चेन्नई. प्रेम को खंडित करने का प्रथम चरण है क्रोध, मध्यम चरण है घृणा और अंतिम चरण है वैर। शक्कर के एक दाने से खीर मधुर नहीं हो सकती पर उसमें एक कंकड़ आने से स्वाद बिगड़ सकता है। भाव में परिवर्तन हो सकता है। घर को, परिवार को, जीवन को बिगाडऩे वाला तत्व है क्रोध। मान, माया, लोभ, अहंकार, अधिकार की एक चिंगारी जीवन का नंदन वन जलाकर राख कर देती है। कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा पानी की एक बूंद घर को तहस नहस नहीं कर सकती। एक बूंद से वस्त्र भी साफ नहीं हो सकता। एक बूंद पानी से स्नान नहीं हो सकता। एक रुपया गिरने से कंगाल नहीं हो सकते। घास का एक तिनका गंदगी नहीं फैला सकता, लेकिन ईष्र्या की एक चिंगारी सालों पुराने संबंध को खराब कर सकती है। परिवार को एक चिंगारी जुदा कर देती है। एक मच्छरदानी हजारों मच्छरों से बचा देती है। नींद की एक गोली खा कर सबकुछ भुुला सकते ह...
चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक विनयमुनि ने आयंबिल ओली के अंतर्गत चल रहे नवपद जाप के आठवें दिन मंगलवार को कहा संसार में मनुष्य के पास सब साधन है पर चरित्र नहीं है तो सब बेकार है। चारित्र नहीं होने पर मनुष्य नरक में प्रवेश करता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को उसके अच्छे चरित्र से ही अलग पहचान मिलती है। चरित्र की आराधना करने वाले अमर हो जाते हैं। उन्होंने कहा जप और तप के साथ अगर नवपद का जाप किया जाए तो मन शुद्ध हो जाता है। नवपद की आराधना करने से जीवन सफल होता है। मनुष्य को उसके द्वारा किए गए पुण्य के कार्य ही उसे उपर उठाते हैं। जीवन में सफल होना है तो धर्म, तप के लिए आगे रहना चाहिए। सागरमुनि ने कहा गुरु भगवंतों के उपदेश जीवन में बदलाव लाने के लिए होते हंै। उनके उपदेशों का मनुष्य अगर अनुसरण करता है तो उसका जीवन बदल जाता है। जीवन में विनय का बहुत महत्व होता है। मनुष्य को खुद मे...
चेन्नई. बिना ज्ञान और क्रिया के मोक्ष संभव नहीं। सम्यक ज्ञान ही आत्मा को क्या करना और क्या नहीं करना इन सारी क्रियाओं का ज्ञान कराता है। साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा पहले ज्ञान फिर दया का पालन। ज्ञान के बिना अहिंसा का स्वरूप समझ में नहीं आने से आत्मा हिंसा को भी अहिंसा धर्म मान लेती है। जानवरों में भी क्या खाना और क्या नहीं खाना इसका ज्ञान होता है, इसलिए खाते समय ऊंट आकड़े को और बकरी कांकरे को छोड़ देती है। जिसका खानपान अच्छा, उसका खानदान भी अच्छा होता है। आहार संज्ञा पर विजय प्राप्त करने हेतु ही नवपद ओली आराधना में आयंबिल का तप करते हैं जिसमें उबला हुआ अन्न-जल एक समय और एक बैठक पर ग्रहण किया जाता है। अयोग्य आचरण का भावपूर्वक त्याग ही ज्ञान का फल है। ज्ञान आत्मा का मौलिक गुण है। बिना ज्ञान के सारी क्रियाएं झूठी कहलाती है। वे भी पांच प्रकार की होती है...
चेन्नई. जीना उसे ही कहते हैं जहां किसी से न राग है और न द्वेष। एक बेहतरीन जीवन जीने के लिए समता की साधना बेहद जरूरी है। जीवन में समता भाव के उदय होते ही शत्रु मित्र के बीच भेदरेखा समाप्त हो जाती है। गोपालपुरम स्थित भगवान महावीर वाटिका में विराजित कपिल मुनि ने उत्तराध्ययन सूत्र पर प्रवचन में कहा प्रभु वीर की अंतिम वाणी जीवन उक्रांति की सम्भावना से भरपूर है। इसे श्रवण करने का सौभाग्य जीव को तभी मिल पाता है जब गत जन्मों में जरूर संतवाणी का श्रवण किया होगा। वीतराग वाणी के श्रवण का सुयोग पाकर भी अगर कोई जीने की कला से अनभिज्ञ रह जाये तो इसे दुर्भाग्य ही समझना चाहिए। वर्तमान दौर में व्यक्ति की जो मौजूदा जीवन शैली है वह जीवन को जीना नहीं अपितु खोने की तैयारी है। स्वभाव में सकारात्मक बदलाव घटित होने लगता है। फिर किसी के द्वारा किया गया कटुता का व्यवहार का असर नहीं करेगा और न ही किसी के प्रति कटुता...
