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सत्य की खोज के मार्ग पर मैत्री की भावना रखें : उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि

  चेन्नई. रविवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज का उत्तराध्ययन सूत्र वाचन कार्यक्रम हुआ। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि श्रुत देवता जिनेश्वर परमात्मा द्वारा प्रदत्त होते हैं। सभी देवी-देवता अपना-अपना आयुष्य लेकर चलते हैं, लेकिन श्रुतदेव परमात्मा के तीर्थंकर नामकर्म के पुण्य से उत्पन्न हैं। इनके साथ तीर्थंकर की आराधना करने वाला साधना के शिखर को छूता ही है। रथरूपी जीवन के दो पहिए श्रद्धा और संयम है और जो परमात्मा के बताए मार्ग से अलग शॉर्टकट रास्तों पर चलता है वह अपनी श्रद्धा और संयम को खो बैठता है। उसकी भावना होने पर भी वह साधना मार्ग पर आगे बढ़ नहीं पाता और बाद में इन्हें याद कर दु:खी होता है। क्षण मात्र के सुख के लिए अपनी आत्मा गंवाने वाले के लिए वस्तुएं और सत्ता, संपदा काम नहीं आती है। जिसने मकान में रहते हुए नया मकान न...

मनुष्य रुपी वृक्ष में छ: फलों को जीवन में आत्मसात करने की दी प्रेरणा: आचार्य श्री महाश्रमण

  चेन्नई मनुष्य हमारी सृष्टि का विशिष्ट प्राणी हैं| इसमें सबसे कम संख्या गर्भज मनुष्यों की हैं| *मनुष्यों में भी सबसे कम संख्या पुरुषों की है,* स्त्रियां पुरुषों से 27 गुणा अधिक हो सकती हैं| उपरोक्त विचार माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ठाणं सूत्र के छठे स्थान के बीसवें श्लोक का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहे| आचार्य श्री ने आगे कहा कि मनुष्य ही साधना करके केवलज्ञान प्राप्त कर सकता हैं, *सिद्ध, बुद्ध, मुक्त बन सकता हैं|* इसलिए मनुष्य जन्म दुर्लभ हैं, महत्वपूर्ण हैं| मनुष्य जन्म वृक्ष हैं| वृक्ष है, तो फल लगने ही चाहिए| *जिस वृक्ष पर फल नहीं लगता, तो उसकी उपयोगिता नहीं रहती,* उसी तरह मनुष्य रूपी वृक्ष के छ: फल लगने चाहिए| हम मानव हैं, जिसे दुर्लभ जन्म बताया गया हैं, पर *वर्तमान में हमें प्राप्त हैं, सुलभ हैं| इस मानव जीवन का हम लाभ उठाये|* हमारे जीवन ...

मानव जीवन का उठाएं पूरा लाभ: आचार्य महाश्रमण

  चेन्नई. माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में आचार्य महाश्रमण ने कहा मनुष्य हमारी सृष्टि का विशिष्ट प्राणी है इसमें सबसे कम संख्या गर्भज मनुष्यों की है। मनुष्यों में भी सबसे कम संख्या पुरुषों की है, स्त्रियां पुरुषों से 27 गुणा अधिक हो सकती हैं।    आचार्य ने कहा मनुष्य ही साधना करके केवलज्ञान प्राप्त कर सकता है। सिद्ध-बुद्ध मुक्त बन सकता है इसलिए मनुष्य जन्म दुर्लभ है, महत्वपूर्ण है। मनुष्य जन्म वृक्ष है, वृक्ष है तो फल लगने ही चाहिए। जिस वृक्ष पर फल नहीं लगते तो उसकी उपयोगिता नहीं रहती। उसी तरह मनुष्य रूपी वृक्ष के छरू फल लगने चाहिए। हम मानव हैं जिसे दुर्लभ जन्म बताया गया है पर वर्तमान में हमें प्राप्त है, सुलभ है। इस मानव जीवन का पूरा लाभ उठाएं। हमारे जीवन रूपी वृक्ष के इन छह फलों को अपनाना चाहिए। प्रतिदिन नमस्कार महामंत्र, लोगस्स की माला फेरें, गुरु उपासना करें, प्...

