आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने सुमति वल्लभ नोर्थ टाउन जैन मूर्तिपूजक संघ में प्रवचन देते हुए कहा कि प्रकृति अत्यंत सरल है। इसकी समस्त क्रियाएं बड़ी सरलता के साथ होती हैं। सूर्य का उदय होना, तारों का टिमटिमाना और नदियों का निरंतर बहना आदि कुदरती क्रियाएं होती रहती हैं। वृक्ष फलते-फूलते हैं, रात के बाद दिन आता है, पर्वत-चट्टानें स्थिर हैं। वस्तुत: प्रकृति जटिलताओं का उद्गम-स्नोत नहीं है, उन्हें वह निर्मित भी नहीं करती। प्रकृति की क्रियाएं क्यों हो रही हैं या फिर क्या होना चाहिए, जैसे प्रश्नों से जटिलताएं आती हैं। प्रकृति में सब कुछ स्वयं ही होता है। प्रकृति की तरह जो चीज सरल रहती है, वही सत्य है। ऊपर से यह बात सहज जान पड़ती है, पर यह उतनी सरल नहीं है। यही जीवन के साथ भी है। सरल रहने तक मानव जीवन सम्यक अर्र्थों में वास्तविक जीवन बना रहता है। यही हमारा जीवन जीना होता है। इससे पृथक होते ही जीव...
🏰☔ *साक्षात्कार वर्षावास* ☔🏰 *ता :08/8/2023 मंगलवार* 🛕 *स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई* 🪷 *विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, संघ एकता शिल्पी, प.पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.* के प्रवचन के अंश 🪔 *विषय अभिधान राजेंद्र कोष भाग 7*🪔 ~ शरीर से कि हुई साधना से दुर्गति में जाना नहीं होगा यह निश्चित नहीं है किंतु ज्ञान से की हुई साधना से दुर्गति नहीं ही होगी और सद्गति ही होगी। ~ हमारे देह के वियोग के साथ कर्म, अज्ञान, पाप, दोष, गलतियों का वियोग (नाश) होता है या नहीं? ~ हमारा धर्म ऐसा प्रकृष्ट बलवान होना ही चाहिए कि देह की मृत्यु के होने के बाद भी धर्म अखंड ही रहे। ~ जब तक हमारा ध्यान हर पल शरीर का ही होगा तब तक सत्य ध...
किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्यश्री केशरसूरिजी के समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरिश्वरजी म.सा. ने प्रवचन में कहा कि हमें सबसे ज्यादा मोह काया का है। काया को स्वस्थ रखने के लिए तप रूपी दवा का उपयोग करना चाहिए। साता वेदनीय कर्म का बंध करने के लिए पर की पीड़ा करना छोड़ दो और परोपकार करना शुरू कर दो। कर्मसत्ता देता है सुख, लेकिन काम दुःखों के कराता है क्योंकि संसार में कहीं न कहीं दुःख तो पड़ा हुआ ही है। छःकाय जीवों की विराधना से मुक्त होने के लिए आराधना करने का मुख्य स्रोत सामायिक है। प्रणिधान यानी निर्धार, प्रायश्चित और प्रसन्नता के अभाव में अपनी आराधना लम्बी चलने के बावजूद आत्मा का स्वभाव नहीं बदलता है। मन के अंदर क्लेश नहीं होना ही प्रसन्नता है। इसके लिए भविष्य की कल्पना नहीं करने के साथ पूर्व की दुःखी करने वाली घटनाओं को याद नहीं करना। उन्होंने कहा हमने संस...
10-11 अगस्त को सुमित बिजनेस पार्क में जुटेगा सकल जैन समाज Sagevaani.com @रायपुर. राजधानी में उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि जी महाराज साहब 9 से 17 अगस्त तक आनंद गाथा का वाचन करेंगे। बुधवार से 15 अगस्त तक यह कार्यक्रम रोज रात 9 से 10 बजे के बीच टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन में संपन्न होगा। वहीं 16 और 17 अगस्त को ये प्रोग्राम रात 8 से 9 बजे के बीच हुकम्स ललित महल में होगा। रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने बताया कि राष्ट्र संत आचार्य आनंद ऋषि जी महाराज साहब के 124वें मंगल जन्मोत्सव के अवसर पर 8 दिवसीय समारोह का आयोजन किया गया है। इसके तहत 10 अगस्त को सुमित बिजनेस पार्क में सुबह 8 बजे से सामायिक दिवस मनाया जाएगा। 11 अगस्त को सुबह 8 बजे से 36 लाख नवकार जाप होगा। इसके लाभार्थी सुमित ग्रुप, कांकरिया परिवार हैं। टैगोर नगर स्थित श्री लालगंगा पटवा भवन में 12 अगस्त को णमोत्थुणं जाप, 13 अगस्त...
