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मनुष्य को मधुर व मीठी वाणी बोलनी चाहिए : मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार

पर्युषण महापर्व – आज वाणी संयम दिवस  आचार्य महाश्रमण के प्रबुद्ध सुशिष्य मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार जी, मुनि रमेश कुमार जी , मुनि पद्म कुमार जी एवं मुनि रत्न कुमार जी के पावन सान्निध्य एवं श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा के तत्वावधान में सभी संघीय संस्थाओं के सहयोग से शनिवार को पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व का चौथा दिन वाणी संयम दिवस के रूप में मनाया गया। इस अवसर पर मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार जी ने उपस्थित अपार जनमेदिनी को फरमाया कि मनुष्य को मधुर व मीठी वाणी बोलनी चाहिए। वाणी के कारण दूसरे को अपना व पराया बनाया जा सकता है। व्यक्ति को कला पूर्ण एवं कम बोलने का प्रयास करना चाहिए। अधिक से अधिक मौन रहने का प्रयास करना चाहिए। मुनिश्री ने भव परम्परा से गुजर रहे भगवान महावीर के सोलहवें भव का प्रसंग सुनाये। मुनि रमेश कुमार जी ने तेरापंथ धर्मस्थल के खचाखच भरे जयसभागार में उपस्थित श्रावक-श्राविका...

वनबंधु परिषद चेन्नई महिला समिति द्वारा वरिष्ठ नागरिक दिवस का आयोजन

21 अगस्त को वनबंधु परिषद चेन्नई महिला समिति ने वरिष्ठ नागरिक दिवस का आयोजन किया। इस आयोजन में समिति ने उन युगल को आमंत्रित किया जिन्होंने अपनी शादी के साठ वर्ष पूर्ण कर लिए थे।  कुल 8 युगल इस कार्यक्रम में शामिल हुए । इनके मनोरंजन के लिए समिति ने अंताक्षरी और कुछ प्रश्न उत्तर तैयार किए जिसमें उन्होंने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। सभी वरिष्ठ सदस्यों से उनकी पसंदीदा फिल्म एवं उनके पसंदीदा हीरो हीरोइन के बारे में पूछा गया और उन्हीं से संबंधित कुछ गाने बनाकर उनके सामने प्रस्तुत किए गए। 60 साल की यह यात्रा अपने सह भागी के साथ कैसी रही? कुछ खट्टी मीठी यादें थीं , जिन्हें सभी युगल ने हमारे साथ साझा किया ,और यह भी बताया की सफल वैवाहिक जीवन के लिए क्या आवश्यक है। सबसे वरिष्ठ तो वह युगल था जिसने अपनी शादी के 72 साल पूर्ण किए l सभी युगल जोड़ियों ने कार्यक्रम को बहुत ज्यादा सराहा। सभी वरिष्ठ नागरिकों को चेन...

अल्पाहार अन्नाधानम का कार्यक्रम

दिनांक 23 August शनिवार 2025, *118* वे अमावस्या* के उपलक्ष मैं *जैन सेवा मंडल* बैंगलोर कैंट, कि और से तीमैया रोड स्थित सेठ श्री *किशनलाल फूलचंद लुनिया मेटरनिटी होम”* (“पुअर हाउस हॉस्पिटल”) के बाहर अल्पाहार अन्नाधानम का कार्यक्रम रखा गया ! इस अवसर पर ताराचंद लुणावत, महावीर चंद गादिया, शांतिलाल चुतर, भिकम चंद लूनिया, भरत मेहता, मनोहर गुलेचा, महेंद्र सेन, अशोक खिवंसरा, आनंद चुतर, मांगीलाल, विजयराज सुराणा, संतोष चुतर, सुनिल पोखरना, विशाल गादिया,जितेन्द्र लुणावत,प्रदीप मेहता, महावीर फुलफगर, सुनीता विमल चंद बरलोटा, ललित लोढा, विजय राज सुराणा, प्रमोद संघवी ,दिनेश लोढ़ा,अशोक कोठारी, महेन्द्र लूणिया, सुनील सुराणा ,राकेश पोखरना,सुनिल खिवंसरा, आदि उपस्थित थे!