विनय गुण में जीवन के संपूर्ण शिष्टाचार का समावेश:कपिल मुनि

  चेन्नई. गोपालपुरम स्थित भगवान महावीर वाटिका  में विराजित कपिल ने कहा प्रभु वीर की अंतिम वाणी जीवन को दिव्यता और भव्यता का वरदान देने वाली है ।क हमारे जीवन का समुचित मार्गदर्शन करने वाले उन शिक्षा सूत्रों इसमें संकलन है जिसके श्रवण और आचरण से  जीवन में सौभाग्य का निर्माण किया जा सता है ।इस वाणी को सुनने की ललक का जन्म  जीव के भव्यत्व की निशानी है । जीवन निर्माण के इन सूत्रों को श्रवण करने का ला भभी उन्हीं को मिल पाता है जिसने अपने जीवन में पुण्य किया हो। भगवान की वाणी से जुडऩे वाला कदम कदम पर पाप से सशंकित और भयभीत होता है। ल  अभिमान है। अभिमान से प्रेरित प्रत्येक कार्य पाप बन जाता है। जीवनमें सबसे बड़ा गति अवरोधक है अहंकार। जिसके आने से जीपाप का मूवन में  कठोरता, स्वार्थपरता, क्रुरता आदि अनेक बुराइयों को पनपने का मौका मिल जाता है । जीवन के उत्थान के लिए अपने ह्रदय को अहंकार से मुक्त...

व्याधि-उपाधि से मुक्त होना ही समाधि: मुनि संयमरत्न विजय

  चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय व भुवनरत्न विजय के सान्निध्य में शिवगंज के नरेन्द्र कुमार केशरीमल साकरिया परिवार द्वारा ‘आनंदघन की आत्मानुभूति का संगीतमय आयोजन हुआ। मुनि ने योगीराज आनंदघन के आध्यात्मिक पदों के गूढ़ रहस्य पर प्रकाश डालते हुए कहा सुसंस्कारों का न्यास करने वाला और कुसंस्कारों का नाश करने वाला संन्यासी होता है। आत्मबुद्धि जाग्रत होते ही जीव अपने देह रूपी देवालय में परमात्म स्वरूप आत्मा को प्रतिष्ठित कर मन को स्थिर करने का प्रयास करता है। शरीर की 72000 नाडिय़ों में 14 नाडिय़ां मुख्य हैं इनमें भी इडा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी प्रधान होती है। इडा-पिंगला नाड़ी से चलने वाला श्वास विषम और सुषुम्ना में चलने वाला श्वास सम होता है। सम श्वास से प्राण सम बनते हैं। प्राण सम चलते हैं तो शरीर स्वस्थ व निरोगी बनता है, मन सुमन बनता है, बुद्धि...

११ नवम्बर को होगी श्वेता व प्रेक्षा की दीक्षा

चेन्नई. यहां माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में ११ नवम्बर को आचार्य महाश्रमण के सान्निध्य में तिरुवण्णामलै निवासी श्वेता एवं प्रेक्षा की जैन भागवती दीक्षा होगी। इससे पूर्व तिरुवण्णामलै में जैन समेत सर्वसमाज के अलावा लायन्स क्लब, रोटरी क्लब, जेसीज, चैम्बर ऑफ कॉमर्स एवं अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा दोनों मुमुक्षुओं का अभिनंदन किया जाएगा। संपन्न परिवार में जन्मी २६ वर्षीया श्वेता एवं प्रेक्षा ने वर्ष २०१४ में क्रमश: सीए व एमबीए किया है। इनके दीक्षा लेने के बारे में पूछने पर श्वेता के पिता अरविंद सेठिया ने बताया कि ये दोनों पढ़ाई के दौरान ही तिरुवण्णामलै आने वाले हर संत के संपर्क में रहती एवं सेवा करती थी और उनसे संत जीवन के बारे में जानकारी हासिल करती रहती थी। संतों द्वारा मिली जानकारी के चलते ही इन्होंने दीक्षा लेने का विचार कर लिया। पढ़ाई पूरी होते ही इन्होंने अभिभावकों ...

चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत रस की सरिता: वीरेन्द्र मुनि

कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत रस की सरिता बह रही है, जैन दिवाकर दरबार में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि नें धर्म सभा मे संबोधन करते हुवे कहा कि श्रीपालजी अकेले ही चल पड़े चलते हुए जंगल पहाड़ गिरी कंदरा पार करते हुए एक पहाड़ी पर एक साधक विद्या सिद्ध करने की कोशिश कर रहा था, पर नहीं हो पा रही था। उससे श्रीपाल ने कहा अभी मेरे सामने करो मैं तुम्हारे लिये साधक हूं सिद्ध पुरुष ने वैसा ही किया तुरंत विद्या सिद्ध हो गई। उसने प्रसन्न होकर के दो विद्याए (1 ) जलतरणी ( 2 ) पर शस्त्र हरणी दो विद्याएँ श्रीपालजी को भेंट की श्रीपालजी ने अपने कदम आगे बढ़ाए। आगे जंगल के एक पहाड़ी पर एक व्यक्ति कोई प्रयोग कर रहा था पर उससे हो नहीं पा रहा था। श्रीपालजी को देख करके वह बोला है भाग्यवान क्या मेरे कार्य में सहयोग बन करके इस स्वर्ण सिद्धि को प्राप्त कर सकते हैं क्या , श्रीपाल जी...

चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत रस की सरिता:

कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत रस की सरिता बह रही है, जैन दिवाकर दरबार में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि नें आज दशहरे रामजी के लंका पर विजय का वर्णन करते हुए कहा कि रावण ने एक गलती कि वह यह कि सीता मैय्या का अपहरण करके ले आया जिसके कारण आज लाखो वर्ष हो गये हर वर्ष आज के दिन रावण का दहन होता आया है। रावण सर्व शक्तिमान था कोई उसे क्या मार सकता परंतु उसके काम ने उसे मार गिराया उसकी आज्ञा का पालन चांद सूरज ग्रह नक्षत्र तारे सभी करते थे सीता को लाने का पाप उसने सीता मैय्या को लाकर के अशोक वाटिका में रख करके रोजाना पास जाकर के रानी बनने के लिये कहता था सीता के न मानने पर रावण ने राम का वेश बनाकर भी कोशिश की पर जैसे ही सीता के सामने जाते वैसे ही कामवासना समाप्त हो जाती थी। ऐसे थे राम – जहां राम वहां काम नहीं जहां काम वहां राम नहीं आखिर आज ही के दिन राम लक्...

प्रायश्चित हैं शल्यक्रिया : आचार्य श्री महाश्रमण

चेन्नई.माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में दो आध्यात्मिक परम्पराओं के संवाहकों जैन तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण और दिगंबर परम्परा के आचार्य श्री पुष्पदंतजी सागर का आध्यात्मिक मिलन हुआ| दोनों आचार्यों ने अभिवादन कर खमत खामणा किया|       सरलता ही बनती निर्वाण का कारण    ससंघ पधारे आचार्य श्री पुष्पदंत सागर ने कहा कि मैं यहां आकर गद् गद् हूँ, आनन्दित हूँ| उन्होंने सरलता के साथ, विनम्र बन कर कहा कि आपको एक बात की हंसी आयेगी, लेकिन कहूंगा| जब मैं आया, महाश्रमणजी आये, हम लोग हाथ पकड़ कर साथ साथ चले, बहुत देर तक खड़े रहे| आचार्य श्री पुष्पदंत ने आगे कहा कि मैने कभी आँख उठाकर महाश्रमणजी को देखा नही था, पास में जरूर बैठा था| तो मैने आपको पूछा – महाश्रमणजी कब आयेंगे, तो आप बोले मैं ही हूँ| इस सरलता पर आचार्य पुष्पदंतजी सागर ने कहा कि  महाश्रमणजी बह...