सौभाग्य प्रकाश संयम सवर्णोत्सव चातुर्मास खाचरोद प्रवर्तक पुज्यू प्रकाश मुनि जी मा.सा. -ज्ञान का कोई पार नही, सम्यक ज्ञान का कोई किनारा नही, ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं? आपको ज्ञान हे! शरीर अलग, आत्मा अलग वह आत्मा का आनन्द ले। ज्ञान अवीकारी होता है, क्योंकि वह विकार में जायगा नहीं। ज्ञान ..ज्ञान रहेगा जीव सम्यकदृष्टि है ज्ञानी है। सुज्ञान सिन्धु गुरुदेव को उपमा दी है ज्ञान के सिन्धु थे। आचारांग सूत्र – *संति मरण समपेहाय*- सम्यक प्रकार से शांति व मरण को देखे, शांति – मुक्ति मरण अर्थात संसार । दोनो को देखे,, देखना हे सम्यक पुर्वक किसी आग्रह, मत से . बंधकर न देखे। दृष्टि बंधी है तो सत्य नहीं दिखाई देता है। संसार क्या हे- बंधन से बंधा प्रकार के कारण से । मोक्ष क्या है – बंधन से मुक्त, अप्रमादी के कारण से *महोमाय उपमाये*- मोह के स्थान है वहाँ अप्रमादी बनना जो बुद्धिमानी है वह अप्...
★ गच्छाधिपति जिनमणिप्रभसूरिश्वरजी ने इगो, स्वार्थ मुक्त जीवन जीने की दी प्रेरणा Sagevaani.com @चेन्नई; श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में धर्मपरिषद् को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने उत्तराध्यन सूत्र के चौथे अध्याय की गाथा का विवेचन करते कहा कि हमारी नजर शरीर पर या उनके भविष्य पर ही नहीं रहनी चाहिए, शरीर का भविष्य तो निश्चित हैं, वह मिटने वाला है। हमारा तो लक्ष्य एक ही रहना चाहिए कि हमारी आत्मा का भविष्य उज्जवल बने। अगले जन्म में कहा जाना है, क्यों जाना है, मेरा अन्तिम लक्ष्य क्या है? चौरासी लाख जीवा योनी में भटकता आ रहा हूँ, कभी नरक में तो कभी देव में, कभी मनुष्य में तो कभी तिर्यंच में। क्या अभी भी मैं कभी सुख कभी दु:ख में, कभी अनुकूलता कभी प्रतिकूलता में ही जीना च...
श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में कर्नाटक तप चंद्रिका प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने बताया कहा अध्यात्म दोषों को छोड़ना है। जब तक ये अंदर में है, तब तक हमारा छन छन भाव मृत्यु चल रही है। जल और जलन, कंटक और कुसुम, विषवेल, अमृतवेल इन सब के फल अलग-अलग है। क्रोध की आग, माया का जाल, मान का नाग, लोभ का छोभ जीवन को नष्ट करने में लगे हैं। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने बताया उतना ही खाओ जितना आप पचा सको। कब खाना, कैसे खाना, कितना खाना इसके बारे में बताया। बड़ी सुंदरता के साथ समझाया गया। सौ. मंजूबाई राजमल कांटेड के आठ उपवास के प्रत्याख्यान हुए। अध्यक्ष विजयराज चुत्तर ने स्वागत किया। मंत्री हस्तीमल बाफना ने संचालन किया।
हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैंl पहला स्टेप बोलने की कला वाला मंत्र जब भी बोलो अदब से बोलो पत्नी को भी आप कहो हो सकता है आप लोग कब तक तुम कहते रहे थेl जो कहा सो का अभी ठीक कर ले अपनी कुलि नता की बात लिख ले फिर खुद को ठीक कब करेंगे कोई मुहूर्त निकाल कर ठीक करेंगे या जागे तभी सवेरा होगाl दूसरा स्टेप जब भी बोले पूरे आत्मविश्वास के साथ बगैर किसी डर या झिझक केअपनी बात को कहना आत्मविश्वास हैl आत्मविश्वास जगाने के लिए शोले फिल्म के डायलॉग याद रखना जो डर गया सो मर गयाl डायलॉग सभी के बहुत काम आता है विश्वास जीवन का सबसे बड़ा मूल्य तत्व हैl जब तक जिगर में श्वास तब तक रखो आत्मविश्वास अपने आप पर यकीन रखो कि मैं गलत नहीं होता हूंl मैं गलत नहीं ब...
