चेन्नई. अयानावरम स्थित जैन दादावाड़ी में विराजित साध्वी कुमुदलताने कहा आचार्य जैन धर्म पर आचरण करना सिखाते हैं। फूलों की खुशबू की तरह ही उपाध्याय प्रवर और संतों का जीवन होता है जो हमेशा फूल की तरह खिला रहता है। धर्म संघ में उपाध्याय प्रवर ज्ञान की खुशबू देकर जीवन पवित्र बनाते हैं। वे जीवन से अज्ञान और मिथ्या की परत हटाने और जीवन में दीपक जलाने का कार्य करते हैं। धर्मसंघ में ज्ञान का दीपक जलाते हैं। प्रकृति हरी भरी है तो जीवन सुदंर और सरल और पवित्र रहेगा। हरे-भरे वातावरण में रहने से व्यक्ति स्वस्थ्य रहता है। हरियाली में रहने से जीवन कांतिमय और हरा-भरा रहता है। साध्वी पद्मकीर्ति ने श्रीपाल रस के माध्यम से श्रीपाल और मैना सुदंरी का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा सच्ची श्रद्धा और विश्वास से व्यक्ति असंभव कार्य को भी संभव बना सकता है। गुरु दिवाकर कमला युवा संघ के सदस्यों ने सभी श्रावकों को जय जिने...
चेन्नई. शनिवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल,पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवंतीर्थेशऋषि महाराज ने उत्तराध्ययन सूत्र का वाचन कराया। वर्धमान शरणं पवज्जामी उच्चारण के साथ धर्मसभा कीशुरुआत हुई। उन्होंने कहा कि परमात्मा को जानना हो तोउनके धर्म और उनके धीरज को जानें। अपने संकटों को बड़ान मानें, अपने गुरु, परमात्मा को बड़ा मानें। जिसने संकट बड़ामान लिया उसकी पराजय उसी समय हो गई। परमात्मा कीशक्ति अनन्न्त है। इस एहसास के साथ जो चलता है उसेसंकट भी शक्ति देकर जाते हैं और यह हम पर निर्भर करताहै। जब हम ग्रहण करने के लिए एक ही रास्ते पर निर्भर रहते हैंतो परेशान होते हैं। मुंह की अपेक्षा रोम छिद्रों से लियाजानेवाले वाला आहार शत प्रतिशत शरीर के काम आता है।चाहे कितनी ही आहार की आवश्यकता हो यदि मर्यादा केअनुसार आहार नहीं मिले तो ग्रहण नहीं करना चाहिए। जोअपनी मर्यादा के लिए कुर्बान रहता है...
चेन्नई. श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज शुक्रवार ने उत्तराध्ययन सूत्र का वाचन करते हुए बताया कि सुधर्मास्वामी भगवान के साथ अपने पलों को याद करते हुए कहते हैं कि परमात्मा को जानना हो तो उनके ज्ञान, दर्शन, शील के साथ धीरज को भी जानना आवश्यक है। परमात्मा कहते हैं कि अपने आत्मस्वरूप को पहचानने के लिए विनय की आराधना कर लो, बिना विनय के स्वाध्याय और तप से अहंकार और क्रोध आते हैं। विनयशील के लिए सभी श्राप वरदान बन जाते हैं। परमात्मा अपनी अनुत्तरदेशना में सबसे पहले विनय का वरदान बरसाते हैं। तप, स्वाध्याय, ध्यान सहज है लेकिन विनय बहुत मुश्किल है। अविनयशील व्यक्ति के ध्यान, ज्ञान और तप से विनाश होता है। परमात्मा ने कहा है कि विनय नम्रता, जीवनशैली और समर्पण की कला व अहोभाव है, यह चापलूसी नहीं। विनयशील स्वयं की भगवत्ता को जाग्रत ...
कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत रस की सरिता बह रही है, जैन दिवाकर दरबार में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि नें आज दशहरे रामजी के लंका पर विजय का वर्णन करते हुए कहा कि रावण ने एक गलती कि वह यह कि सीता मैय्या का अपहरण करके ले आया जिसके कारण आज लाखो वर्ष हो गये हर वर्ष आज के दिन रावण का दहन होता आया है। रावण सर्व शक्तिमान था कोई उसे क्या मार सकता परंतु उसके काम ने उसे मार गिराया उसकी आज्ञा का पालन चांद सूरज ग्रह नक्षत्र तारे सभी करते थे। सीता को लाने का पाप उसने सीता मैय्या को लाकर के अशोक वाटिका में रख करके रोजाना पास जाकर के रानी बनने के लिये कहता था। सीता के न मानने पर रावण ने राम का वेश बनाकर भी कोशिश की पर सीता के सामने जाते वैसे ही कामवासना समाप्त हो जाती थी। ऐसे थे राम – जहां राम वहां काम नहीं जहां काम वहां राम नहीं। आखिर आज ही के दिन राम लक्ष्मण ...