चेन्नई. सम्यक दर्शन से जीवन का दीपक प्रज्वलित कर आत्मा से सिद्ध व नर से नारायण बन सकते हैं। सम्यकता प्राप्त करने के लिए नवपद का आसरा चाहिए। अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में मंगलवार को साध्वी कुमुदलता ने कहा कि सम्यक दर्शन धर्म का बीज है। सम्यक ज्ञान उसका पौधा तथा सम्यक चरित्र फूल है। आंखों से जिस प्रकार आंसू का संबंध होता है उसी प्रकार सम्यक दर्शन का साथ सम्यक ज्ञान का संबंध होता है। उन्होंने कहा सम्यक दर्शन रूपी बुद्धि रखने वाला व्यक्ति संसार में धर्मरूपी मोती प्राप्त करता है। सम्यक दर्शन वाला व्यक्ति संसार में जाकर भी विरक्त रहता है। सम्यकत्व के तीन दोष होते हैं। इस प्रकार सम्यक ज्ञान, दर्शन, चरित्र की प्राप्ति करने के लिए साध्वी ने सुन्दर उद्बोधन दिया। महावीर सिसोदिया ने संचालन किया। साध्वी ने कहा श्रद्धालुओं से कहा कि वे शरद पूर्णिमा के अवसर पर नवपद ओली के माध्यम से अधिक से अधिक संख्या ...
चेन्नई. सोमवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज का उत्तराध्ययन सूत्र वाचन कार्यक्रम हुआ। परमात्मा के धर्म को सुनकर उन पर श्रद्धा करें। परमात्मा का धर्म उनसे अलग नहीं है। जो परमात्मा के धर्म को अर्थ और शब्द समग्र रूप से जानता है, वह देव बनता है और मोक्ष भी प्राप्त करता है। ऐसा धर्म को उपलब्ध कराने वाली स्तुति के प्रति स्वयं को समर्पित करें। निंरतर गुरु की शरण में रहना चाहिए। नौका में तब तक रहना ही चाहिए जब तक किनारे पर न पहुंचे उसी प्रकार गुरु नौका के समान हैं। किस पल गुरु की जरूरत पड़ेगी कह नहीं सकते। चार ज्ञान और १४ पूरब के ज्ञान से संपन्न इंद्रभूति गौतम को परमात्मा के उद्बोधन की आवश्यकता पड़ती है कि परमात्मा हमें संभाल लें। मन में किस समय खिन्नता और पछतावा आ जाता है आज सकता है जिस प्रकार इंद्रभूति गौतम को हुआ। शाल राजा क...
माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में चतुर्दशी पर हाजरी वाचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने साधु समाज को संबोधित करते हुए, धर्मसभा को प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि संघ एक प्रासाद है, मर्यादाएँ स्तम्भ हैं| प्रासाद की सुरक्षा के लिए मर्यादा रूपी स्तम्भ को मजबूत रखना जरूरी हैं| तेरापंथ हमारा एक दल हैं, एक गुट हैं| हम संघ विरोधी किसी प्रकार की गतिविधि नहीं करे| संघ या संघ के किसी भी सदस्य की फालतू, उतरती बातों से दूर रहना चाहिए| मुनि शरीर को छोड़ दे, लेकिन धर्मशासन को नहीं छोड़े| आचार्य श्री ने आगे कहा कि संघनिष्ठा बड़ी चीज हैं| जो साधु चाहे पढ़ा लिखा नहीं है, व्याख्यान सही नहीं दे सकता, लेकिन संघ में रहता है, आज्ञा में रहता है, अनुशासन में चलता है, बहुत बड़ी बात हैं| “संघ में रहने वाला माला का मणिया हैं|” माला में जो मणिया होता हैं, उसको हम हाथ में लेते हैं, जपत...
चेन्नई. जिन बच्चों के परीक्षा में नंबर कम आते हैं, उनको रोजाना णमो णाणस्स की आराधना करनी चाहिए। इसकी आराधना करने से ज्ञानावरणीय अशुभ कर्म का क्षय होकर शुभ कर्म का उदय होता है। अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में दैनिक प्रवचन में साध्वी कुमुदलता ने कहा णमो णाणस्स की आराधना करने वाला व्य्क्ति ज्ञान आराधना में सदैव आगे रहता है। गौतम मुनि की जयंती पर प्रकाश डालते हुए कहा महाराष्ट्र के जालना में उनका जन्म हुआ। आन्ध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु में विहार करते हुए धर्म ध्यान की गंगा प्रवाहित की। आध्यात्म योगी, तत्व ज्ञान के सरल व्याख्याता, सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति, आडम्बरों से मुक्त थे। उनका जीवन खुली किताब की तरह था। उनकी प्रेरणा से कई जनोपयोगी कार्य संपादित किए गए। जैन स्थानक, गोशालाएं, स्कूल, चिकित्सालय, पुस्तकालय उनकी प्रेरणा से चल रहे...