वाणी व्यक्तित्व विकास का सटीक प्रतिबिंब : साध्वी संयमलता

 चंदनबाला तेला तप महायज्ञ में हुए 175 तेले पर्युषण महापर्व का चतुर्थ दिवस विजयनगर, बैंगलोर: जैन श्वेतांबर तेरापंथी सभा, विजयनगर के तत्वावधान में पर्युषण महापर्व के चतुर्थ दिन दिनांक 23 अगस्त को साध्वी श्री संयमलताजी ठाणा 4 के पावन सानिध्य में “वाणी संयम दिवस” का आयोजन अर्हम् भवन में हुआ।  धर्म परिषद को सम्बोधित करते हुए साध्वी श्री संयमलताजी ने कि कहा कि वाणी व्यक्तित्व का आईना है। वाणी बोलने वाले के व्यक्तित्व और विकास का सटीक प्रतिबिंब है। संस्कृति को जीवित रखने में भाषा का बहुत महत्व है। आज विदेशी भाषा के अत्यधिक प्रादुर्भाव के कारण हमारी भाषा विकृत होती जा रही है, उसकी मधुरता कम होती जा रही है। हमारी वाणी में संयम होना आवश्यक है, बिना सोचे समझे कुछ भी नहीं बोलना चाहिए। साध्वीश्रीजी ने फरमाया कि इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण देखने मिलते हैं, जब वाणी के असयंम से अनेक समस्याएं उत...

नशा नाश का द्वार- डॉ श्री वरुण मुनि

श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म.सा. ने पर्व पर्यूषण आराधना के चौथे दिन धर्म सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि नशा नाश का द्वार है। नशे के कारण व्यक्ति के साथ उसके परिवार की सुख शांति भी भंग हो जाती है। इतिहास में अनेकों उदाहरण मिलते हैं जहां नशे व्यसनों के चक्कर में पड़ कर अनेकों जिन्दगीया बर्बाद हो गयी।उनका समूल नष्ट हो गया केवल इस नशे की बुरी आदतों के कारण। सुरा और दैपायन ऋषि के क्रौध के कारण ही द्वारका नगरी का विनाश हुआ। मुनि श्री ने देश एवं समाज के सभी युवाओं को आव्हान करते हुए कहा कि आप सभी आज अभी ही नशें रुपी भयंकर बुरी आदत को छोड़कर सरल, सादगी से अपना जीवन यापन करें। जो आपको दुर्गति में जाने से बचा सकता है और इसमें आपके साथ आपके परिवार में भी सदा सुख शांति समृद्धि और खुशहाली का माहौल बना रह...

बुढ़ापा जीवन का वसंत है, बुढ़ापा जीवनका प्रकाश है – साध्वी स्नेहाश्रीजी म.सा.

पर्युषण पर्व का त्रुतिय पुष्प प्रारंभ हुआ! पु. श्रुतप्रज्ञाश्री जी ने अंतगडसुत्र का वाचन किया , गुरुमॉं पु. चंद्रकला श्रीजी ने प्रभु महावीर के समवसरण की यात्रा करायी! मेरे महावीर भगवान मेरे मनमंदीर मे आओ! बचपन में माता पिता का हाथ, जवानी मे परिवार का सांथ, बुढापे मे परमात्मा की शरण स्वीकारो! बुढ़ापा जीवन का मुख्य अध्याय है ! भोग नही योग के साधन बनो! दुनीया मे आये बिना वस्र आये, जब जाओ महावीरजी का वस्र धारण करो बहनों चंदनबाला का वस्र धारण करो! बुढ़ापा अभिशाप नही , आशिर्वाद है! जब दादाजी बनोगे दादागिरी छोड़ देना! दिल दर्या रखो, खुला रखो यह संदेश पु स्नेहाश्रीजी ने पारिवारिक द्रष्टांत देकर दिया! आलंदी से आये महावीर लुणावत ने 16 उपवास के प्रत्याख्यान लिए! संघाध्यंक्ष सुभाष ललवाणी ने उपस्थित महानुभावों का स्वागत किया एवं दानराशी घोषित करनेवाले परिवारो का शब्दसुमनो से स्वागत किया!