साधु मार्ग को बताया परम् सुख पाने का तीव्र गति का मार्ग आज विजयादशमी का पर्व हैं, विजय प्राप्ति का दिन हैं| हम अपनी आत्मा पर विजय पाये| जो आत्मा को जीत लेता हैं, वह परम् विजयी होता हैं, उपरोक्त विचार माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहें| पटाखों से होता पर्यावरण प्रदूषित आचार्य श्री ने आगे फरमाया कि भगवान महावीर के पिछले भव देखे, कितनी साधना की, तब महावीर के भव में कैवल्य प्राप्त हुआ| महावीर एक महान् धर्म प्रवर्तक एवं मार्गदर्शक थे| भगवान महावीर के निर्वाण दिवस को दीपावली पर्व के रूप में मनाते हैं| उस दिन फटाखें छोड़ते हैं, जिससे हिंसा होती हैं, पर्यावरण भी प्रदूषित होता हैं| उसमें संयम हो, फटाखें छोड़ने का प्रत्याख्यान करे| दीपावली का पर्व भगवान महावीर के जप अनुष्ठान से मनाएं| ठाणं सूत्र के छठे स्थान के अठारहवें सूत्...
मन का स्वभाव पानी जैसा है, हमेशा नीचे की ओर ही जाता है। उसे वासना की गटर ही अच्छी लगती है। अगर पानी को ऊपर ले जाना हो तो मशीन की सहायता लेनी पड़ती है। उसी प्रकार मन को ऊपर ले जाना हो तो तप, त्याग और संयम की आवश्यकता होती है। गाय को कहा जाता है? नदी को मां क्यों कहा जाता है? गाय के मल मूत्र में औषधि के गुण है, जो रक्षा करती है। वह मां है गाय को प्रदाता और संस्कृति का रक्षक माना जाता है। यह धरती को हरा-भरा रखती है, सब की प्यास बुझा आती है। पानी मां की तरह परोपकारी है, सबका मदद करती है। साधु तपस्वी होते हैं, सूक्ष्म शक्ति जागरण के बीज हैं। उपाध्याय अंकुर है, आचार्य पर्प है। निर्वाण को प्राप्त शुद्ध आत्मा है। मनुष्य के जीवन में कितने उत्तल पुथल आते हैं कितने बवंडर आते हैं, ये सब अपने ही किए कर्मों का परिणाम है। लेकिन इनको दूर करने के उपाय हैं। जिनका तप, त्याग, साधना का संकल्प होता है वही परमात...
भगवन बनने की कोशिश में गुरुदेव अरिजित सागरजी प्रवचन क्रम को आगे बढ़ाते हुए आज कहते हैं कि अंतरंग तप का सीधा मतलब है आत्मा को तपाना। दूसरे अर्थ में कहे तोआत्मा का शोदन करना ही अंतरंग तप है। इस संधर्भ का सीधा मतलब प्रायश्चित से है। जिसमे हमसे किये हुए दोषों को अपने गुरु के पास जाकर, दोषों को बताकर प्रायश्चित लेना है। किये हुए दोषों को अपने से पृथक करना ही अंतरंग तप है। मोक्ष मार्ग में रहते हुए गलती कर बैठते हैं। जिसकी वज़ह से अंदर एक ठीस रह जाती है। उस कारण चित्त विशुद्ध नहीं हो पाता। परिणाम स्वरुप किसी भी धर्म कार्य में मन नहीं लगता है। आगे शुभ और अशुभ की तुलना कर बताते हैं कि जिस धर्म क्रिया को करने के बाद ख़ुशी मिलती है तो वह शुभ कार्य है। गुरुदेव और रौशनी डालते हुए कहते हैं गलती करने के बाद मन गलती मान लें तो आत्मा साफ हो जाती है।इससे आत्मा का बचाव होता है। गुरुदेव आगे स्पष्टता प्रदान करते ...
कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत रस की सरिता बह रही है, जैन दिवाकर दरबार में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि नें आली जी की तीसरे दिन के प्रवचन में कहा कि श्रीपाल मैना सुंदरी गुरुदेव के सामने वाणी श्रवण कर रहे थे। गुरुदेव ने कहा कि नवपद की आराधना आयंबिल की विधि के साथ करो जिससे सब अच्छा होता है! साल में दो बार चैत्र और आसोज में सप्तमी से पूनम तक 9 दिन तप और जप करने से आनंद होता है! इस महामंत्र के जाप से रोग शोक दुख दारिद्र आधि व्याधि और उपाधि एवं भूत प्रेत डाकनी साकिनी आदि सब दूर होते हैं, जो अपुत्रियां अर्थात जिसके संतान नहीं है उसके संतान हो जाती है। जिसके पास धन नहीं है तो वह भी धनवान हो जाता है। रुका हुआ कार्य भी बन जाता है। ऐसी शक्ति है इस महामंत्र में, उसी समय गुरुदेव के दर्शन करने के लिये एक श्रावक आये, तो उन्हें इशारा किया ये साधर्मी भाई को तप जप साधना...
