डीमापुर (नागालैंड) : भारत देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र स्थित सूदूर प्रांत नागालैंड के डीमापुर में अभातेयुप के निर्देशन में तेरापंथ सभा, तेरापंथ महिला मण्डल के तत्वावधान में जैन संस्कार विधि द्वारा 28.08.2025 गुरूवार को तप संपूर्ति अनुष्ठान कार्यक्रम समायोजित हुआ। सरदारशहर निवासी डीमापुर प्रवासी स्व. श्री सम्पतकुमारजी- श्रीमति संतोषदेवी की पुत्रवधू श्रीमति शीतल धर्मपत्नी श्री विनीत वैद के 8 की तपस्या का तप संपूर्ति अनुष्ठान जैन संस्कार विधि से संपादित किया गया। जैन संस्कारक व उपासक श्री स्वरूप चन्द दाँती (चेन्नई), उपासक श्री सौभागमल सांड (कडलूर) के सामुहिक नमस्कार महामंत्र समुच्चारण से कार्यक्रम शुभारंभ हुआ। महिला मंडल की बहनों ने तपसण बहिन एवं परिजनों को तिलक लगाया। प्रभु पार्श्वदेव चरणों में, जय महावीर भगवान गीतों से स्तुति, उवसग्गहर स्तोत्र इत्यादी मंगल मंत्रोच्चार के साथ तप संपूर्ति अन...
शास्त्रों में मानव जन्म की प्राप्ति को दुर्लभ बताया गया है यदि पुण्योदय से मिल भी गया तो उसकी सफलता के लिए शुभ कर्म करना चाहिए न कि इसे मौज-मस्ती, काम भोगों में व्यतीत करना चाहिए। मान लो किसी व्यक्ति ने एक कीमती घड़ी ली और उसमें सोने की चैन डलवा कर उसे सुन्दर बनाकर मित्रों व परिवार के अन्य सदस्यों के सामने बार-बार उसका प्रदर्शन करने लगा और उसमें चाबी देना भूल गया तो वह बन्द हो जाएगी। घड़ी कितनी ही मूल्यवान क्यों न हो, एक दिन वह भी खराब होने की है। यदि उसकी सुरक्षा करते रहे तो जीवनभर साथ दे देगी। इसी प्रकार मानव जन्म को सार्थक करने के लिए इसे सजाने-संवारने के स्थान पर इसका सदुपयोग किया जाए या करें। यदि एक पल के लिए भी अपने मन में मलीन भावना उत्पन्न हो जाती है तो आप अनन्त पाप कर्मों का बंध कर लेते हैं और क्षणभर के लिए भी आपके मन में शुभ भावना उत्पन्न होती है तो अनन्त पुण्य कर्म परमाणु बंध स...
जालना : जितकी भुक आहे तितकेच खाल्ले तरच ते पंचन होते, अन्यथा नाही. म्हणूनच भगवंतांनी सांगून ठेवले आहे की, आपल्याला जितकी भुक असेल तेवढेच गृहन केले तरच ते आपल्याला पचन होते, असा हितोपदेश वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित विशेष प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, काही जण तर खाते- खातेही जाते है । धर्म करतांनाही ते दु:खी राहतात. धर्म करतांना तरी मनुष्याने आनंदी राहिले पाहिजे. मात्र दु:खी व्यक्ती धर्म करत असेल तर तो तर धर्म करत नाही. उलट तो दुसर्यांनाही दु:खी करतो. क्यो की, धर्म ही आनंद है। और ये आनंद कुणीही हिस्कावू शकत नाही. महावीर...
शिक्षण हे परिवर्तनाचे सर्वात प्रभावी माध्यम आहे. कारण शिक्षणाच्या माध्यमातूनच व्यक्ती विकास, समाजविकास व राष्ट्रविकास साध्य होत असतो. याच उच्च उद्देशाने श्री नेमिनाथ जैन ब्रह्मचर्याश्रम (जैन गुरुकुल), नेमिनगर, चांदवड, जि. नाशिक ही शतक महोत्सवाकडे वाटचाल करणारी शैक्षणिक संस्था दिनांक 17 नोव्हेंबर 1928 पासून शैक्षणिक क्षेत्रात ज्ञानदानाचे कार्य करीत असून देशातील एक नावाजलेली अग्रगण्य शैक्षणिक संस्था आहे. संस्थेचे संस्थापक कर्मवीर केशवलालजी हरकचंदजी आबड (पूज्य काकाजी) यांनी केवळ तीन विद्यार्थ्यांना घेऊन आश्रमाची मुहूर्तमेढ केली. शिक्षण हे समाजपरिवर्तनाचे एक महत्वाचे साधन आहे अशी त्यांची धारणा होती. शिक्षणाचे महत्व कळावे म्हणून शिक्षणाचा प्रसार आणि शैक्षणिक सुविधा उपलब्ध करुन देण्याची आवश्यकता असलेल्या अशा कालखंडात काकाजींनी ज्ञानदानाचा वसा हाती घेतला व अविरत प्रयत्नाने त्यांनी या जैन गुरुकुला...