मन को संभाल लो,जीवन सुधर जाएगा। सोमवार साहूकार पेठ के मरूधर केसरी दरबार मे महासती धर्मप्रभा ने सैकड़ों श्रोताओं को धर्म उपदेश प्रदान करेंगे हुए कहा कि इंसान का ये मन ही तो है जो पाप,पुण्य कराता है। जीवन को नेक और अनेक रास्तों पर ले जाता है। मन की पवित्रता से जीवन आगे बढ़ता है।परन्तु जीवन में मन ही है जो भटकता है,और मनुष्य के जीवन को भी भटकाता है। यदि मन वश में हो जाए तो मनुष्य जीवन का उत्थान करवा सकता है। तीर्थंकरो की वाणी हमनें कितनी ही बार सुनी, उसका मन पर फर्क नही पड़ता है। और मन पर असर भी नहीं करती है। भगवती सूत्र मे बताया कि मन अति चंचल है उसे वश में करना अत्यंत कठिन है, परन्तु मनुष्य के लिए असंभव भी नहीं है। जब पत्थर की मूर्ति मंदिर में जाती है तो वह परमात्मा बन जाती है और हम मंदिर जाकर लौटते हुए जिदंगी बीत जाती है,लेकिन पत्थर ही बने रहते है। मनुष्य लगातार प्रयत्न एवं प्रयास करेगा तो...
इन्द्रियों पर काबू करने वाला व्यक्ति परमात्मा को प्राप्त कर सकता है सोमवार को अहिंसा भवन शास्त्री नगर मे विदुषी साध्वी प्रिती सुधा ने सैकड़ों श्रध्दांलूओ को धर्म उपदेश देतें हुए कहा कि इंद्रियां मनुष्य को अपना दास बनाती हैं,जो व्यक्ति अपने इंद्रियों पर विजय पा लेता है वह संसार को भी जीत सकता है। ये इंद्रिया व्यक्ति को आलसी बनाती हैं उसे अपना आसक्त बना लेती है. व्यक्ति इंद्रियों के बस में आकर उनकी ही पूर्ति करने के लिए गलत मार्ग को अख्तियार करके अपना पतन कर लेता है। वह समझ ही नहीं पाता है कि सही क्या है और गलत क्या है। जब तक मनुष्य के समझ में आता है तब तक उसका समय निकल चुका होता है. तब व्यक्ति के पास हाथ मलने के अलावा कोई उसके पास दूसरा चारा नहीं बचता है। इन इंद्रियों को वश में करना आसान काम नहीं है लेकिन मनुष्य ज्ञान और अध्यात्म का सहारा लेकर इन्द्रियों की शक्ति को पहचान सकता और इन इन्द्रिय...
🏰☔ *साक्षात्कार वर्षावास* ☔🏰 *ता :06/8/2023 शनिवार* 🛕 *स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई* 🪷 *विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, दीक्षा दाणेश्वरी प.पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.* के प्रवचन के अंश 🪔 *विषय अभिधान राजेंद्र कोष भाग 7*🪔 ~ पूर्व के अनेक भवों में देह की मृत्यु अनेक बार हुई थी अब इस भव में हमारे कर्म और अज्ञान की मृत्यु होनी ही चाहिए। ~ सन्लेखना यानी साक्षी भाव की श्रेष्ठ दशा जिसके बल से हमारे मन के अच्छे विचार और बुरे विचारों से भी पूर्ण रूप से मुक्त हो सकते हैं। ~संलेखना यानी:- सत्य जीवन की महिमा, सत्य जीवन का विचार और सत्य जीवन का आचार । ~संलेखना से साधक परम समाधि भाव को प्राप्त करता है और समाधि के बल ...
श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में कर्नाटक तप चंद्रिका प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने बताया अत्यंत जाज्वल्यमान भयंकर अग्नि शरीर में प्रगट होती है। यह शरीर में रहकर आत्मा के नंदनवन गुणों को जला देती है। सक्रिय क्रोध बाहर से गर्म होता और अंदर से ठंडा रहता है जैसे कपबशी। निष्क्रिय क्रोध बाहर से ठंडा होता है और अंदर से गर्म होता है जैसे केलावड़ा के समान। कभी भी क्रोध नहीं होना चाहिए, नहीं तो हमारा जीवन बर्बाद होता है। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने बताया ईर्ष्या मत करो, क्रोध और मान को जीतो, तो ही हमारा कल्याण होगा। आये हो तो कुछ ना कुछ झोली भर लो, खाली नहीं जाना है। अध्यक्ष विजयराज चुत्तर ने स्वागत किया। मंत्री हस्तीमल बाफना ने संचालन किया।