चेन्नई. जीवन में सफल होना है तो चिंता करने के बजाय चिंतन करें। चिंतन से जीवन में बदलाव लाया जा सकता है। परमात्मा ने कहा है जो मनुष्य अपने भव में पुण्य के कार्य करता है उसके पास बल, बुद्धि और लक्ष्मी सब कुछ होती है। अच्छे कार्य करने और पुण्य कमाने वाले के सभी लोग सेवक बन जाते हैं। जीवन में पुण्य के कार्य करने से कभी भी पीछे नहीं हटना चाहिए। जिसने इस संसार में यश नहीं कमाया उसका जीवन व्यर्थ है। साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक विनयमुनि ने आयंबिल ओली के अंतर्गत चल रहे नवपद जाप के सातवें दिन कहा मनुष्य को जीवन में चिंता नही करना चाहिए, क्योंकि जितना जिसके भाग्य में लिखा होता है उतना ही उसे मिलता है। बैठ कर चिंता करने से किसी भी समस्या का समाधान नहीं निकलता। बल्कि चिंता करने से और भी समस्या बढ़ जाती है। उन्होंने कहा जीवन में मनुष्य को अपने अच्छे कार्य से यश कमा लेना चाहिए। सागरमुनि ने ...
चेन्नई. मिथ्यात्व का फल संसार है तो समकित का फल मोक्ष है। आगम में सम्यक दर्शन को चिंतामणि रत्न की उपमा दी है। चिंतामणि रत्न से भव से दरिद्रता दूर हो जाती है। समकिती जीव नरक में रहकर भी स्वर्ग का सुख अनुभव करता है। वेदना होने पर निज स्वरूप में रमण करता है। प्रतिकूलता में अनुकूलता को निहारता है। उसका चिंतन अधोमुखी न होकर उध्र्वमुखी होता है। ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा आध्यात्मिक भवन में प्रवेश करने के लिए द्वार सम्यक दर्शन है। दर्शन आत्मा का गुण है सम्यक्तव और मिथ्यात्व दोनो पर्याय हैं। अंनतकाल से आत्मा दर्शन मिथ्यात्व के साथ होने से मिथ्यात्व दर्शन के रूप में रही। जब उसका संस्पर्श सम्यकत्व के साथ होता है वही दर्शन सम्यक दर्शन हो जाता है। जहां सत्य और प्रेम होता है वह दुनिया में सबसे शक्तिशाली होता है। सत्यवादी अरण्यक सत्य के पीछे अपने प्राण त्याग करने के लिए तैयार ह...
माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ठाणं सूत्र के छठे स्थान के बीसवें श्लोक के उतराद्ध भाग का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा कि मनुष्य के छह भूमीयों में पैदा होने के हिसाब से छह प्रकार बताएं गये हैं| मूलत: दो प्रकार हैं – समूर्च्छिम और गर्भज| सामान्य भाषा में संज्ञी और असंज्ञी कहते हैं| असंज्ञी मनुष्य, संज्ञी मनुष्यों का उत्पाद आचार्य श्री आगे कहा कि जिसमें मन होता हैं, वह संज्ञी होता हैं| अतीत की स्मृति, वर्तमान का चिन्तन और भविष्य की कल्पना मन के द्वारा ही होती हैं| असंज्ञी के मन नहीं होता, वे अतिसूक्ष्म होते हैं| चींटी, मकोड़े तो हम आँखों से देख सकते हैं, लेकिन असंज्ञी प्राणी को हम आँखों से नहीं देख सकते| असंज्ञी मनुष्य, संज्ञी मनुष्यों का ही उत्पाद हैं, वे हमारे मल, मूत्र, रक्त इत्यादि चौदह स्थानों से पैदा होते हैं, अविकसित होते हैं| आचार्य श्री ने ...
चेन्नई. सोमवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज का उत्तराध्ययन सूत्र वाचन कार्यक्रम हुआ। वर्धमानं शरण पवज्जामी के उद्घोष और पुच्छिस्सुणं के सामूहिक पाठ से धर्मसभा की शुरुआत हुई। उपाध्याय प्रवर ने उत्तराध्ययन का श्रवण कराते हुए कहा कि परमात्मा का स्वरूप उन्हीं से जाना जा सकता है, जिन्होंने उन्हें जीया हो। सुधर्मास्वामी परमात्मा के साथ हर सांस में विश्वास जगाते हुए जिए। उन्होंने परमात्मा की दृष्टि और विजन को स्वीकार किया। परमात्मा की ऐसी दृष्टि जो आपत्ति, विपत्ती, भोग, रोग सभी में उनके साथ समान रही, उन परमात्मा के धैर्य को जानें। आचार्य भद्रबाहु कहते हैं कि जो इसकी अखंड, अभ्यंग आराधना करते हैं वह मिथ्यात्व और संसार को सीमित करते हैं। सौभाग्यशाली हैं वे जीव जो अपराध की सजा के पलों में अपने अपराध का प्रायश्चित कर लेते है। जो प...