आत्मा भावों के झूले पर ऊंचा नीचा झूलता हुआ ही कभी ऊपर उठता है तो कभी नीचे गिरता है। भाव ही राम है और भाव ही रावण है। भाव ही कृष्ण है. भाव ही कंस है। भाव ही महावीर है, भाव ही गौतम है, भाव ही गौशालक है। भाव ही देव है, भाव ही राक्षस है और भाव ही पशु है। भाव ही मानव का शत्रु है और भाव ही मित्र है। भगवान महावीर ने कहा था कि शुभ भावों वाली आत्मा स्वयं कामधेनु है। अशुभ भावों वाली आत्मा स्वयं ही नरक की वैतरणी है। आत्मा ही नन्दनवन है और आत्मा ही कांटों से भरा सामली वृक्ष है। अतः सावधान रहिए। अपने भावों पर पैनी दृष्टि रखिए, कहीं वे गन्दे तो नहीं हो रहे हैं। प्रथमतः भावों को गन्दा होने से सदैव बचाना चाहिए। कभी आकस्मिक भूल से गन्दे हो भी जाएं तो तत्काल उन्हें विवेक ज्ञानगंगा में धोकर शुद्ध बना लेना चाहिए। यदि इसमें तनिक भी देर कर दी जाएगी तो वह फिर ऐसा कीचड़ है जो जमने के बाद जल्दी नहीं धुल पायेगा। भ...
टेढ़ी जुबान से जहां नजदीकियां भी खत्म हो जाती है वहीं मीठी जुबान से बनी हुई दूरियां दूर हो जाती है। मीठा बोलेंगे तो लोगों के दिलों में उतरेंगे और कड़वा बोलेंगे तो लोगों के दिलों से उतर जाएंगे। अगर पूरा देश मीठी भाषा को अपना ले तो पूरी दुनिया भारत की लट्टू हो जाएगी। शब्दों में बड़ी जान होती है, इसी से आरती अरदास और अजान होती है, ये समंदर के वे मोती हैं जिनसे अच्छे आदमी की पहचान होती है। उन्होंने कहा कि जब भी मुसीबत आती है तो मुंह के रास्ते आती है। महाभारत का युद्ध भी कड़वी जुबान के कारण हुआ था। अगर व्यक्ति विपरीत वातावरण में अपनी जुबान पर केवल 2 मिनट का धैर्य व शांति धारण कर ले तो वह 90 प्रतिशत माथाफोडिय़ों से स्नेहा श्री जी म सा ने कहा कि हमारी भाषा में 3 गुण होने चाहिए शिष्ट अर्थात शिष्टाचार युक्त, मिष्ट अर्थात मीठी और इष्ट अर्थात प्रिय। अगर व्यक्ति भाषा में ये 3 गुण ले आए तो वह लोगों के द...
जालना : अंहकार हा असा प्राणी आहे की, तो ना कुणाला जगू देत ना कोणाला मरु देत म्हणूनच आपण सातत्याने श्रृत आराधना करा, असा हितोपदेश वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित विशेष प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, कर्ता आणि करविता तो आहे. म्हणूनच आपण आहोत. तो जर नसेल तर काय झाले असते. हेही तुम्हीही सांगू शकला नसता आणि आम्ही देखील! परंतू भगवंत प्रभूंची महान लिला आहे की, आपण सर्व जण त्यांची आराधना करत आहोत. म्हणूनच परत्म्यानेही म्हटले की, श्रृत आराधना करा, स्वाध्याय करण्यापेक्षा श्रृत आराधना केव्हाही चांगली! स्वाध्याय काळातच स्वाध्याय केला प...
आचार्य महाश्रमण के प्रबुद्ध सुशिष्य मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार जी , मुनि रमेश कुमार जी , मुनि पद्म कुमार जी एवं मुनि रत्न कुमार जी के पावन सान्निध्य में तेरापंथ धर्मस्थल में आयोजित आगम आधारित प्रवचनमाला में सोमवार को मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार जी ने उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को प्रतिबोध देते हुए कहा कि समय की गति को पहचानें। समय का पहिया अपनी गति से अनवरत घूमता ही रहता है। अगर हम समय का सदुपयोग करेंगे तो यह हमारा बन जाएगा। वरना हाथ मलने के सिवाय कुछ नहीं बचेगा। इसलिए कभी अच्छे समय का इंतजार न करें। मुनिश्री ने कहा कि भगवान महावीर का मानना था कि समय की मूल प्रकृति परिवर्तन ही है। मुनि रमेश कुमार जी ने कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ के नवमाचार्य तुलसी जन-जन के आचार्य थे। आचार्य तुलसी ने संप्रदाय से भी अधिक महत्व मानवता को दिया। मानवता के उत्थान के लिए उन्होंने विविध प्रकार के कार्यक्रम प्रारंभ किए ...