मैत्री: आत्मशुद्धीचा आरंभबिंदू

प्रवचन – 22.08.2025 – प पू श्री मुकेश मुनीजी म सा – (बिबवेवाडी जैन स्थानक) जैन धर्मातील “चार अनंत चतुर्विध” भावनांमध्ये — मैत्री, करुणा, मुदिता आणि उपेक्षा — यामध्ये पहिली भावना म्हणजे मैत्री. “मैत्री भवतु सर्वेषां जीवनाम्” अर्थ: सर्व जीवांशी माझं नातं मैत्रीपूर्ण असो. हे केवळ उच्चारायचं वाक्य नाही, तर आत्म्याच्या व्यवहारात उतरवण्यासारखं एक दिव्य सूत्र आहे. सुदामा हे गरीब ब्राह्मण, कृष्ण द्वारकेचा राजा. तरीही कृष्णानं आपल्या लहानपणच्या मित्राला विसरला नाही. गरीबीत आलेल्या सुदाम्याला पाहून श्रीकृष्णाने त्याचे पाय धुतले. त्याच्या डोळ्यात पाणी आले, पण त्याच्या हृदयात होती खरी मैत्री. ही होती निष्कलंक, निस्वार्थ, दिव्य मैत्री. दुर्योधनाने कर्णाला राजा केलं, मान दिला. आणि कर्णाने अखेरपर्यंत आपलं मित्रधर्म निभावलं—युद्धभूमीत आपल्या मृत्यूचा स्वीकार करताना सुद्...

समता की साधना है सामायिक : मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार

पर्युषण महापर्व में आज मनाया सामायिक दिवस आचार्य महाश्रमण के प्रबुद्ध सुशिष्य मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार जी , मुनि रमेश कुमार जी , मुनि पद्म कुमार जी एवं मुनि रत्न कुमार जी के पावन सान्निध्य एवं श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा के तत्वावधान में सभी संघीय संस्थाओं के सहयोग से शुक्रवार को पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व का तीसरा दिन सामायिक दिवस के रूप में मनाया गया। इस अवसर पर सभी को सामूहिक रूप से अभिनव सामायिक का प्रयोग कराया गया, जिसमें सैकड़ों भाई-बहनों ने भाग लिया।     इस अवसर पर मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार जी ने उपस्थित अपार जनमेदिनी को फरमाया कि सामायिक बहुत बड़ी साधना है। समुचितपूर्वक, समतापूर्वक एवं विधिपूर्वक करने से एक सामायिक भी आत्म कल्याण में सहायक हो सकती है। सामायिक का मतलब है समभाव यानी समता भाव में रमण करना। सामायिक इंद्रियों की प्रवृत्ति को शांत करती है और उसे अध्यात्म की ओर ले जात...

पर्यूषण पूर्वाच्या तिसर्‍या दिवसी आध्यात्मिक अनुभवाचा संदेश

जालना : पर्यूषण पर्वाच्या तिसर्‍या दिवसाची सुरुवात अंतर्कृत दशांग सूत्राच्या पवित्र पठणाने झाली. या प्रसंगी उपस्थित भक्तांशी संवाद साधताना परम पूज्य रमणिकमुनिजी म. सा.यांनी जिनवाणी श्रवणाचे महत्त्व गहनपणे सांगितले. महाराजांनी स्पष्ट केले की, भगवान महावीर स्वामींच्या वचनातून प्राप्त झालेले हे ज्ञान अत्यंत मौल्यवान आहे आणि त्याचा स्वीकार न करता जीवनात खर्‍या अर्थाने आत्मिक प्रगती साधणे अशक्य आहे. आत्मिक संपदा आणि मोहनिया कर्मांवर विजय महाराजांनी सांगितले की, आत्मिक ज्ञान ही खरी संपदा आहे, जी ऐकण्यापुरती मर्यादित नसून प्रत्यक्ष जीवनात लोभ, क्रोध, मोह यावर विजय मिळवण्यासाठी वापरली पाहिजे. त्यासाठी त्याग, संयम आणि नियमित साधना हा अविभाज्य मार्ग आहे. भक्तांनी ध्यान, प्रार्थना आणि आत्मावलोकन करून आपल्या आत्म्याची प्रबलता वाढवावी. पर्वांचे उद्दिष्ट आणि आध्यात्मिक संदेश पर्यूषण पर्वाचा मुख्य हेतू श...

