छोटा बालक जैसे माया से रहित...
बालयोगी मुनिश्री प्रिंसकुमारजी ने किया सबसे छोटी उम्र में मासखमण तप आज रात्रि 8 बजे से उनके तप की अनुमोदना में होगा संगीत संध्या का आयोजन परम पूज्य आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सानिध्य में चेन्नै में उनके सुशिष्य बालयोगी मुनिश्री प्रिंसकुमारजी ने सबसे छोटी उम्र में मासखमण तप किया है। जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के अब तक के इतिहास में यह एक कीर्तिमान है। 8 दिसंबर 2004 को जन्मे मुनिश्री प्रिंसकुमारजी ने इससे पूर्व अठाई और पन्द्रह की तपस्या भी सबसे छोटी उम्र में की थी। आज (17 अक्टूबर 2018 को) उनके 30 की तपस्या है। आज रात्रि 8:00 बजे से महाश्रमण समवसरण में उनके तप की अनुमोदना में संगीत संध्या का आयोजन किया गया है, जिसमें मुनिवृन्द उनके अभिनन्दन में स्वरचित गीतों को भी प्रस्तुति देंगे। आप सभी महानुभाव संगीत सन्ध्या में सादर आमंत्रित हैं। 🙏🏻 निवेदक *आचार्यश्री महाश्रमण चातुर्मास प्रवास व्यव...
चेन्नई. मनुष्य की श्रद्धा श्रीपाल और मैना सुंदरी की तरह होनी चाहिए। अरिहंत आराधना द्वारा कषायों का ज्वर उतरता है। इससे विषयों की वासना शांत होती है और कर्मरूपी कीचड़ साफ होने लगता है। एसएस जैन संघ ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि गुणों से युक्त मनुष्य अरिहंत पद को प्राप्त करते हैं। नवपद में दो देव तीन शुक्ल चार पद धर्म के हैं। इसमें भी मंत्र, तंत्र और यंत्र का समावेश हो जाता है। उन्होंने कहा कि ग्वाला पशुओं का देखेरेख कर संरक्षण करता है, जो कि इस जन्म का ही रक्षक होता है। भटकते हुए जीव को सही रास्ता बताने वाले अरिहंत प्रभु का वर्ण श्वेत कहा गया है, जो कि शुभता का प्रतीक है। इस पद के सात अक्षरों के जाप से पचास सागरोपम के नरक के दुख दूर हो जाते हैं। साध्वी सुप्रतिभा ने कहा जीवन में जो महत्व श्वास का है वही महत्व विश्वास का है। ताकत ना तो भगवान में होती है और न ही भक्त में होती है...
चेन्नई. राजेन्द्र भवन में विराजित संयमरत्न विजय ने मंगलवार को सिद्धचक्र नवपद ओली आराधना के प्रथम दिन अरिहंत परमात्मा के 12 गुणों का आध्यात्मिक वर्णन किया। उन्होंने कहा अशोक वृक्ष मनुष्य को शोकमुक्त रहने की प्रेरणा देता है। इससे तन-मन व जीवन में शोक का आगमन नहीं होता। पुष्प वृष्टि मनुष्य को सदा हंसते रहने की प्रेरणा देती हैै। दिव्य ध्वनि मनुष्य को अपनी वाणी को मधुर बनाने का संकेत देता है। स्वर्ण सिंहासन मनुष्य को स्थिर रहने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि जिस मनुष्य की काया एक स्थान पर स्थिर हो जाती है वह जहां बैठता है उसका आसन ही सिंहासन बन जाता है। उन्होंने कहा सिद्धचक्र में प्रवेश पाने वालों का भवचक्र शीघ्र समाप्त हो जाता है। यह चक्र मनुष्य को संसार चक्र से मुक्त करने का कार्य करता है।
चेन्नई. नवपद की आराधना करने से जीवन सफल होता है। जीवन को सफल बनाना है तो मीठे वचनों का प्रयोग करें। नवपद की महिमा से जीवन सफल हो जाता है। साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक विनयमुनि ने नवपद आयंबिल आराधना के पहले दिन मंगलवार को कहा कि जीवन को अगर सफल बनाना है तो मनुष्य को आयंबिल तप करने का प्रयास करना चाहिए। इस तप के करने से जीवन के सभी दुख और मन का खारापन दूर हो जाता है। उन्होंने कहा जप और तप के साथ अगर नवपद का जाप किया जाए तो मन शुद्ध हो जाता है। सागर मुनि ने कहा कि परमात्मा ने अपने आचरण से उपदेश देकर शांति का मार्ग गठित किया है। जीवन को सफल बनाने के लिए पुरुषार्थ करना बहुत ही जरुरी होता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जन्म पाना बहुत ही दुर्लभ है। जन्म पाने के बाद उसे सफल बनाने के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए। जो मानव जीवन में श्रमण करते है वे ज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ते है। धर्म के आ...
चेन्नई. साधु और गुरु इस देश की आध्यात्मिक अभिभावक है। साधक भक्त या शिष्य कभी बड़ा नहीं होता। हमेशा बालक ही रहता है। इसलिए भगवान की वाणी को जिनवाणी मां कहा गया है। उस शिष्य की प्यास कभी पूरी नहीं होती जो मानसिक रूप से शरणागत है। कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि प्रेम में दोष दिखाई नहीं देते। यदि दिखाई दिए तो उनको दूर करने के बदले सेवा का भाव होता है। यही प्रेम है। आप किसी के प्रेम, श्रद्धा में दोष खोजते हो। प्रेम में विरक्ति नहीं आती आसक्ति आती है। प्रेम में तीन चीजें नहीं होती दूरी, देरी और दुराव। प्रेम पल में प्रकट हो जाता है। प्रेम वर्तमान में जीता है। प्रेम में दुख भी सुख जैसा लगता है। परम प्रेम का फल है परमात्मा। प्रेम कभी घटता नहीं और उसमें कभी सूखापन नहीं आता। प्रेम में कभी भय नहीं होता।