भारत ऋषियों, मुनियों, महात्माओं का देश है। एक से बढ़कर एक ऋषि-मुनि अपने आचार, विचार और वाणी से यहां के जनमानस का मार्गदर्शन करते रहे हैं। मुनियों की इसी परम्परा में एक महामुनि हुए – उत्तर भारतीय प्रवर्तक श्रुताचार्य गुरुदेव श्री अमर मुनि जी महाराज! श्रद्धेय अमर मुनीश्वर ने अपने उदात्त आचार, विचार और धर्म-प्रचार से मानव-समाज को एक नई दिशा दी। वि-सं- 1983, भादवा सुदी पंचमी (सन् 1936) को अविभाजित भारतवर्ष के क्वेटा बलूचिस्तान (वर्तमान पाकिस्तान) में एक प्रतिष्ठित क्षत्रिय कुल में श्री अमर गुरुदेव का जन्म हुआ। सद्गृहस्थ श्री दीवानचन्द जी मल्होत्र की अर्द्धांगिनी श्रीमती बसंती देवी की रत्नकुक्षी से जन्म लेकर बालक अमरनाथ लुधियाना में विराजित आचार्य सम्राट श्री आत्माराम जी म.सा. के सान्निध्य में आए। सद्गुरु का पारस-स्पर्श पाकर अमरनाथ शुद्ध स्वर्णत्व को उपलब्ध हुए। आचार्य श्री के दिशा-दर्शन म...
माणकचंद रांका ने स्वीकार की श्रावक की पाँचवी प्रतिमा विकास महोत्सव का हुआ आयोजन साहूकारपेट, चेन्नई : आचार्य महाश्रमण की सुशिष्या साध्वी उदितयशा ठाणा 4 के सान्निध्य में तेरापंथ भवन साहूकारपेट, चेन्नई में 32वें विकास महोत्सव का समायोजन हुआ। नमस्कार महामंत्र समुच्चारण के साथ शुभारंभ कार्यक्रम में समुपस्थित धर्म परिषद को सम्बोधित करते हुए साध्वी उदितयशा ने कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ सदैव विकास के मार्ग पर अग्रसर रहा है। सभी आचार्यों ने मौलिकता को सुरक्षित रखते हुए विकास के नव आयामों का सृजन किया। नवमाधिशास्ता आचार्य तुलसी ने युगानुरूप धर्मसंघ को अनेकानेक आयाम दिये। श्रावक समाज की संगठनात्मक विकास के लिए अनेकों संस्थाओं का गठन किया। वही सामाजिक उत्थान के लिए अणुव्रत, रूढ़ि उन्मूलन इत्यादि आन्दोलन का सूत्रपात किया। आचार्य तुलसी ने योजनाओं की संयोजना की, आयोजन को प्रयोजन सिद्ध करने वाला बनाया। सा...
जालना : मी अगर प्रभाकरवंजी महाराज साहेब यांना गणेशलालजी महारांजींची मानस कन्या म्हटले तर ते वावगे ठरणार नाही. असे सांगून प. पु. रमणीकमुनींजी म्हणाले की, धर्माची सुध्दा एक आचार, विचार असते. आाम्ही तर आहोत तसे प्रभू महावीरांचे संतान आहोत. मग ते श्रावक, असो नाही तर श्राविका असो. परंतू आज पुण्यतिथी मानत आहोत. भगवान महावीर हे आमच्या जीवनात सुध्दा असायला हवेत, असे वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना सांगितले. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित विशेष प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साधू- साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, दोन अडीच वर्षे झाले महावीर आजही जिवंत आहे. ते का जिवंत आहे. महाराणा प्रताप आजही जिवंत आहे...
श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास हेतु विराजमान दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रचारक डा. श्री वरुण मुनि जी महाराज ने रविवार को धार्मिक सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि यदि किसी वृक्ष की जड़ काट दी जाए, तो वृक्ष में कोई शक्ति नहीं रहती और जड़ के बिना वृक्ष का कोई अस्तित्व नहीं होता। ठीक उसी प्रकार यदि मनुष्य के जीवन में भगवान के नाम के दीपक का उजाला नहीं है, तो मनुष्य का जीवन घोर अंधकारमय है। उन्होंने कहा कि इस घोर कलियुग में हमारी बुद्धि और अहंकार ने पर्दा डाल रखा है, जो मनुष्य को राम नाम की चर्चा में नहीं जाने देता। उन्होंने बताया कि यदि हम सत्संग में जाकर वचनों पर अमल करें, तो सभी प्रकार की चिंताएँ और दुख दूर हो जाएंगे और जीवन खुशियों से भर जाएगा। मनुष्य जीवन में शांति के सागर पर समस्याओं की लहरें हैं, बहारों के चमन में पतझड़ है, ज्ञान के खजाने पर ताले लगे हैं, सौभ...