श्रेष्ठ और अनुशासित शिविरार्थीयों को किया सम्मानित परमाराध्य आचार्य प्रवर के मंगल सान्निध्य में, जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संस्कार निर्माण शिविर के अंतिम दिन सुश्री प्रिशा संकलेचा, रचित सिंघी को श्रेष्ठ शिविरार्थी एवं सिद्धार्थ सेठिया, सुश्री जया सुराणा को अनुशासित शिविरार्थीके रूप में एवं उसके और अन्य 10 – 10 संस्कारी बालक बालिकाओंको महासभा उपाध्यक्ष श्री ज्ञानचन्द आंचलिया, चातुर्मास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री धरमचन्द लूंकड़ ने सम्मानित किया| अष्टदिवसीय चले इस शिविर में संयोजक श्री महेन्द्र सेठिया, सहसंयोजिका श्रीमती नीता गादिया के साथ चातुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति, तेयुप चेन्नई, देश के विभिन्न क्षेत्रों से आये प्रशिक्षक, प्रशिक्षिकाओं का योगदान रहा| महासभा द्वारा सभी को सम्मानित किया| https://youtu.be/Prg7egDrokI आचार्य प्रवर ने शिविरार्थीयों को ...
गुरुवर श्री 108 अरिजीत सागरजी की मंगल देशना की प्रमुख बातें: पुंनः स्मरण कराते हुए पूज्य गुरुदेव बता रहे हैं भगवान बनने की प्रक्रिया में तप की महत्वकांशा आवश्यक है। चर्चा में अनशन तप की बात को पुंनः दोहराते हुए उसी क्रम में आज अमोधर्य तप का उल्लेख कर रहे हैं। जिसके बारे में समझाते हैं कि भूख से कम खाना ही अमोधर्य तप है। उपवास रखना आसान है परंतु भूख से कम खाना मुश्किल है। बढ़ते हुए रस परित्याग का जिक्र करते हैं।जिसमें आहार के वक़्त कोई एक रस का त्याग करना होता है। आगे इस संधर्भ में अखेले रहने का अभ्यास करने के बारे में कह रहे हैं। हम किसी के सहारे नहीं रहे।इस सोच को हम हमेशा ही दिल में रखें।तभी हम सहजता से जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। आगे कायक्लेश के बारे में ज्ञान देते हुए कहते है वस्तु के होते हुए वस्तु की कीमत नहीं होती है। इस विषय में साधुओं के बारे में बता रहें हैं। दिगंबर साधुओं की मनोस्ति...
नदी जब अपने किनारों की मर्यादा में रहती है। सिंचाई का काम करती है और मानवता के लिए वरदान बनती है लेकिन जब वही नदी मर्यादा तोड़कर विकराल रूप लेती है वहीं विनाश का कारण बनती है। इसी प्रकार जब मानव मर्यादा में रहता है तो स्वयं का कल्याण करता है और के लिए भी कल्याणकारी होता है। उक्त विचार राष्ट्रसंत कमलमुनि कमलेश ने अहिंसा भवन में तपस्वी राज श्री सुमित प्रकाश जी मार साहब की जन्म जयंती पर अहिंसा भवन में धर्म सभा को संबोधित करते कहा कि मर्यादा ही अपने आप में सबसे महान धर्म है। मर्यादा सामान्य मानव को भी महामानव के रूप में परिवर्तित कर देती है। मुनि कमलेश ने कहा कि जितने में विश्व के महापुरुष हुए हैं सभी मर्यादा का पालन करके बने हैं। मर्यादा का उल्लंघन करना महाविनाश को खुला निमंत्रण देना है। मर्यादा पालन के बिना किसी भी में धर्म में प्रवेश नहीं है। मर्यादा अपने आप में धर्म है और मोक्ष का मार्ग है...
कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत रस की सरिता बह रही है, जैन दिवाकर दरबार में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि नें धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि आज ओली जी का दूसरा दिन है और नवपद महिमा की गौरव गाथा का वर्णन चल रहा है। श्रीपाल राजा की बात करते हुए कहा कि बालक श्रीपाल अपनी मां के साथ कोढ़ीयों के साथ रहते हुवे श्रीपाल के भी शरीर में भी कुष्ठ रोग हो गया था। यह देखकर माँ घबरा गई बच्चे का शरीर कैसे निरोग हो चिंतित हो गई और सोचा कहीं से दवा मिल जाये तो लेकर आउँ। उसके लिये बच्चे को उन कोढ़ीयो के हाथों में सौंपकर के दवाई की खोज में चल पड़ी। गांव गांव में खोज रही थी पर कहीं पर भी सही दवा नहीं मिल पा रही थी। इधर महीनों बरस बीतते जा रहे थे कुष्टी लोग भी घूमते घूमते उज्जैनी नगरी के पास पहुंच गये थे। उस समय वहां पर पऊपाल राजा थे न्यायनीति वाले थे। उनके दो रानियां थी पटर...