क्षमा सहनशीलता की प्रतिमूर्ति थे महान साधक गजसुकुमाल- डॉ श्री वरुण मुनि जी

श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म सा ने शुक्रवार को धर्म सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन अन्तगड सूत्र के माध्यम से सूत्र में वर्णित महान करुणा मूर्ति मोक्षगामी आत्मा श्री गजसुकुमाल मुनि के चरित्र पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि अपूर्व सहनशीलता, क्षमा,समता और करुणा की प्रतिमूर्ति थे महान साधक गजसुकुमाल मुनि। जिनके मस्तक पर सोमिल ने गर्म गर्म अंगारे रख दिये थे। पर करुणा मूर्ति गजसुकुमाल मुनि ने उस अपार तीव्र वेदना को भी समभाव से सहन किया और सामने वाले पर जरा भी क्रोध विषम भावों को नहीं लाते हुए महान क्षमा के गुण को धारण करते हुए सब कर्मो की निर्जरा कर परम पद मुक्ति को प्राप्त किया। ऐसे अपूर्व सहनशीलता समता और क्षमा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हुए आगम के इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठो पर अपना ना...

दुख में भी सुख का अनुभव ईश्वरी कृपा का परिचायक: साध्वी संबोधि

 विश्व के समस्त प्राणियों की एकमात्र यही कामना है कि मुझे सुख मिल जाये और मेरे जीवन के तमाम दुःख टल जाये। सुख प्राप्ति के लिए मनुष्य अनेक प्रकार की प्रवृत्ति करता है, नानाविधि प्रयास करता है किन्तु अफसोस यह है कि हर प्रवृत्ति और प्रयास उसे दुःख के महागर्त में डुबो देता है इसीलिए दुनिया का एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिलेगा जो दुःखी न हो। यह संसार विचित्रता, विविधता और विषमता से भरा हुआ है। ऐसे संसार में जीते हुए हर कदम पर दुःख तो होंगे ही परन्तु आते हुए दुःखों को हम सुख में बदलें, यही हमारी विशेषता है। दुःख को रोकना मनुष्य के बस की बात नहीं है किन्तु आये हुए दुःखों को सुख में बदलना उसके हाथ में है। ज्ञानियों का कथन है कि दुःखों के बीच यदि शांति से जीना हो तो अपनी दृष्टि को बदल लो क्योंकि दृष्टि से ही सुख-दुःख का संवेदन होता है। यदि कोई दुःख का संवेदन करे तो उसे अवश्य दुःख होगा और न करे तो नहीं ...

संसार परिवर्तन शील है: साध्वी संबोधि 

 कर्म के कारण आत्मा का एक जन्म से दूसरे जन्म को प्राप्त करना संसार है। संसार के सब प्राणी समान नहीं है। सबकी बुद्धि, वैभव और क्षमता भिन्न-भिन्न हैं। जिसके पास यह साधन उपलब्ध है उसका मन गर्व से भर जाता है, और जिसके पास साधन नहीं होते उसके मन में हीन भावना पनपती है। इस दोहरी बीमारी की चिकित्सा संसार-अनुप्रेक्षा द्वारा होती है। यह संसार परिवर्तनशील है। इसमें कोई भी व्यक्ति निरन्तर एक स्थिति में नहीं रहता। जन्म के साथ ही रोग, बुढ़ापा और मृत्यु का दुःख उसे घेरे रहता हैं। कहीं जन्म की खुशियाँ मनाई जाती हैं तो कहीं रोगी का पीड़ित स्वर सुनाई देता है। कहीं विवाह उत्सव रचा जा रहा है तो कहीं चिताएं जल रही हैं। वस्तुतः यह संसार असार और दुःखमय है। संसार के रंगमंच पर प्राणी विभिन्न पात्रों के साथ पिता-पुत्र, पति-पत्नी, भाई-भाई आदि के रूप में विविध सम्बन्ध बनाता है। किसी से मैत्री करता है तो किसी से दुश्...

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