बिना साधना नहीं मिलती सिद्धि :साध्वी धर्मलता

चेन्नई.ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा साधु बने बिना साधना नहीं और साधना बिना सिद्धि नहीं मिलती। पंचम पद का वर्ण श्याम कहा गया है। काले रंग पर कोई और रंग नहीं चढ़ता। साधु संत भी संसार से अलिप्त होते हंै उन पर भी विषय कषाय मोह माया का रंग नहीं चढ़ता। उड़द, शनि और मुनि सुव्रत का वर्ण भी श्याम कहा गया है। जैसे उड़द का काला छिलका निकल जाता है तो दाल का सफेद रंग सामने आ जाता है। वैसे ही साधना से आत्मा की कालिमा हट जाती है और वह स्फटिक के समान उज्जवल हो जाती है। साध्वी अपुर्वा ने बताया कि वर्तमान चौसठ योगियों में जिनका नाम और काम सबसे अधिक परिचित है वो है सोलहवें तीर्थंकर शांतिनाथ। शांति इस शब्द के साथ ही सभी धर्म, पंथ, , शाराष्ट्रसन एकमत से जुड़ जाते हैं।

जीवन में विनय नहीं तो धर्म :उपप्रवर्तक विनयमुनि

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक विनयमुनि ने नवपद आयंबिल आराधना के पांचवें दिन कहा मनुष्य को प्रभु का नाम लेते हुए अपने जीवन की नैया पार लगाने का प्रयास करना चाहिए। श्रीपाल और मैना सुंदरी के चारित्र को सुन कर अपने जीवन में बदलाव लाना चाहिए। उन्होंने कहा ओली नामक दवा लेने से संसार के सभी दुख नष्ट हो जाते हंै। जीवन में जो लिखा है वहीं होगा अपने से सुख और दुख नहीं लाया जा सकता लेकिन मीठे वचनों का प्रयोग कर मनुष्य अपने जीवन को सुखमय जरूर बना सकता है। जीवन को सफल बनाना है तो आयंबिल कर लेना चाहिए, कर्म निर्जरा के लिए यह सबसे अच्छा साधन है। धर्म की शुरुआत विनय से होती है, जीवन में विनय नहीं तो धर्म नहीं। सागरमुनि ने कहा विशालता आने के बाद ही मनुष्य के जीवन में साधुता आती है और वे ऊपर उठता है। विशालता आने से मनुष्य को उच्च स्थान मिलता है। ऐसे में मनुष्य के जीवन में भी विशालता होनी...

सम्यकत्व के लिए रखे आत्म का ध्यान:आचार्य पुष्पदंत सागर

चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि आप जैसा बनना चाहते है वैसा रहिए , वैसा सोचिए और वैसा ही आचरण कीजिए। सम्यक दृष्टि होना चाहते है तो अंतरमुखी होने का प्रयास कीजिए। सभी इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर खुलते हैं इसलिए मन बाहर की ओर भाग रहा है। जिनकी खिड़कियां रहती है वे बाहर की ओर देखते रहते हैं। आपका आसपास की बातों पर ध्यान रहता है। आप जिस तरह महसूस करते है उसी तरह की आपकी क्वालिटी है। वही आपकी चाहत है। मुझे खुश रहना है तो मेरा परिवार मेरे अनुकूल रहना चाहिए। मकान ऐसा चाहिए, पत्नी ऐसी होनी चाहिए। आप अपने को गिरवी रख रहे हो। वस्तुओं का इच्छाओं का गुलाम बना रहे हो। कर्म सत्ता आपको खरीद रही है। आप पदार्थजन्य सुख को, पदार्थजन्य शांति को अपना लक्ष्य बनाए हुए है। आपका रस पदार्थों में है। परमात्मा में नहीं पर में है। पॉजीटिव बनिए। शरीर के सामान और सम्मा...

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